भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 332

३२२ भक्तसुधा महानुभावोंको दूसरोंको दुःखमें देखकर खेद हुआ ही करता है। इसीसे उदयनाचार्यजीने जो नास्तिकमतका खण्डन किया है, वह उन्हें भगवत्सुखसे वंचित देखकर करुणावश ही किया है—द्वेषके कारण नहीं किया। देखो महर्लोकनिवासी जीवोंको किसी प्रकारका कष्ट नहीं होता; परंतु वे जो अपनेसे नीचेके लोगोंको परमात्मसुखसे वंचित देखते हैं, इससे तो उन्हें खेद होता ही है। वस्तुतः देखा जाय तो हमलोग भी नास्तिकप्राय ही हैं। यदि भगवान्‌की सत्तामें हमारा पूरा विश्वास होता तो हमें लुक-छिपकर पाप करनेका साहस कैसे होता? भगवान् तो अन्तर्यामी हैं, वे तो हमारी मानसिक क्रियाको भी जानते हैं। अतः ऐसी परिस्थितिमें हमारे मनकी भी दुष्प्रवृत्ति कैसे हो सकती है? इस प्रकार यदि सच पूछा जाय तो हमसे तो नास्तिक ही अच्छे हैं। हम तो ऊपरसे आस्तिकताका दावा करते हुए वस्तुतः नास्तिक हैं, किंतु वे प्रत्यक्ष अपना दोष स्वीकार कर लेते हैं। अतः सिद्ध हुआ कि भगवान्‌का निराकरण करना—यह मायामोहित जीवोंका स्वभाव ही है। श्रीमद्भागवतादिमें यह प्रसिद्ध ही है कि गर्भावस्थामें जीवको भगवान्‌का प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाता है। उस समय उसे अपने पूर्वजन्मोंकी भी स्मृति होती है और वह समझता है कि मैं भगवान्‌से विमुख रहनेके कारण ही अनन्त जन्मोंमें भटकता रहा हूँ। उस समय वह भगवान्‌की प्रार्थना करता है। पूर्वजन्मोंमें भी उसने इसी प्रकार सहस्रों बार प्रार्थना की थी; परंतु संसारमें पदार्पण करते ही उसे उसका कुछ भी ध्यान नहीं रहा। अतः यह देखकर कि मैं अनन्त बार प्रभुके प्रति अपनी प्रतिज्ञा भुला चुका हूँ, उसे बहुत संकोच भी होता है; तथापि प्रभुका स्वभाव समझकर वह फिर भी उनके सामने रोता ही है। यही दशा भगवान्‌से मिलनेके लिये वनको जाते समय भरतजीकी थी— फेरति मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी॥ जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ॥ (रा०च०मा० २।२३४।५-६) अहा! प्रभुका स्वभाव कैसा करुणामय है! उन्हें अपराधका तो स्मरण ही नहीं होता, किंतु थोड़े-से भी उपकारको वे बारम्बार स्मरण करते हैं— रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की॥ (रा०च०मा० १।२९।५) अतः प्रभुका ऐसा स्वभाव समझकर ही जीव उस समय उनसे प्रार्थना करता है कि भगवन्! अब मैं अवश्य आपके चरणोंका समाश्रयण करूँगा। मैं आपको भूलकर बहुत भटक चुका हूँ, अब ऐसी भूल नहीं करूँगा। परंतु गर्भसे बाहर आते ही वह फिर प्रभुको भूल जाता है। यदि थोड़ी-सी विद्या या वैभव मिल गया तो फिर तो सीधे-सीधे प्रभुका निराकरण करने लगता है। परंतु भगवान् तो उनका भी अमंगल नहीं चाहते। वे जानते हैं कि 'ये अज्ञ हैं; मेरी मायासे मोहित हो रहे हैं।' इसीसे यह प्रार्थना की जाती है कि 'मैं ब्रह्मका निराकरण न करूँ और ब्रह्म मेरा निराकरण न करे।' किंतु भगवान्‌का निराकरण न करना अपने हाथकी बात नहीं है। यह तो भगवत्कृपासाध्य ही है। वह भगवत्कृपा तभी हो सकती है; जब हम भगवान्‌की आज्ञाका पालन करें और शास्त्र ही भगवान्‌की आज्ञा है— श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे यस्त उल्लंघ्य वर्तते। आज्ञाच्छेदी मम द्रोही मद्भक्तोऽपि न वैष्णवः ॥ सच्चा भगवत्प्रेमी वही है, जो शास्त्रका उल्लंघन नहीं करता अतः सच्चा भगवत्प्रेमी वही है, जो शास्त्रका उल्लंघन नहीं करता। वैष्णवधर्मका लक्षण करते हुए कहा है— 'न चलति निजवर्णधर्मतो यः सममतिरात्मसुहृद्विपक्षपक्षे।' (श्रीविष्णुपुराण ३।७।२०)

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