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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासलीलारहस्य ३२३

वस्तुतः भगवत्कृपा तो सर्वत्र समान रूपसे विद्यमान है। उसे केवल अभिव्यक्त करना है और वह अभिव्यक्ति भगवदाज्ञा-पालनसे ही हो सकती है। श्रीगोसांईजी महाराज कहते हैं—'अग्या सम न सुसाहिब सेवा।' (रा०च०मा० २।३०१।४) जिस समय भरतजी भगवान्‌को लौटानेके लिये चित्रकूटपर्वतपर गये, उस समय उनका विशेष आग्रह देखकर भगवान्‌ने कहा कि 'भरत, तुम जैसा कहो वैसा ही करूँ।' उस समय भरतजीने यही सोचा कि मुझे अपने सुख-दुःखका विचार न करके भगवान्‌की आज्ञाका ही प्राधान्य रखना चाहिये; क्योंकि सेवकका धर्म तो स्वामीकी आज्ञाका पालन करना ही है। इधर व्रजांगनाओंका व्रत भी तत्सुखसुखित्व ही था। वृन्दावनसे मथुरा कुछ दूर नहीं थी; परंतु भगवान्‌की इच्छा न देखकर उन्होंने मरणसे भी सहस्रगुण दुःखदायिनी वियोग-व्यथा तो सहन की, किंतु वे मथुरा नहीं गयीं। अतः सेवकका प्रधान कर्तव्य तो स्वामीकी आज्ञाका पालन करना ही है। प्रभु-मिलनकी तीव्र उत्कण्ठा होना बड़े सौभाग्यकी बात है जिस समय भगवान् देखते हैं कि मेरा भक्त मुझसे मिलनेके लिये अत्यन्त उत्सुक है, उस समय वे उसे अपनी माधुरीका थोड़ा-सा रसास्वादन करा देते हैं। ऐसा वे इसीलिये करते हैं, जिससे कि उस उपासककी भगवन्मिलनकी तृष्णा और भी अधिक तीव्रतर हो जाय। इसीसे भगवान्‌का भजन करनेवालोंको कभी-कभी कुछ विलक्षण आनन्दका अनुभव हुआ करता है; परंतु वह स्थिर नहीं रहता। वह भजनानन्द तो प्रभु-प्रेमकी आसक्तिके लिये है। जिस प्रकार किसी कामुक पुरुषको कामिनी-सौन्दर्यका थोड़ा- सा भी व्यसन हो जानेपर फिर उसे कितना ही समझाया जाय, वह उसे छोड़ नहीं सकता, उसी प्रकार जिसे भजनानन्दकी थोड़ी-सी भी चाट लग गयी है, उसे संसारका कोई भी सुख आकर्षित नहीं कर सकता।

देखो—जिस समय नारदजीने देखा कि मेरी माताका देहावसान हो गया तो वे यह समझकर कि मेरा भगवद्भजनका एकमात्र प्रतिबन्ध नष्ट हो गया, बहुत प्रसन्न हुए और तत्काल वनको चल दिये। वहाँ इन्द्रियोंका निरोधकर दीर्घकालतक भगवद्भजन करते रहे। इसी समय एक दिन भगवान्‌ने उन्हें अपनी मधुरिमाका यत्किंचित् रसास्वादन कराया। परंतु वह आनन्द बहुत जल्दी तिरोहित हो गया। इससे नारदजी बड़े व्यग्र हुए। उन्होंने बहुत यत्न किया, परंतु पुनः उस रसका समास्वादन न कर सके। उन्होंने प्रभुसे बहुत अनुनय-विनय की, वे बहुत विह्वल हुए, परंतु प्रभुने फिर कृपा न की। वास्तवमें तो प्रभुकी यह कठोरता ही परम कृपा थी। भगवान्‌की सबसे बड़ी कृपा तो यही है कि जीव उनके लिये अत्यन्त तृषित हो जाय। यह तो परम सौभाग्य है। हमलोग स्त्री, धन आदिके लिये निरन्तर शोक- समुद्रमें डूबे रहते हैं, किंतु प्रभुके लिये हमारा अन्तःकरण कभी द्रवीभूत नहीं होता। न जाने वह समय कब आयेगा, जब प्रभुके विप्रयोगानलमें दग्ध होकर हमारा एक-एक पल एक-एक कल्पके समान व्यतीत होगा। भावुकोंकी स्थिति ऐसी ही विलक्षण हुआ करती है। अतः भगवान्‌ने देखा कि नारदके प्रेमका अभी शैशवकाल है। अभी इसके पनपनेकी आवश्यकता है। जिस समय जतु (तरल लाख)-के समान इसका अन्तःकरण सर्वथा द्रवीभूत हो जायगा, उसी समय यह मेरा यथावत् प्रेम प्राप्त कर सकता है। इसलिये भगवान्‌ने यह कठोरता धारण की थी। उनकी यह कठोरता भी कोमलता थी। प्रभुने थोड़ा-सा रसास्वादन इसीलिये कराया था, जिससे उनकी तृषा खूब बढ़ जाय; क्योंकि बिना रस-परिचयके उसमें प्रवृत्ति नहीं होती। इसी प्रकार जब भगवान् कृष्णने देखा कि मेरे उपेक्षाके वचन सुनकर गोपांगनाएँ कुछ उदास हो चली हैं, उन्हें आश्वासन देनेके लिये उन्होंने कहा—

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