भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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३२४ भक्तिसुधा अथवा मदभिस्नेहाद् भवत्यो यन्त्रिताशयाः। आगता ह्युपपन्नं वः प्रीयन्ते मयि जन्तवः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।२३) पहली उत्थानिकामें कहा जा चुका है कि जब प्राणी बहुत कालतक भगवच्चिन्तन करते रहनेपर भी भगवत्कृपासे वंचित रहता है तो उसकी लगनमें कुछ शिथिलता आ जाती है। हम रूप-रसादि शब्दोंका जितना ही अधिक सेवन करेंगे, उतनी ही उनके प्रति हमारी तृष्णा बढ़ती जायगी। शास्त्रालोचनकी भी ऐसी ही बात है। जिन्हें शास्त्रावलोकनका व्यसन हो जाता है, उनसे फिर उसके बिना रहा नहीं जाता। इसी प्रकार जो लोग निरन्तर भगवच्चरित्रोंका श्रवण- कीर्तन करते रहते हैं, उनका भी उसमें सुदृढ़ अनुराग हो जाता है। ऐसा अनुराग सनकादिमें था। आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं॥ (रा०च०मा० ७।३२।६) किंतु यदि भगवद्भजन कुछ कालके लिये छूट जाता है तो उसका स्वारस्य भी कुण्ठित हो जाता है—उसका फिर नये सिरेसे अभ्यास करना होता है। इसीसे योगसूत्रकार महर्षि पतंजलिने कहा है—'स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः॥' (योगदर्शन १।१४) आप चाहे भगवच्चरित्रोंका श्रवण-मनन करें, चाहे कर्मनिष्ठाको दृढ़ करें, चाहे योगाभ्यासमें प्रवृत्त हों और चाहे वेदान्तश्रवण करें— सभीको दीर्घकालतक आदरपूर्वक सेवन करनेकी आवश्यकता है। यदि आपको खिचड़ी बनानी है तो उसके लिये जैसी और जितनी अग्निकी जितनी देरतक आवश्यकता है यदि उतनी अग्नि न देंगे अथवा बीच-बीचमें अग्निसंयोगको रोक देंगे तो खिचड़ी कभी बन ही न पायेगी। इसी प्रकार भगवद्भजनमें सफलता प्राप्त करनेके लिये भी दीर्घकालतक निरन्तर पर्याप्त अभ्यासकी अपेक्षा है। इसी तरह यदि दीर्घकालतक भगवच्चरणस्मरण और भगवत्स्वरूपानुध्यान करते रहोगे तो उसका व्यसन हो जायगा और यह व्यसन ही परम सौभाग्य है। 'पुंसो भवेद् यहिं संसरणापवर्ग- स्त्वय्यब्जनाभसदुपानया मतिः स्यात्॥' (श्रीमद्भा० १०।४०।२८) परंतु यदि दीर्घकालतक प्रियतमके सम्मिलनकी चाह लगी रहे—प्रभुसे मिलनेकी उत्कण्ठा उत्तरोत्तर बढ़ती जाय तो यह बड़े ही सौभाग्यकी बात है। ऐसी प्रीति तो चातक और मीनमें ही देखी जाती है। जग जस भाजन चातक मीना। नेम पेम निज निपुन नबीना॥ (रा०च०मा० २।२३४।३) चातकका एक ही नियम है। वह स्वाति-बूँदको छोड़कर दूसरे जलकी ओर कभी दृष्टिपात भी नहीं करता। उसके अभावमें वह निर्मल-नीर-प्रपूरित सरोवरके तटपर भी पीऊ-पीऊ रटते-रटते मर जायगा, परंतु अन्य जल कदापि ग्रहण न करेगा। अपने एकमात्र प्रियतम पयोधरको छोड़कर वह किसीसे याचना नहीं करता। परंतु वह पयोधर उसे क्या देता है? खूब गर्ज-तर्जकर ओलोंकी वर्षा करता है और बिजली भी गिरा देता है। जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ॥ (रा०च०मा० २।२०५।३) परंतु उसकी तो एक ही टेक रहती है। क्या उसे जलकी कमी है? नहीं, परंतु यदि उसे अमृत भी दिया जाय तो भी वह अपना नियम भंग नहीं कर सकता। चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़ें प्रेमु सब भाँति भलाई॥ (रा०च०मा० २।२०५।४) यही दशा मीनकी है। वह तो एक क्षणके लिये भी अपने प्राणाधार जलका वियोग सहन नहीं कर सकता। इसी विषयमें कविकी उत्प्रेक्षा है— आपदिरेऽम्बरपथं परितः पतङ्गा भृङ्गा रसालमुकुलानि समाश्रयन्ति। संकोचमञ्चति सरस्त्वयि दीनदीनो मीनो नु हन्त कतमां गतिमभ्युपैतु॥ (सुभाषितरत्नभाण्डागार) 'अरे सर! इस समय तो तुममें बड़े दिव्यातिदिव्य पुष्प विद्यमान हैं। इसीसे तेरे बहुत-से साथी बने हुए