भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासलीलारहस्य [३२५]

हैं। परंतु जब तू क्षीण हो जायगा, तुझमें खिले हुए कमल कुम्हला जायँगे; तब ये हंस तुझे छोड़कर गगनमण्डलमें विहार करने लगेंगे और ये भ्रमर, जो तेरे परम प्रेमी बने हुए हैं, वे भी तुझे छोड़कर रसाल- मुकुलका ही आश्रय लेंगे। परंतु बता, यह मीन कहाँ जायगा ? इसे तेरे साथ ही—नहीं, नहीं, तुझसे भी पहले सूख जाना होगा।' साधन-कार्यमें श्रद्धा (उत्साह)-की बड़ी आवश्यकता है इस प्रकार प्रेमास्वादन करनेवालोंमें प्रधान तो चातक और मीन ही हैं। अन्य प्रेमियोंमें तो इस तरहका एकांगी प्रेम प्रायः देखा नहीं जाता। लोकमें यह कहावत प्रसिद्ध ही है कि 'एक हाथसे ताली नहीं बजती' वहाँ तो प्रेमके बदलेमें प्रेम किया जाता है। अतः दोनों ओरसे प्रेमकी अपेक्षा होती है। इसलिये जब प्राणी भगवान्‌के सम्मिलनकी आकांक्षासे कुछ कालतक भगवच्चिन्तनमें तत्पर रहता है और फिर भी भगवान्‌की ओरसे उसे कोई सहारा नहीं मिलता तो उसका धैर्य भग्न हो जाता है और उसकी श्रद्धा शिथिल पड़ जाती है। साधनमार्गमें श्रद्धाकी बड़ी आवश्यकता है। योगदर्शनमें श्रद्धाका अर्थ उत्साह किया है। वहाँ बतलाया है कि वह माताके समान योगीपर अनुग्रह करता है। बिना श्रद्धा या उत्साहके साधनमार्गमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती। अतः श्रद्धापूर्वक स्वाध्याय और अभ्यासमें तत्पर रहनेकी आवश्यकता है। भगवन्मार्गमें शीघ्रतर प्रगति होनेके लिये स्वाध्याय और योगाभ्यास दोनोंहीके क्रमिक अनुष्ठानकी अपेक्षा है। स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात्स्वाध्यायमावसेत्। स्वाध्याययोगसम्पत्त्या परमात्मा प्रकाशते ॥ (श्रीविष्णुपुराण ६।६।२) यदि तुम निरन्तर ध्यानपरायण होकर आरम्भसे ही चार घण्टेकी समाधि लगानेका प्रयत्न करोगे तो उसमें कभी सफल न हो सकोगे। पहले-पहले केवल पाँच मिनट ध्यानका अभ्यास करो; फिर पाँच मिनट स्वाध्याय करो। इस प्रकार ध्यान और स्वाध्यायका साथ-साथ अभ्यास करते हुए क्रमशः ध्यानकालमें वृद्धि करो। ध्यानके बढ़नेपर धीरे-धीरे स्वाध्यायमें कमी कर सकते हो। उससे पहले यदि स्वाध्याय छोड़कर केवल ध्यानमें ही लगोगे तो ध्यान तो होगा नहीं, केवल मनोराज्य या तन्द्रामें समयका अपव्यय होगा। स्वाध्याय क्या है ? अपने प्रियतमके स्वरूपका परिचायक अध्ययन ही स्वाध्याय कहलाता है। यदि तुम भगवान् कृष्णका साक्षात्कार करना चाहते हो तो श्रीसूरदासजीके उन पदोंका पाठ करो, जिनमें भगवान्‌के दिव्यातिदिव्य स्वरूपसौष्ठवका वर्णन किया गया है अथवा श्रीमद्भागवतसे भगवान्‌की दिव्य-मंगलमयी मूर्तिकी स्फूर्ति करनेवाले अंशोंका परिशीलन करो। उसके मननसे जब तुम्हारी मनोवृत्ति ध्येयाकार हो जाय तो जितने काल वह स्वरूप मानस नेत्रोंके सामने रह सके, उतने समयतक ध्यान करो। फिर जब ध्यानमें शिथिलता आये तो स्वाध्याय करो। इसी प्रकार निर्गुणोपासकोंको भी 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय० २।१) आदि वाक्योंका मनन करते हुए ही ध्यानाभ्यासमें प्रवृत्त होना चाहिये। इस तरह स्वाध्याय और ध्यानका क्रमिक अभ्यास करनेसे ही प्रभुके स्वरूपकी स्फूर्ति जल्दी हो सकती है। जब बहुत काल अभ्यास करते रहनेपर भी भगवत्स्वरूपकी स्फूर्ति नहीं होती तो साधक बहुत निरुत्साह हो जाता है। उसका उत्साह बनाये रखनेके लिये ही स्वाध्यायकी आवश्यकता है। बहुत-से लोग भिन्न-भिन्न महात्माओंके पास जाकर साधनकी बात पूछा करते हैं। उन्हें कोई कुछ साधन बतलाता है और कोई कुछ दूसरा साधन बतला देता है। वे कुछ दिनतक साधनका अवलम्बन करते हैं और उसमें असफल होनेपर निरुत्साह हो जाते हैं। उनका हृदय विषादग्रस्त हो जाता है। किंतु विषादसे कोई लाभ नहीं होता। लाभ तो साधन- मार्गमें चलनेसे ही होगा। विषादसे शोक-मोहके