भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 336, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 336

सिवा और कुछ हाथ नहीं लगता। इसलिये साधकको विषाद नहीं करना चाहिये। जिस समय तुम्हारा साधन पूरा होगा, उस समय साध्य अवश्य मिलेगा; उसके लिये उतावले क्यों होते हो ? तनिक हिरण्यकशिपुके तपकी ओर ध्यान दो। उसके शरीरको पिपीलिकाओंने छलनी कर दिया था, मांस सर्वथा सूखकर केवल अस्थि-चर्ममात्र रह गये थे; तो भी वह निरुत्साह नहीं हुआ। वह कहता है कि ‘काल नित्य है और आत्मा नित्य है; अतः यदि शरीर नष्ट भी हो जाय तो कोई चिन्ता नहीं, हम तपस्यासे पीछे नहीं हटेंगे। यह है तपस्याका उत्साह।’ देखो, वे लोग राक्षस थे, किंतु उनकी धारणा कैसी स्थिर थी। हमलोग दस दिन माला फेरते हैं और कोई आनन्दानुभव न होनेके कारण समय और मन्त्रको दोष देने लगते हैं। किंतु यह हमारी भूल है। हमें दृढ़तापूर्वक अपने साधनपर डटे रहना चाहिये। एक वैश्य व्यापारको अपना सर्वस्व समझता है। व्यापार करनेमें वह अपनी सर्वस्व रक्षा मानता है और व्यापार न करनेमें सर्वस्वका नाश समझता है। इसीसे वह धन, स्त्री, गृह और देशकी भी उपेक्षा करके विदेशमें चला जाता है तथा अपने कारोबारके लिये दिन-रात एक कर देता है। लोग कहते हैं— ‘महाराज ! भजन करते हैं तो निद्रा बहुत सताती है।’ किंतु तनिक स्टेशनमास्टर और खजांचियोंसे तो पूछो, उन्हें कितनी निद्रा आती है ? वे जानते हैं कि थोड़ा- सा भी प्रमाद होनेसे हानि होनेकी सम्भावना है। वे दो-चार रुपयेकी हानिकी आशंकासे रातभर जागते रहते हैं। इसी प्रकार तुम्हें भी यदि भजनमें ढील होनेपर हानिकी आशंका होती तो आलस्य कैसे आ सकता था ? जिसे तीव्र क्षुधा या तीव्र पिपासा होती है, उससे कब बैठा जाता है? इसी प्रकार यदि भगवत्तत्त्वके न जाननेमें अपनी हानि सुनिश्चित हो और उसके ज्ञानमें अपना परम लाभ निश्चित हो तो प्रमाद हो ही नहीं सकता। भगवती श्रुति कहती है— ‘इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।’ (केन० २।५) याद रखें—यदि इस मनुष्यजन्ममें आप भगवान्‌का साक्षात्कार न कर सके तो ‘महती विनष्टिः’— सर्वस्वनाश हो जायगा; क्योंकि जब दो रुपयेकी हानिकी आशंकासे रातको नींद नहीं आती तो सर्वस्वनाशकी आशंका होनेपर कैसे आलस्य सतायेगा ? हमें जो काम करना है, उसकी आवश्यकताका अनुभव करना चाहिये। भगवद्भजनमें सर्वस्व लाभ है और उसकी उपेक्षामें सर्वनाश है—जबतक ऐसा सुदृढ़ निश्चय न होगा, भजनमें प्रगति कैसे होगी ? सामान्य रूपसे यह बात सभीको निश्चित है कि एक दिन अवश्य मरना होगा। परंतु यह निश्चय रहते हुए भी साठ-साठ वर्षके बूढ़े भी दुराचार, दम्भ और पापसे निवृत्त नहीं होते। इसमें क्या हेतु है?—मोह। मोह ही उन्हें मृत्युकी घड़ीका विस्मरण करा देता है। एक तो इस प्रकारका मृत्युका सामान्यरूपेण निश्चय और दूसरा अपने पुत्र या बन्धुकी मृत्युको देखकर होनेवाला वैराग्य—क्या ये दोनों समान हैं? हमें भी अपनी मृत्युका निश्चय है; परंतु क्या हम उसकी ओरसे निश्चिन्त नहीं हैं? किंतु यदि हमें राजाज्ञा हो जाय कि आजसे पाँचवें दिन तुम्हें फाँसी दे दी जायगी तो फिर क्या पाँच दिनतक हमें नींद आ सकती है ? अतः हमें ऐसा अभिमान न करना चाहिये कि हम परमार्थ-विषयको जानते ही हैं, हमें सत्पुरुष या सच्छास्त्रोंके संगकी क्या आवश्यकता है? यदि तुम ऐसा सोचोगे तो तुम्हारी प्रगति शिथिल पड़ जायगी। नहीं, इनका संग तो विवेक और वैराग्यको उद्दीपन करनेवाला है। इस उद्दीपनकी बहुत आवश्यकता है। हमें विचारशक्तिको निरन्तर जाग्रत् रखना चाहिये। इस प्रकार जब भजनकी आवश्यकता सुनिश्चित रहेगी तो भजनमें प्रमाद न होगा। यह कोई जादू-टोना या मन्त्र नहीं है, यह तो युक्ति और अनुभवसिद्ध बात है। उत्साह-भंग होनेसे