भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पुरुष निर्वीर्य हो जाता है; अतः उत्साहको स्थिर बनाये रखना चाहिये। सुनते हैं ध्रुवजीको छः महीनेमें ही भगवान्‌का दर्शन हो गया था। जिस समय भगवान् उनके समक्ष प्रकट हुए, ध्रुवने कहा—'भगवन्! मैं तो सुनता था, आप बड़े दुराराध्य हैं, परंतु मुझपर आपने इतनी शीघ्र कृपा कर दी।' भगवान्‌ने कहा—'ध्रुव, तुम यह मत समझो कि हम छः मासमें ही मिल गये हैं; आओ देखो, हमारी प्राप्तिके लिये तुम्हारे कितने शरीर शुष्क हुए हैं।' ध्रुवजीने दिव्य-दृष्टिसे देखा कि उनके सहस्रों शरीर कन्दराओंमें सूखे हुए पड़े हैं। भगवान् बुद्धकी तो प्रतिज्ञा थी— 'इहासने शुष्यतु मे शरीरम्।' भगवत्प्राप्तिका एकमात्र साधन— भगवत्सम्मिलनकी तीव्रतर अभिलाषा—एक दृष्टान्त अतः असफलतासे हताश मत हो। साधनमें लगे रहो। देखो—वायुयान आदि लौकिक पदार्थोंके आविष्कारमें भी कितने समय, धन, जन-समुदायका क्षय हुआ है। भगवत्प्राप्ति तो उसकी अपेक्षा कहीं अधिक मूल्यवान् है। बस, लगे रहो, भगवान् अवश्य कृपा करेंगे। तुमने टिट्टिभकी गाथा सुनी होगी। समुद्र उसके अण्डेको हर ले गया था। इससे कुपित होकर उसने समुद्रको सुखा डालनेका निश्चय किया। वह अपने पंजेमें बालू भरकर समुद्रमें डाल देता और चोंचसे एक बूँद पानी लेकर समुद्रसे बाहर डाल देता। उसने दृढ़ निश्चय कर लिया कि चाहे कितने ही जन्म बीत जायँ समुद्रको अवश्य सुखा डालना है। यह सब लीला देवर्षि नारदजीने भी देखी और टिट्टिभकी दुर्दशा देखकर उन्हें उसपर बड़ी दया आयी। उन्होंने यह सारा समाचार पक्षिराज गरुड़को सुनाया और उन्हें अपने सजातियोंकी सहायता करनेके लिये उत्तेजित किया। फिर क्या था? पक्षिराजके तो पर मारते ही समुद्रमें खलबली पड़ गयी; उसे तुरंत हार माननी पड़ी और टिट्टिभके अण्डे लाकर देने पड़े। यह समुद्रकी पराजय टिट्टिभके अपने प्रयत्नसे नहीं हुई थी। उसमें तो गरुड़जीकी सहायता ही कारण थी। परंतु यदि टिट्टिभ ऐसा हठ न करता तो गरुड़जी क्यों आते? इसी प्रकार जो लोग दत्तचित्त होकर तन-मनसे लग जाते हैं, उन्हींपर भगवान्‌की कृपा होती है और उसीसे वे भगवत्प्राप्ति करनेमें समर्थ होते हैं। भगवत्प्राप्तिका एकमात्र साधन तो भगवत्सम्मिलनकी तीव्रतर तृषा ही है; उस छटपटाहटके बिना भगवत्कृपा अत्यन्त दुर्लभ है। हठ वश शठ बहु साधन करहीं। भक्ति हीन भव सिन्धु न तरहीं॥ इस प्रकार दीर्घकालतक भगवान्‌के लिये सतृष्ण रहते-रहते भी जब साधकको प्रभुकी ओरसे कोई सहारा मिलता दिखायी नहीं देता तो वह श्रान्त हो जाता है, उसका हृदय कुछ अवसन्न हो उठता है। उस समय प्रभु उसपर अनुग्रह करते हैं। प्रभुके हृदयाकाशमें जो अनुग्रहरूप चन्द्र विराजमान है, प्रभुके मन्दहासके द्वारा उसकी शीतल किरणें साधकके सन्तप्त हृदयतक पहुँचकर उसे शान्त कर देती हैं। इस प्रकार प्रभुका अनुग्रह होनेपर साधकको कुछ आश्वासन प्राप्त होता है और वह चौगुने उत्साहसे साधनमें जुट जाता है। यही स्थिति यहाँ व्रजांगनाओंकी थी। वे लौकिक-वैदिक सभी प्रकारकी श्रृंखलाओंको तोड़कर भगवान्‌की सन्निधिमें आयी थीं; किंतु यहाँ उनका इस प्रकार तिरस्कार हुआ। जिनके लिये उन्होंने सर्वस्व त्यागकर अनेकविध विघ्नोंका सामना किया था, वे ही ऐसे निष्ठुर भावसे उनकी उपेक्षा कर रहे हैं। ऐसी स्थितिमें उनके अनाश्वासका अवकाश है या नहीं? परंतु प्रभु बड़े कृपालु हैं। उनका तात्पर्य उनके तिरस्कारमें तो था ही नहीं। वे तो 'स्थूणानिखननन्याय' से अपने प्रति उनकी निष्ठाकी परीक्षा कर रहे थे; वे तो उनकी निष्ठाको और भी सुदृढ़ करना चाहते थे। इससे यह नहीं समझना चाहिये कि व्रजांगनाओंके भावमें भी कोई न्यूनता रहनी सम्भव थी। वे तो