भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२८ भक्तिसुधा प्रेममार्गकी आचार्या हैं। मीन और चातकमें जो प्रेम उपलब्ध होता है, वह तो व्रजांगनाओंके प्रेमसुधासिन्धुका एक कणमात्र है। जीव और परब्रह्ममें जो प्रेमसम्बन्ध है, उस प्रेमका तो एक अंश भी मीन और चातकमें नहीं है। 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।' (बृहदारण्यक० २।४।५) किंतु हाँ, वह प्रेम तिरोहित अवश्य है तथा व्रजांगनाओंका भगवान्के प्रति जो अनुराग है, वह तो तत्त्वज्ञ महानुभावोंके आत्मप्रेमकी अपेक्षा भी कहीं बढ़कर है। हम कह चुके हैं— मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः। सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने ॥ (श्रीमद्भा० ६।१४।५) यद्यपि तत्त्वज्ञ भी प्रपंचका मिथ्यात्व निश्चय करके सजातीय, विजातीय और स्वगत-भेदशून्य परब्रह्ममें ही स्थित होते हैं तथापि चतुर्थ, पंचम और षष्ठ भूमिकावाले ज्ञानियोंका आत्मप्रेम भी उतना प्रौढ़ नहीं होता, जैसा कामुकोंका अपनी प्रेयसीके प्रति होता है। इसीसे विद्यारण्य स्वामीने जीवन्मुक्तिविवेकमें तत्त्वज्ञानके पश्चात् भी मनोनाशकी आवश्यकता बतलायी है, क्योंकि आत्मज्ञान हो जानेपर भी प्रारब्धकी प्रबलता रहनेके कारण विक्षेप बना ही रहता है। इसीसे चित्त ब्रह्मानुसन्धानसे हटकर विषयोंकी ओर चला जाया करता है। ज्ञानी लोग प्रपंचचिन्तनमें अनर्थ समझकर ही उसे उस ओरसे हटाकर पुनः ब्रह्मानुसन्धानमें जोड़ते रहते हैं। ऐसा करते हुए भी उनका चित्त कई बार आत्मानुसन्धानसे हटकर अनात्मपदार्थोंकी ओर चला जाता है। आत्मानुसन्धानमें उसकी स्वारसिक प्रवृत्ति नहीं होती। इसीके लिये योगाभ्यास किया जाता है। निरन्तर योगाभ्यास करते-करते ब्रह्मतत्त्वमें उसकी स्वारसिक प्रवृत्ति हो जाती है। ऐसा नारायण-परायण महापुरुष सुदुर्लभ है। व्रजांगनाओंकी ऐसी स्थिति स्वाभाविक थी। भगवान्के अनेक प्रकारसे तिरस्कार करनेपर भी उनकी मनोवृत्ति भगवान्से विचलित नहीं हो सकती थी। व्रजांगनाएँ तो परम सिद्ध थीं; उनके चरणकमल तो योगेश्वरोंके लिये भी वन्दनीय हैं। परंतु उन्हें लक्ष्य करके ही भगवान्ने सर्वसाधारणके कल्याणके लिये ऐसी कई बातें कही हैं, जिनकी वे पात्र नहीं थीं। हाँ, उनमें भी जो सुदृढ़ निष्ठावाली नहीं थीं, उनके लिये वे बातें उपयुक्त भी हो सकती हैं। भगवान्द्वारा व्रजांगनाओंको आश्वासन इस प्रकार कई बार भगवान्के उपेक्षा करनेपर सम्भव है व्रजांगनाओंको कुछ सन्ताप हुआ हो। अतः उन्हें अपनी अवहेलनासे कुछ खिन्न देखकर भगवान्ने उन्हें आश्वासन देनेके लिये कहा— अथवा मदभिस्नेहाद् भवत्यो यन्त्रिताशयाः। आगता ह्युपपन्नं वः प्रीयन्ते मयि जन्तवः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।२३) 'मैंने जो तुम्हारे विषयमें तरह-तरहके पक्षोंकी कल्पना कर रखी थी, वह व्यर्थ थी। मैं अब समझा; आप तो हमारे प्रेमसे आकृष्ट-चित्ता होकर ही हमसे मिलने आयी हैं।' व्रजांगनाएँ वस्तुतः प्रेमके प्रवाहमें बहकर ही आयी थीं; वे स्वयं अपनी इच्छासे वहाँ नहीं आयीं। भगवान्के मुखारविन्दसे वेणुनादके रूपमें निःसृत जो प्रेमतत्त्व था, उसीने उन्हें खींच लिया था। व्रजांगनाओंका अन्तःकरण तो स्वयं ही प्रेमामृतपूरित एक महासरोवरके समान था; किंतु वह अनेकविध प्रतिबन्धसे निबद्ध था। उसे लौकिक-वैदिक मर्यादारूप बहुत-से बाँधोंने मर्यादामें रोक रखा था, किंतु जब यहाँ श्यामघनने वेणुनादरूप गर्जन करते हुए दिव्यातिदिव्य रसका वर्षण किया तो उससे गोपांगनाओंके हृदयस्थ प्रेमसमुद्रका बाँध टूट गया। उसमें ऐसी बाढ़ आ गयी कि वह और अधिक काल मर्यादामें न रह सका। व्रजांगनाओंने अपनी मर्यादाकी यहाँतक रक्षा की थी कि शरीरकी सुध-बुध भूल जानेपर भी उन्होंने अपनी गोपजातिके लिये विहित लौकिक-वैदिक कृत्योंकी उपेक्षा नहीं की। वे दधिमन्थनादि गृहकृत्य करती ही रहीं। हाटमें गोरस बेचने जातीं, किंतु प्रेमविभोर होकर 'दही लो' कहनेके बदले 'श्याम लो' पुकारने लगतीं ! इससे हमलोगोंके लिये उन्होंने यही उपदेश दिया है