भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य ३२९ कि हमें अपने शास्त्रोक्त स्वधर्मका पालन करते हुए ही भगवत्प्राप्तिका प्रयत्न करना चाहिये। 'दुहन्त्योऽभिययुः काश्चिद् दोहं हित्वा समुत्सुकाः।' (श्रीमद्भा० १०।२९।५) यहाँ जो सार्वत्रिक 'शतृ' प्रत्यय है, वह हेतुताका द्योतक है। अतः इसका तात्पर्य यही है कि भगवान्के वेणुनिनादसे आकर्षित होनेमें गोपियोंको गोदोहनरूप स्वधर्मानुष्ठान ही हेतु था। अतः हमारा यह बलपूर्वक कथन है कि आप किसी भी परिस्थितिमें रहें, अपने लौकिक-वैदिक कृत्योंका यथावत् पालन करते रहें। गोपांगनाओंका प्रेम अत्यन्त प्रौढ़ था; किंतु वे उसे छिपाये रहती थीं। उनका सिद्धान्त था— गुप्त प्रेम सखि सदा दुरैये। कुंजगलिन बिच अड़ये जड़ये॥ प्रेमी लोग प्रेमको सदा दुराते ही हैं। वह हठात् प्रकट हो जाय तो वशकी बात नहीं। अहा! श्रीवृषभानुनन्दिनीने तो अपने प्रेमको अन्तरतम सखियोंसे भी छिपाकर रखा था। वह उन्हें उनकी अचेतावस्थामें ही प्रकट होता था। अब, जब भगवान्ने देखा कि इनकी पूर्ण योग्यता है। ये मेरा रसास्वादन करनेकी पात्र हैं तो उन श्यामघनने वेणु-निनादसे अमृत वर्षणकर उनके हृत्समुद्रमें इतना रस भर दिया कि वह उसमें समा न सका। अहा! जिनके चरणनखसे निकली हुई श्रीगंगाजी वडवाग्निद्वारा सोखे हुए समुद्रको भरनेमें समर्थ हैं, उन्हीं श्यामघनने जब वेणुनादद्वारा प्रेममय अधर- सुधारसका वर्षण किया तो उसका प्रवाह इतना बढ़ा कि उसमें ब्रजांगनाएँ बह गयीं। यदि प्रबल प्रवाहमें पड़ी हुई नौकाको कोई नाविक रोकना चाहे तो वह रोक नहीं सकता। इसी प्रकार गोपांगनाओंको भी कोई रोक न सका। इसीसे भगवान् कहते हैं—'गोपिकाओ! अब मैं समझा। तुम तो मेरे प्रेमसे विवश होकर ही यहाँ आयी हो।' 'यन्त्रिताशयाः—वशीकृतान्तःकरणाः' अर्थात् जिनका अन्तःकरण किसीने अपने अधीन कर लिया हो। भगवान्के मधुमय वेणुनिनादरूप चौरने गोपांगनाओंके हृदय-भवनमें घुसकर उनके विवेकरूप धनको चुरा लिया था। इसीलिये उन्हें लौकिक-वैदिक मर्यादाका ज्ञान नहीं रहा। भगवान् कहते हैं—आपलोगोंने यद्यपि बड़ा प्रयत्न भी किया कि लोकमर्यादाका विच्छेद न हो; परंतु यह तो आपके वशकी बात नहीं रही थी। देखो, भ्रमर बहुत-से बन्धनोंको काट सकता है, कठोर काष्ठमें भी छिद्र कर देता है, परंतु पंकज- कोशको नहीं काट सकता। इस प्रकार आप भी प्रेमबन्धनको काटनेमें सर्वथा असमर्थ थीं। किंतु, प्रियतम! जब आप जानते हैं कि ये व्रजांगनाएँ प्रेमपाशमें बँधकर ही आपके पास आयी हैं तो आप इनपर कृपा क्यों नहीं करते? इसपर भगवान् कहते हैं—'मदभिस्नेहाद् भवत्यो यन्त्रिताशयाः' (श्रीमद्भा १०।२९।२३)—आप मेरे अभिस्नेहसे विवशचित्त हैं। 'अभितः स्नेहः अभिस्नेहः प्रीतिविशेषः' अर्थात् हे गोपांगनाओ! हम जानते हैं, आपलोग सहज स्नेहसे आयी हैं— किसी स्त्री-पुरुष-सम्बन्धिनी रतिके कारण नहीं आयीं। आपका प्रेम विशुद्ध है; उसमें कामका लेश नहीं है। मेरेमें तो केवल प्रेम है, कृति तो है नहीं। अतः वह तो हमारे दर्शनमात्रसे चरितार्थ हो गया। आपलोग यदि रमणाभिलाषासे आतीं तो अंग- संगकी आवश्यकता होती। आप यदि अंग-संगकी इच्छासे आतीं तो आपको ब्रह्मसंस्पर्श प्राप्त होता। आपका तो स्वाभाविक प्रेम है और मेरे प्रति प्रेम होना स्वाभाविक ही है; क्योंकि 'प्रीयन्ते मयि जन्तवः' मेरे प्रति जीवमात्रका प्रेम है। यह तो मेरा स्वभाव ही है; अतः इसमें कोई विशेषता नहीं है। यहाँ 'भवत्यः' शब्द पूजार्थक है। इसका तात्पर्य यह है कि आप तो प्रेमकी आचार्या और मुनिजनोंके लिये भी वन्दनीया हैं। मेरे प्रति तो स्वभावतः समस्त जीवोंका प्रेम है; फिर यदि आपका भी मेरेमें अनुराग हुआ तो इसमें विशेषता ही क्या है? इसलिये आपका प्रेम तो मेरे दर्शनमात्रसे ही