भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 340, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंचरितार्थ हो गया। 'जन्तु' पदसे यहाँ देहमें तादात्म्याध्यासवाले पामर और अनभिज्ञ प्राणी अभिप्रेत हैं; क्योंकि आत्मा तो वस्तुतः जन्म-मरणरहित है। वह 'जन्तु' शब्दका वाच्य नहीं हो सकता। जिस समय वह देहसे अपना तादात्म्य करता है, तभी 'जन्तु' कहा जाता है। मेरे प्रति तो उन पामर प्राणियोंका भी प्रेम है; क्योंकि मैं सभीका आत्मा हूँ और आत्मा नामकी वस्तु सभीको प्रिय हुआ ही करती है। यद्यपि जीव देहादिमें ही आत्मभाव कर लेते हैं तो भी मैं तो उनका भी परम-प्रेमास्पद हूँ। कहते हैं जिस समय रामभद्र वनको पधारे, उस समय अयोध्यामें जो स्त्रियाँ पुत्रहीना थीं, उन्हें भी जब प्रभुके वनगमनान्तर पुत्र-प्राप्ति हुई तो प्रभुके वियोगके कारण उससे कुछ प्रसन्नता नहीं हुई; जिनके पति चिरकालसे विदेश गये हुए थे, उन्हें उनका आगमन होनेपर भी कोई सुख न हुआ। यहाँतक कि पशु-पक्षी और स्थावरोंकी भी दुर्दशा ही रही। नदियाँ सूख गयीं और वृक्ष एवं लताएँ पत्र- पुष्पहीन हो गये। 'अपि ते विषये म्लाना सपुष्पाङ्कुरकोरकाः।' घोड़ोंकी दशा तो श्रीगोसाईंजी महाराजने लिखी ही है— जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही॥ जहँ असि दसा जड़न्ह कै बरनी। को कहि सकइ सचेतन करनी॥ (रा०च०मा० २।१४३।७; १।८५।३) यदि भगवान् राम कोई अन्य व्यक्ति होते तो सबको ऐसी बेचैनी क्यों होती? यद्यपि आपात दृष्टिसे यह भी कहा जाता है कि उन सबको यह ज्ञान भी नहीं था कि वे हमारे अन्तरात्मा ही हैं तथापि वस्तुस्थिति तो ऐसी ही थी। हमारी तो ऐसी भी आस्था है कि जिन्होंने भगवान् रामभद्रका दर्शन या स्पर्श किया था, उन्हें उनका अपने अन्तरात्मास्वरूपसे अवश्य ज्ञान हो गया था; क्योंकि प्रभुकी यह प्रतिज्ञा है— मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज स्वरूपा॥ (रा०च०मा० ३।३६।९) अतः जिन्हें उनका सान्निध्य प्राप्त हुआ था, उन्हें तो उस परमतत्त्वका लाभ अवश्य हो गया था, जो योगीन्द्रोंको भी दुर्लभ है। उन्हें जो स्वरूपानभिज्ञ कहा जाता है, वह लौकिकी दृष्टिको लेकर कहा जाता है। अन्यथा 'कस रे सठ हनुमान कपि' (रा०च०मा० ६।२६) भला मरुतनन्दन वीराग्रणी श्रीहनुमान्जी क्या बन्दर हैं? पक्षिराज जटायु क्या साधारण पक्षी हैं? भक्ताग्रगण्य काकभुशुण्डिजी क्या कोरे कौए ही हैं? केवल लौकिकी दृष्टिसे ही उन्हें पशु-पक्षी कहा जाता है। अहा! जिन्हें प्रभुका सान्निध्य प्राप्त हुआ था, उन कोल-किरात और भीलोंको भी प्रभुका जो परम दुर्लभ प्रेम प्राप्त हुआ था, वह क्या हमें अनायास प्राप्त हो सकता है? प्रभु कैसे प्रेमसे उनकी बातें सुनते थे!— बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन। बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन॥ (रा०च०मा० २।१३६) इससे यह सिद्ध होता है कि प्रभुका स्वरूप- ज्ञान किसीको हुआ हो अथवा न हुआ हो, उनके दर्शनमात्रसे उनके प्रति प्रेमातिशयका होना तो स्वाभाविक ही था। देखो खर और दूषण कैसे क्रूर राक्षस थे? वे अपनी बहनके अपमानसे क्षुभित होकर बदला लेनेके लिये ही आये थे। तथापि जिस समय उन्होंने प्रभुका रूप-माधुर्य देखा तो कहने लगे— जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा॥ (रा०च०मा० ३।१९।५) भगवान् तो साक्षात् अपने आत्मा हैं, जिन अन्य पदार्थोंमें भी आत्मत्वका विभ्रम हो जाता है, उनके प्रति भी अपार प्रेम हो जाता है। देखो—शरीरमें आत्मत्वका केवल भ्रम ही तो है; किंतु उसके लिये मनुष्य संसारकी सारी वस्तुओंको निछावर कर देता है।