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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

चरितार्थ हो गया। 'जन्तु' पदसे यहाँ देहमें तादात्म्याध्यासवाले पामर और अनभिज्ञ प्राणी अभिप्रेत हैं; क्योंकि आत्मा तो वस्तुतः जन्म-मरणरहित है। वह 'जन्तु' शब्दका वाच्य नहीं हो सकता। जिस समय वह देहसे अपना तादात्म्य करता है, तभी 'जन्तु' कहा जाता है। मेरे प्रति तो उन पामर प्राणियोंका भी प्रेम है; क्योंकि मैं सभीका आत्मा हूँ और आत्मा नामकी वस्तु सभीको प्रिय हुआ ही करती है। यद्यपि जीव देहादिमें ही आत्मभाव कर लेते हैं तो भी मैं तो उनका भी परम-प्रेमास्पद हूँ। कहते हैं जिस समय रामभद्र वनको पधारे, उस समय अयोध्यामें जो स्त्रियाँ पुत्रहीना थीं, उन्हें भी जब प्रभुके वनगमनान्तर पुत्र-प्राप्ति हुई तो प्रभुके वियोगके कारण उससे कुछ प्रसन्नता नहीं हुई; जिनके पति चिरकालसे विदेश गये हुए थे, उन्हें उनका आगमन होनेपर भी कोई सुख न हुआ। यहाँतक कि पशु-पक्षी और स्थावरोंकी भी दुर्दशा ही रही। नदियाँ सूख गयीं और वृक्ष एवं लताएँ पत्र- पुष्पहीन हो गये। 'अपि ते विषये म्लाना सपुष्पाङ्कुरकोरकाः।' घोड़ोंकी दशा तो श्रीगोसाईंजी महाराजने लिखी ही है— जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही॥ जहँ असि दसा जड़न्ह कै बरनी। को कहि सकइ सचेतन करनी॥ (रा०च०मा० २।१४३।७; १।८५।३) यदि भगवान् राम कोई अन्य व्यक्ति होते तो सबको ऐसी बेचैनी क्यों होती? यद्यपि आपात दृष्टिसे यह भी कहा जाता है कि उन सबको यह ज्ञान भी नहीं था कि वे हमारे अन्तरात्मा ही हैं तथापि वस्तुस्थिति तो ऐसी ही थी। हमारी तो ऐसी भी आस्था है कि जिन्होंने भगवान् रामभद्रका दर्शन या स्पर्श किया था, उन्हें उनका अपने अन्तरात्मास्वरूपसे अवश्य ज्ञान हो गया था; क्योंकि प्रभुकी यह प्रतिज्ञा है— मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज स्वरूपा॥ (रा०च०मा० ३।३६।९) अतः जिन्हें उनका सान्निध्य प्राप्त हुआ था, उन्हें तो उस परमतत्त्वका लाभ अवश्य हो गया था, जो योगीन्द्रोंको भी दुर्लभ है। उन्हें जो स्वरूपानभिज्ञ कहा जाता है, वह लौकिकी दृष्टिको लेकर कहा जाता है। अन्यथा 'कस रे सठ हनुमान कपि' (रा०च०मा० ६।२६) भला मरुतनन्दन वीराग्रणी श्रीहनुमान्‌जी क्या बन्दर हैं? पक्षिराज जटायु क्या साधारण पक्षी हैं? भक्ताग्रगण्य काकभुशुण्डिजी क्या कोरे कौए ही हैं? केवल लौकिकी दृष्टिसे ही उन्हें पशु-पक्षी कहा जाता है। अहा! जिन्हें प्रभुका सान्निध्य प्राप्त हुआ था, उन कोल-किरात और भीलोंको भी प्रभुका जो परम दुर्लभ प्रेम प्राप्त हुआ था, वह क्या हमें अनायास प्राप्त हो सकता है? प्रभु कैसे प्रेमसे उनकी बातें सुनते थे!— बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन। बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन॥ (रा०च०मा० २।१३६) इससे यह सिद्ध होता है कि प्रभुका स्वरूप- ज्ञान किसीको हुआ हो अथवा न हुआ हो, उनके दर्शनमात्रसे उनके प्रति प्रेमातिशयका होना तो स्वाभाविक ही था। देखो खर और दूषण कैसे क्रूर राक्षस थे? वे अपनी बहनके अपमानसे क्षुभित होकर बदला लेनेके लिये ही आये थे। तथापि जिस समय उन्होंने प्रभुका रूप-माधुर्य देखा तो कहने लगे— जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा॥ (रा०च०मा० ३।१९।५) भगवान् तो साक्षात् अपने आत्मा हैं, जिन अन्य पदार्थोंमें भी आत्मत्वका विभ्रम हो जाता है, उनके प्रति भी अपार प्रेम हो जाता है। देखो—शरीरमें आत्मत्वका केवल भ्रम ही तो है; किंतु उसके लिये मनुष्य संसारकी सारी वस्तुओंको निछावर कर देता है।

श्रीरासलीलारहस्य ३३१ अतः भगवान् कहते हैं कि इस प्रकार जब अज्ञ जन्तुओंका भी मेरे प्रति स्वाभाविक अनुराग है तो हे गोपिकाओ ! आप तो परम पूजनीया हैं। आपको मेरे प्रति प्रेम हुआ—इसमें तो कहना ही क्या है। आप जैसी प्रणयिनी, जो योगीन्द्रमुनीन्द्रवन्द्यपादारविन्दा हैं, यदि लौकिक-वैदिक बन्धनोंकी उपेक्षा करके हमारे प्रेमसे आकृष्ट होकर यहाँ पधारी हैं तो यह उचित ही है। इसपर गोपिकाओंकी ओरसे यह प्रश्न हो सकता है कि महाराज ! आपके प्रति तो सब प्रेम करते हैं, किंतु आप भी उनके लिये कुछ करते हैं या नहीं ? इसका उत्तर यही है कि ‘प्रीयन्ते प्रीतिमेव कुर्वन्ति न तु किञ्चिदपि मत्तोऽभिवाञ्छन्ति'—जीव मेरे प्रति केवल प्रेम ही किया करते हैं, मुझसे कुछ चाहते नहीं हैं। मेरे सम्मुख होते ही उनकी सारी कामनाएँ निवृत्त हो जाती हैं। देखो—विभीषण राज्यकी कामनासे भगवान्के सम्मुख आये थे, परंतु प्रभुका दर्शन करनेपर तो यही कहने लगे— उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥ (रा०च०मा० ५।४९।६) यदि कहो कि अच्छा, भक्त तो आपसे कुछ नहीं चाहते, परंतु आपको तो अपनी ओरसे उनका कुछ उपकार करना ही चाहिये। इसपर प्रभु कहते हैं— 'प्रीयन्ते मयि स्वरूपमात्रे न तु प्रत्युपकारिणी'— मुझ अपने स्वरूपमात्रमें उनका केवल प्रेम ही होता है, वे मुझमें प्रत्युपकारकी दृष्टिसे प्रीति नहीं करते, क्योंकि मुझमें तो केवल प्रेम ही है—कर्तव्य नहीं है। जिन्हें कोई कामना हो, उन्हें अन्य देवताओंकी शरण लेनी चाहिये। कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः। × × × लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥ (गीता ७।२०, २२) मुझमें तो उन्हींका अनुराग होता है, जिनका अन्तःकरण समस्त कामनाओंसे निर्मुक्त होकर स्वच्छ हो गया है। येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥ (गीता ७।२८) किंतु ऐसी बात नहीं है कि भगवान् किसीकी कामनाएँ पूर्ण किया ही नहीं करते। यह तो उनकी नीति है। उन्होंने कामनापूर्तिका काम अन्य देवताओंको सौंप रखा है। जिस प्रकार सम्राट्के यहाँ भिन्न-भिन्न विभागोंके भिन्न-भिन्न अधिकारी होते हैं, उसी प्रकार भगवान्के यहाँ भी हैं। परंतु समय-समयपर भगवान् स्वयं भी अपने भक्तोंकी कामना पूर्ण करते ही आये हैं। जिस समय ग्राहगृहीत होनेपर गजराजने निर्विशेष रूपसे भगवान्की स्तुति की थी, उस समय और कोई देवता उसकी रक्षाके लिये उपस्थित नहीं हुआ। यद्यपि इन्द्र, वरुण, कुबेर आदि सभी देवता उसकी रक्षा करनेमें समर्थ थे; परंतु उन्होंने तो यही सोचा कि हमारा नाम लेकर थोड़े ही पुकारता है, जो हम जायँ। उस समय केवल श्रीहरिने ही प्रकट होकर उसका संकट निवृत्त किया और साथ ही यह भी सिद्ध कर दिया कि जिस निर्विशेष परब्रह्मकी गजराजने स्तुति की थी, वह मैं ही हूँ। इसी प्रकार द्रौपदीकी लाज बचानेके समय भी प्रभुने ही वस्त्रावतार लिया था। अतः ऐसी बात भी नहीं है कि प्रभु कभी किसीकी कामनापूर्ति करते ही न हों। इसीलिये— अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः। तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्॥ (श्रीमद्भा० २।३।१०) —ऐसी उक्ति है। परंतु यहाँ तो व्रजांगनाओंके साथ उपहास हो रहा है। इस प्रकार यद्यपि उन्होंने व्रजांगनाओंका समाश्वासन भी कर दिया तथापि बात वही रही कि गोष्ठको जाओ, देरी मत करो। यह नियम है कि जिस समय प्रियतम अपने प्रेमीका निराकरण करता हो, उस

समय यदि वह मुसकाने लगे तो उसके तिरस्कारका प्रभाव नहीं पड़ता। वह बात उपहासमें सम्मिलित हो जाती है। जिस प्रकार यदि कोई पुरुष वैराग्यका उपदेश कर रहा हो और स्वयं अच्छे ठाट-बाटमें हो तथा आकृतिसे भी रागी-सा जान पड़ता हो तो उसके कथनका कोई प्रभाव नहीं होता। अतः उपदेशके समय अनुकूल आचरण और मुद्राकी भी बहुत आवश्यकता है। इसीसे जब परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रने उनका स्वागत करके फिर मन्द मुसकानपूर्वक निराकरण करना आरम्भ किया तो वे समझ गयीं कि यह केवल इनका उपहास है। ब्रजांगनाओंकी उच्चतम स्थिति अब मानिनी ब्रजांगनाओंकी स्थिति भी समझ लेनी चाहिये। उनकी स्थिति बहुत ऊँची है। मानिनी गोपांगनाएँ वे हैं, जो प्रभुपर आत्मीयताका अधिकार रखती हैं; वे उन्हें अपने अधीन समझती हैं और उनसे जो चाहें करा सकती हैं। उन्हींके विषयमें यह कहा गया है कि वे भगवान्‌को कठपुतलीके समान नचाती थीं— 'ताहि अहीरकी छोहरियाँ, छछियाभरि छाछपै नाच नचावैं॥' दूसरी अनभिज्ञा गोपियाँ हैं। साहित्य-दृष्टिसे वे मुग्धा नायिका हैं। वे प्रभुके अनुकूल रहकर उनका अनुग्रह प्राप्त करना चाहती हैं। वे प्रभुकी प्रार्थना करती हैं, किंतु जो मदीयत्वाभिमानवाली हैं, उनकी प्रार्थना स्वयं प्रभु करते हैं। देखो—जिस समय वृषभानुनन्दिनीजीने कहा कि महाराज, मैं तो थक गयी तो यहाँतक उनका कथन ठीक था; किंतु इसके आगे जो यह कहा कि 'नय मां यत्र ते मनः'— आपकी जहाँ इच्छा हो, वहाँ मुझे ले चलिये—यह कथन उनके अनुरूप नहीं हुआ। इसीसे भगवान् अन्तर्धान हो गये। श्रीराधिकाजी मानिनी नायिका थीं; उनको नायकके आश्रित नहीं होना चाहिये था। उन्होंने जो आश्रयत्व-व्यंजक भाव प्रकट किया— यह उनके अनुरूप नहीं था। इससे रसभंग हो गया और रासलीलाका आविर्भाव रसवृद्धिके लिये ही हुआ था। इसीसे भगवान् अन्तर्धान हो गये। गोपिकाओंने कहा था कि 'हे कृष्ण, हम आपका वेणुनिनाद सुनकर नहीं आयीं। हम तो शरच्चन्द्रकी दुग्धसदृश शुभ्र चन्द्रिकासे अत्यन्त शोभाप्राप्त इस कुसुमित वनावलीकी छटा निहारने आयी हैं। हमें यहाँ ठहरनेके लिये विशेष अवकाश ही नहीं है।' उस समय भगवान्‌को यही कहना पड़ा कि 'हे मानिनियो ! यह ठीक है, आप हमारी वंशी- ध्वनि सुनकर हमारे दर्शनोंके लिये तो नहीं आयीं, परंतु अब यदि हमारे सौभाग्यसे आप यहाँ पधारी हैं तो कुछ काल ठहरिये।' यही बात इस समय भगवान् कह भी रहे हैं— 'मानिनियो ! हम जानते हैं, आप ऊपरसे ही कह रही हैं कि हम वृन्दारण्यकी शोभा निहारनेके लिये आयी हैं तथापि भीतरसे तो हमारे प्रति आपका अवश्य अनुराग है। यदि कहो कि आप हम कुलांगनाओंके लिये ऐसे अननुरूप वचन क्यों कहते हैं, हम पर पुरुषमें कैसे अनुराग कर सकती हैं ? तो ऐसी बात नहीं है, मेरा तो सौभाग्यातिशय ही ऐसा है कि जो रस-रीतिसे अनभिज्ञ शुष्कहृदय पशुप्राय जीव हैं, उनका भी मुझमें अनुराग हो जाता है, फिर आप तो रसिकशिरोमणिभूता हैं। अतः मेरे प्रति आपका अनुराग होना तो सर्वथा उचित ही है। कामिनियोंके हाव- भाव कटाक्षका रहस्य तो कामुकोंको ही ज्ञात हो सकता है। आपलोग रसाभिज्ञोंमें शिरोमणिभूता हैं; अतः जिस शृंगारमूर्ति मुझ आनन्दकन्दके प्रति स्वभावतः सब जीवोंका आकर्षण होता है, उसके प्रति आपको अनुराग होना ठीक ही है।' अथवा 'अयन्त्रिताशया' ऐसा पदच्छेद किया जाय तो यह भाव होगा कि गोपिकाओ ! आप वास्तवमें पतिव्रताशिरोमणि ही हैं। मेरा रूप यद्यपि ऐसा है कि उसके प्रति सभीका आकर्षण हो जाता है तो भी आपका चित्त मेरी ओर आकर्षित नहीं हुआ—यह

श्रीरासलीलारहस्य ३३३ आपके मनोबलकी ही महिमा है अथवा भगवान् इसलिये अब आप जाओ, अपने पतिदेवोंका ही गोपिकाओंसे प्रेमकी भिक्षा माँगते हैं। वे कहते हैं कि पूजन करो। उसीसे मेरा भी पूजन हो जायगा; क्योंकि जिसमें पामर जीव भी प्रेमपाशसे बँध जाते हैं, उसे मैं सर्वान्तरात्मा हूँ। यह गोपिकाओंके उपलक्षणसे मेरे प्रति क्या आपका अब भी अनुग्रह नहीं होगा— संन्यासनिष्ठाके अनधिकारियोंको उपदेश है कि तुम अब तो मुझे अपना प्रेमदान देना ही चाहिये। अपने वर्णाश्रमधर्मका पालन करते हुए ही मुझ अथवा भगवान्‌की यह उक्ति अनधिकारिणी सर्वान्तरात्माकी आराधना करो। गोपांगनाओंकी निष्ठाको विचलित करनेके लिये और इसी उक्तिसे वे अधिकारिणी गोपांगनाओंसे कह अन्तरंगाओंकी निष्ठाको सुदृढ़ करनेके लिये है; रहे हैं कि ‘हे गोपियो! तुम्हें सारे बन्धनोंको काटकर क्योंकि जिन्हें उनके प्रति ऐकान्तिक प्रेम नहीं है, उन्हें अब मेरी ही आराधना करनी चाहिये; क्योंकि तो स्वधर्ममें ही परिनिष्ठित रहना चाहिये और जो ‘अभिस्नेहात्’ ‘अभितः’—सब ओरसे मुझमें ही [

यह बिनती रघुबीर गुसाईं। ते सब तुलसिदास प्रभु ही सों, होहिं सिमिटि इक ठाईं ॥ गोपियोंकी स्थिति ऐसी ही भगवन्मयी थी। वे जो कुछ देखती थीं, जो कुछ सूँघती थीं, जो कुछ स्पर्श करती थीं, सब श्याममय था—'जित देखूँ तित श्याममई है।' उनका अन्तःकरणरूप सरोवर श्याम- रंगसे रँग गया था। अन्तःकरण जिस-जिस इन्द्रियरूप प्रणालीके द्वारा निकलकर जिस-जिस विषयको व्याप्त करके प्रकाशित करता था, वही श्याममय प्रतीत होता था। अतः भगवान् कहते हैं—'अयि मानिनियो ! आपलोगोंका मेरे प्रति अभिस्नेह है। आपका चारों ओरका प्रेम पुंजीभूत होकर मुझमें ही लग गया है। अतः आप यन्त्रिताशया हैं, आपका चित्त विवश है। सो यह उपपन्न ही है। आप इसकी अनुपपत्तिकी आशंका न करें; क्योंकि जब अवान्तर धर्म सर्वात्मा श्रीहरिके स्मरणरूप परमधर्ममें बाधक होने लगते हैं तो वे त्याज्य हो ही जाते हैं। यद्यपि मेरे प्रति प्रेम तो सभीका होता है तथापि सर्वकर्म-संन्यासमें उसीका अधिकार है, जो श्रौत और स्मार्त कर्मोंका अनुष्ठान करनेसे शुद्धान्तःकरण होकर या तो निर्विशेष परब्रह्मका श्रवण, मनन और निदिध्यासनपूर्वक अपरोक्ष साक्षात्कार कर चुका हो या भगवान्‌के पदपद्मपरागका सुरसिक मधुकर होकर सांसारिक भोगवासनाओंसे ऊपर उठ गया हो। ऐसा महानुभाव बहुत दुर्लभ है; क्योंकि इन्द्रियोंकी स्वाभाविक प्रवृत्ति विषयोंकी ही ओर है; अतः आचार्य लोग साधनोंपर ही जोर दिया करते हैं। इधर भगवान् भी व्रजांगनाओंकी स्वरूपनिष्ठाको पुष्ट करते हुए उन्हें पतिशुश्रूषाका ही आदेश देकर सर्वसाधारणके लिये श्रौत-स्मार्त कर्मोंकी आवश्यकताका ही प्रतिपादन कर रहे हैं। भगवान्‌का इस सारे कथनसे क्या-क्या तात्पर्य है, सो तो वे ही जानें। हमें तो जो कुछ उन्हींके कृपाकणसे प्राप्त हुआ है, उसीका निरूपण कर रहे हैं। हम पहले कह चुके हैं कि श्यामसुन्दर श्रीहरिके वामांगमें रासेश्वरी श्रीवृषभानुनन्दिनी विराजती हैं। वे उन्हींकी आह्लादिनी शक्ति हैं; स्वरूपतः भगवान्‌के साथ उनका अभेद है। आरम्भमें जो ‘श्रीभगवानुवाच’ ऐसा कहा गया है, वहाँ ‘श्री’ शब्द उन्हींका द्योतक है। यह श्री ‘श्रयते हरिं या इति श्रीः'—जो हरिका आश्रय ले वह श्री नहीं है, बल्कि ‘श्रीयते इति श्रीः'—जिसका आश्रय लिया जाता है, वह श्री है। अनन्तकोटि-ब्रह्माण्डान्तर्गत सौन्दर्य-माधुर्य-सुधाकी अधिष्ठात्री जो महालक्ष्मी हैं, उनके द्वारा भी जिनके चरणकमल सेवित हैं, वे श्रीवृषभानुदुलारी ही श्री हैं। उनकी प्रसन्नताके लिये ही भगवान्‌ने यह लीला की थी। रासलीला एक नायिकासे नहीं होती, इसीलिये अन्य गोपांगनाओंका आवाहन किया गया था। अब यदि उन सबका आदर करते हैं तो सम्भव है श्रीराधिकाजी रुष्ट हो जायँ; क्योंकि वे मानिनी हैं न! अतः भगवान् उनका तिरस्कार करते हैं, जिसमें वे दयावश स्वयं ही कह दें कि श्यामसुन्दर ! अब आप इनका निराकरण क्यों करते हैं, आ गयी हैं तो इनकी इच्छा भी पूर्ण कीजिये। अथवा यह भी सम्भव है कि अन्य गोपियाँ तो आ गयी हों और राधिकाजी अभी न आयी हों। इसलिये भगवान् उनकी प्रतीक्षामें हों; क्योंकि इस लीलाकी अधिनायिका तो वे ही हैं। अतः वे अन्य गोपिकाओंको इसलिये सीधा-सीधा उत्तर नहीं देते, जिसमें राधिकाजीके आनेपर उनका मान रखनेके लिये यह कह सकें कि हमें आपकी प्रतीक्षा थी, इसीसे अभी कोई निश्चय नहीं हुआ। इस गोपिकायूथमें कितनी ही व्रजांगनाएँ मानिनी हैं। इसीसे भगवान् ऐसे वचन कह रहे हैं, जिनके अनुकूल और प्रतिकूल दोनों अर्थ हो सकते हैं। मानिनी नायिकाका नायकपर आधिपत्य रहता है; इसलिये उसे ऐसे वाक्य बोलने पड़ते हैं, जिनका अर्थ बदलकर वह अपनेको उनके कोपका भाजन होनेसे बचा सके।

श्रीरासलीलारहस्य ३३५

रासलीला परब्रह्मका नित्य लास्य है यह रासलीला कोई उपहास या प्राकृत लीला नहीं है। यह तो शुद्ध परब्रह्मका नित्य लास्य है। रासका स्वरूप क्या है?— 'माधवं माधवं वान्तरे अङ्गना अङ्गनामङ्गनामन्तरे माधवः।' एक-एक गोपीके अनन्तर भगवान् हैं और भगवान्‌की एक-एक मूर्तिके अनन्तर एक-एक व्रजांगना है। सांख्यवादियोंका कथन है—'क्षणपरिणामिनो हि भावा ऋते चितिशक्तेः।' वह चितिशक्ति ही भगवान् कृष्ण हैं। यह सम्पूर्ण प्रकृति चिद्रूप श्रीकृष्णके ही चारों ओर घूम रही है। आजकल वैज्ञानिकोंका भी मत है कि एक ग्रह दूसरे ग्रहके आश्रित होकर गति कर रहा है। इस प्रकार सारा ही ब्रह्माण्ड गतिशील है। यही प्रकृतिका नित्य नृत्य है। यदि आध्यात्मिक दृष्टिसे विचार करें तो हमारे शरीरमें भी भगवान्‌की यह नित्यलीला हो रही है। हमारा प्रत्येक अंग गतिशील है। हाथ, पाँव, जिह्वा, मन, प्राण सभी नृत्य कर रहे हैं। इन सबका आश्रय और आराध्य केवल शुद्ध चेतन ही है। यह सारा नृत्य उसीकी प्रसन्नताके लिये है और वही नित्य एकरस रहकर इन सबकी गति-विधिका निरीक्षण करता है। जबतक इनके बीचमें वह चैतन्यरूप कृष्ण अभिव्यक्त रहता है; तबतक तो यह रास रसमय है; किंतु उसका तिरोभाव होते ही यह विषमय हो जाता है। इसी प्रकार गोपांगनाएँ भी भगवान्‌के अन्तर्हित हो जानेपर व्याकुल हो गयी थीं। अतः इस संसाररूप रासक्रीड़ामें भी जिन महाभागोंको परमानन्दकन्द श्रीव्रजचन्द्रकी अनुभूति होती रहती है, उनके लिये तो यह आनन्दमय ही है। अहो! यह संसार तो अब भी प्रभुका वृन्दारण्य ही है। यहाँ वही चन्द्र छिटक रहा है, वही यमुना है और वही मन्द-सुगन्ध सुशीतल समीर बह रहा है। तथापि आज श्रीकृष्णचन्द्रके ओझल हो जानेसे इन जीवरूप गोपांगनाओंके लिये यह दुःखमय ही हो रहा है। यदि वे दीखने लगें तो फिर यही परम आनन्दमय हो जाय। जीवका परमपुरुषार्थ प्रभुकी प्राप्ति ही है देखो—इस रस-रसकी प्राप्तिके लिये गोपांगनाओंने स्वधर्मानुष्ठान करते हुए श्रीकात्यायनीदेवीकी आराधना की थी। अतः हमें भी भगवत्संयोग-सुखकी प्राप्तिके लिये स्वधर्म-पालनमें ही तत्पर रहकर भगवान्‌की उपासना करनी चाहिये। जबतक जीव परब्रह्म श्रीकृष्णचन्द्रसे वियुक्त रहता है, तबतक उसे शान्ति नहीं मिलती। अतः जीवका परम पुरुषार्थ प्रभुकी प्राप्ति ही है। इसके लिये हमें भगवान्‌के किसी भी स्वरूपकी उपासना करनी चाहिये। भगवान् विष्णु, शिव, श्रीकृष्ण, रामभद्र, दुर्गा—ये सब भगवद्विग्रह ही हैं। साम्प्रदायिक पक्षपातके कारण इनमेंसे किसीके प्रति भी द्वेष-दृष्टि नहीं करनी चाहिये। अपने इष्टदेवका प्रेमपूर्वक पूजन करो। इसके लिये उनके स्वरूप और उपासना-विधिका ज्ञान प्राप्त करो तथा यह भी मालूम करो कि उनकी उपासनामें क्या-क्या प्रतिबन्ध हैं। प्रतिबन्ध कुपथ्य रूप हैं, उनसे बचनेकी बहुत आवश्यकता है। यदि कुपथ्य करते हुए चन्द्रोदय- जैसी ओषधिका भी सेवन किया जाय तो भी लाभ होना सम्भव नहीं है। इसलिये उपासनामार्गके प्रतिबन्धोंसे सर्वदा सतर्क रहो। 'स्वधर्माचरणं शक्त्या विधर्माच्च निवर्तनम्।' (श्रीमद्भा० ३।२८।२) —इस वाक्यके अनुसार सर्वदा स्वधर्मका तो यथाशक्ति पालन करो, किंतु विधर्मका तो सर्वथा त्याग कर दो। यदि साथ-साथ विधर्मरूप कुपथ्यका त्याग और स्वधर्मरूप पथ्यका सेवन न किया जायगा तो यथेष्ट लाभ होना कदापि सम्भव नहीं है। ऐसी अवस्थामें सारी ओषधि निष्फल हो जायगी। इस प्रकार यदि कोई पुरुष स्वधर्म-पालन और विधर्म- विसर्जनपूर्वक भगवान्‌की उपासना करता है तो उसे ब्रह्मसंस्पर्श अवश्य प्राप्त हो जाता है।

३३६ भक्तिसुधा श्रीरासपंचाध्यायी गोपियोंके गर्वापहरणके लिये भगवान् अन्तर्धान हो गये अन्तर्हिते भगवति सहसैव व्रजाङ्गनाः। अतप्यंस्तमचक्षाणाः करिण्य इव यूथपम्॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।१) भगवान् भक्तपराधीन हैं। वे अपनी सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता आदिको भूलकर भक्तोंके पीछे घूमते हैं, परंतु गर्वसे उन्हें बड़ी शत्रुता है। वे अपने भक्तोंमें गर्व नहीं आने देना या नहीं रहने देना चाहते। जहाँ गर्व रहेगा, भगवान् वहाँ स्वयं न रहेंगे। भगवान्‌को अपने अत्यन्त अनुकूल पाकर गोपियोंको गर्व हो गया। उसे दूर करनेके लिये भगवान् अन्तर्हित हुए। गोपियोंको भगवान्‌के दर्शन और स्पर्शका जो बाह्य सुख मिल रहा था, वह नहीं रहा। भगवान् वहाँसे कहीं चले नहीं गये, अपितु गोपियोंके मन, बुद्धि, प्राण, अन्तःकरण आदिमें प्रविष्ट हुए। श्रीमद्वल्लभाचार्यजी कहते हैं—वे कैसे अन्तःप्रविष्ट हुए, उसका क्या प्रकार था— वह व्रजांगनाएँ जान न सकीं। वे क्यों नहीं जानती थीं; क्योंकि वे व्रजांगनाएँ थीं, अतः नहीं जानती थीं। अर्थात् जन्मसे, बाल्यकालसे ही वे भगवान्‌को बाह्य मूर्तिके ही रूपमें देखा करती थीं। अतः जब आज उन्हें नहीं देखा तो वे दुःखी हुईं। ब्रजवासियोंपर दया करके विषमताको मिटाकर भगवान् व्रजमें प्रकट हुए— 'तास्ताः क्षपाः प्रेष्ठतमेन नीता मयैव वृन्दावनगोचरेण।' (श्रीमद्भा० ११।१२।११) जो अनन्त अचिन्त्य अलक्ष्य अव्यपदेश्य निर्विकार तत्त्व है—वह वृन्दावनमें गोपाल, गोचारक बना। जिसे अष्टांगयोगयुक्त योगी नहीं प्राप्त कर सकते, वह यहाँ प्रकट। बात यह है कि अत्यन्त वैजात्यमें प्रीति नहीं होती। मनुष्य रूपहीन, स्पर्शहीन, रसहीन, गन्धहीन, अचिन्त्य अग्राह्यमें कैसे प्रीति करे? यद्यपि अचिन्त्य अग्राह्य निर्विकार श्रीभगवान्‌ने भक्तानुग्रहार्थ नृसिंह, वराह, कच्छपादि अवतार धारण किये, परंतु उनकी महामहिमा, महान् ऐश्वर्यको देखकर अपनेसे असमान होनेके कारण मानव- हृदय उनसे स्वच्छन्द अनुराग करनेमें और भी असमर्थ रहा। पहले तो अचिन्त्य, अग्राह्य आदि होनेसे ही प्रेम दुर्घट रहा, फिर कच्छपादिमें भी महामहिमा आदिके कारण वहाँ भी वह दुर्लभ ही रहा। अतः भक्तवत्सल भगवान् चतुर्भुज मानवरूपमें अवतीर्ण हुए। परंतु इस रूपमें भी चतुर्भुजरूप और ऐश्वर्यातिशयके कारण मनुष्यको कुछ संकोच ही रहा, वह पूरा-पूरा अपना हृदय उनके समक्ष न खोल सका। तब प्रभु ठीक-ठीक मानवाकार श्रीरामरूपमें अवतीर्ण हुए, परंतु यहाँ भगवान् मर्यादा- पुरुषोत्तम बन गये। अतः इस रूपमें भी मर्यादापूर्ण लोग अथवा साधारण जीव प्रीति करते डरते रहे। ऐश्वर्यमें भी संकोच बना ही है। इसलिये वह अचिन्त्यैश्वर्य जगदाधार भगवान् गोप और गोपियोंके साजात्य सम्बन्धको लेकर गोपालरूपमें अवतीर्ण हुए और सभीके निःसंकोच परप्रेमास्पद बन गये। गोपबालाओंका अन्तर्द्वन्द्व जब भगवान् कृष्ण मथुरामें आ गये, तब गोपबालाएँ अधिक वियोगसन्तप्त हुईं। किसीने कहा— 'मथुरा क्या दूर है, नहीं रहा जाता तो जाओ, वहीं दर्शन कर आओ!' सब तो नहीं, पर कुछ व्रजांगनाएँ किसी समय मथुरा भी गयीं, परंतु वहाँ श्रीमथुरानाथका वैभव देखकर; उनके शौर्य, वीर्य, ओज, तेजको देखकर उन्होंने घूँघट निकाल लिया, कहने लगीं—ये हमारे प्रभु प्राणधन श्यामसुन्दर नहीं हैं। नखसे शिखतक रत्नजटित सौवर्णाभरणधारी सम्राट् ये हमारे प्रभु नहीं हैं। हमारे तो वे मयूरपिच्छ, गुंजावतंस, पीताम्बर, लकुटीकम्बलधारी व्रजविहारी प्रभु हैं अर्थात् ऐश्वर्यमें उन्हें संकोच हुआ, वे तो अपने साजात्यमें प्रेम करती रहीं। अभिप्राय यह

  • भगवान् सहसा अन्तर्धान हो गये। उन्हें न देखकर व्रजयुवतियोंकी वैसी ही दशा हो गयी, जैसे यूथपति गजराजके बिना हथिनियोंकी होती है।

कि साजात्यमें निःसंकोच प्रणय होता है, अतः भगवान् गोचारण करते प्रकटे। जीव अल्पज्ञ है, अल्पशक्ति है, अकिंचन है और प्रभु सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् हैं। ऐसे महान् अन्तरमें जीवकी कैसे गति हो, वह उन्हें कैसे प्राप्त करे? एक दीन-हीन भिक्षुकी महाराजाधिराजसे, सम्राट्से, सम्मिलनकी सम्भावना भी कैसे कर सकती है? परंतु यों निराश होना ठीक नहीं, अपितु उत्कट आशा बनाये रखनी चाहिये, तब शीघ्र ही दर्शन मिलता है। यद्यपि आशा दोष है, त्याज्य कोटिमें है, परंतु प्रभुसम्मिलनकी आशा महापुण्योंका फल है। यह आशा कल्पलता है। इसे नेहके अनुरागके जलसे सींचना चाहिये। शनैः-शनैः इसमें नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र, पुष्प और फल अवश्य लगेगा ही। इस भावका आना कि प्रभु दुर्लभ हैं, इसे स्वयं भगवान्ने दूर किया है—श्रुति कहती है— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्य- नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥ (श्वेताश्वतर० ४।६) तुम और तुम्हारे प्रभु एक हैं, दोनों सुपर्ण हैं, दोनोंका साजात्य सम्बन्ध है, तब मिलनेमें कुछ कठिनाई नहीं। कहा जा सकता है—कहीं-कहीं साजात्यमें—भाई-भाईमें भी प्रेम नहीं रहता, इसको दूर करनेके लिये—'सखाया' कहा। जब परस्पर सख्य-सौहार्द होगा, तब मिलनेमें कोई कठिनाई न रहेगी। हाँ, यदि सखा भी दूर देशमें हो तो अवश्य विघ्न हो सकता है; जैसे चन्द्र और समुद्र। परंतु यहाँ तो यह बात भी नहीं है; क्योंकि— 'समानं वृक्षं परिषस्वजाते' शरीररूप एक ही वृक्षपर दोनोंका निवास है, सादेश्य है। फिर भी 'असङ्गो नहि सज्जते' से उस परतत्त्वको जब असंग बतलाया गया, तब उसमें प्रेम कैसे हो? इसका भी समाधान करते हुए श्रुतिने 'सयुजा' विशेषण दिया अर्थात् जीव और ब्रह्म दोनोंका घनिष्ठ सम्बन्ध है, दोनों एक ही हैं। जैसे जल और तरंग, घट और मृत्तिका, उत्पल और नैल्य एक ही हैं, इनमेंसे एक दूसरेसे अलग नहीं हो सकते। चिदचित्, भेदाभेद आदि सभी वादोंमें यह बात माननी पड़ती है। ऐसी स्थितिमें निराश होनेकी बात ही नहीं रह जाती। भगवान् तो स्वयं इस विषमताको मिटानेका प्रयत्न करते हैं, वे गोपोंके साथ प्रेम करनेके लिये ही गोपाल बने हैं। यहाँ तो 'अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति' का भेद भी '...वृन्दावनगोचराः से मिट गया। यहाँ तो उस 'अनशिता' अभोक्ताने गवाँरी ग्वालिनियोंके मक्खनकी चोरी की। निरंजनने श्रीयशोदासे अंजन लगवाया, वह अनंग (निरंग) सांग बन गया, उसने खूब व्रजदेवियोंसे उपाहृत छाकें छकीं। इसी समतामें क्रीडा होती है। तभी तो—'उवाह कृष्णो भगवान् श्रीदामानं पराजितः।' (श्रीमद्भा० १०।१८।२४) चुटिया पकड़कर श्रीदामाने भगवान्से अपना दाँव लिया, उनकी पीठपर चढ़कर टिक- टिक करके उसने सवारी साधी। यदि श्रीदामा उनमें और अपनेमें जरा भी भेद पाता तो यह कहनेकी कैसे हिम्मत करता— 'न्यारि करो हरि आपन गैया, ना हम चाकर नन्द बाबाके ना तू मोर गुसैंया, '...कहा भयो दस गैया अधिकैंया……।' इस तरह भगवान् अपनी सर्वज्ञताको भूलें, हम अपनी अल्पज्ञताको भूलें और इस तरह समानता स्थापित हो। इस समानताके रूपमें भगवान् यहाँ पधारे हैं। इस रूपमें इनपर व्रजांगना न्योछावर हो रही हैं। वे उन प्रियतम प्राणधनको—बालमुकुन्दको बालभावसे देखती हैं, बाहुलतासे वेष्टित करती हैं और उनकी बलैया लेकर फूली नहीं समातीं। ऐसी स्थितिमें वे अन्तर्हितको क्या जानें। विशेषकर वे व्रजांगना हैं, व्रजकी अंगना हैं, भोली हैं, मुग्धा हैं, वे तो साक्षात् भगवान्को ही जानती हैं। अतः 'अतप्यंस्तमचक्षाणाः करिण्य इव यूथपम्॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।१) उन्हें न देखकर बड़ी सन्तप्त हुईं, जैसे हथिनियाँ हाथीको न देखकर

व्याकुल होती हैं। 'तमचक्षाणाः' से यह भाव बतलाया कि ये विशुद्धानुरागवती हैं, कान्तभाववती नहीं। अतः दर्शन, स्पर्श ही मुख्य है, रमण मुख्य नहीं। अतएव 'करिण्य इव यूथपम्' का उदाहरण है। करिणी स्पर्शकुशल होती हैं। एक सूक्तमें कुरंग, मातंग, पतंग, भृंग और मीनकी एक विषयकी कुशलता बतायी गयी है—'कुरङ्गमातङ्गपतङ्गभृङ्ग- मीना हताः पञ्चभिरेव पञ्च' अतः दर्शन और स्पर्शकुशला सख्यभाववती अथवा विशुद्धानुरागवती व्रजांगना श्रीश्यामसुन्दरका दर्शन न पाकर अति सन्तप्त हुईं। रासेश्वरके अन्तर्धान हो जानेपर व्रजांगनाओंकी मनोदशा साधारणतया दो प्रकारकी गोपी हैं, एक सख्यभाववती, दूसरी कान्तभाववती। चन्द्रावलीप्रभृति कान्तभाववती हैं। इन्हें स्पर्शसुखकी अधिक आकांक्षा रहती है; सख्यभाववती केवल दर्शनसे तृप्त रहती हैं। यहाँ इन्हींके लिये 'तमचक्षाणाः' पद है। गोपियाँ श्रीयुगल-सरकारके दर्शनके लिये लालायित रहती हैं। इनकी एकके दर्शनसे तृप्ति नहीं होती, वे दोनोंहीके दर्शन चाहा करती हैं। श्रीरासेश्वरी वृषभानुनन्दिनीके बिना आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रके मुखचन्द्रका दर्शन और श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहनके बिना श्रीव्रजेश्वरी महारानीका दर्शन भी उन्हें तृप्त नहीं करता, सुख- आनन्द नहीं देता। वे तो युगल-सरकारका, श्रीराधाकृष्णका, श्यामाश्यामका युगल दर्शन चाहती हैं। फिर जहाँ दोनोंमेंसे एकका भी दर्शन नहीं अथवा दोनोंका ही दर्शन नहीं, वहाँ तो सन्तापका कुछ ठिकाना ही नहीं। अतः कहा—'अतप्यंस्तमचक्षाणाः' हाय, हम हतभाग्याओंको प्रिया-प्रियतममेंसे एकके भी दर्शन नहीं! अभी प्रियतमके दर्शन हो रहे थे, उन्हें भी विधाताने ओझल कर दिया ! शारदी पूर्णिमाके स्वच्छ, शुद्ध, निष्कलंक पूर्णचन्द्र श्रीकृष्णचन्द्रके दर्शनके बिना यह चन्द्र प्रलयकालीन द्वादश आदित्योंके समान सन्ताप दे रहा है। यह आह्लादकर चन्द्र नहीं, अपितु प्रलयकालके महातापके द्वादश आदित्य एकत्र उदित हुए हैं। ये किंशुक- कुसुम और अरुण वस्त्र नहीं हैं, अपितु ये दावाग्निकी लपटें हैं। अपने प्रियतम प्राणधन मनमोहन श्यामसुन्दरको न देखकर उनके दर्शन-कालमें, संयोगके समयमें आह्लाद देनेवाली इन वस्तुओंमें अधिकाधिक तापकताकी गोपांगनाओंको प्रतीति हो रही है। कान्तभाववती तथा सख्यभाववती दोनोंकी ही यह सन्तप्त दशा है। यह ठीक ही है, प्राणीको प्राणके वियोगमें, अभीष्टके अभावमें दुःख होता ही है। फिर जो प्राणोंका भी प्राण है, मनका भी मन है, श्रोत्रका भी श्रोत्र है, चक्षुका भी चक्षु है, वाणीकी भी वाणी है, उसके विप्रयोगमें असह्य पीड़ाका होना स्वाभाविक है। श्रुति कहती है—‘प्राणस्य प्राणं...’ (बृहदारण्यक० ४।४।१८) महात्मा तुलसीदासजीने भी कहा है— प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम। तुम्ह तजि तात सोहात गृह तिन्हहि तिन्हहि बिधि बाम॥ (रा०च०मा० २।२९०) श्रुतिका वचन भी है—‘···“एतस्यैवानन्दस्य··· मात्रामुपजीवन्ति।’ (बृहदारण्यक० ४।३।३२) जगत्में जितने भी महान्-से-महान् आनन्द हैं, सुख हैं, वे सब इसी आनन्दके एक अंशमें--कणमें समा जाते हैं। वे सब इसीकी क्षुद्र विभूति हैं। चन्द्रमें आह्लादकता, नीरसमें सरसता, उस पूर्णतम पुरुषोत्तमसे ही है। इसके न होनेसे आह्लाद कहाँ? सरसता कहाँ? सौख्य कहाँ? फिर तो उरग-श्वासकी तरह सब विषमयं--दुःखमय होगा। ऐसे उन प्रभु प्रियतम प्राणधनके विप्रयोगसे श्रीव्रजांगनाओंको इतना दारुण सन्ताप हुआ कि वह अकथनीय ही है। उन्हें उस समय समस्त आह्लादकर वस्तुएँ दुःखद प्रतीत हुईं। श्रीमद्वल्लभाचार्यजीके कथनानुसार यह ताप पहले ऊपर-ही-ऊपर रहा, फिर अन्तरमें प्रविष्ट होने लगा, परंतु अन्तःप्रविष्ट थे—लीलारससहित श्रीकृष्ण, वे कहीं अन्यत्र नहीं गये थे। वहींसे गोपिकाओंके अन्तरसे उनकी लीलाशक्ति प्रकट हुई। तब उस लीलाक्तिकी प्रेरणासे रमापतिके गति- विभ्रम आदिसे आक्षिप्तचित्त होकर तथा तदात्मिका बनकर श्रीमती व्रजांगनाओने उन्हींकी उन-उन चेष्टाओंको ग्रहण किया।

श्रीरासपञ्चाध्यायी ३३१ श्रीकृष्णमय गोपियाँ भगवान्‌की चेष्टाओंका अनुकरण करने लगीं गत्यानुरागस्मितविभ्रमेक्षितै- र्मनोरमालापविहारविभ्रमैः । आक्षिप्तचित्ताः प्रमदा रमापते- स्तास्ता विचेष्टा जगृहुस्तदात्मिकाः ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।२) वियोग ऊँची चीज है, मूल्यवान् वस्तु है। किसीने कहा—'सङ्गमविरहविकल्पे वरमिह विरहो न सङ्गमस्तस्याः। सङ्गे सैव तथैका त्रिभुवनमपि तन्मयं विरहे' हमें तो वियोग चाहिये, संगम नहीं, पर यह बड़े दीर्घदर्शियोंकी बातें हैं। संयोगमें एक ही जगह प्रियतम होता है, पर वियोगमें तो सारा विश्व प्रियतममय हो जाता है। 'जित देखूँ तित स्याममई है।' एक अवस्था इससे भी ऊँची है, उसमें संयोग और वियोग दोनोंमें कष्ट-ही-कष्ट है— अदृष्टे दर्शनोत्कण्ठा दृष्टे विच्छेदभीरुता। नादृष्टेन न दृष्टेन भवता लभ्यते सुखम्॥ (काव्यप्रकाश ५।१२८) हे प्राणधन! जबतक आपके दर्शन नहीं होते, तबतक तो दर्शनकी उत्कण्ठा लगी रहती है और दर्शन हो जानेपर अगले क्षणमें होनेवाले वियोगकी चिन्ता लग जाती है। क्या करें, किसी भी तरह चैन नहीं है, न दर्शनसे ही सुख मिलता है और न अदर्शनसे ही। संयोग-वियोग किसीमें शान्ति नहीं। सखि! अभी तो श्यामसुन्दर मदनमोहनका यह भुजाश्लेष मिला है, पर यह भुजलताबन्ध कबतक प्राप्त रहेगा, यह संश्लेषजन्य सुख कबतक रहेगा, कुछ ठिकाना नहीं। हाय! कहीं अभी विश्लेष न आ जाय! यों ऊँचे प्रेमियोंको दुःख-ही-दुःख बना रहता है। यह एक विशिष्ट स्थिति है—प्रेमीको संयोगमें कुछ शान्ति रहती है। पर विप्रयोग दशामें उद्वेलित समुद्रकी तरह शृंगारकी स्थिति होती है। उस समय वह मर्यादा तोड़ देता है, प्रेमीके धैर्यका पुल टूट जाता है। कहा है— प्रासादे सा दिशि दिशि च सा पृष्ठतः सा पुरः सा पर्यङ्के सा पथि पथि च सा तद्वियोगातुरस्य। हंहो चेतः प्रकृतिरपरा नास्ति मे कापि सा सा सा सा सा सा जगति सकले कोऽयमद्वैतवादः॥ (सुभाषितरत्न० प्र० ६।६५) ····यह अद्वैतीका अद्वैत है। पर यहाँका अद्वैत और है, यहाँ तो आलम्बन ही सर्वत्र दीख पड़ रहा है। यही दशा श्रीलालजूकी है। वे वियोगमें अपनी प्राणेश्वरीको सर्वत्र देख रहे हैं। यों संयोग और वियोगमें वियोगका महत्त्व है, पर वियोगमें आनन्द कब आता है? हम सब अनादिकालकी वियोगिनी हैं, वियोगिनी इसलिये कि जीव स्वल्पज्ञ है, परतन्त्र है और पारतन्त्र्य ही स्त्रीत्व है। हाँ तो हम सब अनादिकालकी वियोगिनी हैं, पर क्या वह आस्वाद है? जन्म-जन्मान्तरसे, युग-युगान्तरसे शूकर, कूकुर, कीट, पतंग बनते-बनते मर रहे हैं। उस परप्रेमास्पदका वियोग जन्म-जन्मान्तरसे हो रहा है, पर वियोगजन्य आनन्दका कभी स्वप्नमें भी स्वाद नहीं आता। इसका कारण यही कि उस तत्त्वका कभी साक्षात्कार नहीं, श्रवणतक नहीं 'श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः' (कठ० १।२।७) तब कैसे आनन्द मिले? पहले सम्प्रयोग हो, वस्तुका थोड़ा परिचय मिले, रसका कुछ पता लगे, तब पुनः उसके लिये उत्कट उत्कण्ठा हो, तब कहीं उसके वियोगका आस्वाद हो। देवर्षि नारदने जब प्रथमावस्थामें महात्माओंके प्रसादसे तत्त्वका थोड़ा पता पाया और जंगलमें जाकर परिश्रमपूर्वक जब अनुसन्धान करने लगे तो एक क्षणके लिये उन्हें हृदयमें कुछ चमत्कार मिला। देवर्षि नारदके शब्द हैं— ध्यायंतश्चरणाम्भोजं भावनिर्जितचेतसा। औत्कण्ठ्याश्रुकलाक्षस्य हृद्यासीन्मे शनैर्हरिः॥ (श्रीमद्भा० १।६।१७) फिर उन्होंने बहुत प्रयत्न किया, पर वह

  • भगवान् श्रीकृष्णकी मदोन्मत्त गजराजकी-सी चाल, प्रेमभरी मुसकान, विलासभरी चितवन, मनोरम प्रेमालाप, भिन्न-भिन्न प्रकारकी लीलाओं तथा शृंगार-रसकी भाव-भंगियोंने उनके चित्तको चुरा लिया था। वे प्रेमकी मतवाली गोपियाँ श्रीकृष्णमय हो गयीं और फिर श्रीकृष्णकी विभिन्न चेष्टाओंका अनुकरण करने लगीं।

३४० भक्तिसुधा चमत्कार उन्हें नहीं मिला। वे बहुत ही दुःखी हुए, जैसे रंकको बड़ी कठिनतासे मिली निधि और फणिकी मणि खो जाये। फिर आकाशवाणी हुई— हन्तास्मिञ्जन्मनि भवान्मा मां द्रष्टुमिहार्हति। अविपक्वकषायाणां दुर्दर्शोऽहं कुयोगिनाम्॥ सकृद् यद् दर्शितं रूपमेतत्कामाय तेऽनघ। मत्कामः शनकैः साधुः सर्वान्मुञ्चति हृच्छयान्॥ (श्रीमद्भा० १।६।२२-२३) आप इस जन्ममें मुझे नहीं प्राप्त कर सकते; क्योंकि वैराग्यके परिपक्व हुए बिना कुयोगियोंको मैं नहीं दीखता। जो एक बार रूप दिखाया है, वह आपकी कामना (इच्छा-वृद्धि)-के लिये है। फिर तो जरा-सा भी आस्वाद मिल जानेसे छोड़ा ही न जा सकेगा— 'विहातुमिच्छेन्न रसग्रहो यतः।' (श्रीमद्भा० १।५।१९) एक क्षणका भी आस्वाद हो जानेसे फिर 'चाट' पड़ जाती है। पर जबतक कुछ भी अनुभव नहीं, किसी भी वस्तुमें कैसे प्रवृत्ति हो सकती है ? इसलिये पहले संयोग हो, तब विप्रयोगका आनन्द मिले। इसीलिये भगवान् कृष्णने श्रीव्रजांगनाओंमें पहले रससंचार किया। बाहुप्रसारपरिरम्भकरालकोरु- नीवीस्तनालभननर्मनखाग्रपातैः । क्ष्वेल्यावलोकहसितैर्व्रजसुन्दरीणा- मुत्तम्भयन् रतिपतिं रमयाञ्चकार ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।४६) आज भागवतकी 'रासपञ्चाध्यायी' शंकाओंका केन्द्र बनी हुई है। उसका यह श्लोक प्रधान और स्पष्ट शंकास्थान माना गया है। परंतु इसके पूर्वापरको जिन्होंने कभी सोचा नहीं, जो अत्यन्त बहिरंग हैं, उन्हें ही दोष दीख पड़ते हैं। अन्यथा थोड़ा भी विचार करनेसे प्रसंग शुद्ध प्रतीत होता है। हाँ तो श्रीकृष्ण कोटि-कोटि कन्दर्पके सौन्दर्यदर्पको अपनी नखमणिचन्द्रिकाके सौन्दर्यसिन्धुके एक बिन्दुकणसे निर्जित करनेवाले हैं। श्रीश्यामसुन्दर मुरलीमनोहरने श्रीव्रजांगनाजनको उनका वृद्धिंगत प्रणय देखकर स्वरसास्वाद कराना चाहा, पर वहाँ पहले प्रकृत काम हटे, तब अलौकिक रसकी स्थापना हो। बाहु, ऊरु, स्तन आदि प्राकृत लौकिक कामके स्थान हैं, कामदेव उनमें छिपकर बैठा हुआ है। श्रीगोपांगनाजनको कामदेवने अपना दुर्ग बनाया है और वह बाहु आदि स्थानोंमें बैठकर मानो श्रीकृष्णसे युद्ध करना चाह रहा है। भगवान् कृष्णने श्रीगोपांगनाओंके अंग-दुर्ग- देशोंसे कन्दर्पको निकालकर वहाँ स्वानन्दात्मक रसकी स्थापना की। यही 'बाहुप्रसार....' का तात्पर्य है। जब पहले स्वानन्दात्मक रसकी स्थापना हो गयी, तब भगवान् अन्तर्धान हो गये—छिप गये। अब श्रीव्रजांगना विप्रयोगके आनन्दका अनुभव करने लगीं। बात यह है कि जीवको अनेक जन्मके कई प्रकारके पहले संस्कार पड़े हैं। उनके कारण वह अपने प्रभुके अनेक जन्मके विप्रयोगको जानता ही नहीं, यदि वह जान जाये तो विप्रयोगका उसे आनन्द मिले। दूसरे, आवश्यकता है परम तल्लीनताकी— प्रेममें विभोर हो उठनेकी, श्यामके रंगमें अपनेको रँग डालनेकी। जबतक यह स्थिति नहीं, तबतक आनन्द कैसा ? भक्त और भगवान्—दोनोंकी विवशता लाक्षा (लाख) कठोर वस्तु है, पर अग्निके सम्बन्धको पाकर वह द्रुत कोमल हो जाता है। इसमें विशेषता यह है कि जितना अधिक अग्निका ताप होगा, उतना ही अधिक द्रवता आयेगी। लाखको खूब तपाया जाये, इतना तपाया जाये कि वह सौ परत (तह)-के तनजेबमें छाननेयोग्य हो जाये। फिर वह छान भी लिया जाय, कूड़ा-करकट उसमेंसे निकाल लिया जाय, गंगाजलकी तरह वह स्वच्छ विशुद्ध हो जाये। उसमें हरिद्रा, हिंगुल, हरा, पीला कोई भी रंग छोड़ा जाये; जो भी छोड़ा जायगा, वह सब उसके अणु-अणुमें, अंश-अंशमें व्याप्त हो जायगा। अब यह लाख चाहे कि इस रंगको मैं निकाल डालूँगा तो उसके द्वारा निकाल पाना असम्भव है और यदि रंग ही चाहे कि मैं इसमेंसे निकल जाऊँ तो यह भी असम्भव है। यह है दृष्टान्त। इसे दार्ष्टान्तमें समन्वित कीजिये। भक्तका या प्रेमीका अन्तःकरण लाक्षा है, उसे प्रियतम प्राणधन श्यामसुन्दरकी प्रणयाग्निसे तपाओ, खूब तपाओ।

काम, क्रोध, लोभ, मोह आदिके कूड़े-करकटको निकालकर फेंक दो। फिर उसमें 'श्याम' रंग छोड़ो, अब प्रेमिका अन्त:करण और प्रियतम एकमेक हो गया। प्रेमी चाहे कि अपने अन्त:करणसे मैं श्यामको हटा दूँ तो वह असमर्थ ही रहेगा। श्यामसुन्दर भी चाहें कि मैं यहाँसे निकल भागूँ तो उनके लिये भी यह न होगा, चाहे वे कितने भी छली-बली हों। एक भक्त-अन्धे भक्त (सूरदास) इसी कोटिके हो गये हैं। वे यहीं वृन्दावनकी कुंज गलियोंमें अपने प्रियतम प्राणधन श्यामसुन्दर मनमोहनको ढूँढ़ते एक कुएँमें गिर पड़े। वैसे तो भगवान् उन्हें नहीं मिल रहे थे। पर अब उनसे न रहा गया, तुरंत हाथ पकड़कर कुएँसे निकाल लिया। महाभाग्यवान् सूरदास कूपपात पीड़ाको भूल गये। वे उस कोमल कर-स्पर्शको पाकर कृतकृत्य हो गये। उन्होंने निश्चय किया कि इतना सुखकर, साधारण जनोंमें असुलभ, कोमल स्पर्श प्रियतम प्राणधनके बिना अन्यत्र उपलब्ध ही नहीं हो सकता। उस मंगलमय ब्रह्मसंस्पर्शसे वे रोमांचित हो उठे। उन्होंने उसे जोरसे पकड़ लिया। भक्तकी वांछा पूरी हुई, दिव्य दृष्टि मिली, दर्शन आदि मिले। भगवान् बलात् अपना हाथ छुड़ाकर जाने लगे तब सूरने कहा- हस्तमुच्छिद्य यातोऽसि बलात्कृष्ण किमद्भुतम्। हृदयाद् यदि निर्यासि पौरुषं गणयामि ते॥ इसीका हिन्दीमें भी अनुवाद है- हाथ छुड़ाए जात हो निबल जानिके मोहि। हिरदे से जब जाहुगे मरद बदौंगो तोहि॥ नाथ! हाथ छुड़ाके जाते हो, जाओ, पर आपकी सर्वज्ञता सर्वशक्तिमत्ताकी महत्ता तो तब है, जब आप इस दुर्बल अन्धेके हृदय-मन्दिरसे निकल भागो, आज मुझे यही देखना है। यह पिघली हुई लाखकी ललकार है, रंगके प्रति। भक्त अपने हृदयसे निकल जानेको चैलेंज देता है, पर प्रभु लाचार हैं, निकल नहीं सकते। यह प्रभुकी लाचारीका दृष्टान्त है। अब भक्तकी लाचारीका दृष्टान्त सुनिये। एक सखी मूर्च्छित पड़ी है, एक उसके पवन-संचार आदि उपायमें खड़ी है। दूसरी आकर मनमोहन श्यामसुन्दरका नाम लेने लगती है, उनकी कुछ करतूत बतलाना चाहती है, पर उपचारिका सखी अपने मुखपर तर्जनी रखकर संकेतसे उसे वैसा करनेको रोकती है-'सन्त्यज सखि तदुदन्तं सुखलवमपि यदि समीहसे सख्याः, स्मारय किमपि तदितरत् विस्मारय हन्त मोहनं मनसः।' सखि! यदि अपनी सखीका तुम थोड़ा भी कल्याण चाहती हो तो उसकी बातको मत छेड़ो, उसके अतिरिक्त किसी अन्यका स्मरण कराओ। 'तदुदन्तम्' और 'तदितरत्' कहती है, नामतक नहीं लेना चाहती। तब सखि, क्या करें? फिर यह कैसे अच्छी होगी? उपाय यही है, सखि! किसी तरह इसके मनसे मोहनको भुला दो। इस दृश्यको एक महात्मा योगी देख रहे थे, उन्हें यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। वे कहते हैं- प्रत्याहृत्य मुनिः क्षणं विषयतो यस्मिन्मनो धित्सति बालासौ विषयेषु धित्सति मनः प्रत्याहरन्ती ततः। यस्य स्फूर्तिलवाय हन्त हृदये योगी समुत्कण्ठते मुग्धेयं किल पश्य तस्य हृदयान्निष्क्रान्तिमाकाङ्क्षते॥ एक मुनि विषयोंसे चित्तको हटाकर क्षणभरके लिये; जिसमें लगाना चाहता है, यह बाला उससे चित्तको-आसक्त चित्तको निकालकर विषयोंमें लगाना चाहती है! कितना आश्चर्य है कि जिस तत्त्वकी हृदयमें तनिक-सी स्फूर्ति-चमत्कारके लिये अष्टांगयोगयुक्त योगी उत्कण्ठित रहता है-कभी मेरे मानसकुंजमें भगवान् पधारें, यह मुग्धा भोली गवाँरी ग्वालिन उसे अपने चित्तसे निकाल देनेके लिये व्याकुल है और भी एक सखी कहती है- 'इत उत देखे मति चौथ को चन्दा तोय देखे ते कलङ्क मोय लग जायेगो।' भगवदनुरक्त गोपियोंद्वारा भगवद्विस्मरणके लिये उनमें दोषानुसन्धान इतना ही नहीं, वह श्यामसुन्दर चित्तसे निकल जाये, इसके लिये दोषानुसन्धान करती है। जिसके नामस्मरणमात्रसे दोष नामशेष हो जाते हैं, प्रेमोन्मादमें व्रजांगना उसमें दोष ढूँढ़ती है- मृगयुरिव कपीन्द्रं विव्यधे लुब्धधर्मा स्त्रियमकृत विरूपां स्त्रीजितः कामयानाम्।

३४२ भक्तिसुधा बलिमपि बलिमत्त्वावेष्ट्यद् ध्वाङ्क्षवद् य- स्तदलमसितसख्यैर्दुस्त्यजस्तत्कथार्थः ॥ (श्रीमद्भा० १०।४७।१७) सखि ! ये तो सदाके छलिया हैं, देखो, रामावतारमें लुब्धधर्मा अथवा अलब्धधर्मा होकर मृगयु— बहेलियाकी तरह निरपराध बालीको मारा; छिपकर— पेड़की ओट लेकर बालीका वध किया* और इनकी बहादुरी तो देखो सखि ! स्त्रीपर इन्होंने हाथ उठाया, प्रेम करनेके लिये बेचारी शूर्पणखा इनकी उदारता सुनकर पहुँची थी, उसे यह वर दिया कि नाक-कान काटकर बेचारीको बिदा किया। क्या कहें सखि ! स्त्रीजितोंको कुछ विचार थोड़े ही रहता है। वे जानकीके प्रणयोन्मादमें इतने प्रमत्त थे कि उन्हें धर्मशास्त्रतक नहीं स्मृत रहा, विरूप कर दिया एक सुन्दरी स्त्रीको। सखि ! कोई एक अवतारकी बात हो तो कहें, इनके तो जन्म-जन्मकी ये ही करतूतें हैं— देखो, वामन-अवतारमें इन्होंने बलिको छला। 'बलि' को खाकर कौएकी तरह इन्होंने सर्वस्वसमर्पयिता बलिको, उसका सर्वस्व हरण करके भी उसे नागपाशमें बाँध लिया। सखि ! यह क्या न्याय है ? इसलिये कालोंसे, कुटिलोंसे सम्बन्ध जोड़ना, सख्यभाव करना अब हम छोड़ देंगी। पर क्या करें, उनका कथा रूप अर्थ हाय ! छोड़ा ही नहीं जाता। ये सब व्रजांगनाओंके प्रेम-समुद्रकी तरंगें हैं। कहीं कहती हैं—'प्रीति की रीति रंगीलोइ जाने।' और अपना सर्वस्व न्योछावर करती हैं और कहीं ऐसा दोषानुसन्धान करती हैं कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। एक और दोषानुसन्धान-प्रसंग है— एक विरहतप्ता व्रजबाला कहती है—'सखि, इन्होंने कभी किसीका भला नहीं किया। जन्मसे ही तो 'पूतना—सुपयः-पानस्' बेचारी पूतनाको—स्त्रीको— समाप्त कर दिया। सखि ! कालोंकी यही करतूतें हैं।' 'काले सबहिं बुरे……।' हम अब कालेसे बिलकुल अनुराग न करेंगी। जब उनमें ही प्रेम नहीं, तब हम क्यों उनसे प्रेम करें ?' कभी-कभी तो कालेका इतना निषेध कि 'अब काले वस्त्र और आभूषणतक न पहनेंगी। कभी तो यह भाव, यह तरंग कि 'सखि हौं श्याम रंग रंगी' सब चीज काली। नील निचोल, ओढ़नी, लहँगा, सब काले, यहाँतक कि हाथ आदिके गहने भी काले इन्द्रनीलमणिके। पर जब दोषानुसन्धानका प्रसंग उपस्थित हुआ, तब 'एक भी काली चीज पासमें न रखेंगी।' एक चतुर सखीने बीचमें मीठी चुटकी लेते हुए पूछा—'सखि ! हमने माना इन काले वस्त्रालंकारोंको तुम अवश्य फेंक दोगी, पर यह तो बताओ, इन काले केशोंका क्या करोगी?' उत्तर मिला, और बड़ा भावगम्भीर उत्तर मिला—'…………धूलिधृता मस्तके' सखि, इन केशोंमें मिट्टी पोत लेंगी।' दोषानुसन्धानके प्रसंगमें जो श्लोक 'मृगयुरिव कपीन्द्रम्' पहले कहा, उसीके आगे एक और वैसा ही श्लोक है— यदनुचरितलीलाकर्णपीयूषविप्रुट्- सकृददनविधूतद्वन्द्वधर्मा विनष्टाः। सपदि गृहकुटुम्बं दीनमुत्सृज्य दीना बहव इह विहङ्गा भिक्षुचर्यां चरन्ति ॥ (श्रीमद्भा० १०।४७।१८) अर्थात् सखि, उन श्यामसुन्दरके द्वारा अनुष्ठित, सुधा-बिन्दुके समान कानोंको अति मधुर लगनेवाली लीलाओंको जिन्होंने एक बार भी सुन लिया, उनके द्वन्द्व धर्म—सुख-दुःखादि—जो गृहस्थादिमें हुआ करते हैं, काँप गये अर्थात् इस हमारे आश्रित पुरुषने ऐसी चीज सुन ली, जो अब जंगलोंमें मारा-मारा फिरेगा। यह समझकर दुःखादि भी दुःखसे मानो कम्पित हो गये। यों कृष्णलीलाके श्रोता पुरुष घर- घाट कहींके नहीं रहे, अतएव विनष्ट हो गये। हाय ! वे लोग बिलखते स्त्री-पुत्रोंको, जिनका पालन धर्मतः न्याय है—लीला सुनते ही तुरन्त छोड़कर सचमुच जंगलोंमें भाग गये। ऐसे बहुत-से लीला-श्रोता दीन

  • लुब्धधर्मा = व्याधके जैसे क्रूरता, निर्दयता आदि धर्मोंको क्षत्रिय होकर भी इन्होंने ग्रहण किया। भयावह परधर्मको लेकर पापतक किया। फिर व्याध तो मांस-भोजनकी इच्छासे हरिण आदिको मारता है, परंतु इन्होंने इसलिये बालिको नहीं मारा, वृथा ही मारा, अतः ये बड़े कठिन हैं—अलब्धधर्मा हैं।

श्रीरामपञ्चाध्यायी ३४३ होकर अर्थात् कन्था, कौपीनके चिथड़ोंको लपेटे, पक्षियोंकी वृत्ति धारण किये, नारायण कहते यहाँ वृन्दावनमें भीख माँगते फिरते हैं। क्या सखि! तुम्हीं बताओ, ऐसोंसे प्रेम करें ? सारांश यह कि जब सतत भावना-परिपाकसे भावुकका चित्त लाक्षाकी तरह द्रुत हो जायगा, तब उसमें व्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरका प्राकट्य होगा और फिर वे वहाँसे जानेमें समर्थ न होंगे। यद्यपि भगवान् सर्वशक्तिमान् हैं, उनकी महिमा है- 'छूछी भरे, भरी ढरकावे, जब चाहे तब फेर भरावे।' परंतु ऐसे भक्तोंके आगे उनकी सर्वशक्तिमत्ता कुण्ठित हो जाती है, वे उन्हें नचा सकते हैं। इस तरहके वियोगमें स्वाद है। यह अनुभवकी बात है। कहीं मार्गमें प्रिय मित्र मिला, उसका चित्र हृदयपटर अंकित हो गया। मोहर तब उखड़ती है, जब लाक्षा गरम हो। स्नेहरूप अग्निसे द्रुत अन्तःकरणपर वस्तुका स्वरूप प्रकट होगा। कामी कामिनीके लिये व्याकुल रहता है, उसे अग्निके लिये तृणसे कोई सम्बन्ध नहीं, उसके हृदयमें वियोगाग्नि सदा धधकती रहती है। इस तरह दर्शन-स्पर्शनादिद्वारा हृदयलाक्षा पिघलती है, उसमें अपने इष्टतत्त्वके सम्पृक्त होनेपर वह फिर अचल हो जाता है। श्रीमद्भगवद्वपु मूत्र-पुरीष- भाण्डागार प्राकृत शरीर नहीं, वह अप्राकृत दिव्य रसमय है, अतएव पूर्वोक्त रीत्या 'बाहुप्रसारपरिरम्भ' आदिके अनुसार व्रजदेवियोंके तत्तदंगालंभनद्वारा मानो उसने व्रजदेवियोंको अप्राकृतरसानुभवक्षम देह दी। 'उज्ज्वलनीलमणि' का भी यही मत है- गन्धकको पारदसे घोटें तो कुछ कालके बाद गन्धक जैसे पारद (पारा)-रूप हो जाता है, वैसे ही पूर्णके सम्बन्धसे अपूर्ण वस्तु पूर्ण हो जाती है, प्राकृत वस्तु अप्राकृत बन जाती है। यही बात व्रजांगनाओंके पक्षमें है, भगवान्ने उनके अलकादिका स्पर्श करके इन्हें रसस्वरूप- स्व-स्वरूप बना दिया, प्राकृतसे अप्राकृतमें बदल दिया। इसपर भगवान्का अधिक आनुकूल्य पाकर गोपांगनाओंको दर्प हुआ। उसीको दूर करनेके लिये लीलानायक श्रीकृष्ण अन्तर्हित हो गये। छिप गये। भगवान्के अन्तर्धान होनेका हेतु- गोपियोंपर कृपा करना श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहनके वियोगमें जब गोपांगनाएँ व्यथित हुईं, वह विप्रयोगाग्निताप शनैः- शनैः जब उनके अन्तःकरणमें प्रविष्ट हुआ, तब उनके तापको, दुःखको दूर करनेके लिये श्रीभगवान्‌की लीलाशक्ति प्रकट हुई। अन्तर्हित शब्दका अर्थ 'छिपना' और ('अन्तःमनसि हितं - दया यस्य सः') जिसके हृदयमें दया हो वह व्यक्ति भी होता है। पीछे 'अन्तर्हिते भगवति', 'अन्तर्हिते' कह आये हैं। भगवान् गोपीजनवल्लभ हैं। गोपांगनाओंके प्रति बड़े कृपालु हैं। उनके हितके लिये ही वे अन्तर्हित हुए हैं, उन्हें सन्ताप पहुँचानेके लिये नहीं; क्योंकि वे निष्ठुर नहीं हैं। इसलिये 'तासां तत् सौभगमदं....' (श्रीमद्भा० १०।२९।४८) आदि पहले कहा। श्रीव्रजांगनाओंको यह गर्व था कि 'श्रीश्यामसुन्दर हमारे परवश हैं- अधीन हैं; क्योंकि वे हमारी वेणी सुलझाते हैं, पादचित्तकी उन्नतिका नाम 'मान' और उसकी गाढ़ता 'मद' है। 'रासलीला' परम रसमयी है। थोड़ा भी गर्व उसमें बाधक होगा। अतः श्रीश्यामसुन्दर प्रभु उसे दूर करके पूर्ण विशुद्ध रसास्वाद करनेके लिये और 'प्रसादाय' (गोपियोंकी प्रसन्नताके लिये) स्ववश करनेके लिये अन्तर्हित हुए, छिपे। तथा मनमें हित है। अथवा 'अन्तः' पंचम्यन्त अव्यय है। उसका अर्थ हुआ ('हृदयात्') हृदयसे अर्थात् व्रजदेवियोंके हृदयसे विच्छेदहेतुक गर्वके निवारण करनेके लिये भगवान् परमोपकारक बने, अन्तर्हित हुए। श्रीमद्वल्लभाचार्यजी कहते हैं- 'तासां तत् सौभगमदं वीक्ष्य मानञ्च....' इसमें 'मद' का अर्थ पूर्णता है, जिसका आशय हुआ गोपांगनाओंको अपनी पूर्णताका, अपने सौभाग्यके उत्कर्षका अनुसन्धान हुआ। यदि ऐसा हो तो इसमें कोई आपत्ति नहीं; क्योंकि उनके-जैसी कृष्णग्रहगृहीतात्माओंको उन्हें अपने सौभाग्यके उत्कर्षका अनुसन्धान हो तो जिस अवस्थामें वे हैं, उसमें जाकर होना ही चाहिये। यह बहुत दुर्लभ है। फिर भगवान्‌की पूर्णकृपासे ही तो यह

३४४ भक्तिसुधा हुआ है। ऐसी स्थितिमें इसका अपनोदन क्यों हो ? इसपर वे कहते हैं—जो मान हुआ, वह असामयिक है, वह रस-विच्छेदक होगा। अतः उसे दूर करनेके लिये भगवान् अन्तर्हित हुए। फिर भी अन्तर्हित न होना चाहिये; क्योंकि मानवतीका मान मनाकर अपनोदन करना ही रसमर्यादा है। इसपर कहते हैं— मान आन्तर वस्तु है, बहिरंग नहीं। अतः उनका अपनोदन अन्तर्निहित होकर ही हो सकता है, अतएव भगवान् अन्तर्हित हुए। उन्होंने लीलाविशेषसे विशिष्ट होकर अन्तर्हितताके साथ मानापनोदन किया। अथवा मान हुआ श्रीवृषभानुनन्दिनीको, वह भी सहसा। वे करुणामयी हैं। उनके प्रसाद-लेशसे श्रीश्यामसुन्दरका दर्शन सम्भव है। उनके बिना कृष्णतत्त्वका प्राकट्य ही नहीं। 'आत्मरति' में आत्मा श्रीरासेश्वरी हैं। जैसे गुण और गुणीका तादात्म्य है, वैसे ही श्रीराधा-कृष्ण तत्त्वका तादात्म्य है। कर्पूरमेंसे सौगन्ध निकल जाय तो कर्पूर कुछ नहीं रह जाता। श्रीवृषभानुनन्दिनी जलमें माधुर्यस्थानीया हैं। श्रीश्यामसुन्दरतत्त्वमेंसे माधुर्य निकल जाय तो फिर वह कुछ है ही नहीं। श्रीनन्दनन्दनका आन्तररमण श्रीरासेश्वरीमें ही होता है। बाहरका रमण बहिरंगोंमें है। किसी भावुकके मतसे तो सौगन्धका पृथक् होना और उसके ग्राहक घ्राणका अलग होना, यह बड़ा व्यवधान है, असह्य है। पूरा आनन्द तो तब है, जब पुष्पमें ही घ्राण हो। यह यहीं सम्भव है। उनकी शक्ति उनमें और उनकी शक्ति उनमें रहती है। अतः 'सर्वं वाक्यं सावधारणं भवति'— जहाँ कहीं आत्माका संचार होगा, जहाँ श्रीरासेश्वरीके स्वरूपका संचार होगा, वहीं रमण होगा। श्रीललिता, विशाखा आदिमें रसोदय उनसे सम्बन्ध जुड़नेपर होगा। उनका अनुगमन इसकी तरह हुए बिना रसोदय या रमण नहीं होगा। श्रीरासेश्वरीकी कृपाके बिना श्रीकृष्णको भी रसास्वाद या रमण सम्भव नहीं, अतः दोनोंका तादात्म्य-ऐकात्म्य स्वीकृत हुआ है। फिर श्रीरासेश्वरी परम करुणामयी हैं, इसी बलपर वे कृतकृत्य हुए। जो सखियोंके प्रति यदा-कदा उनमें ईर्ष्यादि दीख पड़ती है, वह सब लीला रससंचारार्थ है। सूक्ष्म विचार करनेपर तो नित्य निकुंजमें मान आदिका प्रवेश ही नहीं। परंतु इन स्थूल मान आदिका ही वहाँ संचार नहीं, सूक्ष्म मान आदि तो रसपोषार्थ वहाँ भी है ही। वहाँ सर्वाधिक सम्प्रयोग है, कभी विप्रयोग होता ही नहीं। तथापि रसकी सब अवस्था प्रकट होती रहती है। नेत्रके उन्मीलन-निमीलनमात्रसे विप्रयोग आदि हो जाते हैं। अस्तु, इसी दृष्टिसे श्रीब्रजेश्वरी रासेश्वरीमें ईर्ष्याका संचार हुआ और मेरे प्रभु, मेरे ही प्राणधन अन्योंको भी ऐसा मान देते हैं, इस तरहका मान उत्पन्न हुआ तथा अन्योंमें गर्वका उदय हुआ। अतः 'प्रशमाय प्रसादाय तत्रैवान्त- रधीयत'। अहो ! प्रभुकी भक्तवश्यता ? जो प्रभु केशव हैं, 'कश्च ईश्च केशौ तावपि वशयतीति सः' अर्थात् ब्रह्मा तथा रुद्रको भी जो वशमें रखनेवाले हैं, वे भगवान् गोपीगर्वापहारार्थ अन्तर्धान हुए, परंतु यह ऐश्वर्य श्रीरासेश्वरीका मान दूर करनेमें कैसे समर्थ होगा ? वहाँके माधुर्य-साम्राज्यमें इसका प्रवेश भी कहाँ ? इसलिये वहाँ तो भगवान् श्रीराधारानीकी 'वेणुगूंथन' सेवा करके उनका मान मनायेंगे। इस पक्षमें 'केशव' की व्युत्पत्ति होगी—'केशान् वयते संस्करोतीति केशवः।' भगवान् अपनी योगमायासे ही अन्तर्हित हुए। श्रीव्रजदेवियोंके हृदयमें वे अकेले नहीं, किंतु अपनी लीलाके साथ अन्तर्निहित हुए। अतः लीलादेवी श्रीव्रजांगनाओंके व्रजांगना-मानसमें प्रविष्ट थीं, अतः वहींसे प्रकट होने लगीं। उसीको कहते हैं— गत्यानुरागस्मितविभ्रमेक्षितै- र्मनोरमालापविहारविभ्रमैः । आक्षिप्तचित्ताः प्रमदा रमापते- स्तास्ता विचेष्टा जगृहुस्तदात्मिकाः ॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।२) कायिकी, वाचिनिकी, मानसिकी तीन प्रकारकी लीलाएँ साधारणतया मानी गयी हैं। उनमें पहले कायिकी गतिका वर्णन करते हैं, श्रीव्रजांगना विहार करते समय गतिका अनुभव कर रही थीं। हंस, गज और सिंह-सी गति उनके मानसमें उदित हुई। जब उनके मनमें यह भावना हुई कि हमारे प्राणधन

श्रीकृष्ण सम्मिलनके लिये पधार रहे हैं, तब इन गतियोंका स्फुरण हुआ। 'गत्यानुराग' में गति आ अनुराग ऐसा सन्धिविच्छेद करना चाहिये। 'आ अनुराग' का आशय है 'प्रेमको सब ओरसे बटोरकर' वे प्रियतम श्रीकृष्णके स्मितादिका अनुभव करने लगीं। ऐसे एकान्त गाढ़ अनुरागसे श्रीगोपांगनाएँ श्यामसुन्दरके 'स्मित' आदिका अनुध्यान या ग्रहण करने लगीं। स्मित मन्दहासका नाम है, यह चित्तलोभक है। यह अद्भुत विभ्रम है, माया है। जिससे गोपांगना न तो अत्यन्त बहिर्मुख ही रहें और न अत्यन्त अन्तर्मुख ही, क्योंकि बहिर्मुखतासे ताप और अत्यन्त अन्तर्मुखतासे साक्षात्कार होगा, जो अभी अभीष्ट नहीं। अतः मध्यमस्थितिमें रखा। गोपांगनाओंको यह सब नाच वही भगवल्लीलाशक्ति नचा रही है। अलसवलितादिस्वरूप गोपांगनाविषयक शृंगारोद्रेकसे मनकी अनवस्थितिका नाम विभ्रम है। यह श्रीकृष्णभाव है। इस प्रकारके अवलोकसे गोपियाँ कृष्णात्मक चेष्टासे गृहीत हुईं। इन सबसे लाखकी तरह द्रुत भाव भी हो रहा है। इसके अतिरिक्त श्रीकृष्णकी प्रत्येक चेष्टासे जो मनोरम आलाप अथवा रमण करनेवाले आलाप हैं, फिर तदनुगुण विहार और विभ्रमसे तदात्मक चेष्टा ग्रहण की। विभ्रमका अर्थ पहले कहा गया है। 'मनमोहन श्यामसुन्दर सिंह-गतिसे आकर सामने खड़े हो गये।' ऐसी व्रजांगनाओंकी भावनासे उनके मानसमें पूर्णानुरागका अभिव्यंजन, हासके स्वानुकूलता-विभ्रमसे विशिष्ट भ्रमण, कटाक्ष, नेत्रतारकोंका विशिष्ट घुमाव आदि हुआ। यह सब प्राकृतोंमें भी होता है, पर उससे यह लीला अधिक स्थिर महत्त्वकी है। 'मनोरमालाप'-पर विश्वनाथ चक्रवर्तीके ये भाव हैं—श्रीव्रजदेवियोंके उस समय ये मनोरम आलाप हुए—अयि पद्मिनि ! (कमलिनि अर्थात् स्त्रीसे— नायिकासे—बात कर रही है, नायिकात्वका आरोप करके पूछ रही है) आपलोग स्थलपद्मिनी हैं, हम प्रेमपिपासार्त हैं, हम मधुपोंको मधुपान कराओ। एक गोपी कहती है—'हे पद्मिनि! अपने पति सूर्यको मधुपान देगी ? पर सूर्यको पद्मिनी मधुपान नहीं कराती।' ऐसे मनोरमालापसे एक गोपी पराजित हो गयी। दूसरा अर्थ—दूसरी कहती है—तुम्हें महादर्प- सर्पने दष्ट किया है, हम गारुडिक हैं, हम तुम्हारे अंगका विघट्टन करेंगी। तब वह कहती है—हमें सर्पने नहीं काटा। इसपर गारुडिक बनी गोपी कहती है—तुम्हारी गद्गद वाणीसे तो यह स्पष्ट हो रहा है। ऐसे मनोरमालापसे आक्षिप्तचित्ता गोपांगनाओंने श्रीकृष्णकी गत्यादि उन-उन चेष्टाओंको ग्रहण किया। इससे मनमें लौकिकता न आनी चाहिये। श्रीभगवान् परम निष्काम हैं। यहाँ भक्तपारवश्यात् प्राकृतताकी प्रतीति है। एक बार श्रीनन्दरानीको भाव हुआ कि 'ये तो ईश्वर हैं।' पर यह भाव प्राकृतलीलामें व्याघात है। ऐसा होनेपर श्रीयशोदा छड़ी कैसे दिखायें ? अतः प्रभुने उस भावको हटाया। माधुर्यभावसे वह हट गया। यहाँ प्राकृत कान्तभावसे अप्राकृत ईश्वरभावको दबाया। श्रीभगवान्‌का वह सौन्दर्य, माधुर्य कान्तादि भावसे गोपांगनाओंकी एकतानताका विशेषकर पोषक हुआ। मनोरमालाप, विहार आदिसे उन्हें बन्धादि उपदेश हुआ। यह सब भाव व्रजदेवियोंके रोम-रोममें समाये हुए थे। वे किसी-न-किसी भावसे प्रतिक्षण कृष्णप्रविष्टचेता रहती थीं। 'वैधी' में यह बात नहीं है, वहाँ तो संसारसे चित्त हटाकर प्रभुका ध्यान करनेपर भी वह (चित्त) वहाँ नहीं रहता। परंतु रागानुगा प्रीतिमें मन सहजहीमें प्रियतम प्राणधनके ध्यानमें लीन रहता है। श्रीश्यामसुन्दर मनमोहनका यह लोकोत्तर हास, विभ्रम, गति, सौन्दर्य प्रेमीको बलात् खींचे, हटानेपर भी न हटे, तभी सच्ची रागानुगा प्रीति है। लौकिक कामी-कामुककी भी यही स्थिति होती है। इसीलिये महात्मा श्रीतुलसीदासने चाहा कि जैसे कामीको नारी प्रिय होती है, वैसे ही मुझे भगवान् श्रीअयोध्यापति प्रिय हों— कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम। (रा०च०मा० ७।१३० ख) इसीलिये सकलसुन्दरशेखर मयूरशेखर श्रीकृष्ण ऐसे भावसे व्यक्त हुए कि उन्हें देखकर किसका मन न चल जाय ? ऐसे ही तात्पर्यकी श्रीव्रजांगनाजनकी

उक्ति है— का स्त्र्यङ्ग ते कलपदायतमूर्च्छितेन संमोहितार्यचरितान चलेत्त्रिलोक्याम्। त्रैलोक्यसौभगमिदं च निरीक्ष्य रूपं यद गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यबिभ्रन्॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।४०) अर्थात् नाथ! मधुर पदावलीके साथ उच्च स्वरसे गाये गये आपके स्वरालापोंको सुनकर तथा त्रिभुवनमोहन इस दिव्य रूपराशिको निहारकर दैवी, मानवी, आसुरी—त्रिलोकमें कौन वह स्त्री है, जो आर्यचरितसे चलित न हो जाय? जब कि पशु, पक्षी, हरिण और जड़ वृक्षोंतकमें रोमांच हो आता है? इस प्रकार यहाँ व्रजकी दिव्य देवियोंके प्रसंगमें केवल भावमात्र लौकिक है। वैसे तो वे प्रभु और उनकी लीला सदासे अलौकिक है। अतः व्रजांगनाओंके आकर्षणातिशय-द्योतनार्थ भी कहा—'गत्यानुराग- स्मित....।' इसमें 'प्रमदा' पद आया है। इसकी व्युत्पत्ति है—'प्रकृष्टो मदो यासान्ताः प्रमदाः।' मदमें मोहकता है। यह नारीवर्गमें स्वभावसिद्ध है। वह भी व्रजकी नारियोंमें, वह भी फिर अंगना 'प्रशस्तानि अङ्गानि यासान्ताः' वह भी श्रीकृष्णमें, उनकी ही लीलासे आक्षिप्तचित्त प्रमदाएँ। यों प्रकर्षकी पराकाष्ठा हो गयी। इसपर भी यह और विशेषता कि इनका चित्त, देह, गेह, स्वजननेहसे हटकर श्रीकृष्ण परमात्मार्यें आकृष्ट हो गया, और चाहिये ही क्या? अनृत, मायामय संसारसे चित्त हटकर उनमें फँसे, यही तो होना चाहिये। बड़े-बड़े अष्टांगयोगयुक्त योगी इसीके लिये लालायित रहते हैं। सिद्ध महात्मा जप, तप, ध्यानसे इसी एक बातको निरन्तर चाहा करते हैं। पर धन्य है, उन व्रजांगनाओंको, जिन्होंने योगसे भी दुर्लभ तत्त्वको भोगसे प्राप्त किया। श्रीश्यामसुन्दर मनमोहनकी आभामें, सौन्दर्य झलकमें उनका चित्त ऐसा उलझा कि फिर उलझा ही रह गया। अतएव वे प्रमदा भी हैं अर्थात् इसी कारण प्रकृष्ट मद- हर्षवाली होनेसे वे प्रमदा हैं। सचमुच इससे बढ़कर और हर्षका स्थान कौन होगा? औपनिषद् विज्ञान भी ऐसा है—'प्रमोद उत्तरः पक्षः' अर्थात् प्रिय, मोद, प्रमोद और आनन्द— ये आनन्दमय ब्रह्मके एक अंग हैं। ये सब योनियोंमें अनुभूत होते हैं। देवादिमें भी ये अनुभूत हैं। ये ही आनन्दसिन्धु शुद्ध ब्रह्मके चिह्न हैं। ये जहाँसे आते हैं, वहीं आनन्दसिन्धु हैं। तब आनन्दसिन्धु बलदेवबन्धुमें आक्षिप्तचित्त होकर गोपांगनाएँ प्रकृष्ट हर्ष या मोदवाली हों, इसमें कहना ही क्या? पूर्वोक्त श्रीवल्लभाचार्यजीके अभिप्रायानुसार जब लीला-शक्तिने 'ताप' को बाहर ही रोक दिया, तब वे सुतरां प्रमदा हो गयीं। यों उनका कथन भी ठीक हुआ। एक दूसरा भाव—'आक्षिप्तचित्ताः प्रमदा रमापतेः' श्रीव्रजदेवियाँ स्वयं सुन्दरी हैं, वे किसी साधारण व्यक्तिके गत्यादिसे आक्षिप्तचेता न होंगी। अतः विशेष हेतु दिया—'रमापतेः—लक्ष्मीपतेः गत्यादिभिराक्षिप्तचित्ताः' अर्थात् व्रजांगनाजनके आकृष्ट होनेमें ललित गति, मधुर आलाप आदि [L55

श्रीरासपञ्चाध्यायी ३४७ ये दोनों बातें हैं, पर वे रूप और वेश आदिसे अमंगल बने हैं और कोई (विष्णु) उक्त दोनों बातोंके साथ सुमंगल भी हैं, पर वे मुझे चाहते ही नहीं। शंकर अनन्त, अखण्ड हैं, पर उनका वेश विलक्षण अमंगल है। विष्णुमें सब बातें हैं, पर वे मुझे चाहते ही नहीं। अच्छा, ये न चाहें, मैं तो इन्हें चाहती हूँ। यह निश्चय करके लक्ष्मीने श्रीविष्णुके गलेमें वरमाला पहना दी। भगवान् भक्तपराधीन हैं भगवान् भक्तपराधीन हैं। भक्त उन्हें जैसा नाच नचायें, नाचते हैं। भक्त भगवान्‌को वनमाला पहनाता है, वह सूख भी जाती है, पर भगवान् उसे उतारते नहीं, क्योंकि वह प्रिय भक्तकी पहनायी हुई है। यद्यपि भगवान्‌के अंग-संगसे कोई भी वस्तु म्लान नहीं होती तथापि यह भी एक भाव है। हाँ तो यों भगवान् अपने भक्तकी पहनायी मालाको उतारते नहीं। वह भगवान्‌की दक्षिणावर्त सुवर्णरोमराजिपर सूखी हो जानेसे कुरकुराती है। वक्षःस्थलके दोनों ओर वह चुभती है, तब भी भगवान् उसे उतारते नहीं— पर्युष्टया तव विभो वनमालयेयं संस्पर्धिनी भगवती प्रतिपत्निवच्छ्रीः। यः सुप्रीणतममुयार्हणमाददन्नो भूयात् सदाऽङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः॥ (श्रीमद्भा० ११।६।१२) अतः भगवान्‌ने निरपेक्ष होनेपर भी भक्तजन- वश्यतावश लक्ष्मीजीको स्वीकृत किया। इस प्रकार सर्वजगदधिष्ठात्री देवी लक्ष्मीने खूब परीक्षा करके भगवान्‌को वरा और उनके चरणोंमें ऐसी अनुरक्त हुईं कि अपनी स्वाभाविक चंचलताको छोड़कर सदाके लिये अचला हो गयीं—'चलापि यच्छ्रीर्न जहाति कर्हिचित्' (श्रीमद्भा० १।११।३३)। ऐसी लक्ष्मीको भी मुग्ध करनेवाले श्यामसुन्दरके गति-विभ्रम आदिसे व्रजदेवियाँ कैसे वश न हों? भगवान्‌के प्रति गोपियोंके वशीकारमें एक दूसरा यह भी हेतु है कि सर्वसौन्दर्य-माधुर्य-सम्पदधिष्ठातृ महाशक्ति श्रीरमा हैं। उसके पति-अध्यक्ष-भगवान्, उससे भी अधिक अनन्तसौन्दर्य-माधुर्य-सुधाजलनिधि हैं, अतः उनकी ललित गति आदिसे गोपांगनाओंका मन आकृष्ट हो गया। यह एक और तरहकी 'रमापति' पदकी साभिप्रायता हुई। इसके अतिरिक्त 'रमा' श्रीरासेश्वरी राधाका ही नाम है—'रमयति श्रीकृष्णं या, सा रमा' इस व्युत्पत्तिसे श्रीकृष्णचन्द्र भगवान्‌को रमण करानेवाली तो राधा ही हैं। लक्ष्मी विष्णुको रमण कराती हैं। यह वैकुण्ठकी बात है, व्रजरसकी नहीं। 'रासपञ्चाध्यायी' में श्रीकृष्णसे सम्बद्ध व्रजरसका वर्णन है। इस दृष्टिसे रमापति या राधापति अर्थात् श्रीराधाके प्राणधन श्रीकृष्णभगवान्‌की उन गति-विलासादिसे श्रीराधा, सखी आदि आक्षिप्तचेता हुईं। प्रेमप्रमत्त श्रीव्रजांगनाएँ भगवान्‌की इन लीला, गति, स्मित, विभ्रम, विहार आदिसे तदात्मिका हो गयीं। वे भूल गयीं कि हम कृष्णप्रणयप्रमत्त गोपांगना हैं, बल्कि उन्हें दृढ़ निश्चय हो गया कि हम कृष्ण ही हैं। फिर वे भी वैसी ही लीलाएँ करने लगीं। एक कहती है—सखि! देख, मैं कृष्ण हूँ, मेरी गति देख। यों तन्मयी होकर वे वही सब करने लगीं—'तास्ता विचेष्टा जगृहुस्तदात्मिकाः ॥' यद्यपि दासी स्वामीकी चेष्टाका अनुकरण करे, यह दोष है, ऐसा करना अनुचित है, परंतु व्रजांगनाओंका इसमें कोई दोष नहीं, क्योंकि वे प्रभु नटनागरकी इन लीलाओंसे आक्षिप्तचित्ता हैं। उन्हें पता ही नहीं कि वे कहाँ, कब, क्या कर रही हैं। जैसा-जैसा लीलाशक्ति कराती है, वैसा-वैसा वे करती हैं। भाव यह कि कहाँ तो इन व्रजदेवियोंकी यह स्थिति कि श्रीमुरलीमनोहर श्यामसुन्दरके पादारविन्दकी दिव्यनखमणिचन्द्रिकाकी एक छटाके दर्शन प्राप्त होनेसे अपनेको कृतकृत्य मानती हैं। ऐन्द्रपद, ब्राह्मपदतकके ऐश्वर्य-सुखोंको उसपर न्योछावर करती हैं और कहाँ यह स्थिति कि उन्हीं श्रीमदनमोहन भगवान्‌से पादसंवाहनतक करायें! यह उसी सौभगमदकी महिमाका प्रभाव था, जो कि श्रीव्रजदेवियोंको अपना दास्यभाव भूल गया और यह गर्व उत्पन्न हो आया कि वे श्रीघनश्याम हमपर मुग्ध हैं, हमारे हाथकी कठपुतली हैं, हम जो करायेंगी, सो करेंगे। यह सब उसी लीलासे उन भावोंने उन्हें वैसा करनेको प्रेरित किया।

, and it has a repha, then it is 'र्प'! Then: द + र्प + द + ल + न = दर्पदलन!! YES! Look at that: द र्प द ल न Wait, why did I see "दपर्दलन"? Because the repha on 'प' is at the top-right of 'प'! And right next to it is 'द'! Because Devanagari characters are tightly kerned, the repha on the right stem of 'प' hangs slightly over the junction between 'प' and 'द'! And because 'प' and 'द' are together, it looked like the repha was on the next letter! Wait, look at "कन्दर्प": The repha on 'प' in "कन्दर्प" is also on the right stem of 'प'! And in "दर्प": The letter is 'द', then 'प' with repha = 'र्प', then 'द', then 'ल', then 'न'! It is simply: कोटिकन्दर्पदर्पदलन-पटीयान! There is NO extra letter! It is purely "दर्पदलन"! "कोटिकन्दर्पदर्पदलन-पटीयान"! That is 100% correct, grammatically, doctrinally, and typographically!

Let's check the line numbers: Let's trace all lines of the page carefully.

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श्रीरासपंचाध्यायी ३४९

आवश्यकता है। श्रीभगवान्‌की लीला रोम-रोममें जब स्थायीभावापन्न हो जाय, तब अनुकरण किया जाता है। भक्त भी अनुकरण कर सकता है अथवा लीला ही जब उन्हें स्वयं गृहीत कर ले, तब अनुकरण हो सकता है। भगवान्‌के लीलानुकरणसे गोपियाँ अपनेको 'मैं श्रीकृष्ण ही हूँ'—ऐसा मानने लगीं जैसे कहीं भक्त भगवान्‌को ग्रहण करता है तो कहीं भगवान् ही उसे ग्रहण करते हैं। यहाँ उन लीलाओंने गोपप्रमदाओंको गृहीत किया, इसका अधिक स्फुटीकरण इसमें है— गतिस्मितप्रेक्षणभाषणादिषु प्रियाः प्रियस्य प्रतिरूढमूर्तयः। असावहं त्वित्यबलास्तदात्मिका न्यवेदिषुः कृष्णविहारविभ्रमाः॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।३) गोपसुन्दरियाँ उस समय अपनी गतिसे हंस, सिंह और गजेन्द्रको भी लजाने लगीं, उनका मन्दहास कामको भी विस्मय उत्पन्न करने लगा। ऐसे ही प्रेक्षण, भाषण आदि हुए। उनके स्वरूपमें गोपललनाओंके मन आदि तल्लीन हो गये। ऐसा अद्भुत अनुरागोद्रेक अन्तःकरणकी कोमलताका द्योतक है। यहाँ अन्योन्यात्मकताका वर्णन है। पहले स्मित आदि स्थिर हुए, फिर वे लीला आदिके साथ गोपरामाओंमें प्रतिबिम्बित हुए और उनका इनमें प्रतिबिम्बन हुआ। गोपांगनाओंके मन, इन्द्रियोंमें गति, स्मित आदि आरूढ़मूर्ति हुए, फिर गति, स्मित आदिमें गोपांगनाचित्त आदि प्रतिरूढ़मूर्ति हुए, परस्पर ऐक्य हुआ। यों श्रीनन्दनन्दन वंशीधर प्रभुका स्वरूप और लीला ब्रजदेवियोंके मन, बुद्धि, अन्तःकरण, रोम-रोममें प्रविष्ट हुई। मूर्ति—कार्यकारणसंघात—अन्तरात्मा प्राणोंमें प्रतिरूढ़ हुई। श्रीभगवान् और उनकी लीला श्रीब्रजदेवियोंमें और श्रीब्रजदेवियोंके मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि श्रीभगवान् और उनकी लीलामें प्रतिरूढ़ हुए। एक यह भी बात है कि उस समय वहाँ श्रीगोपियोंको भगवान्‌का प्रत्यक्ष दर्शन अथवा उनकी लीलाका ही प्रत्यक्ष दर्शन तो है नहीं, फिर श्रीकृष्णमूर्तिमें यह सब प्रतिरूढ़ कैसे हुआ ? तब इसपर यह समझना चाहिये कि पहले श्रीकृष्ण और उनकी लीला आदि श्रीगोपरामाओंमें—उनके मन, बुद्धिमें प्रविष्ट या आरूढ़ हुए, फिर स्वान्तस्थ अथवा स्वान्तःप्रत्यक्ष श्रीकृष्ण तथा तल्लीलामें श्रीगोपांगनाएँ और तन्मनोबुद्ध्यादि प्रत्यारूढ़ हुए। तभी 'असावहं त्वित्यबलाः' यह कथन संगत हुआ। इस तरह जब अन्योन्यकी एकता हो गयी— श्रीश्यामसुन्दरकी व्रजांगनाओंसे और व्रजांगनाओंकी श्रीश्यामसुन्दरसे एकता हो गयी—अभेद हो गया, तब श्रीगोपबाला कहती हैं—'देखो सखि, हम ही कृष्ण हैं।' यह तन्मयता कैसे ? तब कहा—'अबलाः' (नारी) बलहीन हैं। श्रीमोहन मुरलीमनोहरके विरहमें शक्तिहीन हो गयीं। धैर्य रखना बलका काम है। उसके बिना धैर्य कैसा ? जरासे विप्रयोगमें भी आँख डबडबा आती है—आँसू आ जाते हैं। इतना अधैर्य यद्यपि गुण नहीं, पर यहाँका अधैर्य महागुण है। श्रीश्यामसुन्दरके वियोगमें जितनी ही व्याकुलता हो, तड़फड़ाहट हो, उतनी ही अधिक तन्मयता होती है। नारी धैर्यबलशून्य होनेसे शीघ्र व्याकुल होती है। इनका हृदय बहुत कोमल होता है। इसी कोमलताके कारण वे प्रेमकी अधिकारिणी हैं। फिर व्रजांगनाओंकी कोमलताका तो कुछ ठिकाना ही नहीं। इसी तन्मयता और कोमलताके कारण वे भेद नहीं जान सकीं। इनमें और श्रीकृष्णमें परस्पर प्रतिबिम्बसे अभेद हो गया, तब युक्त ही कहा गया—'असावहं त्वित्यबलाः'। अथवा ऐसी दुर्लभ स्थिति—श्रीकृष्ण परब्रह्मके साथ तादात्म्यापत्तिकी प्राप्ति—निर्बलतासे कैसे होगी ? यह तो बड़े बलका काम है। तब कहा—'अबलाः— अः वासुदेवः बलं यासान्ताः' अर्थात् भगवान् वासुदेव ही जिनका सबसे बड़ा बल हैं, वे व्रजांगनाएँ 'असावहम्' इत्यादि कहने लगीं। वस्तुतः जगत्के


  • अपने प्रियतम श्रीकृष्णकी चाल-ढाल, हास-विलास और चितवन-बोलन आदिमें श्रीकृष्णकी प्यारी गोपियाँ उनके समान ही बन गयीं; उनके शरीरमें भी वही गति-मति, वही भाव-भंगी उतर आयी। वे अपनेको सर्वथा भूलकर श्रीकृष्ण-स्वरूप हो गयीं और उन्हींके लीला-विलासका अनुकरण करती हुईं 'मैं श्रीकृष्ण ही हूँ'—इस प्रकार कहने लगीं।