भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरामपञ्चाध्यायी ३४३ होकर अर्थात् कन्था, कौपीनके चिथड़ोंको लपेटे, पक्षियोंकी वृत्ति धारण किये, नारायण कहते यहाँ वृन्दावनमें भीख माँगते फिरते हैं। क्या सखि! तुम्हीं बताओ, ऐसोंसे प्रेम करें ? सारांश यह कि जब सतत भावना-परिपाकसे भावुकका चित्त लाक्षाकी तरह द्रुत हो जायगा, तब उसमें व्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरका प्राकट्य होगा और फिर वे वहाँसे जानेमें समर्थ न होंगे। यद्यपि भगवान् सर्वशक्तिमान् हैं, उनकी महिमा है- 'छूछी भरे, भरी ढरकावे, जब चाहे तब फेर भरावे।' परंतु ऐसे भक्तोंके आगे उनकी सर्वशक्तिमत्ता कुण्ठित हो जाती है, वे उन्हें नचा सकते हैं। इस तरहके वियोगमें स्वाद है। यह अनुभवकी बात है। कहीं मार्गमें प्रिय मित्र मिला, उसका चित्र हृदयपटर अंकित हो गया। मोहर तब उखड़ती है, जब लाक्षा गरम हो। स्नेहरूप अग्निसे द्रुत अन्तःकरणपर वस्तुका स्वरूप प्रकट होगा। कामी कामिनीके लिये व्याकुल रहता है, उसे अग्निके लिये तृणसे कोई सम्बन्ध नहीं, उसके हृदयमें वियोगाग्नि सदा धधकती रहती है। इस तरह दर्शन-स्पर्शनादिद्वारा हृदयलाक्षा पिघलती है, उसमें अपने इष्टतत्त्वके सम्पृक्त होनेपर वह फिर अचल हो जाता है। श्रीमद्भगवद्वपु मूत्र-पुरीष- भाण्डागार प्राकृत शरीर नहीं, वह अप्राकृत दिव्य रसमय है, अतएव पूर्वोक्त रीत्या 'बाहुप्रसारपरिरम्भ' आदिके अनुसार व्रजदेवियोंके तत्तदंगालंभनद्वारा मानो उसने व्रजदेवियोंको अप्राकृतरसानुभवक्षम देह दी। 'उज्ज्वलनीलमणि' का भी यही मत है- गन्धकको पारदसे घोटें तो कुछ कालके बाद गन्धक जैसे पारद (पारा)-रूप हो जाता है, वैसे ही पूर्णके सम्बन्धसे अपूर्ण वस्तु पूर्ण हो जाती है, प्राकृत वस्तु अप्राकृत बन जाती है। यही बात व्रजांगनाओंके पक्षमें है, भगवान्ने उनके अलकादिका स्पर्श करके इन्हें रसस्वरूप- स्व-स्वरूप बना दिया, प्राकृतसे अप्राकृतमें बदल दिया। इसपर भगवान्का अधिक आनुकूल्य पाकर गोपांगनाओंको दर्प हुआ। उसीको दूर करनेके लिये लीलानायक श्रीकृष्ण अन्तर्हित हो गये। छिप गये। भगवान्के अन्तर्धान होनेका हेतु- गोपियोंपर कृपा करना श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहनके वियोगमें जब गोपांगनाएँ व्यथित हुईं, वह विप्रयोगाग्निताप शनैः- शनैः जब उनके अन्तःकरणमें प्रविष्ट हुआ, तब उनके तापको, दुःखको दूर करनेके लिये श्रीभगवान्की लीलाशक्ति प्रकट हुई। अन्तर्हित शब्दका अर्थ 'छिपना' और ('अन्तःमनसि हितं - दया यस्य सः') जिसके हृदयमें दया हो वह व्यक्ति भी होता है। पीछे 'अन्तर्हिते भगवति', 'अन्तर्हिते' कह आये हैं। भगवान् गोपीजनवल्लभ हैं। गोपांगनाओंके प्रति बड़े कृपालु हैं। उनके हितके लिये ही वे अन्तर्हित हुए हैं, उन्हें सन्ताप पहुँचानेके लिये नहीं; क्योंकि वे निष्ठुर नहीं हैं। इसलिये 'तासां तत् सौभगमदं....' (श्रीमद्भा० १०।२९।४८) आदि पहले कहा। श्रीव्रजांगनाओंको यह गर्व था कि 'श्रीश्यामसुन्दर हमारे परवश हैं- अधीन हैं; क्योंकि वे हमारी वेणी सुलझाते हैं, पादचित्तकी उन्नतिका नाम 'मान' और उसकी गाढ़ता 'मद' है। 'रासलीला' परम रसमयी है। थोड़ा भी गर्व उसमें बाधक होगा। अतः श्रीश्यामसुन्दर प्रभु उसे दूर करके पूर्ण विशुद्ध रसास्वाद करनेके लिये और 'प्रसादाय' (गोपियोंकी प्रसन्नताके लिये) स्ववश करनेके लिये अन्तर्हित हुए, छिपे। तथा मनमें हित है। अथवा 'अन्तः' पंचम्यन्त अव्यय है। उसका अर्थ हुआ ('हृदयात्') हृदयसे अर्थात् व्रजदेवियोंके हृदयसे विच्छेदहेतुक गर्वके निवारण करनेके लिये भगवान् परमोपकारक बने, अन्तर्हित हुए। श्रीमद्वल्लभाचार्यजी कहते हैं- 'तासां तत् सौभगमदं वीक्ष्य मानञ्च....' इसमें 'मद' का अर्थ पूर्णता है, जिसका आशय हुआ गोपांगनाओंको अपनी पूर्णताका, अपने सौभाग्यके उत्कर्षका अनुसन्धान हुआ। यदि ऐसा हो तो इसमें कोई आपत्ति नहीं; क्योंकि उनके-जैसी कृष्णग्रहगृहीतात्माओंको उन्हें अपने सौभाग्यके उत्कर्षका अनुसन्धान हो तो जिस अवस्थामें वे हैं, उसमें जाकर होना ही चाहिये। यह बहुत दुर्लभ है। फिर भगवान्की पूर्णकृपासे ही तो यह