भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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३४२ भक्तिसुधा बलिमपि बलिमत्त्वावेष्ट्यद् ध्वाङ्क्षवद् य- स्तदलमसितसख्यैर्दुस्त्यजस्तत्कथार्थः ॥ (श्रीमद्भा० १०।४७।१७) सखि ! ये तो सदाके छलिया हैं, देखो, रामावतारमें लुब्धधर्मा अथवा अलब्धधर्मा होकर मृगयु— बहेलियाकी तरह निरपराध बालीको मारा; छिपकर— पेड़की ओट लेकर बालीका वध किया* और इनकी बहादुरी तो देखो सखि ! स्त्रीपर इन्होंने हाथ उठाया, प्रेम करनेके लिये बेचारी शूर्पणखा इनकी उदारता सुनकर पहुँची थी, उसे यह वर दिया कि नाक-कान काटकर बेचारीको बिदा किया। क्या कहें सखि ! स्त्रीजितोंको कुछ विचार थोड़े ही रहता है। वे जानकीके प्रणयोन्मादमें इतने प्रमत्त थे कि उन्हें धर्मशास्त्रतक नहीं स्मृत रहा, विरूप कर दिया एक सुन्दरी स्त्रीको। सखि ! कोई एक अवतारकी बात हो तो कहें, इनके तो जन्म-जन्मकी ये ही करतूतें हैं— देखो, वामन-अवतारमें इन्होंने बलिको छला। 'बलि' को खाकर कौएकी तरह इन्होंने सर्वस्वसमर्पयिता बलिको, उसका सर्वस्व हरण करके भी उसे नागपाशमें बाँध लिया। सखि ! यह क्या न्याय है ? इसलिये कालोंसे, कुटिलोंसे सम्बन्ध जोड़ना, सख्यभाव करना अब हम छोड़ देंगी। पर क्या करें, उनका कथा रूप अर्थ हाय ! छोड़ा ही नहीं जाता। ये सब व्रजांगनाओंके प्रेम-समुद्रकी तरंगें हैं। कहीं कहती हैं—'प्रीति की रीति रंगीलोइ जाने।' और अपना सर्वस्व न्योछावर करती हैं और कहीं ऐसा दोषानुसन्धान करती हैं कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। एक और दोषानुसन्धान-प्रसंग है— एक विरहतप्ता व्रजबाला कहती है—'सखि, इन्होंने कभी किसीका भला नहीं किया। जन्मसे ही तो 'पूतना—सुपयः-पानस्' बेचारी पूतनाको—स्त्रीको— समाप्त कर दिया। सखि ! कालोंकी यही करतूतें हैं।' 'काले सबहिं बुरे……।' हम अब कालेसे बिलकुल अनुराग न करेंगी। जब उनमें ही प्रेम नहीं, तब हम क्यों उनसे प्रेम करें ?' कभी-कभी तो कालेका इतना निषेध कि 'अब काले वस्त्र और आभूषणतक न पहनेंगी। कभी तो यह भाव, यह तरंग कि 'सखि हौं श्याम रंग रंगी' सब चीज काली। नील निचोल, ओढ़नी, लहँगा, सब काले, यहाँतक कि हाथ आदिके गहने भी काले इन्द्रनीलमणिके। पर जब दोषानुसन्धानका प्रसंग उपस्थित हुआ, तब 'एक भी काली चीज पासमें न रखेंगी।' एक चतुर सखीने बीचमें मीठी चुटकी लेते हुए पूछा—'सखि ! हमने माना इन काले वस्त्रालंकारोंको तुम अवश्य फेंक दोगी, पर यह तो बताओ, इन काले केशोंका क्या करोगी?' उत्तर मिला, और बड़ा भावगम्भीर उत्तर मिला—'…………धूलिधृता मस्तके' सखि, इन केशोंमें मिट्टी पोत लेंगी।' दोषानुसन्धानके प्रसंगमें जो श्लोक 'मृगयुरिव कपीन्द्रम्' पहले कहा, उसीके आगे एक और वैसा ही श्लोक है— यदनुचरितलीलाकर्णपीयूषविप्रुट्- सकृददनविधूतद्वन्द्वधर्मा विनष्टाः। सपदि गृहकुटुम्बं दीनमुत्सृज्य दीना बहव इह विहङ्गा भिक्षुचर्यां चरन्ति ॥ (श्रीमद्भा० १०।४७।१८) अर्थात् सखि, उन श्यामसुन्दरके द्वारा अनुष्ठित, सुधा-बिन्दुके समान कानोंको अति मधुर लगनेवाली लीलाओंको जिन्होंने एक बार भी सुन लिया, उनके द्वन्द्व धर्म—सुख-दुःखादि—जो गृहस्थादिमें हुआ करते हैं, काँप गये अर्थात् इस हमारे आश्रित पुरुषने ऐसी चीज सुन ली, जो अब जंगलोंमें मारा-मारा फिरेगा। यह समझकर दुःखादि भी दुःखसे मानो कम्पित हो गये। यों कृष्णलीलाके श्रोता पुरुष घर- घाट कहींके नहीं रहे, अतएव विनष्ट हो गये। हाय ! वे लोग बिलखते स्त्री-पुत्रोंको, जिनका पालन धर्मतः न्याय है—लीला सुनते ही तुरन्त छोड़कर सचमुच जंगलोंमें भाग गये। ऐसे बहुत-से लीला-श्रोता दीन

  • लुब्धधर्मा = व्याधके जैसे क्रूरता, निर्दयता आदि धर्मोंको क्षत्रिय होकर भी इन्होंने ग्रहण किया। भयावह परधर्मको लेकर पापतक किया। फिर व्याध तो मांस-भोजनकी इच्छासे हरिण आदिको मारता है, परंतु इन्होंने इसलिये बालिको नहीं मारा, वृथा ही मारा, अतः ये बड़े कठिन हैं—अलब्धधर्मा हैं।