भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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काम, क्रोध, लोभ, मोह आदिके कूड़े-करकटको निकालकर फेंक दो। फिर उसमें 'श्याम' रंग छोड़ो, अब प्रेमिका अन्त:करण और प्रियतम एकमेक हो गया। प्रेमी चाहे कि अपने अन्त:करणसे मैं श्यामको हटा दूँ तो वह असमर्थ ही रहेगा। श्यामसुन्दर भी चाहें कि मैं यहाँसे निकल भागूँ तो उनके लिये भी यह न होगा, चाहे वे कितने भी छली-बली हों। एक भक्त-अन्धे भक्त (सूरदास) इसी कोटिके हो गये हैं। वे यहीं वृन्दावनकी कुंज गलियोंमें अपने प्रियतम प्राणधन श्यामसुन्दर मनमोहनको ढूँढ़ते एक कुएँमें गिर पड़े। वैसे तो भगवान् उन्हें नहीं मिल रहे थे। पर अब उनसे न रहा गया, तुरंत हाथ पकड़कर कुएँसे निकाल लिया। महाभाग्यवान् सूरदास कूपपात पीड़ाको भूल गये। वे उस कोमल कर-स्पर्शको पाकर कृतकृत्य हो गये। उन्होंने निश्चय किया कि इतना सुखकर, साधारण जनोंमें असुलभ, कोमल स्पर्श प्रियतम प्राणधनके बिना अन्यत्र उपलब्ध ही नहीं हो सकता। उस मंगलमय ब्रह्मसंस्पर्शसे वे रोमांचित हो उठे। उन्होंने उसे जोरसे पकड़ लिया। भक्तकी वांछा पूरी हुई, दिव्य दृष्टि मिली, दर्शन आदि मिले। भगवान् बलात् अपना हाथ छुड़ाकर जाने लगे तब सूरने कहा- हस्तमुच्छिद्य यातोऽसि बलात्कृष्ण किमद्भुतम्। हृदयाद् यदि निर्यासि पौरुषं गणयामि ते॥ इसीका हिन्दीमें भी अनुवाद है- हाथ छुड़ाए जात हो निबल जानिके मोहि। हिरदे से जब जाहुगे मरद बदौंगो तोहि॥ नाथ! हाथ छुड़ाके जाते हो, जाओ, पर आपकी सर्वज्ञता सर्वशक्तिमत्ताकी महत्ता तो तब है, जब आप इस दुर्बल अन्धेके हृदय-मन्दिरसे निकल भागो, आज मुझे यही देखना है। यह पिघली हुई लाखकी ललकार है, रंगके प्रति। भक्त अपने हृदयसे निकल जानेको चैलेंज देता है, पर प्रभु लाचार हैं, निकल नहीं सकते। यह प्रभुकी लाचारीका दृष्टान्त है। अब भक्तकी लाचारीका दृष्टान्त सुनिये। एक सखी मूर्च्छित पड़ी है, एक उसके पवन-संचार आदि उपायमें खड़ी है। दूसरी आकर मनमोहन श्यामसुन्दरका नाम लेने लगती है, उनकी कुछ करतूत बतलाना चाहती है, पर उपचारिका सखी अपने मुखपर तर्जनी रखकर संकेतसे उसे वैसा करनेको रोकती है-'सन्त्यज सखि तदुदन्तं सुखलवमपि यदि समीहसे सख्याः, स्मारय किमपि तदितरत् विस्मारय हन्त मोहनं मनसः।' सखि! यदि अपनी सखीका तुम थोड़ा भी कल्याण चाहती हो तो उसकी बातको मत छेड़ो, उसके अतिरिक्त किसी अन्यका स्मरण कराओ। 'तदुदन्तम्' और 'तदितरत्' कहती है, नामतक नहीं लेना चाहती। तब सखि, क्या करें? फिर यह कैसे अच्छी होगी? उपाय यही है, सखि! किसी तरह इसके मनसे मोहनको भुला दो। इस दृश्यको एक महात्मा योगी देख रहे थे, उन्हें यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। वे कहते हैं- प्रत्याहृत्य मुनिः क्षणं विषयतो यस्मिन्मनो धित्सति बालासौ विषयेषु धित्सति मनः प्रत्याहरन्ती ततः। यस्य स्फूर्तिलवाय हन्त हृदये योगी समुत्कण्ठते मुग्धेयं किल पश्य तस्य हृदयान्निष्क्रान्तिमाकाङ्क्षते॥ एक मुनि विषयोंसे चित्तको हटाकर क्षणभरके लिये; जिसमें लगाना चाहता है, यह बाला उससे चित्तको-आसक्त चित्तको निकालकर विषयोंमें लगाना चाहती है! कितना आश्चर्य है कि जिस तत्त्वकी हृदयमें तनिक-सी स्फूर्ति-चमत्कारके लिये अष्टांगयोगयुक्त योगी उत्कण्ठित रहता है-कभी मेरे मानसकुंजमें भगवान् पधारें, यह मुग्धा भोली गवाँरी ग्वालिन उसे अपने चित्तसे निकाल देनेके लिये व्याकुल है और भी एक सखी कहती है- 'इत उत देखे मति चौथ को चन्दा तोय देखे ते कलङ्क मोय लग जायेगो।' भगवदनुरक्त गोपियोंद्वारा भगवद्विस्मरणके लिये उनमें दोषानुसन्धान इतना ही नहीं, वह श्यामसुन्दर चित्तसे निकल जाये, इसके लिये दोषानुसन्धान करती है। जिसके नामस्मरणमात्रसे दोष नामशेष हो जाते हैं, प्रेमोन्मादमें व्रजांगना उसमें दोष ढूँढ़ती है- मृगयुरिव कपीन्द्रं विव्यधे लुब्धधर्मा स्त्रियमकृत विरूपां स्त्रीजितः कामयानाम्।