भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४० भक्तिसुधा चमत्कार उन्हें नहीं मिला। वे बहुत ही दुःखी हुए, जैसे रंकको बड़ी कठिनतासे मिली निधि और फणिकी मणि खो जाये। फिर आकाशवाणी हुई— हन्तास्मिञ्जन्मनि भवान्मा मां द्रष्टुमिहार्हति। अविपक्वकषायाणां दुर्दर्शोऽहं कुयोगिनाम्॥ सकृद् यद् दर्शितं रूपमेतत्कामाय तेऽनघ। मत्कामः शनकैः साधुः सर्वान्मुञ्चति हृच्छयान्॥ (श्रीमद्भा० १।६।२२-२३) आप इस जन्ममें मुझे नहीं प्राप्त कर सकते; क्योंकि वैराग्यके परिपक्व हुए बिना कुयोगियोंको मैं नहीं दीखता। जो एक बार रूप दिखाया है, वह आपकी कामना (इच्छा-वृद्धि)-के लिये है। फिर तो जरा-सा भी आस्वाद मिल जानेसे छोड़ा ही न जा सकेगा— 'विहातुमिच्छेन्न रसग्रहो यतः।' (श्रीमद्भा० १।५।१९) एक क्षणका भी आस्वाद हो जानेसे फिर 'चाट' पड़ जाती है। पर जबतक कुछ भी अनुभव नहीं, किसी भी वस्तुमें कैसे प्रवृत्ति हो सकती है ? इसलिये पहले संयोग हो, तब विप्रयोगका आनन्द मिले। इसीलिये भगवान् कृष्णने श्रीव्रजांगनाओंमें पहले रससंचार किया। बाहुप्रसारपरिरम्भकरालकोरु- नीवीस्तनालभननर्मनखाग्रपातैः । क्ष्वेल्यावलोकहसितैर्व्रजसुन्दरीणा- मुत्तम्भयन् रतिपतिं रमयाञ्चकार ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।४६) आज भागवतकी 'रासपञ्चाध्यायी' शंकाओंका केन्द्र बनी हुई है। उसका यह श्लोक प्रधान और स्पष्ट शंकास्थान माना गया है। परंतु इसके पूर्वापरको जिन्होंने कभी सोचा नहीं, जो अत्यन्त बहिरंग हैं, उन्हें ही दोष दीख पड़ते हैं। अन्यथा थोड़ा भी विचार करनेसे प्रसंग शुद्ध प्रतीत होता है। हाँ तो श्रीकृष्ण कोटि-कोटि कन्दर्पके सौन्दर्यदर्पको अपनी नखमणिचन्द्रिकाके सौन्दर्यसिन्धुके एक बिन्दुकणसे निर्जित करनेवाले हैं। श्रीश्यामसुन्दर मुरलीमनोहरने श्रीव्रजांगनाजनको उनका वृद्धिंगत प्रणय देखकर स्वरसास्वाद कराना चाहा, पर वहाँ पहले प्रकृत काम हटे, तब अलौकिक रसकी स्थापना हो। बाहु, ऊरु, स्तन आदि प्राकृत लौकिक कामके स्थान हैं, कामदेव उनमें छिपकर बैठा हुआ है। श्रीगोपांगनाजनको कामदेवने अपना दुर्ग बनाया है और वह बाहु आदि स्थानोंमें बैठकर मानो श्रीकृष्णसे युद्ध करना चाह रहा है। भगवान् कृष्णने श्रीगोपांगनाओंके अंग-दुर्ग- देशोंसे कन्दर्पको निकालकर वहाँ स्वानन्दात्मक रसकी स्थापना की। यही 'बाहुप्रसार....' का तात्पर्य है। जब पहले स्वानन्दात्मक रसकी स्थापना हो गयी, तब भगवान् अन्तर्धान हो गये—छिप गये। अब श्रीव्रजांगना विप्रयोगके आनन्दका अनुभव करने लगीं। बात यह है कि जीवको अनेक जन्मके कई प्रकारके पहले संस्कार पड़े हैं। उनके कारण वह अपने प्रभुके अनेक जन्मके विप्रयोगको जानता ही नहीं, यदि वह जान जाये तो विप्रयोगका उसे आनन्द मिले। दूसरे, आवश्यकता है परम तल्लीनताकी— प्रेममें विभोर हो उठनेकी, श्यामके रंगमें अपनेको रँग डालनेकी। जबतक यह स्थिति नहीं, तबतक आनन्द कैसा ? भक्त और भगवान्—दोनोंकी विवशता लाक्षा (लाख) कठोर वस्तु है, पर अग्निके सम्बन्धको पाकर वह द्रुत कोमल हो जाता है। इसमें विशेषता यह है कि जितना अधिक अग्निका ताप होगा, उतना ही अधिक द्रवता आयेगी। लाखको खूब तपाया जाये, इतना तपाया जाये कि वह सौ परत (तह)-के तनजेबमें छाननेयोग्य हो जाये। फिर वह छान भी लिया जाय, कूड़ा-करकट उसमेंसे निकाल लिया जाय, गंगाजलकी तरह वह स्वच्छ विशुद्ध हो जाये। उसमें हरिद्रा, हिंगुल, हरा, पीला कोई भी रंग छोड़ा जाये; जो भी छोड़ा जायगा, वह सब उसके अणु-अणुमें, अंश-अंशमें व्याप्त हो जायगा। अब यह लाख चाहे कि इस रंगको मैं निकाल डालूँगा तो उसके द्वारा निकाल पाना असम्भव है और यदि रंग ही चाहे कि मैं इसमेंसे निकल जाऊँ तो यह भी असम्भव है। यह है दृष्टान्त। इसे दार्ष्टान्तमें समन्वित कीजिये। भक्तका या प्रेमीका अन्तःकरण लाक्षा है, उसे प्रियतम प्राणधन श्यामसुन्दरकी प्रणयाग्निसे तपाओ, खूब तपाओ।