भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 349, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासपञ्चाध्यायी ३३१ श्रीकृष्णमय गोपियाँ भगवान्की चेष्टाओंका अनुकरण करने लगीं गत्यानुरागस्मितविभ्रमेक्षितै- र्मनोरमालापविहारविभ्रमैः । आक्षिप्तचित्ताः प्रमदा रमापते- स्तास्ता विचेष्टा जगृहुस्तदात्मिकाः ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।२) वियोग ऊँची चीज है, मूल्यवान् वस्तु है। किसीने कहा—'सङ्गमविरहविकल्पे वरमिह विरहो न सङ्गमस्तस्याः। सङ्गे सैव तथैका त्रिभुवनमपि तन्मयं विरहे' हमें तो वियोग चाहिये, संगम नहीं, पर यह बड़े दीर्घदर्शियोंकी बातें हैं। संयोगमें एक ही जगह प्रियतम होता है, पर वियोगमें तो सारा विश्व प्रियतममय हो जाता है। 'जित देखूँ तित स्याममई है।' एक अवस्था इससे भी ऊँची है, उसमें संयोग और वियोग दोनोंमें कष्ट-ही-कष्ट है— अदृष्टे दर्शनोत्कण्ठा दृष्टे विच्छेदभीरुता। नादृष्टेन न दृष्टेन भवता लभ्यते सुखम्॥ (काव्यप्रकाश ५।१२८) हे प्राणधन! जबतक आपके दर्शन नहीं होते, तबतक तो दर्शनकी उत्कण्ठा लगी रहती है और दर्शन हो जानेपर अगले क्षणमें होनेवाले वियोगकी चिन्ता लग जाती है। क्या करें, किसी भी तरह चैन नहीं है, न दर्शनसे ही सुख मिलता है और न अदर्शनसे ही। संयोग-वियोग किसीमें शान्ति नहीं। सखि! अभी तो श्यामसुन्दर मदनमोहनका यह भुजाश्लेष मिला है, पर यह भुजलताबन्ध कबतक प्राप्त रहेगा, यह संश्लेषजन्य सुख कबतक रहेगा, कुछ ठिकाना नहीं। हाय! कहीं अभी विश्लेष न आ जाय! यों ऊँचे प्रेमियोंको दुःख-ही-दुःख बना रहता है। यह एक विशिष्ट स्थिति है—प्रेमीको संयोगमें कुछ शान्ति रहती है। पर विप्रयोग दशामें उद्वेलित समुद्रकी तरह शृंगारकी स्थिति होती है। उस समय वह मर्यादा तोड़ देता है, प्रेमीके धैर्यका पुल टूट जाता है। कहा है— प्रासादे सा दिशि दिशि च सा पृष्ठतः सा पुरः सा पर्यङ्के सा पथि पथि च सा तद्वियोगातुरस्य। हंहो चेतः प्रकृतिरपरा नास्ति मे कापि सा सा सा सा सा सा जगति सकले कोऽयमद्वैतवादः॥ (सुभाषितरत्न० प्र० ६।६५) ····यह अद्वैतीका अद्वैत है। पर यहाँका अद्वैत और है, यहाँ तो आलम्बन ही सर्वत्र दीख पड़ रहा है। यही दशा श्रीलालजूकी है। वे वियोगमें अपनी प्राणेश्वरीको सर्वत्र देख रहे हैं। यों संयोग और वियोगमें वियोगका महत्त्व है, पर वियोगमें आनन्द कब आता है? हम सब अनादिकालकी वियोगिनी हैं, वियोगिनी इसलिये कि जीव स्वल्पज्ञ है, परतन्त्र है और पारतन्त्र्य ही स्त्रीत्व है। हाँ तो हम सब अनादिकालकी वियोगिनी हैं, पर क्या वह आस्वाद है? जन्म-जन्मान्तरसे, युग-युगान्तरसे शूकर, कूकुर, कीट, पतंग बनते-बनते मर रहे हैं। उस परप्रेमास्पदका वियोग जन्म-जन्मान्तरसे हो रहा है, पर वियोगजन्य आनन्दका कभी स्वप्नमें भी स्वाद नहीं आता। इसका कारण यही कि उस तत्त्वका कभी साक्षात्कार नहीं, श्रवणतक नहीं 'श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः' (कठ० १।२।७) तब कैसे आनन्द मिले? पहले सम्प्रयोग हो, वस्तुका थोड़ा परिचय मिले, रसका कुछ पता लगे, तब पुनः उसके लिये उत्कट उत्कण्ठा हो, तब कहीं उसके वियोगका आस्वाद हो। देवर्षि नारदने जब प्रथमावस्थामें महात्माओंके प्रसादसे तत्त्वका थोड़ा पता पाया और जंगलमें जाकर परिश्रमपूर्वक जब अनुसन्धान करने लगे तो एक क्षणके लिये उन्हें हृदयमें कुछ चमत्कार मिला। देवर्षि नारदके शब्द हैं— ध्यायंतश्चरणाम्भोजं भावनिर्जितचेतसा। औत्कण्ठ्याश्रुकलाक्षस्य हृद्यासीन्मे शनैर्हरिः॥ (श्रीमद्भा० १।६।१७) फिर उन्होंने बहुत प्रयत्न किया, पर वह
- भगवान् श्रीकृष्णकी मदोन्मत्त गजराजकी-सी चाल, प्रेमभरी मुसकान, विलासभरी चितवन, मनोरम प्रेमालाप, भिन्न-भिन्न प्रकारकी लीलाओं तथा शृंगार-रसकी भाव-भंगियोंने उनके चित्तको चुरा लिया था। वे प्रेमकी मतवाली गोपियाँ श्रीकृष्णमय हो गयीं और फिर श्रीकृष्णकी विभिन्न चेष्टाओंका अनुकरण करने लगीं।