भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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व्याकुल होती हैं। 'तमचक्षाणाः' से यह भाव बतलाया कि ये विशुद्धानुरागवती हैं, कान्तभाववती नहीं। अतः दर्शन, स्पर्श ही मुख्य है, रमण मुख्य नहीं। अतएव 'करिण्य इव यूथपम्' का उदाहरण है। करिणी स्पर्शकुशल होती हैं। एक सूक्तमें कुरंग, मातंग, पतंग, भृंग और मीनकी एक विषयकी कुशलता बतायी गयी है—'कुरङ्गमातङ्गपतङ्गभृङ्ग- मीना हताः पञ्चभिरेव पञ्च' अतः दर्शन और स्पर्शकुशला सख्यभाववती अथवा विशुद्धानुरागवती व्रजांगना श्रीश्यामसुन्दरका दर्शन न पाकर अति सन्तप्त हुईं। रासेश्वरके अन्तर्धान हो जानेपर व्रजांगनाओंकी मनोदशा साधारणतया दो प्रकारकी गोपी हैं, एक सख्यभाववती, दूसरी कान्तभाववती। चन्द्रावलीप्रभृति कान्तभाववती हैं। इन्हें स्पर्शसुखकी अधिक आकांक्षा रहती है; सख्यभाववती केवल दर्शनसे तृप्त रहती हैं। यहाँ इन्हींके लिये 'तमचक्षाणाः' पद है। गोपियाँ श्रीयुगल-सरकारके दर्शनके लिये लालायित रहती हैं। इनकी एकके दर्शनसे तृप्ति नहीं होती, वे दोनोंहीके दर्शन चाहा करती हैं। श्रीरासेश्वरी वृषभानुनन्दिनीके बिना आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रके मुखचन्द्रका दर्शन और श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहनके बिना श्रीव्रजेश्वरी महारानीका दर्शन भी उन्हें तृप्त नहीं करता, सुख- आनन्द नहीं देता। वे तो युगल-सरकारका, श्रीराधाकृष्णका, श्यामाश्यामका युगल दर्शन चाहती हैं। फिर जहाँ दोनोंमेंसे एकका भी दर्शन नहीं अथवा दोनोंका ही दर्शन नहीं, वहाँ तो सन्तापका कुछ ठिकाना ही नहीं। अतः कहा—'अतप्यंस्तमचक्षाणाः' हाय, हम हतभाग्याओंको प्रिया-प्रियतममेंसे एकके भी दर्शन नहीं! अभी प्रियतमके दर्शन हो रहे थे, उन्हें भी विधाताने ओझल कर दिया ! शारदी पूर्णिमाके स्वच्छ, शुद्ध, निष्कलंक पूर्णचन्द्र श्रीकृष्णचन्द्रके दर्शनके बिना यह चन्द्र प्रलयकालीन द्वादश आदित्योंके समान सन्ताप दे रहा है। यह आह्लादकर चन्द्र नहीं, अपितु प्रलयकालके महातापके द्वादश आदित्य एकत्र उदित हुए हैं। ये किंशुक- कुसुम और अरुण वस्त्र नहीं हैं, अपितु ये दावाग्निकी लपटें हैं। अपने प्रियतम प्राणधन मनमोहन श्यामसुन्दरको न देखकर उनके दर्शन-कालमें, संयोगके समयमें आह्लाद देनेवाली इन वस्तुओंमें अधिकाधिक तापकताकी गोपांगनाओंको प्रतीति हो रही है। कान्तभाववती तथा सख्यभाववती दोनोंकी ही यह सन्तप्त दशा है। यह ठीक ही है, प्राणीको प्राणके वियोगमें, अभीष्टके अभावमें दुःख होता ही है। फिर जो प्राणोंका भी प्राण है, मनका भी मन है, श्रोत्रका भी श्रोत्र है, चक्षुका भी चक्षु है, वाणीकी भी वाणी है, उसके विप्रयोगमें असह्य पीड़ाका होना स्वाभाविक है। श्रुति कहती है—‘प्राणस्य प्राणं...’ (बृहदारण्यक० ४।४।१८) महात्मा तुलसीदासजीने भी कहा है— प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम। तुम्ह तजि तात सोहात गृह तिन्हहि तिन्हहि बिधि बाम॥ (रा०च०मा० २।२९०) श्रुतिका वचन भी है—‘···“एतस्यैवानन्दस्य··· मात्रामुपजीवन्ति।’ (बृहदारण्यक० ४।३।३२) जगत्में जितने भी महान्-से-महान् आनन्द हैं, सुख हैं, वे सब इसी आनन्दके एक अंशमें--कणमें समा जाते हैं। वे सब इसीकी क्षुद्र विभूति हैं। चन्द्रमें आह्लादकता, नीरसमें सरसता, उस पूर्णतम पुरुषोत्तमसे ही है। इसके न होनेसे आह्लाद कहाँ? सरसता कहाँ? सौख्य कहाँ? फिर तो उरग-श्वासकी तरह सब विषमयं--दुःखमय होगा। ऐसे उन प्रभु प्रियतम प्राणधनके विप्रयोगसे श्रीव्रजांगनाओंको इतना दारुण सन्ताप हुआ कि वह अकथनीय ही है। उन्हें उस समय समस्त आह्लादकर वस्तुएँ दुःखद प्रतीत हुईं। श्रीमद्वल्लभाचार्यजीके कथनानुसार यह ताप पहले ऊपर-ही-ऊपर रहा, फिर अन्तरमें प्रविष्ट होने लगा, परंतु अन्तःप्रविष्ट थे—लीलारससहित श्रीकृष्ण, वे कहीं अन्यत्र नहीं गये थे। वहींसे गोपिकाओंके अन्तरसे उनकी लीलाशक्ति प्रकट हुई। तब उस लीलाक्तिकी प्रेरणासे रमापतिके गति- विभ्रम आदिसे आक्षिप्तचित्त होकर तथा तदात्मिका बनकर श्रीमती व्रजांगनाओने उन्हींकी उन-उन चेष्टाओंको ग्रहण किया।