भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 347, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंकि साजात्यमें निःसंकोच प्रणय होता है, अतः भगवान् गोचारण करते प्रकटे। जीव अल्पज्ञ है, अल्पशक्ति है, अकिंचन है और प्रभु सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् हैं। ऐसे महान् अन्तरमें जीवकी कैसे गति हो, वह उन्हें कैसे प्राप्त करे? एक दीन-हीन भिक्षुकी महाराजाधिराजसे, सम्राट्से, सम्मिलनकी सम्भावना भी कैसे कर सकती है? परंतु यों निराश होना ठीक नहीं, अपितु उत्कट आशा बनाये रखनी चाहिये, तब शीघ्र ही दर्शन मिलता है। यद्यपि आशा दोष है, त्याज्य कोटिमें है, परंतु प्रभुसम्मिलनकी आशा महापुण्योंका फल है। यह आशा कल्पलता है। इसे नेहके अनुरागके जलसे सींचना चाहिये। शनैः-शनैः इसमें नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र, पुष्प और फल अवश्य लगेगा ही। इस भावका आना कि प्रभु दुर्लभ हैं, इसे स्वयं भगवान्ने दूर किया है—श्रुति कहती है— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्य- नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥ (श्वेताश्वतर० ४।६) तुम और तुम्हारे प्रभु एक हैं, दोनों सुपर्ण हैं, दोनोंका साजात्य सम्बन्ध है, तब मिलनेमें कुछ कठिनाई नहीं। कहा जा सकता है—कहीं-कहीं साजात्यमें—भाई-भाईमें भी प्रेम नहीं रहता, इसको दूर करनेके लिये—'सखाया' कहा। जब परस्पर सख्य-सौहार्द होगा, तब मिलनेमें कोई कठिनाई न रहेगी। हाँ, यदि सखा भी दूर देशमें हो तो अवश्य विघ्न हो सकता है; जैसे चन्द्र और समुद्र। परंतु यहाँ तो यह बात भी नहीं है; क्योंकि— 'समानं वृक्षं परिषस्वजाते' शरीररूप एक ही वृक्षपर दोनोंका निवास है, सादेश्य है। फिर भी 'असङ्गो नहि सज्जते' से उस परतत्त्वको जब असंग बतलाया गया, तब उसमें प्रेम कैसे हो? इसका भी समाधान करते हुए श्रुतिने 'सयुजा' विशेषण दिया अर्थात् जीव और ब्रह्म दोनोंका घनिष्ठ सम्बन्ध है, दोनों एक ही हैं। जैसे जल और तरंग, घट और मृत्तिका, उत्पल और नैल्य एक ही हैं, इनमेंसे एक दूसरेसे अलग नहीं हो सकते। चिदचित्, भेदाभेद आदि सभी वादोंमें यह बात माननी पड़ती है। ऐसी स्थितिमें निराश होनेकी बात ही नहीं रह जाती। भगवान् तो स्वयं इस विषमताको मिटानेका प्रयत्न करते हैं, वे गोपोंके साथ प्रेम करनेके लिये ही गोपाल बने हैं। यहाँ तो 'अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति' का भेद भी '...वृन्दावनगोचराः से मिट गया। यहाँ तो उस 'अनशिता' अभोक्ताने गवाँरी ग्वालिनियोंके मक्खनकी चोरी की। निरंजनने श्रीयशोदासे अंजन लगवाया, वह अनंग (निरंग) सांग बन गया, उसने खूब व्रजदेवियोंसे उपाहृत छाकें छकीं। इसी समतामें क्रीडा होती है। तभी तो—'उवाह कृष्णो भगवान् श्रीदामानं पराजितः।' (श्रीमद्भा० १०।१८।२४) चुटिया पकड़कर श्रीदामाने भगवान्से अपना दाँव लिया, उनकी पीठपर चढ़कर टिक- टिक करके उसने सवारी साधी। यदि श्रीदामा उनमें और अपनेमें जरा भी भेद पाता तो यह कहनेकी कैसे हिम्मत करता— 'न्यारि करो हरि आपन गैया, ना हम चाकर नन्द बाबाके ना तू मोर गुसैंया, '...कहा भयो दस गैया अधिकैंया……।' इस तरह भगवान् अपनी सर्वज्ञताको भूलें, हम अपनी अल्पज्ञताको भूलें और इस तरह समानता स्थापित हो। इस समानताके रूपमें भगवान् यहाँ पधारे हैं। इस रूपमें इनपर व्रजांगना न्योछावर हो रही हैं। वे उन प्रियतम प्राणधनको—बालमुकुन्दको बालभावसे देखती हैं, बाहुलतासे वेष्टित करती हैं और उनकी बलैया लेकर फूली नहीं समातीं। ऐसी स्थितिमें वे अन्तर्हितको क्या जानें। विशेषकर वे व्रजांगना हैं, व्रजकी अंगना हैं, भोली हैं, मुग्धा हैं, वे तो साक्षात् भगवान्को ही जानती हैं। अतः 'अतप्यंस्तमचक्षाणाः करिण्य इव यूथपम्॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।१) उन्हें न देखकर बड़ी सन्तप्त हुईं, जैसे हथिनियाँ हाथीको न देखकर