भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 346

३३६ भक्तिसुधा श्रीरासपंचाध्यायी गोपियोंके गर्वापहरणके लिये भगवान् अन्तर्धान हो गये अन्तर्हिते भगवति सहसैव व्रजाङ्गनाः। अतप्यंस्तमचक्षाणाः करिण्य इव यूथपम्॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।१) भगवान् भक्तपराधीन हैं। वे अपनी सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता आदिको भूलकर भक्तोंके पीछे घूमते हैं, परंतु गर्वसे उन्हें बड़ी शत्रुता है। वे अपने भक्तोंमें गर्व नहीं आने देना या नहीं रहने देना चाहते। जहाँ गर्व रहेगा, भगवान् वहाँ स्वयं न रहेंगे। भगवान्‌को अपने अत्यन्त अनुकूल पाकर गोपियोंको गर्व हो गया। उसे दूर करनेके लिये भगवान् अन्तर्हित हुए। गोपियोंको भगवान्‌के दर्शन और स्पर्शका जो बाह्य सुख मिल रहा था, वह नहीं रहा। भगवान् वहाँसे कहीं चले नहीं गये, अपितु गोपियोंके मन, बुद्धि, प्राण, अन्तःकरण आदिमें प्रविष्ट हुए। श्रीमद्वल्लभाचार्यजी कहते हैं—वे कैसे अन्तःप्रविष्ट हुए, उसका क्या प्रकार था— वह व्रजांगनाएँ जान न सकीं। वे क्यों नहीं जानती थीं; क्योंकि वे व्रजांगनाएँ थीं, अतः नहीं जानती थीं। अर्थात् जन्मसे, बाल्यकालसे ही वे भगवान्‌को बाह्य मूर्तिके ही रूपमें देखा करती थीं। अतः जब आज उन्हें नहीं देखा तो वे दुःखी हुईं। ब्रजवासियोंपर दया करके विषमताको मिटाकर भगवान् व्रजमें प्रकट हुए— 'तास्ताः क्षपाः प्रेष्ठतमेन नीता मयैव वृन्दावनगोचरेण।' (श्रीमद्भा० ११।१२।११) जो अनन्त अचिन्त्य अलक्ष्य अव्यपदेश्य निर्विकार तत्त्व है—वह वृन्दावनमें गोपाल, गोचारक बना। जिसे अष्टांगयोगयुक्त योगी नहीं प्राप्त कर सकते, वह यहाँ प्रकट। बात यह है कि अत्यन्त वैजात्यमें प्रीति नहीं होती। मनुष्य रूपहीन, स्पर्शहीन, रसहीन, गन्धहीन, अचिन्त्य अग्राह्यमें कैसे प्रीति करे? यद्यपि अचिन्त्य अग्राह्य निर्विकार श्रीभगवान्‌ने भक्तानुग्रहार्थ नृसिंह, वराह, कच्छपादि अवतार धारण किये, परंतु उनकी महामहिमा, महान् ऐश्वर्यको देखकर अपनेसे असमान होनेके कारण मानव- हृदय उनसे स्वच्छन्द अनुराग करनेमें और भी असमर्थ रहा। पहले तो अचिन्त्य, अग्राह्य आदि होनेसे ही प्रेम दुर्घट रहा, फिर कच्छपादिमें भी महामहिमा आदिके कारण वहाँ भी वह दुर्लभ ही रहा। अतः भक्तवत्सल भगवान् चतुर्भुज मानवरूपमें अवतीर्ण हुए। परंतु इस रूपमें भी चतुर्भुजरूप और ऐश्वर्यातिशयके कारण मनुष्यको कुछ संकोच ही रहा, वह पूरा-पूरा अपना हृदय उनके समक्ष न खोल सका। तब प्रभु ठीक-ठीक मानवाकार श्रीरामरूपमें अवतीर्ण हुए, परंतु यहाँ भगवान् मर्यादा- पुरुषोत्तम बन गये। अतः इस रूपमें भी मर्यादापूर्ण लोग अथवा साधारण जीव प्रीति करते डरते रहे। ऐश्वर्यमें भी संकोच बना ही है। इसलिये वह अचिन्त्यैश्वर्य जगदाधार भगवान् गोप और गोपियोंके साजात्य सम्बन्धको लेकर गोपालरूपमें अवतीर्ण हुए और सभीके निःसंकोच परप्रेमास्पद बन गये। गोपबालाओंका अन्तर्द्वन्द्व जब भगवान् कृष्ण मथुरामें आ गये, तब गोपबालाएँ अधिक वियोगसन्तप्त हुईं। किसीने कहा— 'मथुरा क्या दूर है, नहीं रहा जाता तो जाओ, वहीं दर्शन कर आओ!' सब तो नहीं, पर कुछ व्रजांगनाएँ किसी समय मथुरा भी गयीं, परंतु वहाँ श्रीमथुरानाथका वैभव देखकर; उनके शौर्य, वीर्य, ओज, तेजको देखकर उन्होंने घूँघट निकाल लिया, कहने लगीं—ये हमारे प्रभु प्राणधन श्यामसुन्दर नहीं हैं। नखसे शिखतक रत्नजटित सौवर्णाभरणधारी सम्राट् ये हमारे प्रभु नहीं हैं। हमारे तो वे मयूरपिच्छ, गुंजावतंस, पीताम्बर, लकुटीकम्बलधारी व्रजविहारी प्रभु हैं अर्थात् ऐश्वर्यमें उन्हें संकोच हुआ, वे तो अपने साजात्यमें प्रेम करती रहीं। अभिप्राय यह

  • भगवान् सहसा अन्तर्धान हो गये। उन्हें न देखकर व्रजयुवतियोंकी वैसी ही दशा हो गयी, जैसे यूथपति गजराजके बिना हथिनियोंकी होती है।