भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासलीलारहस्य ३३५

रासलीला परब्रह्मका नित्य लास्य है यह रासलीला कोई उपहास या प्राकृत लीला नहीं है। यह तो शुद्ध परब्रह्मका नित्य लास्य है। रासका स्वरूप क्या है?— 'माधवं माधवं वान्तरे अङ्गना अङ्गनामङ्गनामन्तरे माधवः।' एक-एक गोपीके अनन्तर भगवान् हैं और भगवान्‌की एक-एक मूर्तिके अनन्तर एक-एक व्रजांगना है। सांख्यवादियोंका कथन है—'क्षणपरिणामिनो हि भावा ऋते चितिशक्तेः।' वह चितिशक्ति ही भगवान् कृष्ण हैं। यह सम्पूर्ण प्रकृति चिद्रूप श्रीकृष्णके ही चारों ओर घूम रही है। आजकल वैज्ञानिकोंका भी मत है कि एक ग्रह दूसरे ग्रहके आश्रित होकर गति कर रहा है। इस प्रकार सारा ही ब्रह्माण्ड गतिशील है। यही प्रकृतिका नित्य नृत्य है। यदि आध्यात्मिक दृष्टिसे विचार करें तो हमारे शरीरमें भी भगवान्‌की यह नित्यलीला हो रही है। हमारा प्रत्येक अंग गतिशील है। हाथ, पाँव, जिह्वा, मन, प्राण सभी नृत्य कर रहे हैं। इन सबका आश्रय और आराध्य केवल शुद्ध चेतन ही है। यह सारा नृत्य उसीकी प्रसन्नताके लिये है और वही नित्य एकरस रहकर इन सबकी गति-विधिका निरीक्षण करता है। जबतक इनके बीचमें वह चैतन्यरूप कृष्ण अभिव्यक्त रहता है; तबतक तो यह रास रसमय है; किंतु उसका तिरोभाव होते ही यह विषमय हो जाता है। इसी प्रकार गोपांगनाएँ भी भगवान्‌के अन्तर्हित हो जानेपर व्याकुल हो गयी थीं। अतः इस संसाररूप रासक्रीड़ामें भी जिन महाभागोंको परमानन्दकन्द श्रीव्रजचन्द्रकी अनुभूति होती रहती है, उनके लिये तो यह आनन्दमय ही है। अहो! यह संसार तो अब भी प्रभुका वृन्दारण्य ही है। यहाँ वही चन्द्र छिटक रहा है, वही यमुना है और वही मन्द-सुगन्ध सुशीतल समीर बह रहा है। तथापि आज श्रीकृष्णचन्द्रके ओझल हो जानेसे इन जीवरूप गोपांगनाओंके लिये यह दुःखमय ही हो रहा है। यदि वे दीखने लगें तो फिर यही परम आनन्दमय हो जाय। जीवका परमपुरुषार्थ प्रभुकी प्राप्ति ही है देखो—इस रस-रसकी प्राप्तिके लिये गोपांगनाओंने स्वधर्मानुष्ठान करते हुए श्रीकात्यायनीदेवीकी आराधना की थी। अतः हमें भी भगवत्संयोग-सुखकी प्राप्तिके लिये स्वधर्म-पालनमें ही तत्पर रहकर भगवान्‌की उपासना करनी चाहिये। जबतक जीव परब्रह्म श्रीकृष्णचन्द्रसे वियुक्त रहता है, तबतक उसे शान्ति नहीं मिलती। अतः जीवका परम पुरुषार्थ प्रभुकी प्राप्ति ही है। इसके लिये हमें भगवान्‌के किसी भी स्वरूपकी उपासना करनी चाहिये। भगवान् विष्णु, शिव, श्रीकृष्ण, रामभद्र, दुर्गा—ये सब भगवद्विग्रह ही हैं। साम्प्रदायिक पक्षपातके कारण इनमेंसे किसीके प्रति भी द्वेष-दृष्टि नहीं करनी चाहिये। अपने इष्टदेवका प्रेमपूर्वक पूजन करो। इसके लिये उनके स्वरूप और उपासना-विधिका ज्ञान प्राप्त करो तथा यह भी मालूम करो कि उनकी उपासनामें क्या-क्या प्रतिबन्ध हैं। प्रतिबन्ध कुपथ्य रूप हैं, उनसे बचनेकी बहुत आवश्यकता है। यदि कुपथ्य करते हुए चन्द्रोदय- जैसी ओषधिका भी सेवन किया जाय तो भी लाभ होना सम्भव नहीं है। इसलिये उपासनामार्गके प्रतिबन्धोंसे सर्वदा सतर्क रहो। 'स्वधर्माचरणं शक्त्या विधर्माच्च निवर्तनम्।' (श्रीमद्भा० ३।२८।२) —इस वाक्यके अनुसार सर्वदा स्वधर्मका तो यथाशक्ति पालन करो, किंतु विधर्मका तो सर्वथा त्याग कर दो। यदि साथ-साथ विधर्मरूप कुपथ्यका त्याग और स्वधर्मरूप पथ्यका सेवन न किया जायगा तो यथेष्ट लाभ होना कदापि सम्भव नहीं है। ऐसी अवस्थामें सारी ओषधि निष्फल हो जायगी। इस प्रकार यदि कोई पुरुष स्वधर्म-पालन और विधर्म- विसर्जनपूर्वक भगवान्‌की उपासना करता है तो उसे ब्रह्मसंस्पर्श अवश्य प्राप्त हो जाता है।