भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह बिनती रघुबीर गुसाईं। ते सब तुलसिदास प्रभु ही सों, होहिं सिमिटि इक ठाईं ॥ गोपियोंकी स्थिति ऐसी ही भगवन्मयी थी। वे जो कुछ देखती थीं, जो कुछ सूँघती थीं, जो कुछ स्पर्श करती थीं, सब श्याममय था—'जित देखूँ तित श्याममई है।' उनका अन्तःकरणरूप सरोवर श्याम- रंगसे रँग गया था। अन्तःकरण जिस-जिस इन्द्रियरूप प्रणालीके द्वारा निकलकर जिस-जिस विषयको व्याप्त करके प्रकाशित करता था, वही श्याममय प्रतीत होता था। अतः भगवान् कहते हैं—'अयि मानिनियो ! आपलोगोंका मेरे प्रति अभिस्नेह है। आपका चारों ओरका प्रेम पुंजीभूत होकर मुझमें ही लग गया है। अतः आप यन्त्रिताशया हैं, आपका चित्त विवश है। सो यह उपपन्न ही है। आप इसकी अनुपपत्तिकी आशंका न करें; क्योंकि जब अवान्तर धर्म सर्वात्मा श्रीहरिके स्मरणरूप परमधर्ममें बाधक होने लगते हैं तो वे त्याज्य हो ही जाते हैं। यद्यपि मेरे प्रति प्रेम तो सभीका होता है तथापि सर्वकर्म-संन्यासमें उसीका अधिकार है, जो श्रौत और स्मार्त कर्मोंका अनुष्ठान करनेसे शुद्धान्तःकरण होकर या तो निर्विशेष परब्रह्मका श्रवण, मनन और निदिध्यासनपूर्वक अपरोक्ष साक्षात्कार कर चुका हो या भगवान्के पदपद्मपरागका सुरसिक मधुकर होकर सांसारिक भोगवासनाओंसे ऊपर उठ गया हो। ऐसा महानुभाव बहुत दुर्लभ है; क्योंकि इन्द्रियोंकी स्वाभाविक प्रवृत्ति विषयोंकी ही ओर है; अतः आचार्य लोग साधनोंपर ही जोर दिया करते हैं। इधर भगवान् भी व्रजांगनाओंकी स्वरूपनिष्ठाको पुष्ट करते हुए उन्हें पतिशुश्रूषाका ही आदेश देकर सर्वसाधारणके लिये श्रौत-स्मार्त कर्मोंकी आवश्यकताका ही प्रतिपादन कर रहे हैं। भगवान्का इस सारे कथनसे क्या-क्या तात्पर्य है, सो तो वे ही जानें। हमें तो जो कुछ उन्हींके कृपाकणसे प्राप्त हुआ है, उसीका निरूपण कर रहे हैं। हम पहले कह चुके हैं कि श्यामसुन्दर श्रीहरिके वामांगमें रासेश्वरी श्रीवृषभानुनन्दिनी विराजती हैं। वे उन्हींकी आह्लादिनी शक्ति हैं; स्वरूपतः भगवान्के साथ उनका अभेद है। आरम्भमें जो ‘श्रीभगवानुवाच’ ऐसा कहा गया है, वहाँ ‘श्री’ शब्द उन्हींका द्योतक है। यह श्री ‘श्रयते हरिं या इति श्रीः'—जो हरिका आश्रय ले वह श्री नहीं है, बल्कि ‘श्रीयते इति श्रीः'—जिसका आश्रय लिया जाता है, वह श्री है। अनन्तकोटि-ब्रह्माण्डान्तर्गत सौन्दर्य-माधुर्य-सुधाकी अधिष्ठात्री जो महालक्ष्मी हैं, उनके द्वारा भी जिनके चरणकमल सेवित हैं, वे श्रीवृषभानुदुलारी ही श्री हैं। उनकी प्रसन्नताके लिये ही भगवान्ने यह लीला की थी। रासलीला एक नायिकासे नहीं होती, इसीलिये अन्य गोपांगनाओंका आवाहन किया गया था। अब यदि उन सबका आदर करते हैं तो सम्भव है श्रीराधिकाजी रुष्ट हो जायँ; क्योंकि वे मानिनी हैं न! अतः भगवान् उनका तिरस्कार करते हैं, जिसमें वे दयावश स्वयं ही कह दें कि श्यामसुन्दर ! अब आप इनका निराकरण क्यों करते हैं, आ गयी हैं तो इनकी इच्छा भी पूर्ण कीजिये। अथवा यह भी सम्भव है कि अन्य गोपियाँ तो आ गयी हों और राधिकाजी अभी न आयी हों। इसलिये भगवान् उनकी प्रतीक्षामें हों; क्योंकि इस लीलाकी अधिनायिका तो वे ही हैं। अतः वे अन्य गोपिकाओंको इसलिये सीधा-सीधा उत्तर नहीं देते, जिसमें राधिकाजीके आनेपर उनका मान रखनेके लिये यह कह सकें कि हमें आपकी प्रतीक्षा थी, इसीसे अभी कोई निश्चय नहीं हुआ। इस गोपिकायूथमें कितनी ही व्रजांगनाएँ मानिनी हैं। इसीसे भगवान् ऐसे वचन कह रहे हैं, जिनके अनुकूल और प्रतिकूल दोनों अर्थ हो सकते हैं। मानिनी नायिकाका नायकपर आधिपत्य रहता है; इसलिये उसे ऐसे वाक्य बोलने पड़ते हैं, जिनका अर्थ बदलकर वह अपनेको उनके कोपका भाजन होनेसे बचा सके।