भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य ३३३ आपके मनोबलकी ही महिमा है अथवा भगवान् इसलिये अब आप जाओ, अपने पतिदेवोंका ही गोपिकाओंसे प्रेमकी भिक्षा माँगते हैं। वे कहते हैं कि पूजन करो। उसीसे मेरा भी पूजन हो जायगा; क्योंकि जिसमें पामर जीव भी प्रेमपाशसे बँध जाते हैं, उसे मैं सर्वान्तरात्मा हूँ। यह गोपिकाओंके उपलक्षणसे मेरे प्रति क्या आपका अब भी अनुग्रह नहीं होगा— संन्यासनिष्ठाके अनधिकारियोंको उपदेश है कि तुम अब तो मुझे अपना प्रेमदान देना ही चाहिये। अपने वर्णाश्रमधर्मका पालन करते हुए ही मुझ अथवा भगवान्की यह उक्ति अनधिकारिणी सर्वान्तरात्माकी आराधना करो। गोपांगनाओंकी निष्ठाको विचलित करनेके लिये और इसी उक्तिसे वे अधिकारिणी गोपांगनाओंसे कह अन्तरंगाओंकी निष्ठाको सुदृढ़ करनेके लिये है; रहे हैं कि ‘हे गोपियो! तुम्हें सारे बन्धनोंको काटकर क्योंकि जिन्हें उनके प्रति ऐकान्तिक प्रेम नहीं है, उन्हें अब मेरी ही आराधना करनी चाहिये; क्योंकि तो स्वधर्ममें ही परिनिष्ठित रहना चाहिये और जो ‘अभिस्नेहात्’ ‘अभितः’—सब ओरसे मुझमें ही [