भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
३४२ भक्तिसुधा बलिमपि बलिमत्त्वावेष्ट्यद् ध्वाङ्क्षवद् य- स्तदलमसितसख्यैर्दुस्त्यजस्तत्कथार्थः ॥ (श्रीमद्भा० १०।४७।१७) सखि ! ये तो सदाके छलिया हैं, देखो, रामावतारमें लुब्धधर्मा अथवा अलब्धधर्मा होकर मृगयु— बहेलियाकी तरह निरपराध बालीको मारा; छिपकर— पेड़की ओट लेकर बालीका वध किया* और इनकी बहादुरी तो देखो सखि ! स्त्रीपर इन्होंने हाथ उठाया, प्रेम करनेके लिये बेचारी शूर्पणखा इनकी उदारता सुनकर पहुँची थी, उसे यह वर दिया कि नाक-कान काटकर बेचारीको बिदा किया। क्या कहें सखि ! स्त्रीजितोंको कुछ विचार थोड़े ही रहता है। वे जानकीके प्रणयोन्मादमें इतने प्रमत्त थे कि उन्हें धर्मशास्त्रतक नहीं स्मृत रहा, विरूप कर दिया एक सुन्दरी स्त्रीको। सखि ! कोई एक अवतारकी बात हो तो कहें, इनके तो जन्म-जन्मकी ये ही करतूतें हैं— देखो, वामन-अवतारमें इन्होंने बलिको छला। 'बलि' को खाकर कौएकी तरह इन्होंने सर्वस्वसमर्पयिता बलिको, उसका सर्वस्व हरण करके भी उसे नागपाशमें बाँध लिया। सखि ! यह क्या न्याय है ? इसलिये कालोंसे, कुटिलोंसे सम्बन्ध जोड़ना, सख्यभाव करना अब हम छोड़ देंगी। पर क्या करें, उनका कथा रूप अर्थ हाय ! छोड़ा ही नहीं जाता। ये सब व्रजांगनाओंके प्रेम-समुद्रकी तरंगें हैं। कहीं कहती हैं—'प्रीति की रीति रंगीलोइ जाने।' और अपना सर्वस्व न्योछावर करती हैं और कहीं ऐसा दोषानुसन्धान करती हैं कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। एक और दोषानुसन्धान-प्रसंग है— एक विरहतप्ता व्रजबाला कहती है—'सखि, इन्होंने कभी किसीका भला नहीं किया। जन्मसे ही तो 'पूतना—सुपयः-पानस्' बेचारी पूतनाको—स्त्रीको— समाप्त कर दिया। सखि ! कालोंकी यही करतूतें हैं।' 'काले सबहिं बुरे……।' हम अब कालेसे बिलकुल अनुराग न करेंगी। जब उनमें ही प्रेम नहीं, तब हम क्यों उनसे प्रेम करें ?' कभी-कभी तो कालेका इतना निषेध कि 'अब काले वस्त्र और आभूषणतक न पहनेंगी। कभी तो यह भाव, यह तरंग कि 'सखि हौं श्याम रंग रंगी' सब चीज काली। नील निचोल, ओढ़नी, लहँगा, सब काले, यहाँतक कि हाथ आदिके गहने भी काले इन्द्रनीलमणिके। पर जब दोषानुसन्धानका प्रसंग उपस्थित हुआ, तब 'एक भी काली चीज पासमें न रखेंगी।' एक चतुर सखीने बीचमें मीठी चुटकी लेते हुए पूछा—'सखि ! हमने माना इन काले वस्त्रालंकारोंको तुम अवश्य फेंक दोगी, पर यह तो बताओ, इन काले केशोंका क्या करोगी?' उत्तर मिला, और बड़ा भावगम्भीर उत्तर मिला—'…………धूलिधृता मस्तके' सखि, इन केशोंमें मिट्टी पोत लेंगी।' दोषानुसन्धानके प्रसंगमें जो श्लोक 'मृगयुरिव कपीन्द्रम्' पहले कहा, उसीके आगे एक और वैसा ही श्लोक है— यदनुचरितलीलाकर्णपीयूषविप्रुट्- सकृददनविधूतद्वन्द्वधर्मा विनष्टाः। सपदि गृहकुटुम्बं दीनमुत्सृज्य दीना बहव इह विहङ्गा भिक्षुचर्यां चरन्ति ॥ (श्रीमद्भा० १०।४७।१८) अर्थात् सखि, उन श्यामसुन्दरके द्वारा अनुष्ठित, सुधा-बिन्दुके समान कानोंको अति मधुर लगनेवाली लीलाओंको जिन्होंने एक बार भी सुन लिया, उनके द्वन्द्व धर्म—सुख-दुःखादि—जो गृहस्थादिमें हुआ करते हैं, काँप गये अर्थात् इस हमारे आश्रित पुरुषने ऐसी चीज सुन ली, जो अब जंगलोंमें मारा-मारा फिरेगा। यह समझकर दुःखादि भी दुःखसे मानो कम्पित हो गये। यों कृष्णलीलाके श्रोता पुरुष घर- घाट कहींके नहीं रहे, अतएव विनष्ट हो गये। हाय ! वे लोग बिलखते स्त्री-पुत्रोंको, जिनका पालन धर्मतः न्याय है—लीला सुनते ही तुरन्त छोड़कर सचमुच जंगलोंमें भाग गये। ऐसे बहुत-से लीला-श्रोता दीन
- लुब्धधर्मा = व्याधके जैसे क्रूरता, निर्दयता आदि धर्मोंको क्षत्रिय होकर भी इन्होंने ग्रहण किया। भयावह परधर्मको लेकर पापतक किया। फिर व्याध तो मांस-भोजनकी इच्छासे हरिण आदिको मारता है, परंतु इन्होंने इसलिये बालिको नहीं मारा, वृथा ही मारा, अतः ये बड़े कठिन हैं—अलब्धधर्मा हैं।
श्रीरामपञ्चाध्यायी ३४३ होकर अर्थात् कन्था, कौपीनके चिथड़ोंको लपेटे, पक्षियोंकी वृत्ति धारण किये, नारायण कहते यहाँ वृन्दावनमें भीख माँगते फिरते हैं। क्या सखि! तुम्हीं बताओ, ऐसोंसे प्रेम करें ? सारांश यह कि जब सतत भावना-परिपाकसे भावुकका चित्त लाक्षाकी तरह द्रुत हो जायगा, तब उसमें व्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरका प्राकट्य होगा और फिर वे वहाँसे जानेमें समर्थ न होंगे। यद्यपि भगवान् सर्वशक्तिमान् हैं, उनकी महिमा है- 'छूछी भरे, भरी ढरकावे, जब चाहे तब फेर भरावे।' परंतु ऐसे भक्तोंके आगे उनकी सर्वशक्तिमत्ता कुण्ठित हो जाती है, वे उन्हें नचा सकते हैं। इस तरहके वियोगमें स्वाद है। यह अनुभवकी बात है। कहीं मार्गमें प्रिय मित्र मिला, उसका चित्र हृदयपटर अंकित हो गया। मोहर तब उखड़ती है, जब लाक्षा गरम हो। स्नेहरूप अग्निसे द्रुत अन्तःकरणपर वस्तुका स्वरूप प्रकट होगा। कामी कामिनीके लिये व्याकुल रहता है, उसे अग्निके लिये तृणसे कोई सम्बन्ध नहीं, उसके हृदयमें वियोगाग्नि सदा धधकती रहती है। इस तरह दर्शन-स्पर्शनादिद्वारा हृदयलाक्षा पिघलती है, उसमें अपने इष्टतत्त्वके सम्पृक्त होनेपर वह फिर अचल हो जाता है। श्रीमद्भगवद्वपु मूत्र-पुरीष- भाण्डागार प्राकृत शरीर नहीं, वह अप्राकृत दिव्य रसमय है, अतएव पूर्वोक्त रीत्या 'बाहुप्रसारपरिरम्भ' आदिके अनुसार व्रजदेवियोंके तत्तदंगालंभनद्वारा मानो उसने व्रजदेवियोंको अप्राकृतरसानुभवक्षम देह दी। 'उज्ज्वलनीलमणि' का भी यही मत है- गन्धकको पारदसे घोटें तो कुछ कालके बाद गन्धक जैसे पारद (पारा)-रूप हो जाता है, वैसे ही पूर्णके सम्बन्धसे अपूर्ण वस्तु पूर्ण हो जाती है, प्राकृत वस्तु अप्राकृत बन जाती है। यही बात व्रजांगनाओंके पक्षमें है, भगवान्ने उनके अलकादिका स्पर्श करके इन्हें रसस्वरूप- स्व-स्वरूप बना दिया, प्राकृतसे अप्राकृतमें बदल दिया। इसपर भगवान्का अधिक आनुकूल्य पाकर गोपांगनाओंको दर्प हुआ। उसीको दूर करनेके लिये लीलानायक श्रीकृष्ण अन्तर्हित हो गये। छिप गये। भगवान्के अन्तर्धान होनेका हेतु- गोपियोंपर कृपा करना श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहनके वियोगमें जब गोपांगनाएँ व्यथित हुईं, वह विप्रयोगाग्निताप शनैः- शनैः जब उनके अन्तःकरणमें प्रविष्ट हुआ, तब उनके तापको, दुःखको दूर करनेके लिये श्रीभगवान्की लीलाशक्ति प्रकट हुई। अन्तर्हित शब्दका अर्थ 'छिपना' और ('अन्तःमनसि हितं - दया यस्य सः') जिसके हृदयमें दया हो वह व्यक्ति भी होता है। पीछे 'अन्तर्हिते भगवति', 'अन्तर्हिते' कह आये हैं। भगवान् गोपीजनवल्लभ हैं। गोपांगनाओंके प्रति बड़े कृपालु हैं। उनके हितके लिये ही वे अन्तर्हित हुए हैं, उन्हें सन्ताप पहुँचानेके लिये नहीं; क्योंकि वे निष्ठुर नहीं हैं। इसलिये 'तासां तत् सौभगमदं....' (श्रीमद्भा० १०।२९।४८) आदि पहले कहा। श्रीव्रजांगनाओंको यह गर्व था कि 'श्रीश्यामसुन्दर हमारे परवश हैं- अधीन हैं; क्योंकि वे हमारी वेणी सुलझाते हैं, पादचित्तकी उन्नतिका नाम 'मान' और उसकी गाढ़ता 'मद' है। 'रासलीला' परम रसमयी है। थोड़ा भी गर्व उसमें बाधक होगा। अतः श्रीश्यामसुन्दर प्रभु उसे दूर करके पूर्ण विशुद्ध रसास्वाद करनेके लिये और 'प्रसादाय' (गोपियोंकी प्रसन्नताके लिये) स्ववश करनेके लिये अन्तर्हित हुए, छिपे। तथा मनमें हित है। अथवा 'अन्तः' पंचम्यन्त अव्यय है। उसका अर्थ हुआ ('हृदयात्') हृदयसे अर्थात् व्रजदेवियोंके हृदयसे विच्छेदहेतुक गर्वके निवारण करनेके लिये भगवान् परमोपकारक बने, अन्तर्हित हुए। श्रीमद्वल्लभाचार्यजी कहते हैं- 'तासां तत् सौभगमदं वीक्ष्य मानञ्च....' इसमें 'मद' का अर्थ पूर्णता है, जिसका आशय हुआ गोपांगनाओंको अपनी पूर्णताका, अपने सौभाग्यके उत्कर्षका अनुसन्धान हुआ। यदि ऐसा हो तो इसमें कोई आपत्ति नहीं; क्योंकि उनके-जैसी कृष्णग्रहगृहीतात्माओंको उन्हें अपने सौभाग्यके उत्कर्षका अनुसन्धान हो तो जिस अवस्थामें वे हैं, उसमें जाकर होना ही चाहिये। यह बहुत दुर्लभ है। फिर भगवान्की पूर्णकृपासे ही तो यह
३४४ भक्तिसुधा हुआ है। ऐसी स्थितिमें इसका अपनोदन क्यों हो ? इसपर वे कहते हैं—जो मान हुआ, वह असामयिक है, वह रस-विच्छेदक होगा। अतः उसे दूर करनेके लिये भगवान् अन्तर्हित हुए। फिर भी अन्तर्हित न होना चाहिये; क्योंकि मानवतीका मान मनाकर अपनोदन करना ही रसमर्यादा है। इसपर कहते हैं— मान आन्तर वस्तु है, बहिरंग नहीं। अतः उनका अपनोदन अन्तर्निहित होकर ही हो सकता है, अतएव भगवान् अन्तर्हित हुए। उन्होंने लीलाविशेषसे विशिष्ट होकर अन्तर्हितताके साथ मानापनोदन किया। अथवा मान हुआ श्रीवृषभानुनन्दिनीको, वह भी सहसा। वे करुणामयी हैं। उनके प्रसाद-लेशसे श्रीश्यामसुन्दरका दर्शन सम्भव है। उनके बिना कृष्णतत्त्वका प्राकट्य ही नहीं। 'आत्मरति' में आत्मा श्रीरासेश्वरी हैं। जैसे गुण और गुणीका तादात्म्य है, वैसे ही श्रीराधा-कृष्ण तत्त्वका तादात्म्य है। कर्पूरमेंसे सौगन्ध निकल जाय तो कर्पूर कुछ नहीं रह जाता। श्रीवृषभानुनन्दिनी जलमें माधुर्यस्थानीया हैं। श्रीश्यामसुन्दरतत्त्वमेंसे माधुर्य निकल जाय तो फिर वह कुछ है ही नहीं। श्रीनन्दनन्दनका आन्तररमण श्रीरासेश्वरीमें ही होता है। बाहरका रमण बहिरंगोंमें है। किसी भावुकके मतसे तो सौगन्धका पृथक् होना और उसके ग्राहक घ्राणका अलग होना, यह बड़ा व्यवधान है, असह्य है। पूरा आनन्द तो तब है, जब पुष्पमें ही घ्राण हो। यह यहीं सम्भव है। उनकी शक्ति उनमें और उनकी शक्ति उनमें रहती है। अतः 'सर्वं वाक्यं सावधारणं भवति'— जहाँ कहीं आत्माका संचार होगा, जहाँ श्रीरासेश्वरीके स्वरूपका संचार होगा, वहीं रमण होगा। श्रीललिता, विशाखा आदिमें रसोदय उनसे सम्बन्ध जुड़नेपर होगा। उनका अनुगमन इसकी तरह हुए बिना रसोदय या रमण नहीं होगा। श्रीरासेश्वरीकी कृपाके बिना श्रीकृष्णको भी रसास्वाद या रमण सम्भव नहीं, अतः दोनोंका तादात्म्य-ऐकात्म्य स्वीकृत हुआ है। फिर श्रीरासेश्वरी परम करुणामयी हैं, इसी बलपर वे कृतकृत्य हुए। जो सखियोंके प्रति यदा-कदा उनमें ईर्ष्यादि दीख पड़ती है, वह सब लीला रससंचारार्थ है। सूक्ष्म विचार करनेपर तो नित्य निकुंजमें मान आदिका प्रवेश ही नहीं। परंतु इन स्थूल मान आदिका ही वहाँ संचार नहीं, सूक्ष्म मान आदि तो रसपोषार्थ वहाँ भी है ही। वहाँ सर्वाधिक सम्प्रयोग है, कभी विप्रयोग होता ही नहीं। तथापि रसकी सब अवस्था प्रकट होती रहती है। नेत्रके उन्मीलन-निमीलनमात्रसे विप्रयोग आदि हो जाते हैं। अस्तु, इसी दृष्टिसे श्रीब्रजेश्वरी रासेश्वरीमें ईर्ष्याका संचार हुआ और मेरे प्रभु, मेरे ही प्राणधन अन्योंको भी ऐसा मान देते हैं, इस तरहका मान उत्पन्न हुआ तथा अन्योंमें गर्वका उदय हुआ। अतः 'प्रशमाय प्रसादाय तत्रैवान्त- रधीयत'। अहो ! प्रभुकी भक्तवश्यता ? जो प्रभु केशव हैं, 'कश्च ईश्च केशौ तावपि वशयतीति सः' अर्थात् ब्रह्मा तथा रुद्रको भी जो वशमें रखनेवाले हैं, वे भगवान् गोपीगर्वापहारार्थ अन्तर्धान हुए, परंतु यह ऐश्वर्य श्रीरासेश्वरीका मान दूर करनेमें कैसे समर्थ होगा ? वहाँके माधुर्य-साम्राज्यमें इसका प्रवेश भी कहाँ ? इसलिये वहाँ तो भगवान् श्रीराधारानीकी 'वेणुगूंथन' सेवा करके उनका मान मनायेंगे। इस पक्षमें 'केशव' की व्युत्पत्ति होगी—'केशान् वयते संस्करोतीति केशवः।' भगवान् अपनी योगमायासे ही अन्तर्हित हुए। श्रीव्रजदेवियोंके हृदयमें वे अकेले नहीं, किंतु अपनी लीलाके साथ अन्तर्निहित हुए। अतः लीलादेवी श्रीव्रजांगनाओंके व्रजांगना-मानसमें प्रविष्ट थीं, अतः वहींसे प्रकट होने लगीं। उसीको कहते हैं— गत्यानुरागस्मितविभ्रमेक्षितै- र्मनोरमालापविहारविभ्रमैः । आक्षिप्तचित्ताः प्रमदा रमापते- स्तास्ता विचेष्टा जगृहुस्तदात्मिकाः ॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।२) कायिकी, वाचिनिकी, मानसिकी तीन प्रकारकी लीलाएँ साधारणतया मानी गयी हैं। उनमें पहले कायिकी गतिका वर्णन करते हैं, श्रीव्रजांगना विहार करते समय गतिका अनुभव कर रही थीं। हंस, गज और सिंह-सी गति उनके मानसमें उदित हुई। जब उनके मनमें यह भावना हुई कि हमारे प्राणधन
श्रीकृष्ण सम्मिलनके लिये पधार रहे हैं, तब इन गतियोंका स्फुरण हुआ। 'गत्यानुराग' में गति आ अनुराग ऐसा सन्धिविच्छेद करना चाहिये। 'आ अनुराग' का आशय है 'प्रेमको सब ओरसे बटोरकर' वे प्रियतम श्रीकृष्णके स्मितादिका अनुभव करने लगीं। ऐसे एकान्त गाढ़ अनुरागसे श्रीगोपांगनाएँ श्यामसुन्दरके 'स्मित' आदिका अनुध्यान या ग्रहण करने लगीं। स्मित मन्दहासका नाम है, यह चित्तलोभक है। यह अद्भुत विभ्रम है, माया है। जिससे गोपांगना न तो अत्यन्त बहिर्मुख ही रहें और न अत्यन्त अन्तर्मुख ही, क्योंकि बहिर्मुखतासे ताप और अत्यन्त अन्तर्मुखतासे साक्षात्कार होगा, जो अभी अभीष्ट नहीं। अतः मध्यमस्थितिमें रखा। गोपांगनाओंको यह सब नाच वही भगवल्लीलाशक्ति नचा रही है। अलसवलितादिस्वरूप गोपांगनाविषयक शृंगारोद्रेकसे मनकी अनवस्थितिका नाम विभ्रम है। यह श्रीकृष्णभाव है। इस प्रकारके अवलोकसे गोपियाँ कृष्णात्मक चेष्टासे गृहीत हुईं। इन सबसे लाखकी तरह द्रुत भाव भी हो रहा है। इसके अतिरिक्त श्रीकृष्णकी प्रत्येक चेष्टासे जो मनोरम आलाप अथवा रमण करनेवाले आलाप हैं, फिर तदनुगुण विहार और विभ्रमसे तदात्मक चेष्टा ग्रहण की। विभ्रमका अर्थ पहले कहा गया है। 'मनमोहन श्यामसुन्दर सिंह-गतिसे आकर सामने खड़े हो गये।' ऐसी व्रजांगनाओंकी भावनासे उनके मानसमें पूर्णानुरागका अभिव्यंजन, हासके स्वानुकूलता-विभ्रमसे विशिष्ट भ्रमण, कटाक्ष, नेत्रतारकोंका विशिष्ट घुमाव आदि हुआ। यह सब प्राकृतोंमें भी होता है, पर उससे यह लीला अधिक स्थिर महत्त्वकी है। 'मनोरमालाप'-पर विश्वनाथ चक्रवर्तीके ये भाव हैं—श्रीव्रजदेवियोंके उस समय ये मनोरम आलाप हुए—अयि पद्मिनि ! (कमलिनि अर्थात् स्त्रीसे— नायिकासे—बात कर रही है, नायिकात्वका आरोप करके पूछ रही है) आपलोग स्थलपद्मिनी हैं, हम प्रेमपिपासार्त हैं, हम मधुपोंको मधुपान कराओ। एक गोपी कहती है—'हे पद्मिनि! अपने पति सूर्यको मधुपान देगी ? पर सूर्यको पद्मिनी मधुपान नहीं कराती।' ऐसे मनोरमालापसे एक गोपी पराजित हो गयी। दूसरा अर्थ—दूसरी कहती है—तुम्हें महादर्प- सर्पने दष्ट किया है, हम गारुडिक हैं, हम तुम्हारे अंगका विघट्टन करेंगी। तब वह कहती है—हमें सर्पने नहीं काटा। इसपर गारुडिक बनी गोपी कहती है—तुम्हारी गद्गद वाणीसे तो यह स्पष्ट हो रहा है। ऐसे मनोरमालापसे आक्षिप्तचित्ता गोपांगनाओंने श्रीकृष्णकी गत्यादि उन-उन चेष्टाओंको ग्रहण किया। इससे मनमें लौकिकता न आनी चाहिये। श्रीभगवान् परम निष्काम हैं। यहाँ भक्तपारवश्यात् प्राकृतताकी प्रतीति है। एक बार श्रीनन्दरानीको भाव हुआ कि 'ये तो ईश्वर हैं।' पर यह भाव प्राकृतलीलामें व्याघात है। ऐसा होनेपर श्रीयशोदा छड़ी कैसे दिखायें ? अतः प्रभुने उस भावको हटाया। माधुर्यभावसे वह हट गया। यहाँ प्राकृत कान्तभावसे अप्राकृत ईश्वरभावको दबाया। श्रीभगवान्का वह सौन्दर्य, माधुर्य कान्तादि भावसे गोपांगनाओंकी एकतानताका विशेषकर पोषक हुआ। मनोरमालाप, विहार आदिसे उन्हें बन्धादि उपदेश हुआ। यह सब भाव व्रजदेवियोंके रोम-रोममें समाये हुए थे। वे किसी-न-किसी भावसे प्रतिक्षण कृष्णप्रविष्टचेता रहती थीं। 'वैधी' में यह बात नहीं है, वहाँ तो संसारसे चित्त हटाकर प्रभुका ध्यान करनेपर भी वह (चित्त) वहाँ नहीं रहता। परंतु रागानुगा प्रीतिमें मन सहजहीमें प्रियतम प्राणधनके ध्यानमें लीन रहता है। श्रीश्यामसुन्दर मनमोहनका यह लोकोत्तर हास, विभ्रम, गति, सौन्दर्य प्रेमीको बलात् खींचे, हटानेपर भी न हटे, तभी सच्ची रागानुगा प्रीति है। लौकिक कामी-कामुककी भी यही स्थिति होती है। इसीलिये महात्मा श्रीतुलसीदासने चाहा कि जैसे कामीको नारी प्रिय होती है, वैसे ही मुझे भगवान् श्रीअयोध्यापति प्रिय हों— कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम। (रा०च०मा० ७।१३० ख) इसीलिये सकलसुन्दरशेखर मयूरशेखर श्रीकृष्ण ऐसे भावसे व्यक्त हुए कि उन्हें देखकर किसका मन न चल जाय ? ऐसे ही तात्पर्यकी श्रीव्रजांगनाजनकी
उक्ति है— का स्त्र्यङ्ग ते कलपदायतमूर्च्छितेन संमोहितार्यचरितान चलेत्त्रिलोक्याम्। त्रैलोक्यसौभगमिदं च निरीक्ष्य रूपं यद गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यबिभ्रन्॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।४०) अर्थात् नाथ! मधुर पदावलीके साथ उच्च स्वरसे गाये गये आपके स्वरालापोंको सुनकर तथा त्रिभुवनमोहन इस दिव्य रूपराशिको निहारकर दैवी, मानवी, आसुरी—त्रिलोकमें कौन वह स्त्री है, जो आर्यचरितसे चलित न हो जाय? जब कि पशु, पक्षी, हरिण और जड़ वृक्षोंतकमें रोमांच हो आता है? इस प्रकार यहाँ व्रजकी दिव्य देवियोंके प्रसंगमें केवल भावमात्र लौकिक है। वैसे तो वे प्रभु और उनकी लीला सदासे अलौकिक है। अतः व्रजांगनाओंके आकर्षणातिशय-द्योतनार्थ भी कहा—'गत्यानुराग- स्मित....।' इसमें 'प्रमदा' पद आया है। इसकी व्युत्पत्ति है—'प्रकृष्टो मदो यासान्ताः प्रमदाः।' मदमें मोहकता है। यह नारीवर्गमें स्वभावसिद्ध है। वह भी व्रजकी नारियोंमें, वह भी फिर अंगना 'प्रशस्तानि अङ्गानि यासान्ताः' वह भी श्रीकृष्णमें, उनकी ही लीलासे आक्षिप्तचित्त प्रमदाएँ। यों प्रकर्षकी पराकाष्ठा हो गयी। इसपर भी यह और विशेषता कि इनका चित्त, देह, गेह, स्वजननेहसे हटकर श्रीकृष्ण परमात्मार्यें आकृष्ट हो गया, और चाहिये ही क्या? अनृत, मायामय संसारसे चित्त हटकर उनमें फँसे, यही तो होना चाहिये। बड़े-बड़े अष्टांगयोगयुक्त योगी इसीके लिये लालायित रहते हैं। सिद्ध महात्मा जप, तप, ध्यानसे इसी एक बातको निरन्तर चाहा करते हैं। पर धन्य है, उन व्रजांगनाओंको, जिन्होंने योगसे भी दुर्लभ तत्त्वको भोगसे प्राप्त किया। श्रीश्यामसुन्दर मनमोहनकी आभामें, सौन्दर्य झलकमें उनका चित्त ऐसा उलझा कि फिर उलझा ही रह गया। अतएव वे प्रमदा भी हैं अर्थात् इसी कारण प्रकृष्ट मद- हर्षवाली होनेसे वे प्रमदा हैं। सचमुच इससे बढ़कर और हर्षका स्थान कौन होगा? औपनिषद् विज्ञान भी ऐसा है—'प्रमोद उत्तरः पक्षः' अर्थात् प्रिय, मोद, प्रमोद और आनन्द— ये आनन्दमय ब्रह्मके एक अंग हैं। ये सब योनियोंमें अनुभूत होते हैं। देवादिमें भी ये अनुभूत हैं। ये ही आनन्दसिन्धु शुद्ध ब्रह्मके चिह्न हैं। ये जहाँसे आते हैं, वहीं आनन्दसिन्धु हैं। तब आनन्दसिन्धु बलदेवबन्धुमें आक्षिप्तचित्त होकर गोपांगनाएँ प्रकृष्ट हर्ष या मोदवाली हों, इसमें कहना ही क्या? पूर्वोक्त श्रीवल्लभाचार्यजीके अभिप्रायानुसार जब लीला-शक्तिने 'ताप' को बाहर ही रोक दिया, तब वे सुतरां प्रमदा हो गयीं। यों उनका कथन भी ठीक हुआ। एक दूसरा भाव—'आक्षिप्तचित्ताः प्रमदा रमापतेः' श्रीव्रजदेवियाँ स्वयं सुन्दरी हैं, वे किसी साधारण व्यक्तिके गत्यादिसे आक्षिप्तचेता न होंगी। अतः विशेष हेतु दिया—'रमापतेः—लक्ष्मीपतेः गत्यादिभिराक्षिप्तचित्ताः' अर्थात् व्रजांगनाजनके आकृष्ट होनेमें ललित गति, मधुर आलाप आदि [L55
श्रीरासपञ्चाध्यायी ३४७ ये दोनों बातें हैं, पर वे रूप और वेश आदिसे अमंगल बने हैं और कोई (विष्णु) उक्त दोनों बातोंके साथ सुमंगल भी हैं, पर वे मुझे चाहते ही नहीं। शंकर अनन्त, अखण्ड हैं, पर उनका वेश विलक्षण अमंगल है। विष्णुमें सब बातें हैं, पर वे मुझे चाहते ही नहीं। अच्छा, ये न चाहें, मैं तो इन्हें चाहती हूँ। यह निश्चय करके लक्ष्मीने श्रीविष्णुके गलेमें वरमाला पहना दी। भगवान् भक्तपराधीन हैं भगवान् भक्तपराधीन हैं। भक्त उन्हें जैसा नाच नचायें, नाचते हैं। भक्त भगवान्को वनमाला पहनाता है, वह सूख भी जाती है, पर भगवान् उसे उतारते नहीं, क्योंकि वह प्रिय भक्तकी पहनायी हुई है। यद्यपि भगवान्के अंग-संगसे कोई भी वस्तु म्लान नहीं होती तथापि यह भी एक भाव है। हाँ तो यों भगवान् अपने भक्तकी पहनायी मालाको उतारते नहीं। वह भगवान्की दक्षिणावर्त सुवर्णरोमराजिपर सूखी हो जानेसे कुरकुराती है। वक्षःस्थलके दोनों ओर वह चुभती है, तब भी भगवान् उसे उतारते नहीं— पर्युष्टया तव विभो वनमालयेयं संस्पर्धिनी भगवती प्रतिपत्निवच्छ्रीः। यः सुप्रीणतममुयार्हणमाददन्नो भूयात् सदाऽङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः॥ (श्रीमद्भा० ११।६।१२) अतः भगवान्ने निरपेक्ष होनेपर भी भक्तजन- वश्यतावश लक्ष्मीजीको स्वीकृत किया। इस प्रकार सर्वजगदधिष्ठात्री देवी लक्ष्मीने खूब परीक्षा करके भगवान्को वरा और उनके चरणोंमें ऐसी अनुरक्त हुईं कि अपनी स्वाभाविक चंचलताको छोड़कर सदाके लिये अचला हो गयीं—'चलापि यच्छ्रीर्न जहाति कर्हिचित्' (श्रीमद्भा० १।११।३३)। ऐसी लक्ष्मीको भी मुग्ध करनेवाले श्यामसुन्दरके गति-विभ्रम आदिसे व्रजदेवियाँ कैसे वश न हों? भगवान्के प्रति गोपियोंके वशीकारमें एक दूसरा यह भी हेतु है कि सर्वसौन्दर्य-माधुर्य-सम्पदधिष्ठातृ महाशक्ति श्रीरमा हैं। उसके पति-अध्यक्ष-भगवान्, उससे भी अधिक अनन्तसौन्दर्य-माधुर्य-सुधाजलनिधि हैं, अतः उनकी ललित गति आदिसे गोपांगनाओंका मन आकृष्ट हो गया। यह एक और तरहकी 'रमापति' पदकी साभिप्रायता हुई। इसके अतिरिक्त 'रमा' श्रीरासेश्वरी राधाका ही नाम है—'रमयति श्रीकृष्णं या, सा रमा' इस व्युत्पत्तिसे श्रीकृष्णचन्द्र भगवान्को रमण करानेवाली तो राधा ही हैं। लक्ष्मी विष्णुको रमण कराती हैं। यह वैकुण्ठकी बात है, व्रजरसकी नहीं। 'रासपञ्चाध्यायी' में श्रीकृष्णसे सम्बद्ध व्रजरसका वर्णन है। इस दृष्टिसे रमापति या राधापति अर्थात् श्रीराधाके प्राणधन श्रीकृष्णभगवान्की उन गति-विलासादिसे श्रीराधा, सखी आदि आक्षिप्तचेता हुईं। प्रेमप्रमत्त श्रीव्रजांगनाएँ भगवान्की इन लीला, गति, स्मित, विभ्रम, विहार आदिसे तदात्मिका हो गयीं। वे भूल गयीं कि हम कृष्णप्रणयप्रमत्त गोपांगना हैं, बल्कि उन्हें दृढ़ निश्चय हो गया कि हम कृष्ण ही हैं। फिर वे भी वैसी ही लीलाएँ करने लगीं। एक कहती है—सखि! देख, मैं कृष्ण हूँ, मेरी गति देख। यों तन्मयी होकर वे वही सब करने लगीं—'तास्ता विचेष्टा जगृहुस्तदात्मिकाः ॥' यद्यपि दासी स्वामीकी चेष्टाका अनुकरण करे, यह दोष है, ऐसा करना अनुचित है, परंतु व्रजांगनाओंका इसमें कोई दोष नहीं, क्योंकि वे प्रभु नटनागरकी इन लीलाओंसे आक्षिप्तचित्ता हैं। उन्हें पता ही नहीं कि वे कहाँ, कब, क्या कर रही हैं। जैसा-जैसा लीलाशक्ति कराती है, वैसा-वैसा वे करती हैं। भाव यह कि कहाँ तो इन व्रजदेवियोंकी यह स्थिति कि श्रीमुरलीमनोहर श्यामसुन्दरके पादारविन्दकी दिव्यनखमणिचन्द्रिकाकी एक छटाके दर्शन प्राप्त होनेसे अपनेको कृतकृत्य मानती हैं। ऐन्द्रपद, ब्राह्मपदतकके ऐश्वर्य-सुखोंको उसपर न्योछावर करती हैं और कहाँ यह स्थिति कि उन्हीं श्रीमदनमोहन भगवान्से पादसंवाहनतक करायें! यह उसी सौभगमदकी महिमाका प्रभाव था, जो कि श्रीव्रजदेवियोंको अपना दास्यभाव भूल गया और यह गर्व उत्पन्न हो आया कि वे श्रीघनश्याम हमपर मुग्ध हैं, हमारे हाथकी कठपुतली हैं, हम जो करायेंगी, सो करेंगे। यह सब उसी लीलासे उन भावोंने उन्हें वैसा करनेको प्रेरित किया।
, and it has a repha, then it is 'र्प'! Then: द + र्प + द + ल + न = दर्पदलन!! YES! Look at that: द र्प द ल न Wait, why did I see "दपर्दलन"? Because the repha on 'प' is at the top-right of 'प'! And right next to it is 'द'! Because Devanagari characters are tightly kerned, the repha on the right stem of 'प' hangs slightly over the junction between 'प' and 'द'! And because 'प' and 'द' are together, it looked like the repha was on the next letter! Wait, look at "कन्दर्प": The repha on 'प' in "कन्दर्प" is also on the right stem of 'प'! And in "दर्प": The letter is 'द', then 'प' with repha = 'र्प', then 'द', then 'ल', then 'न'! It is simply: कोटिकन्दर्पदर्पदलन-पटीयान! There is NO extra letter! It is purely "दर्पदलन"! "कोटिकन्दर्पदर्पदलन-पटीयान"! That is 100% correct, grammatically, doctrinally, and typographically!
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श्रीरासपंचाध्यायी ३४९
आवश्यकता है। श्रीभगवान्की लीला रोम-रोममें जब स्थायीभावापन्न हो जाय, तब अनुकरण किया जाता है। भक्त भी अनुकरण कर सकता है अथवा लीला ही जब उन्हें स्वयं गृहीत कर ले, तब अनुकरण हो सकता है। भगवान्के लीलानुकरणसे गोपियाँ अपनेको 'मैं श्रीकृष्ण ही हूँ'—ऐसा मानने लगीं जैसे कहीं भक्त भगवान्को ग्रहण करता है तो कहीं भगवान् ही उसे ग्रहण करते हैं। यहाँ उन लीलाओंने गोपप्रमदाओंको गृहीत किया, इसका अधिक स्फुटीकरण इसमें है— गतिस्मितप्रेक्षणभाषणादिषु प्रियाः प्रियस्य प्रतिरूढमूर्तयः। असावहं त्वित्यबलास्तदात्मिका न्यवेदिषुः कृष्णविहारविभ्रमाः॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।३) गोपसुन्दरियाँ उस समय अपनी गतिसे हंस, सिंह और गजेन्द्रको भी लजाने लगीं, उनका मन्दहास कामको भी विस्मय उत्पन्न करने लगा। ऐसे ही प्रेक्षण, भाषण आदि हुए। उनके स्वरूपमें गोपललनाओंके मन आदि तल्लीन हो गये। ऐसा अद्भुत अनुरागोद्रेक अन्तःकरणकी कोमलताका द्योतक है। यहाँ अन्योन्यात्मकताका वर्णन है। पहले स्मित आदि स्थिर हुए, फिर वे लीला आदिके साथ गोपरामाओंमें प्रतिबिम्बित हुए और उनका इनमें प्रतिबिम्बन हुआ। गोपांगनाओंके मन, इन्द्रियोंमें गति, स्मित आदि आरूढ़मूर्ति हुए, फिर गति, स्मित आदिमें गोपांगनाचित्त आदि प्रतिरूढ़मूर्ति हुए, परस्पर ऐक्य हुआ। यों श्रीनन्दनन्दन वंशीधर प्रभुका स्वरूप और लीला ब्रजदेवियोंके मन, बुद्धि, अन्तःकरण, रोम-रोममें प्रविष्ट हुई। मूर्ति—कार्यकारणसंघात—अन्तरात्मा प्राणोंमें प्रतिरूढ़ हुई। श्रीभगवान् और उनकी लीला श्रीब्रजदेवियोंमें और श्रीब्रजदेवियोंके मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि श्रीभगवान् और उनकी लीलामें प्रतिरूढ़ हुए। एक यह भी बात है कि उस समय वहाँ श्रीगोपियोंको भगवान्का प्रत्यक्ष दर्शन अथवा उनकी लीलाका ही प्रत्यक्ष दर्शन तो है नहीं, फिर श्रीकृष्णमूर्तिमें यह सब प्रतिरूढ़ कैसे हुआ ? तब इसपर यह समझना चाहिये कि पहले श्रीकृष्ण और उनकी लीला आदि श्रीगोपरामाओंमें—उनके मन, बुद्धिमें प्रविष्ट या आरूढ़ हुए, फिर स्वान्तस्थ अथवा स्वान्तःप्रत्यक्ष श्रीकृष्ण तथा तल्लीलामें श्रीगोपांगनाएँ और तन्मनोबुद्ध्यादि प्रत्यारूढ़ हुए। तभी 'असावहं त्वित्यबलाः' यह कथन संगत हुआ। इस तरह जब अन्योन्यकी एकता हो गयी— श्रीश्यामसुन्दरकी व्रजांगनाओंसे और व्रजांगनाओंकी श्रीश्यामसुन्दरसे एकता हो गयी—अभेद हो गया, तब श्रीगोपबाला कहती हैं—'देखो सखि, हम ही कृष्ण हैं।' यह तन्मयता कैसे ? तब कहा—'अबलाः' (नारी) बलहीन हैं। श्रीमोहन मुरलीमनोहरके विरहमें शक्तिहीन हो गयीं। धैर्य रखना बलका काम है। उसके बिना धैर्य कैसा ? जरासे विप्रयोगमें भी आँख डबडबा आती है—आँसू आ जाते हैं। इतना अधैर्य यद्यपि गुण नहीं, पर यहाँका अधैर्य महागुण है। श्रीश्यामसुन्दरके वियोगमें जितनी ही व्याकुलता हो, तड़फड़ाहट हो, उतनी ही अधिक तन्मयता होती है। नारी धैर्यबलशून्य होनेसे शीघ्र व्याकुल होती है। इनका हृदय बहुत कोमल होता है। इसी कोमलताके कारण वे प्रेमकी अधिकारिणी हैं। फिर व्रजांगनाओंकी कोमलताका तो कुछ ठिकाना ही नहीं। इसी तन्मयता और कोमलताके कारण वे भेद नहीं जान सकीं। इनमें और श्रीकृष्णमें परस्पर प्रतिबिम्बसे अभेद हो गया, तब युक्त ही कहा गया—'असावहं त्वित्यबलाः'। अथवा ऐसी दुर्लभ स्थिति—श्रीकृष्ण परब्रह्मके साथ तादात्म्यापत्तिकी प्राप्ति—निर्बलतासे कैसे होगी ? यह तो बड़े बलका काम है। तब कहा—'अबलाः— अः वासुदेवः बलं यासान्ताः' अर्थात् भगवान् वासुदेव ही जिनका सबसे बड़ा बल हैं, वे व्रजांगनाएँ 'असावहम्' इत्यादि कहने लगीं। वस्तुतः जगत्के
- अपने प्रियतम श्रीकृष्णकी चाल-ढाल, हास-विलास और चितवन-बोलन आदिमें श्रीकृष्णकी प्यारी गोपियाँ उनके समान ही बन गयीं; उनके शरीरमें भी वही गति-मति, वही भाव-भंगी उतर आयी। वे अपनेको सर्वथा भूलकर श्रीकृष्ण-स्वरूप हो गयीं और उन्हींके लीला-विलासका अनुकरण करती हुईं 'मैं श्रीकृष्ण ही हूँ'—इस प्रकार कहने लगीं।
सब बल-धन, विद्या, सौन्दर्य आदिको छोड़कर श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्द नन्दनन्दनको ही जिसने अपना सर्वोपरि बल बनाया, वही अभिन्न होता है। तभी तो उन अबला-व्रजबालामें अभेद हुआ। तभी उन्होंने कहा—'असावहम्', अथवा 'अः—वासुदेवः बलम्-प्राणा यासान्ताः'। अर्थात् बलका भी मूल है प्राण, भगवान् वासुदेव ही जिनके प्राण हैं, वे व्रजांगनाएँ 'अबला' हुईं। इस तरह श्रीकृष्णके अनुकूल और श्रीकृष्णके ही आधारपर कायिकी, वाचनिकी एवं मानसी समस्त चेष्टावाली व्रजदेवियाँ 'अबला' ठहरीं। जिनके भगवान् वासुदेव ही मन, बुद्धि, अन्तर्रात्मा, रोम-रोमके सर्वस्व हैं, उन व्रजबालाओंको उनके बिना, प्राणस्थानीय उनके बिना, कैसी अन्य अवधानता ? अतः सर्वत्र उनका अवलोकन करती कहती हैं—'मैं कृष्ण हूँ'। यह स्थिति वेश-भूषा आदिसे भी अनुकरण करा देती हैं। रसके उद्रेकमें नायिका नायककी लीलाका अनुकरण करती है। यही स्थिति 'मधुरिपुरहमिति भावनशीला' इस रसिकेन्द्रचूड़ामणि श्रीजयदेवके गीतमें पायी जाती है। एक बार श्रीराधा प्रतीक्षा कर रही थीं—बाट जोह रही थीं, अपने प्राणधन त्रिभुवनमोहन मुरलीमनोहरकी। उसी समय उन्हें एक विशिष्ट अवस्थामें 'मधुरिपुरहम्' का अनुसन्धान हो आया। यह भावनाका फल है। वस्तुतः यहाँ तो इन व्रजमहिलाओंके बाहर-भीतर श्रीसाँवरिया गिरिधारी ही विराजमान हैं। अतः यहाँ तो यह व्यवहार स्वाभाविक है। श्रीराधा और श्रीकृष्ण एक ही हैं, दो हैं ही नहीं। कल्पना करो—दो शीशी हैं, एक श्याम, एक गौर। श्याम शीशीमें गौर रस भरा है और गौर शीशीमें श्याम रस भरपूर है। श्रीराधा रसमयी गौर शीशी हैं, वह काँचकी नहीं, रसकी ही बनी है। वैजात्यकी यहाँ कल्पना ही नहीं। उसमें शामरस भरपूर है। ऐसे ही श्रीकृष्ण श्याम शीशी हैं। अतः उभय उभयभावात्मा, उभय उभयरसात्मा हैं। यहाँ कुछ व्रजांगनाएँ राधांशभूता हैं। अंश भी बहुत ही स्वल्प है। राजराजेश्वरी श्रीरासेश्वरी राधाके पादारविन्दकी नखमणिज्योत्स्नाकी छटाका एक स्वल्पभाग, तद्भूता व्रजांगना तद्रूप होनेके नाते अपनेको अभिन्न मानती हैं। इस प्रकार भावनासे भी अभेद होता है। वस्त्राभरणसे भी व्रजांगनाएँ अपनेको श्यामाभिन्न समझती हैं। उन्होंने जो नील निचोल पहना है, वक्षोजमें जो मृगमद लेपा है, वह सब श्याम ही है। भीतर-बाहर श्याम-ही- श्याम है। किसी भावस्निग्धका बड़ा ही सुन्दर सूक्त है— श्रवसोः कुवलयमक्ष्णोरञ्जनमुरसो महेन्द्रमणिदाम । वृन्दावनतरुणीनां मण्डनमखिलं हरिर्जयति ॥ व्रजबालाओंने अपने कानोंमें नीलकमलके 'कर्णफूल', नेत्रोंमें अंजन और हृदयमें नीलवर्णकी महेन्द्रमणिका हार पहना है। लोग समझेंगे, उन्होंने इन वस्तुओंसे अपना श्रृंगार किया है। पर बात ऐसी नहीं। उन्होंने इन श्यामवर्णकी वस्तुओंको धारण करके प्राणधन श्यामसुन्दरको ही धारण किया है। उनका तो अखिल मण्डन-समस्त श्रृंगार-एकमात्र 'श्रीहरि' ही हैं। वे इन सोने-चाँदीके, कंकड़-पत्थरके भूषणोंको नहीं पहनतीं। अपने कानोंमें उन्होंने जिस श्यामसरोरुहको सजाया है, वह साधारण सरोरुह नहीं, अपितु पूर्णानुरागरससारसमुद्भूत है। कमलका नाम पंकज है, वह पंक-कीचड़से उत्पन्न होता है, पर जिस पंकजको उन्होंने धारण किया है, वह साधारण मिट्टीकी कीचमें नहीं उपजा, वह पूर्णानुरागदुग्धसरोवरकी कीचमें उपजा है। जब सरोवर दूधका, तब उसकी कीच नवनीत (मक्खन)-की होगी। जब भूपंकज लोकातिशायी सौन्दर्य-सौगन्ध्य-सम्पन्न होता है, तब पूर्णानुरागरससार-समुद्भूत सरसिजके सौरभादिकी कीमत कौन आँके ? ऐसे ही व्रजबालाओंने यह साधारण करिखा आँखोंमें नहीं लगाया, अपितु उस सौन्दर्यसुधाजलनिधि श्रीघनश्यामको ही सदाके लिये अपने नेत्र-निकुंजमें निवास दिया है। श्रीगोसाईंजीने भी ग्रामवधूटियोंकी उक्तिमें कहा है— जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं ॥ (रा०च०मा० २।१२१।५) उन ग्रामवधूटियोंकी तो यह वासनामात्र थी कि यदि हमें ब्रह्मा वर देनेको प्रस्तुत हों तो हम यह वर माँगैं कि इन भगवान् श्रीरामको अपने नेत्रोंमें पधराकर
श्रीरासपञ्चाध्यायी ३५१ रखें, पर इन व्रजवधूटियोंने तो यह साक्षात् ही कर दिखाया अथवा श्रीकृष्णपाद-पद्मपरागको ही इन्होंने अंजन बनाया। इस प्रकार व्रजवनिताएँ अपनेको श्रीश्यामसुन्दरसे ही भूषित करती थीं। उनकी दृष्टिमें इसके अतिरिक्त किसी भी आभूषणको पहनना अत्यन्त ही हेय है। जैसा कि एक स्थलमें उनकी स्पष्ट उक्ति है— ईदृशा पुरुषभूषणेन या भूषयन्ति हृदयं न सुभ्रुवः। धिक् तदीयकुलशीलयौवनं धिक् तदीयगुणरूपसम्पदः॥ ऐसे सिद्धान्तवाली व्रजांगनाओंने बाहर-भीतर सर्वत्र श्रीश्यामसुन्दर प्राणधनको ही धारण किया। इस प्रकारका तादात्म्य श्रीगोपांगनाओंको हुआ। अन्यत्र तादात्म्य आरोपित होता है, परंतु यहाँ नहीं। अतः श्रीश्यामसुन्दर भगवान्की गति, स्मित, प्रेक्षण, भाषण आदि श्रीव्रजवनिताओंमें और व्रजवनिताओंके मन, बुद्धि आदि श्रीश्यामसुन्दर भगवान्में आरूढ हुए। भगवान् श्रीकृष्णके साथ यों अभिन्नभावसे उनकी रसमयी कायिकी-वाचनिकी-मानसी लीलासे, विहारसे उनमें जो विभ्रम उत्पन्न हुए, वे सब व्रजदेवियोंमें उत्पन्न हुए। श्रीनवलकिशोरकी सभी चेष्टा—गति, भाषण, दर्शन आदि—जो-जो थीं, सब इन व्रजांगनाजनमें प्रस्फुटित हुईं। इतना ही नहीं, बल्कि इतनी ऐक्यापत्ति हुई कि इन व्रजरमणियोंकी लीलासे श्रीराधाविहारीका विभ्रम हुआ—'श्रीकृष्णविहारस्य विभ्रमो याभ्यः।' अनुकरण पूरा उतरा, सर्वथा तन्मयता अथवा लीलाओंने गोपरामाओंको बलात् गृहीत किया। यों 'गतिस्मित' इत्यादि संगत हुआ। यहाँ एक भाव यह भी है—श्रीवल्लभाचार्यजीने अणुभाष्यमें कहा है—किसी भावुकके चिन्तनसे जो अभेद होता है, यह एक संचारीभाव है। इसमें तीन अवस्थाएँ होती हैं। यहाँ 'छान्दोग्योपनिषद्' का यह प्रसंग उदाहरण है—'अहमेव पुरस्तात्' इत्यादि अर्थात् पहले भावुकको जगत्की और अपनी भी विस्मृति हो जाती है। फिर केवल अपनी ही स्मृति रहती है—'अहमेव पुरस्तात् दक्षिणतश्चोत्तरेण' वह सम्पूर्ण विश्वमें अपना ही अस्तित्व देखता है। दूसरी स्थितिमें वह भगवान्को ही सर्वत्र देखता है— 'भूमैव पुरस्तात्, भूमैव'। अन्तमें तीसरी स्थिति— 'अहमेव पुरस्तात्' या 'आत्मैवोपरिष्टात्' की होती है अर्थात् मैं ही अथवा आत्मा ही सर्वत्र भरपूर है, यह भावुक ज्ञानीको अन्तिम निश्चय होता है। भगवान्ने कहा है— मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये। मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ ॥ (श्रीमद्भा० ३।२९।११) मेरे गुणोंके श्रवण करनेसे—मेरी लीलासे भावुकके चित्तकी सर्वाधिष्ठान मुझमें गति होती है। जैसे गंगाका जल समुद्रमें जाता है, भावुकका चित्त वैसे मेरी ओर प्रवाहित होता है। भावुकके द्रुत चित्तकी यह स्थिति है। चित्तकी द्रुतता उसकी निर्मलतापर निर्भर है। 'भक्तिरसायन' में कहा है—जलके प्रधान स्थान 'टंकी' आदिमें रंग छोड़नेसे वह जहाँ-जहाँ स्पष्ट होगा—अपनेमें रँग लेगा। जहाँ-जहाँ वह रंगीन जल निकलेगा—कल आदिके द्वारा—वहाँ वह जिस- जिसपर पड़ेगा—अपने रंगमें मिला लेगा। सभीका बाह्य और आभ्यन्तर दर्शन-ग्रहण अन्तःकरणसे ही होता है। वह यदि लाक्षाकी तरह या 'टंकी' के सदृश श्याम रंगमें रँगा है तो अब जो भी उससे गृहीत होगा चाहे वह आन्तर, बाह्य, पुरस्तात्, उपरिष्टात्, हरित, पीत कैसा भी हो—उस रंगमें रँगा जाकर ही गृहीत होगा। अतः श्रीश्यामसुन्दर भगवान्को अपने हृत्पुण्डरीकपर विराजित करके व्रजांगना सब कुछ श्याममय ही देखती हैं—'जित देखो तित स्याममई है।' व्रजांगना अपने मनमें विचारती हैं—'ये लोग बावरे हैं या हम ही बावरी हैं, इन लोगोंके नेत्रमें विकार हो गया है या हम ही किसी नेत्ररोगसे ग्रस्त हो गयी हैं! क्योंकि लोग हरे, पीले, लाल कई रंग बतलाते हैं, पर हमें तो सर्वत्र श्याम-ही-श्याम दीख पड़ रहा है।' इस स्थितिमें—'भूमैवाधस्तात् भूमैवोपरिष्टात्····' की प्रतीति होती है। जब भूमाका पार्थक्य नहीं प्रतीत होता, तब 'अहमेव पुरस्तादहमेवो- परिष्टादहमेव दक्षिणतश्चोत्तरेण' की ही सर्वत्र
३५२ भक्तिसुधा प्रतीति होती है। इसी प्रकार तदवस्थापन्न व्रजांगना 'जैसी श्यामकी सब लीला, वैसी ही हमारी सब लीला' ऐसा समझती हैं। इस रूपसे अपनेको श्यामाभिन्न समझकर कहती हैं—'मैं ही श्याम हूँ।' जिनमें कृष्ण-विहार-विभ्रमा ('कृष्णाय विहारेण विभ्रमो यासु') की वस्तुस्थिति है, उनकी यह बात है, अन्योंकी नहीं। सभी तो श्रीराधांश- समुद्भूता नहीं। जो हैं, उनमें ऐसा विभ्रम हुआ। मूल श्लोकमें 'न्यवेदिषुः' बहुवचन है। इसका यह अभिप्राय है कि सम्पूर्ण—अपरिगणित कोटि व्रजांगनाओंको विभ्रम हुआ। सबने अपनेको कृष्ण समझा। विशेषता यह थी कि सभी अपनेको कृष्ण समझती हैं, पर अन्योंको 'मैं कृष्ण हूँ' ऐसे भ्रमसे युक्त समझती हैं तथा च समझाती हैं—'सखि, हम तो तुम्हारे पास ही हैं, हमारे विप्रयोगसे तुम क्यों इतनी म्लान हो रही हो?' इसपर समझायी जानेवाली सखी समझानेवालीसे कहती है—'सखि, तुम तो सखी हो, कृष्ण नहीं।' तब वह उत्तरमें कहती है—'नहीं, तुम तो सखी हो, मैं तो कृष्ण हूँ।' यों वे एक-दूसरेको समझाती हैं और अपनेको सब श्रीकृष्ण समझती हैं तथा दूसरीको सब सखी जानती हैं। इस प्रकार वे व्रजांगना विभ्रमान्वित हुईं। यहाँ एक यह भी प्रश्न उठता है कि श्रीश्यामसुन्दर भगवान्के विहारसे इन्हें यह विभ्रम हुआ है, अथवा शृंगाररसाक्रान्ततावश अपने चित्तकी अनवस्थितिसे उन्हें यह भावना हुई कि—'हम कृष्ण हैं।' इसपर यही समझना चाहिये कि अधिकारानुसार पात्रोंमें भावनाकी उद्भूति होती है। इनमें किसीको श्रीकृष्ण-विहार-विभ्रमसे तो किसीको शृंगाराक्रान्ततासे विभ्रम हुआ। बाकी विभ्रम सबको हुआ—'मैं ही कृष्ण हूँ।' 'अन्तर्हिते भगवति सहसैव व्रजाङ्गनाः। अतप्यंस्तमचक्षाणाः'''' ॥' गोपरामाओंका प्रेमोन्माद भगवान् श्रीकृष्णके अन्तर्हित होनेपर गोपरामा बहुत विह्वल हुईं। उनका चित्त अपने प्राणधनकी गति, अद्भुत अनुराग, काममदभंजक स्मित, आकर्षक विभ्रम, मनोरमालापसे उनमें सर्वदाके लिये आकृष्ट हो गया। भगवान्ने अपने इन स्वाभाविक गति, स्मित आदिसे बलात् उनके चित्तको अपनेमें खींच लिया। प्राणवियोगमें मरण होता है। श्रीकृष्ण तो प्राणोंके भी प्राण हैं, फिर उनके वियोगमें ब्रजसुन्दरियोंका जीवन कैसे रहा, यही अचरज है। उस समय उनके लिये परमाह्लादकर शारद पूर्णचन्द्र भी सूर्यके यद्वा प्रलयकालीन तीव्र सूर्योंके सदृश परम तापक हुआ। प्रलयकालमें नीचेसे संकर्षण-ज्वाला उठती है, ऊपरसे त्रयोदश प्रचण्ड चण्डांशु तपते हैं। शारद पूर्णचन्द्र शीतल, कोमल, मधुर, आह्लादकर होता है। परंतु यही वियोगियोंके लिये उक्त प्रलयकालीन संकर्षण-ज्वाला, त्रयोदशादित्यके सदृश परम सन्तापक होता है। ब्रजवामाओंके लिये श्रीकृष्णचन्द्ररूप पूर्णचन्द्रके वियोगमें प्रलय-सा उपस्थित हो गया। निश्चय था कि शीघ्र ही उनके प्राणपखेरू उड़ जाते। इस सन्ताप-स्थितिको दूर करनेके लिये ही श्रीरमापतिने अपनी गति आदिसे उनके चित्तको अपनेमें आकृष्ट कर लिया; क्योंकि चित्त रहे तो देहानुसन्धान हो। भगवान्ने गोपरामाओंको सन्ताप- सूर्यसे बचानेके लिये ही अपने गत्यादिसे उनके चित्तको खींच लिया, अतएव 'आक्षिप्तचित्ताः प्रमदाः' (श्रीमद्भा० १०।३०।२) कहा गया। अथवा 'आक्षिप्तचित्ताः प्रमदाः' का अर्थ है—अपने प्राणधन श्यामधनको ढूँढ़नेके लिये व्रजरामाओंने अपने मनको प्रोत्साहन देकर निकाल दिया कि 'हे मन! प्राणधन प्रियतमका पता नहीं और तुम यहाँ इस वियोगमें शान्तिसे बैठे हो, जाओ उनका पता लो।' यों तिरस्कारपूर्वक चित्तको निकाल दिया, फेंक दिया। इस तरह आक्षिप्तचित्तता बनी। जब चित्त ही नहीं, तब तापका अनुभव कैसा? व्रजबालाएँ श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दघनको प्राप्त करके 'प्रमदा' बनी हैं। उन्हें अपने इस प्रमदात्व-हर्षप्रकर्ष अथवा मद- प्रकर्षके कारण अपने इन्द्रियज्ञानतकका पता नहीं। वे प्रेमोन्मादमें, संयोगमें भी ऐसी वियोगकी भावना किया करती हैं। वैसे तो उन्हें रोम-रोममें श्रीकृष्णसंयोग प्राप्त है। अतः यह प्रेमोन्मादमें वियोग-भावना है। वे तो इस प्रकारसे प्रियमय ही हैं, केवल 'बरफ-पूतरी सिन्धुविच रटत पियास पियास' की स्थिति है।
श्रीरासपंचाध्यायी ३५३ बरफकी पूतरीके भीतर, बाहर, मध्यमें जल-ही-जल है। वह स्वयं भी जल ही है। इसी प्रकार श्रीप्रिया- प्रियतमको परस्परमें सदा प्रेमकी भूख रहती है— 'हाय! प्रेम नहीं मिला' और वे हैं स्वयं प्रियतमप्रेमके स्थान। सूर्यका प्रकाश अन्यत्र पर्वतादिमें कभी होने और कभी नहीं होनेसे व्यभिचरित है, पर सूर्यमें वह सदा रहता है। प्रेम और प्रेमीकी जाति अलग है, पर यहाँ तो दोनों एक ही हैं। पूतरी जलमें पड़ी है, पर प्यासी मरती है, मानो अनादिकालसे जल नहीं मिला। यही प्रिया-प्रियतमकी स्थिति है। यह अचिन्त्य, अनन्त, अखण्ड, अव्यक्त, प्रत्यक्चैतन्याभिन्न तत्त्वकी बनी पूतरी है। अनेक शब्दोंमें कह सकते हैं— प्रेमामृतसिन्धु, अचिन्त्यरसामृतसिन्धु, पूर्णानुराग- रससारसिन्धुसे दो पूतरी निकलीं—श्रीराधा, श्रीश्याम। अब इनके बाहर-भीतर सर्वत्र वही प्रेमामृत आदि तत्त्व है। वहाँ प्रेम स्थायी है, जैसे सूर्यमें प्रकाश नित्य है। प्रेमानन्दमहासूर्यमें कभी भी प्रेमका अभाव नहीं हो सकता। अपने स्वरूपके पूर्ण ज्ञानमें पूतरीको प्यास ही कैसी? पर प्रेमोन्मादकी स्थिति है—'मैं प्यासी हूँ।' पूतरीकी तरह प्रिया-प्रियतम दोनों उस प्रेमसिन्धुमें हैं। अनन्तानन्त-अनुराग होनेपर भी उसके लिये दोनों अधीर रहते हैं। 'इनके मिलनेके मूल्यका कण भी हमारे पास नहीं' यही भाव, यही प्यास दोनोंको सदा तड़फड़ाती रहती है। सूर्यसे प्रकाश कभी जाता ही नहीं। पूतरीसे जल कभी जाता नहीं। वैसे ही प्रेम जिनमें सदा, नित्य रहता है, उन श्रीश्यामाश्यामको सदा यही भावना रहती है कि कब प्रेमकण मिले। वे सदा प्रेमको चाहा करते हैं, उसके लिये विकल रहते हैं, पर उन्मादमें, अत्यन्त संयोगमें सर्वांगीण सम्प्रयोगके होने तथा रहनेपर भी उसकी प्राप्तिकी महती आकांक्षा बनी ही रहती है। उसके प्राप्त होनेपर प्रेमोन्मादमें उसे भूल जाते हैं। प्रेमोन्मादमूलक दो आकांक्षाएँ प्रणयीकी होती हैं—एक प्रियतमके सम्मिलनकी अभिलाषा और दूसरी संयोगमूलक अनुरागकी उत्कण्ठा। प्रेमीकी स्थिति कुछ विचित्र रही है, वह भजन करनेकी अपेक्षा प्रेम करना ही उत्तम समझता है। प्रयत्न नहीं करनेपर भी प्रेम प्राप्त करनेको तैयार रहता है। किसी भी तरह प्रियतम मिले, यही उसका ध्येय रहता है। प्रेममें गुण-दोषकी परीक्षा या विवेकको स्थान नहीं है प्रेममें गुण-दोषकी परीक्षाको या विवेकको स्थान नहीं है। कहा है— महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुनधाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥ (रा०च०मा० १।८०) श्रीअम्बा पार्वती श्रीशिवप्राप्तिके निमित्त तप कर रही थीं। उसी प्रसंगपर सप्तर्षि उनके पास गये। परीक्षाके निमित्त भगवान् शिवकी उनके सामने निन्दा की, पर श्रीपार्वती अटल निश्चय लेकर बैठी थी। वह कोई बालूकी भित्ति न थी, जो फूँकसे उड़ जाती। उन्होंने अन्तमें स्पष्ट कह दिया—'हमने माना कि महादेव अवगुण—दोषके घर हैं और विष्णु सब गुणोंके स्थान, पर जिसका मन जहाँ रम गया, उसे तो उसीसे काम है।' उसे गुण-दोष देखनेका समय ही कहाँ? ऐसे ही श्रीव्रजांगनाएँ श्रीकृष्णसे प्रेम करती हैं। उन्हें यह ज्ञान ही नहीं कि उनके प्रेमास्पद सुन्दर हैं या असुन्दर, गुणी हैं या निर्गुणी। वे इन सब बातोंको कुछ नहीं जानतीं, केवल प्रेम करना जानती हैं। किसी भक्तकी सूक्ति है— असुन्दरः सुन्दरशेखरो वा गुणैर्विहीनो गुणिनां वरो वा। द्वेषी मयि स्यात् करुणाम्बुधिर्वा कृष्णः स एवाद्य गतिर्ममास्तु॥ हमारे प्रियतम चाहे सुन्दरोंके सरताज हों, चाहे गुणगणसे विहीन हों, चाहे वे मनमोहन हमसे प्रेम करें, चाहे न करें, चाहे वे हमपर प्रसन्न हों, चाहे नाराज, पर हमारे तो वे ही प्राणधन हैं, सर्वस्व हैं। जहाँ प्रेमियोंकी गणना चलेगी, वहाँ एक प्रेमी चातक भी गिना जायगा। प्रेमियोंके पारखी श्रीगोस्वामीजी कहते हैं—'जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ॥' (रा०च०मा० २।२०५।३) प्रेमी स्वातिबिन्दु माँगता है और प्राणधन मेघ ओला-पत्थर बरसाता है, परंतु चातक
३५४ भक्तिसुधा कभी उसकी इस निष्ठुरताको मनमें भी नहीं लाता। मेघ कभी उसे वर्षभरमें भी याद नहीं करता, कभी ध्यानपर भी नहीं लाता। एक तरफ यह हाल है और दूसरी ओर प्रेमी एकाध वस्तु नहीं, अपितु अपना सर्वस्व वार डालनेको तैयार है। गंगाजल, यमुनाजल, साक्षात् सुधा भी चातकको नहीं चाहिये। उसको तो वही एक, केवल एक ही, स्वातिबिन्दु चाहिये। प्रेमकी दृढ़ताका एक दृष्टान्त गंगाके तटपर एक वृक्ष था। उसकी एक शाखा गंगामें लटक रही थी। चातक-पक्षिराज अपने प्राण- जीवनकी चिन्तामें उसी शाखापर बैठा था। इसी समय पीछेसे एक बहेलियाने तीर मारा। निशाना सच्चा बैठा, उसके प्राणपखेरू उड़ गये, वह हवाके झोंकेसे गंगामें गिर पड़ा। परंतु अन्तमें मरते समय भी उसका नियम नहीं टूटा, स्वभावसे ही उसने अपना मुँह बन्द कर लिया—कहीं मरनेपर भी गंगाजल मुँहमें न चला जाय, मेरे तो मुखमें बस वही स्वातिबिन्दु हो। कितना ही कोई अपना हो, निजी हो, पर उसके भी प्रतिकूल आचरणपर एक दिन कोप आ ही जाता है। किंतु चातकको नहीं आता। किसीने कहा—‘चातक, अन्य उत्तम जल पियो, मैं अमृत आन दूँगा। क्यों स्वातिपर प्राण देते हो?’ तो उसने कहा—‘नहीं, मेरे लिये तो साक्षात् प्रेमद्रव भी तुच्छ है। मनुष्यकी तरह ढुलमुलपन्थी मैं नहीं हूँ। यहाँ तो यह अडिग-अडोल निश्चय है— स्वातिबिन्दु ही मिलेगा तो लेंगे, नहीं तो पत्थर, ओलाकी मारसे मर जायँगे।’ इतना ही नहीं, उसके मुँहसे मरते समय अन्तिम शब्द निकले—‘पुत्रो ! मेरा श्राद्ध भी गंगाजल आदि जलोंसे नहीं करना।’ वाह री दृढ़ता ! अपने प्रत्यक्ष भी न लिया और भविष्यके लिये भी वंशजोंको शिक्षा दे गया। इतना ही नहीं, किंतु मेरे वंशज भी ऐसा ही करें—यह भी निश्चित कर गया। यह है प्रेमतत्त्व। इन प्रेमी व्यक्तियोंके अखण्ड प्रेमसे ही इनका इतना यश फैला है। इसी प्रेमतत्त्वके सम्बन्धसे साधारण वस्तुमें भी मिठास— उत्तमता आ जाती है। इसके बिना अमृत भी फीका है। बस, यदि यह प्रेम नहीं तो कुछ नहीं। यदि श्रीव्रजांगनाएँ व्रजेश्वर श्रीश्यामसुन्दरको पपीहाकी तरह स्वातिका जल न समझकर साधारण जलस्थानीय समझतीं और ऐसी स्थितिमें दूसरेके भजन-सेवन करनेमें प्रवृत्त हो जातीं तो आज उनके इस महान् सौभाग्यका कोई प्रसंग ही न आता। पर इसके विपरीत उनका तो मन्तव्य ही यह है कि हमारे प्राणधन प्रेमी चाहे जैसे भी हों, हम तो उनसे ही प्रेम करेंगी—‘असुन्दरः सुन्दरशेखरो वा····’ वे अपने प्रेमीके गुण, दोष, महत्त्वके विषयमें कोई शर्त ही नहीं रखतीं; बस, केवल प्रेम करती हैं। चातककी तरह अपमानित होनेपर भी अपने लक्ष्यसे नहीं गिरतीं। क्योंकि—‘चातकु रटनि घटें घटि जाई।’ (रा०च०मा० २।२०५।४)—का उनका सिद्धान्त है। अजी! जिनपर जीवन वार डारा—सर्वस्व न्योछावर कर दिया, बदलेमें उनके प्रेम न करनेपर यदि उनसे वैराग्य हो जाय तो फिर कुछ स्वारस्य ही नहीं। स्वाद तो तभी; जब प्रेमीकी ओरसे शतधा-सहस्रधा अपमानित होनेपर भी चातकके जैसी रटन न घटे। प्रत्युत, उत्तरोत्तर रटन बढ़ती ही जाय, चाहे कितने ही तिरस्कार क्यों न हों। सुवर्णको जितना ही तपाया जायगा, जितना ही उसका निघर्षण-छेदन-ताप-ताड़न किया जायगा, उतना ही वह मूल्यवान् होगा। हमारा प्रेम कांचनकी तरह खरा होना चाहिये। आज प्रेम कम, बल्कि नहींके बराबर है और उसका दिखावा, ढिंढोरा ही सबसे ज्यादा है, पर यह है अपनेको धोखा देना ही। एक भक्त कहता है—हम प्रेम तो करें, पर यदि वे न जानें, तब करें; अथवा उनकी ओरसे अधिक-से-अधिक उपेक्षा, तिरस्कार, डाट-फटकार मिले, तब करें। ‘प्रेम कनक ही बात चढ़े····’ यह तो यहाँ शर्त ही नहीं थी कि वे प्रेम करें, वे सुन्दर हों, तब हम प्रेम करेंगे। यह है प्रेम चीज, यह जिसमें हो, वही धन्य है। मिसरी जैसी मीठी लगती है, ब्रह्म अथवा ब्रह्मस्थानीय श्रीकिशोर नटनागर प्रभु वैसे मीठे नहीं लगते, कटु लगते हैं। खेल-तमाशोंमें, उपन्यास- नाटकोंमें, थियेटर-सिनेमामें मन लगता है। दोषवश जैसे मिसरीमें मिठास नहीं प्रतीत होती, वैसे ही मायावश सर्वान्तरतम प्रियतम प्रभुमें मिठास नहीं प्रतीत
होती, पर वास्तवमें मीठे वे ही हैं। वे प्रेमके योगसे ज्ञात होते हैं। प्रेमके बिना अचिन्त्य, अनन्त, अव्यक्त तत्त्व भी फीका लगता है, जो मधुरिमाका उद्गमस्थान है। प्रेमकी महिमासे सुतृप्त हुआ चातक अमृत भी नहीं चाहता। इसलिये श्रीव्रजांगना प्रेम चाहती है, आदर नहीं। प्रेम होनेसे ही परमानन्दकी प्राप्ति होती है। कंस आदिने भी प्रभु श्रीकृष्णका दर्शन किया, पर आनन्द—मिठास—उन्हें अनुभूत नहीं हुई, क्योंकि वहाँ प्रेम नहीं था। अतः ये गोपरामा प्रेमकी भिक्षा माँगती हैं। जहाँ प्रेम मिला कि प्रेमोन्माद हुआ, वहाँ संयोगमें भी वियोगकी उच्च दशाका उदय हो जाता है। अतः रासेश्वरीकी, प्रेमकी और प्रिय सम्मेलनकी उत्कट इच्छा रहती है—प्रेम, प्रियतम दोनों मिलें। ऐसे ही श्रीश्यामसुन्दर भी दोनों चाहते हैं। जिस प्रेमसिन्धुकी ये दोनों—श्रीश्यामाश्याम पूतरी हैं, उसीसे प्रेम बना। इन दोनोंहीके भीतर प्रेम भी और प्रियतम भी हैं। इधर श्रीरासेश्वरीके स्वरूपमें प्रेम, प्रियतम विराजमान हैं, उधर श्रीरसिकविहारीमें भी ऐसे ही प्रेम, प्रियतम इसकी भिक्षा माँगते हैं। दोनों विराजमान हैं। फिर भी दोनों भीतर-बाहर एक हैं। बरफ-पूतरीकी तरह प्रेम, प्रियतम एक ही प्रेमसिन्धुसे निकले हैं, एकत्र ही स्थित हैं। फिर भी 'रटत पियास पियास'—'हा प्राणजीवन ! कब मिलोगे?' यह प्रेमोन्मादकी स्थिति है। असली वस्तु प्रेमोन्मादको उत्पन्न करके विप्रयोगमें संयोग भावनाका हो जाना है। परंतु इसके बिना संयोगमें वियोग प्रतीत न हो जाय, इसलिये श्रीभगवान्ने 'गत्यानुराग- स्मितविभ्रमेक्षितैः' (श्रीमद्भा० १०।३०।२)-से संत्राण करनेके लिये यह प्रेमोन्माद प्रदान किया। एक और भी अर्थ है—भगवान्को गोपवामाओंके सन्त्राणकी परवाह क्यों करनी थी ? जबकि वे आप्तकाम, आत्माराम हैं ? उन्हें तो चातकके सामने जलदकी तरह ही डटे रहना चाहिये था। आप्तकाम पूर्णकाम भी लीलास्वादनमें तत्पर रहते हैं इसपर यह समझना कि—'रमापतेः आक्षिप्त- चित्ताः' अर्थात् रमापति मनमोहनके चित्तको भी अपनी गति आदिसे गोपियोंने आक्षिप्त कर लिया, हर लिया। गति या अनुराग, स्मित, विभ्रम, ईक्षित कटाक्षादि, मनोरम आलस्य, विलास आदिद्वारा श्रीकृष्णको गोपांगनाओंने अपने वशमें कर लिया। अतः उनकी पूर्णकामता भुला गयी। थे तो ये पूर्णकाम ही, पर जब गोपांगनाओंके अपांगोंसे मन खो बैठे, तब इधर इनपर ध्यान आया और तब प्रेमोन्मादकी स्थिति उत्पन्न की, वे तो थे नीरस, पूर्णकाम, उन्हें सकाम और सरस बनाया सखियोंने। ठीक है, माधुर्यके बिना मिसरीका मूल्य ही क्या ? 'राधा बिन आधा कृष्ण ?' एक विशेषता यह भी कि पूर्णकामके भक्त श्रीआत्माराम, पूर्णकाम, परम निष्काम होते हैं। परंतु लीलास्वादनमें तो ये बड़े तत्पर देखे जाते हैं। देखिये, श्रीगोस्वामीजी कह रहे हैं—'आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं।।' (रा०च०मा० ७।३२।६) उन निष्कामोंमें सकामता ला देनेवाले वे श्रीहरि इस प्रकारके गुणवाले हैं, इसमें उन भक्तोंका कोई दोष नहीं। कहा है— आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥ × × × नैर्गुण्यस्था रमन्ते स्म गुणानुकथने हरेः ॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०; २।१।७) अहैतुकी भक्ति चुम्बककी तरह बलात् उन्हें खींच लेती है। श्रीभगवान्में आत्मारामचित्ताकर्षकत्व भी एक गुण है। श्रीसनकादि, शुकादि 'निर्ग्रन्थ' थे, उनकी चित्-अचित्की ग्रन्थि—चिज्जडग्रन्थि खुल गयी थी। 'पलालमिव धान्यार्थी' की तरह वे सारग्रहण कर चुके थे, सब मर्मज्ञ थे, शास्त्ररहस्य जानकर सब कुछ छोड़ बैठे थे, मोक्षतक नहीं चाहते थे, पर फिर भी उस बाँकिविहारी मनोहारीके लोकोत्तररूपलावण्यपर उनका चित्त बरबस लुभा जाता था। किसीकी बड़ी सुन्दर सूक्ति है— क्लेशे क्रमात् पञ्चविधे क्षयङ्गते यद्ब्रह्मसौख्यं स्वयमस्फुरत्परम्। तद् व्यर्थयन् कः पुरतो नराकृतिः श्यामोऽयमामोदभरः प्रकाशते ॥
३५६ भक्तिसुधा किन्हीं महापुरुषके पंचविध क्लेश—अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश क्षीण हो चुके थे, शान्त होकर पंचकोशातीतमें उनका मन लग गया। तत्त्वसाक्षात्कार उन्हें हो चुका था, उन्हें कहीं श्यामसुन्दरके दर्शन हो गये। अब प्रयत्न करते हैं, पर समाधि ही नहीं लगती। किसीने कहा है कि 'जौ लों तोहि नन्दको कुमार नाहीं दीठि परौ, तौ लौ ध्यान धारणा समाधि तू करि ले।' उसका दर्शन हो जानेके बाद चित्त खिंच जाता है, पर पवित्र अन्तःकरणवालोंका ही वहाँ खिंचाव होता है। जैसे चुम्बक स्वच्छ लोहेको जल्दी खींच लेता है, वैसे ही वह श्यामसुन्दर महात्माओंके चित्तको जल्दी खींच लेता है। उन्हें ज्ञात ही नहीं होता कि वे श्यामसुन्दरसे क्यों इतना प्रेम करते हैं? यह श्रीभगवान्में विराजमान चित्ताकर्षकत्व गुणका माहात्म्य है। यह तो हुई योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंकी बात, पर यहाँ इन गँवारी ग्वालिनियोंने तो इन योगीन्द्र-मुनीन्द्र मनोहारी श्रीभगवान्के भी मनको खींच लिया। उन्हें श्रीभगवान् होकर भी इन गोपरामाओंके साथ रमण करनेकी इच्छा हो गयी। भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः । वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१) यह तो मानना ही पड़ेगा कि सनकादि, शुकादि अन्य आत्मारामोंकी अपेक्षा श्रीभगवान्में अधिक आत्मारामत्व था, पर इन्हें कम आत्मारामत्ववाली अथवा जो आत्मारामत्वको जानतीं भी नहीं, उन गोपांगनाओंने इनके आत्मारामत्वको छीन लिया और इन्हें 'गोपीराम' या गोपीरमण बना दिया। निष्कामको सकाम बना दिया। पूर्णकामता आदि छिप गयी, मन गोपरामाओंमें खिंच गया। अब यह दशा हो रही है कि इनके पीछे-पीछे घूम रहे हैं। इस प्रकार 'आकृष्टचित्ता रमापतेः' के अर्थमें षष्ठी है। अतः यह अर्थ भी होता है कि श्रीरमापतिने राजहंस, गजराज और सिंहकी गतिको लज्जित करनेवाली गति, अनुराग, हास, अलसवलितादि विभ्रम तथा मनोरमालापसे व्रजांगनाओंके चित्तको खींच लिया; क्योंकि उन्होंने सोचा कि 'यदि चित्त इनके पास रहेगा तो ये हमारे विप्रयोगजन्य तीव्रतापमें सन्तप्त होंगी।' व्रजांगनाओंको 'प्रमदा' कहा गया। 'प्रकृष्टो मदो यासाम्' इस व्युत्पत्तिसे भाव यह कि दैहिक सब प्रपंच भूल गयीं, जिस मनके रहनेमें सन्ताप, वियोग होता है, उसे तो भगवान्ने पहले ही हर लिया। अब सुख-दुःख ही किसे हो? फिर श्रीभगवान्ने गोपांगनाओंमें प्रमद— मादक मद उत्पन्न किया, जिससे वियोगतापमें भी उन्हें संयोग प्रतीत हुआ, इससे वह वियोगजन्य तीव्रताप उनके अन्तरमें प्रविष्ट न हो सका। इतनेपर भी यदि श्रीमन्मोहनका विप्रयोग उन्हें बाधा पहुँचाये—तो ठीक नहीं। अतः 'तास्ता विचेष्टा जगृहुस्तदात्मिकाः ॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।२) तदात्मिकाका अर्थ है— 'स एव रक्षकत्वेन वर्तमानो
श्रीरासपंचाध्यायी ३५७ हे प्रिय ! आपके चरण अत्यन्त सुकोमल हैं, उनमें कमलकी पांखुरीके भी गड़ जानेका भय रहता है। आपके उन चरणोंको हृदयके तापको दूर करनेके लिये हम अपने स्तनोंमें—हृदयमें धारण करती हैं, पर नाथ ! हम डरती हैं—आपके कमलकोमल पादोंको कर्कश-कठोर स्तनोंमें कैसे धरें, कहीं वे उनमें गड़ न जायें। हे प्राणजीवन ! आप उन्हीं कोमल चरणोंसे कण्टकाकीर्ण अरण्योंमें घूमते हो, इससे हमें और भी व्यथा होती है। हमारे तो प्राणोंके भी प्राण, जीवन आप हो। 'आपको यों घूमते देखकर हमारी बुद्धि चकरा जाती है, हम क्या करें?' कितना ध्यान है, कितनी भावुकता है; क्या यह प्राकृत विषयलोलुप कामिनियोंको होगी ? फिर आध्यात्मिकादि ताप भी तभी दूर होंगे, जब प्रभु श्रीहरिके चरण हृदयमें निहित होंगे। बात यह है कि लौकिक कामुक-कामिनी आदिमें स्वसुखसुखित्वका भाव होता है, वे सब अपने सुखके लिये प्रेम करते हैं। लोकमें पिता आदि अपने आनन्दके लिये बालकके कोमल कपोलका चुम्बन करते हैं, उसे उनकी दाढ़ी चुभती है, वह रोता है, पर इसकी परवाह किसे रहती है? वहाँ तो चुम्बनकी बौछार (परम्परा) लग जाती है। इसलिये कहा है—'....आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति....' (बृहदारण्यक० २।४।५) किंतु श्रीव्रजांगनाओंके विषयमें यह बात नहीं है, यहाँ तो तत्सुखसुखित्वका भाव है। यह श्लोक लज्जाका स्थान नहीं, जैसा कि अनभिज्ञ कह बैठते हैं। अपितु श्रीव्रजदेवियोंके विशुद्ध, गाढ़ प्रेमसे आक्षिप्त हृदयका दर्पण है, उच्च भावुकताका केन्द्र है। वे कहती हैं—क्या करें, आपके चरण हृदयोंमें धरे बिना ताप दूर नहीं होगा—यह सभी शास्त्रोंका सिद्धान्त है, पर डरती हैं हम, यह स्तन (हृदय) कठिन है, कहीं चुभ न जाय, पर आप इनसे वनमें घूमते हो, क्या इनमें तृण, गुल्म, पत्र आदि न गड़ते होंगे ? अवश्य गड़ते होंगे। फिर भी हाय ! हम जीवित हैं, परंतु हमारा कुछ वश नहीं चलता, क्योंकि हमारे प्राण विधाताने आपके हाथमें दे दिये हैं, नहीं तो ये कबके निकल गये होते। अतः 'तस्मिन्नेव आत्मा प्राणो यासान्ताः तदात्मिकाः' यह ठीक कहा गया। जबतक श्रीश्यामसुन्दर प्राणेश्वर इनके अन्तरमें विराजमान हैं, तबतक ये मर सकतीं नहीं, तीव्र ताप सहकर भी जीवित रहेंगी, डोलती-फिरतीं काम-काज करती रहेंगी। इसीसे 'रमापतेरपि आक्षिप्तं चित्तं याभिस्ताः' यह संगत है। जो श्यामसुन्दर परमसमाहितचेता योगीन्द्र मुनीन्द्रोंके चित्तको भी आकृष्ट कर लेते हैं, उनके चित्तको गोपवधूटियोंने आकृष्ट कर लिया। अतएव 'रमापतेरपि प्रकृष्टो मदो यासाम्' यह भी भाव है अर्थात् जिनका मद रमापतिसे भी बढ़कर है। तभी तो अपनी 'गति' आदिसे आप्तकाम, पूर्णकामको भी खूब मतवाला बना दिया। अथवा अपने चित्तपर आक्षेप करती हैं—'अरे चित्त ! तू शरीरमें बैठा क्या करता है ? जा, प्राणधनका अन्वेषण कर' इस तरह ('आक्षिप्तं चित्तं याभिस्ताः') चित्तको जिन्होंने बाहर निकाल दिया, वे गोपांगनाएँ श्रीश्यामसुन्दरको ढूँढ़ती हुई उनकी लीलाका अनुकरण करती हैं। उसमें ऐसी विभोर, तल्लीन हो गयी हैं कि श्रीश्यामके गति, स्मित, प्रेक्षण, भाषण आदि सबका अनुकरण करती हैं। यद्यपि अनुकर्ता नट आदिको अनुकरणीय और अनुकर्तामें भेद बना रहता है, पर इनको तो यह भेद ज्ञात ही नहीं रह गया। इनके मन, बुद्धि आदि सभी सर्वथा श्यामसुन्दरके ही सदृश हो गये। प्रेमोद्रेकमें व्यवधान सह्य नहीं होता उस समय धर्मी (श्रीकृष्ण) और धर्म (जैसे अग्निकी उष्णता आदि, वैसे श्रीकृष्णके धर्म) दोनोंका आविर्भाव हुआ। फिर विहारविभ्रमका उदय हुआ। ('विहारः—विगतो हारो यस्माद् एतादृशो विभ्रमः') अर्थात् जिस विभ्रम या विलासमें हाररहित होना पड़ता है, उस विहारविभ्रमका उदय हुआ। जिस समय व्रजांगनाएँ अपने प्रियतमसे मिलने लगती हैं, उस समय वे देश, काल और वस्तुका व्यवधान भी नहीं रहने देना चाहतीं। प्रेमोद्रेकमें व्यवधान सह्य नहीं होता। हार, कंचुकी आदि निकाल देती हैं। आनन्दोद्रेकमें रोमांचतक—जो प्रियतमालिंगनसमुत्थ है—बाधक होता
३५८ भक्तिसुधा है, फिर हारकी तो बात ही क्या? अतः 'विहार' ('विगतो हारः') कहा। ऐसे विलासका वे अनुभव करने लगीं। द्वारकाकी श्रीकृष्णकी पटरानियोंका भी एक ऐसा ही प्रसंग है। एक बार श्रीकृष्ण इन्द्रप्रस्थके प्रवाससे आये तो उनकी महिषियाँ उनसे मिलनेके लिये—' "उत्तस्थूराश्रात् सहसासनाशायात्' (श्रीमद्भा० १।११।३१) आसनसे उठीं और आशयसे भी उठीं। देशव्यवधानको दूर करनेके लिये आसनसे उठीं। पर उन्हें इतनेसे सन्तोष नहीं हुआ। उन्होंने सोचा—क्या हम उन प्राणेश्वरसे पाँच-पाँच कोषके कंचुकको पहने हुए मिलें, जहाँ एक कंचुकमात्र भी बाधक होता है, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय कोषके कंचुकोंको पहनकर मिलनेमें स्वाद ही कुछ नहीं। इन प्राणधनसे तो निरावरण होकर सम्मिलनमें आनन्द है। अतः आशयसे उठकर मिलीं अर्थात् आशयोपलक्षित पंचकोषके आवरणको हटाकर श्रीकृष्ण परमात्मासे मिलीं। परंतु श्रीव्रजदेवियोंके यहाँ इन कोषोंकी चर्चा नहीं, वे तो नवघनश्याम मुरलीमनोहर मनमोहनकी निरन्तर चिन्तासे तदात्मिका-रसात्मिका हो रही हैं और श्रीवृषभानुनन्दिनी उस रसकी मधुरिमास्थानीया हैं। इस प्रसंगपर श्रीनन्ददासजीने कहा है—'तरंगन वारि ज्यों।' श्रीउद्धव भगवान् कृष्णके सन्देशको गोकुलमें व्रजबालाओंके निकट पहुँचाकर जब वापस आये, तब श्यामके विप्रयोगमें व्याकुल उन गोपदेवियोंका उन्होंने श्रीकृष्णके सामने दयनीय चित्र खींचा और कहा—वे आपके बिना मरी जा रही हैं और आप यहाँ मौज ले रहे हो। उत्तरमें श्रीभगवान्ने सहास स्वरमें कहा—उद्धव ! व्रजमें इतने दिन रहकर उन व्रजांगनाओंसे क्या सीख आये हो? और तब उन्होंने दिखाया 'तरंग ज्यों।' श्रीगोपांगनाओंके रोम-रोममें, प्राण-प्राणमें श्यामसुन्दर विराजमान हैं। श्रीउद्धव यह देखकर और चकित रह गये। ऐसी स्थितिमें गोपियों और श्रीकृष्णमें छिपाव ही क्या है? लोग व्यर्थ शंका करते हैं—श्रीकृष्णने गोपांगनाओंको नग्न कराया, हाथ बँधाकर बुलाया, चीरहरण-लीला की। पर क्या वे नग्न होकर जलमें नहीं नहायी थीं? क्या वे कृष्ण परमात्मा जलसे भी बहिरंग हैं? वस्तु- स्थिति तो यह है कि— सर्वेषामपि वस्तूनां भावार्थो भवति स्थितः। तस्यापि भगवान् कृष्णः किमतद् वस्तु रूप्यताम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५७) सभी वस्तुओंका भावार्थ परिणामीमें स्थित होता है अर्थात् सभी वस्तुएँ अपने कारणरूपमें स्थित होती हैं। उस कारणके भी कारण भगवान् कृष्ण हैं। उनसे भिन्न और है ही क्या वस्तु, जिसका निरूपण किया जाय? अन्तमें सतत्त्व श्रीकृष्ण ही ठहरते हैं। इतना भीतरी श्रीकृष्णतत्त्व है। उसके समक्ष क्या कोई वस्त्रपरिधान करेगा, हाँ तो प्रकृतमें—जलमें तरंगकी तरह गोपांगना हैं। वे एक तरहसे जल ही हैं, परंतु जलगता मधुरिमाकी अपेक्षा तरंग बहिरंग हैं। मधुरिमा अन्तरंग है, वह श्रीराधा हैं। अस्तु, इस प्रकार 'कृष्णविहार-विभ्रमा' व्रजांगनाएँ आपसमें एक-दूसरीसे कहती हैं—हे अबलाओ, तुम कहाँ श्यामसुन्दरको ढूँढ़ती-फिरती हो, वह अशेष विहार नागर कृष्ण तो हम ही हैं, लो हमें ग्रहण करो। इस प्रकार वे मनमोहनस्वरूप ही हो रही हैं। बाहर, भीतर, मध्यमें उनके श्याम-ही-श्याम भरपूर हैं। वही आत्मा, मन, बुद्धि, प्राण सब कुछ हो गये हैं। यों वे 'तदात्मिकाः' ('स एव आत्मा प्राणादिर्यासान्ताः') हो गयी हैं। प्रकृत श्लोकके 'प्रियाः प्रियस्य प्रतिरूढमूर्तयः।' अंशपर पहले कुछ कहा गया है। अब एक भाव और कहा जाता है—'प्रियाः प्रियस्य प्रतिरूढमूर्तयः।' विष्णुदैवतसमें 'क्वचित् स्त्रियः पुरुषायिता भवन्ति' से विपरीत रतिका एक पक्ष है अर्थात् शृंगारोद्रेकमें नायक नायिका बन जाता है और नायिका नायक बन जाती है। यहाँ 'गति, स्मित...' आदि लीला में 'स्वयं स्त्रियः सत्यः प्रतिरूढमूर्तयः' हुए। श्रीव्रजांगना श्यामसुन्दर बन गयीं और व्रजचन्द्र श्रीकृष्णचन्द्र व्रजांगना बन गये। श्रीराधा श्याम हो गयीं और श्रीश्याम राधा हो गये। प्राकृत-लौकिक शृंगारमें वस्तुतः नायिका नायक नहीं होती और नायक नायिका नहीं होता। पर यहाँ तो प्रभु साक्षात् काम और सत्यसंकल्प हैं। एक-दूसरेका चिन्तन करते-
श्रीरासपंचाध्यायी ३५९ ही-करते श्रीरसिक विहारिणी बन जाते और वह रसिक बन जाती हैं। ये दोनों प्रेमामृतसिन्धुकी दो मूर्ति बनकर प्रकट होते हैं और उसीमें ये दोनों प्रिया- प्रियतम गोता लगाते रहते हैं। उसमें न जाने कौन कब बदल जाता है, कुछ पता नहीं रहता; क्योंकि उस प्रेमसुधासिन्धुके उन्मज्जन-निमज्जनमें यह उलट-फेर दिनमें करोड़ों बार होता है। भक्तकी दृढ़ भावनासे भगवान् भक्तके अधीन हो जाते हैं इस प्रसंगमें यह भी ज्ञातव्य है कि पहले श्रीभगवान्—भजनीयतत्त्व स्वतन्त्र और साधक परतन्त्र रहता है। भक्त भगवान्को हर तरह रिझानेका प्रयत्न करता है; स्तुति आदि करता फिरता है। वस्तुतः स्वातन्त्र्य ही पुंस्त्व और पारतन्त्र्य ही स्त्रीत्व है— (‘स्वातन्त्र्यमेव पुंस्त्वम्, पारतन्त्र्यमेव स्त्रीत्वम्’)। इन दृष्टियोंसे यही निश्चय होता है कि जीव परवश—पराधीन और ईश स्ववश—स्वाधीन है। श्रीगोस्वामीजीने भी कहा है—‘परबस जीव स्वबस भगवंता।’ (रा०च०मा० ७।७८।७) तरंग जलके परतन्त्र रहती हैं, जीव प्रभुके परतन्त्र रहता है। इस आशयसे ईशप्राप्तिके निमित्त सखीभावकी साधना होती है। पारतन्त्र्यसे ही पूर्णता-स्वाधीनता प्राप्त होती है। भक्तकी दृढ़ साधनासे फिर धीरे-धीरे श्रीभगवान् परतन्त्र—भक्तके अधीन होने लगते हैं और भक्त स्वतन्त्र, दुरूह वेदान्त और कोमल भक्तिरसमें समान भावसे वर्तमान। श्रीस्वामी मधुसूदन सरस्वतीके श्रीकृष्ण- तत्त्वके साक्षात्कारके लिये यहीं श्रीवृन्दावनमें चार बार श्रीगोपालसहस्रनामका पुरश्चरण किया, पर कुछ भी सिद्धि-सूत्र न मिलनेपर अन्तमें इन्होंने काशीमें श्रीकालभैरवका अनुष्ठान किया। उससे उन्हें पूर्वसंचित अपने पापोंका—प्रभुदर्शन-प्रतिबन्धका ज्ञान हुआ, हताशा भाव मिटा और श्रीकालभैरवके प्रोत्साहनसे फिर श्रीवृन्दावनमें आकर पाँचवीं बार श्रीगोपाल- सहस्रनामका पुरश्चरण उन्होंने आरम्भ किया। उसमें पूर्वपरिश्रमकी सब कसर निकल गयी। ‘क्लेशः फलेन हि पुनर्नवतां विधत्ते।’ रूप, लावण्य, माधुर्य और सुन्दरताकी सीमा श्रीमुरलीमनोहर मनमोहन उनके समक्ष प्रकट हो गये। अब श्रीस्वामीजीको मानकी सूझी, श्रीश्यामसुन्दर उनके सामने जाते हैं और वे मुँह फिराते हैं। अब भक्त स्वतन्त्र, भगवान् परतन्त्र हैं। ऐसे ही अवसरके लिये श्रीभगवान्ने श्रीमुखसे कहा है—‘अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।’ मैं भक्तोंके अधीन हूँ (श्रीमद्भा० ९।४।६३)। साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम्। मदन्यत् ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥ (श्रीमद्भा० ९।४।६८) साधुओंका—भक्तोंका हृदय मेरा विहार-स्थल है और मेरा हृदय साधुओंका निवासस्थान। मेरे सिवा वे और कुछ नहीं जानते। ‘वशीकुर्वन्ति मां भक्त्या सत्स्त्रियः सत्पतिं यथा॥’ (श्रीमद्भा० ९।४।६६)। जैसे साध्वीसती पतिव्रता स्त्री अपने सत्पतिको वशमें कर रखती है, वैसे ही स्वाधीनभर्तृकाकी तरह मुझे सद्भक्त वशमें कर लेता है। तभी तो उस पूर्णतमको हाथमें माखन रख- रखकर, ताली दे-देकर गोपियोंने नचाया। मानो वे उनकी काठकी पूतरी थे—‘तद्वशो दारुयन्त्रवत्’ (श्रीमद्भा० १०।११।७) इसके अनुसार श्रीकृष्णमें गोपांगनात्व हुआ। यों ‘प्रियाः प्रियस्य प्रतिरूढमूर्तयः’ से विपरीत रतिभाव बना। श्रीकृष्ण गोपांगना हो गये और गोपांगनाएँ श्रीकृष्ण हो गयीं। इस प्रकार गोपांगनाएँ श्रीकृष्ण बनकर कहती हैं—‘असावहं त्विति’ (श्रीमद्भा० १०।३०।३) यह केवल भावना ही नहीं, वस्तुस्थिति ही ऐसी है। पहले तो प्रेमोद्रेकवश श्रीनन्दनन्दन उन व्रजांगनाओंके रोम-रोममें थे ही, दूसरे प्रतिरूढ़भावसे भी वे उनमें स्थित हुए एवं तीसरे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकारमें विभ्रमादिसे भी वे प्रविष्ट हुए। इसके अतिरिक्त ‘कृष्ण- विहारविभ्रमाः’ (श्रीमद्भा० १०।३०।३)—का यह भी समास होता है—‘कृष्णविहारस्य विभ्रमो यासु।’ कृष्णविहारका विभ्रम जिनमें हुआ। वे गोपियाँ ‘मैं ही कृष्ण हूँ’, ऐसा परस्पर कहने लगीं। अर्थात् इन गोपांगनाओंके विहारमें कृष्णलीलाका विभ्रम हो गया। अतएव यह लौकिक लीला थी। वस्तुतः
३६० भक्तिसुधा गोपांगनाओंके मनमें यह भाव ही नहीं था कि हम अनुकरण कर रही हैं, वे निष्कपट, निश्छल थीं। वे सच्चे ही प्रेम-समुद्रमें गोता लगाती रहती थीं। इस समुद्रकी तरंगें संयोगमें शान्त रहती हैं, पर वियोगमें खूब उठती हैं। कभी इसमें उन्माद, विभोरताका ज्वारभाटा आता है। गोपियोंकी प्रेमसमाधि भग्न होनेपर वे श्यामसुन्दरको पुकारने लगीं जब कभी उनकी यह प्रेम-समाधि भग्न होती, तल्लीनतामें कुछ कमी आती, वियोगका ज्ञान होता, तब वे पुकार उठतीं, 'हा! प्राणधन, श्यामसुन्दर, नटनागर, कहाँ हो' और ढूँढ़ने लगतीं- गायन्त्य उच्चैरमुमेव संहता विचिक्युरुन्मत्तकवद् वनाद् वनम्। पप्रच्छुराकाशवदन्तरं बहि- र्भूतेषु सन्तं पुरुषं वनस्पतीन् ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।४) श्रीगोपांगनाएँ अबतक बाह्यानुसन्धानसे शून्य थीं, उन्हें होश ही नहीं कि हमारा श्रीप्राणप्यारेसे इस समय असम्प्रयोग हो रहा है। बाह्यानुसन्धान होते ही 'हा श्याम ! हा प्राण कहाँ हो!' इस चिन्तासन्तान- सन्तापसे सातिशय सन्तप्त हो उठती हैं और श्रीश्यामसुन्दर नन्ददुलारेको फिर प्राप्त करनेका प्रयत्न करती हैं-सखि, चलो ढूँढ़ें। कैसे ढूँढ़ें? तो संहत- सम्मिलित होकर ढूँढ़ें। यहाँ व्रजदेवियोंके इस चरित्रसे उपदेश मिलता है कि कोई भी काम सम्मिलित होकर ही करना चाहिये, आपसकी फूटसे काम बिगड़ जाता है। इनकी तो यह नित्यलीला है। यह तो विप्रयोगका नटन हम लोगोंके लिये है। वैसे इनमें कभी ईर्ष्या भी होती थी। इनके पृथक्-पृथक् यूथ थे। इनकी ईर्ष्या स्पृहणीय है, वह भक्तिरसामृतसिन्धुकी लहरें हैं। पारा बहुत स्वच्छ-उज्ज्वल होता है। गन्धक उसके रूपमें हो जाता है, उसमें समा जाता है। चित्त जब स्वच्छ होता है, इष्ट-प्रेय तत्त्व उसमें प्रतिफलित होता है। उस समय चित्त आनन्दस्वरूप- रसस्वरूप होता है। अमृतकी सब तरंगें अमृत, रसकी सब तरंगें रस ही होती हैं। ईर्ष्यादि सब चित्तकी ही वृत्तियाँ अथवा विकार हैं। इस प्रकार श्यामप्रेमप्रमत्त बड़भागियोंकी ईर्ष्या भी प्रेम ही है। अस्तु, अब तो ढूँढ़ना है, अतः रागद्वेषहीन होकर ढूँढ़नेमें ही सुविधा रहेगी। यही उपदेश भी मिलता है। कुंज आदिकी बातोंका अर्थात् यह अमुक कुंजकी, अमुक भावकी है आदि बातोंका विचार कभी स्वस्थतामें होगा। इस समय दृष्टिकी अपेक्षा नहीं। अब तो ईर्ष्या-द्वेष सब दूर हो गया। केवल श्रीश्यामसुन्दरके अन्वेषणकी चिन्ता है। अब तो वे परस्पर कहती हैं-सखि ! यह प्रेममूर्च्छित होगी तो अपने गुलाबजल छिड़ककर इसको होशमें लायेंगी। अतः 'संहताः' कहा। 'गायन्त्य उच्चैः' गाती हुई ढूँढ़ने चल रही हैं-यदि मनमोहन दूर भी होंगे तो सुन लेंगे। फिर हम तो उनके गुण गाती चलती हैं- जिन्हें सुनकर रह न सकेंगे, जहाँ भी होंगे, अवश्य और शीघ्र ही आकर दर्शन देंगे। इस बहाने हम अपनी आर्ति-पीड़ा भी सुना देंगी। वे हमारी पीड़ा सुनकर भी प्रसन्न होते हैं। इसके अतिरिक्त उन्हें गान लगता भी बहुत अच्छा है। हम कहर्तीं- ललन! जरा पादसंवाहन करो, वेणी गूँथ दो, तब वे 'मुझे गान सुनाओ, गूँथ दूँगा' आदि कोरी गप्प मारने लगते, काम न करते। अतः हमारे उच्च स्वरसे गाये गये गीतोंको सुनकर अवश्य ही प्राणधन घनश्याम पधारेंगे। भगवान्ने स्वयं ही कहा- नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च। मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद ॥ (आदिपुराण १९।३५) अथवा गोपियाँ प्रेमार्तिमें विह्वलतासे बेहाल हैं। उन्मादसे गान निकल रहा है। व्रजांगनाओंको किसीने
- वे सब परस्पर मिलकर ऊँचे स्वरसे उन्हींके गुणोंका गान करने लगीं और मतवाली होकर एक वनसे दूसरे वनमें, एक झाड़ीसे दूसरी झाड़ीमें जा-जाकर श्रीकृष्णको ढूँढ़ने लगीं। परीक्षित् ! भगवान् श्रीकृष्ण कहीं दूर थोड़े ही गये थे। वे तो समस्त जड-चेतन पदार्थोंमें तथा उनके बाहर भी आकाशके समान एकरस स्थित ही हैं। वे वहीं थे, उन्हींमें थे, परंतु उन्हें न देखकर गोपियाँ वनस्पतियोंसे-पेड़-पौधोंसे उनका पता पूछने लगीं।
श्रीरासपञ्चाध्यायी ३६१
समझाया—तुम क्यों उन्हींको गाती हो, जो त्यागकर चले गये। इसपर वे कहती हैं—'हाँ, हम तो उन्हींको गायेंगी, उन्हींको रिझायेंगी।' वे यह निश्चय लेकर बैठी हैं—'चाहे वे शतकोटि-अनन्तकोटि कष्ट दें, पर हम तो उन्हें ही, बाँकेबिहारीको ही गायेंगी। इनका यह 'अटल' नियम है। कितनी भी विपत्ति आनेपर, ये अन्यको न गायेंगी। वे त्रिभंग होनेपर भी ललित श्याम, चाहे कितने भी विपरीत आचरण करें, पर इनका प्रेम-प्राखर्य बढ़ता ही जायेगा। गायन उनका स्वभाव हो गया, अतः गाती ही हैं। गोपाङ्गनाओंका प्रेमविह्वल हो वृक्षों- वनस्पतियोंसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना तथा उत्तर न मिलनेपर दोषानुसन्धान करना 'विचिक्युरुन्मत्तकवद् वनाद् वनम्' उन्मत्तकी तरह, जहाँ-जहाँ सम्भावना है, ढूँढ़ती हैं। एकसे एकको, निरालस होकर, दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवें वनोंको ढूँढ़ डालती हैं। विश्राम ही नहीं लेतीं। जबतक प्यारे मनमोहन न मिल जायें, चैन ही नहीं। इससे भी उपदेश है—'ढूँढ़ते ही रहो।' जबतक अभिलषित कार्य सिद्ध न हो ले, विश्राम ही कैसा? फिर वे पूछती हैं—वनस्पतियोंसे। उन्हें दृढ़ आशा है कि इनसे प्राणप्यारेका पता मिलेगा ही। इससे यह भी सिद्ध हुआ कि—प्रेमी वृक्षोंतकसे पूछ सकता है; चेतनकी तो कथा ही क्या? अमुकसे पूछो, अमुकसे नहीं—यह तो उनके यहाँ विचार ही नहीं—अतएव साधारण्येन बहुवचन है—'वनस्पतीन्'। श्रीमद्वल्लभा- चार्यजीका इसपर एक भाव है—वृन्दावनके वनस्पति वैष्णव हैं, 'मूढा अपि वैष्णवाः प्रष्टव्याः'। अनुरागी चाहे विद्वान् न हों, पर वे प्रष्टव्य हैं। अतः वृक्षोंसे पूछती हैं अथवा व्रजांगनाओंको प्रेमोन्मादसे दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई, उन्हें वृक्षोंका वास्तविक स्वरूप ज्ञात हुआ। व्रजके वन, लता, तरु आदि अपने एक-एक कणसे श्रीश्यामसुन्दरके स्वरूपको प्रकट करते हैं*— अतएव भावुक व्रजधूलिको भालपर धरते हैं। एक भावुकका कहना है— सन्त्ववतारा बहवः पुष्करनाभस्य सर्वतोभद्राः। कृष्णादन्यः को वा लतास्वपि प्रेमदो भवति॥ अर्थात् भगवान् विष्णुके बहुत अवतार हुए और उत्तम-उत्तम हुए हों, परंतु श्रीकृष्णअवतारके अतिरिक्त और कौन अवतार हुआ, जिसने लताओंमें भी, जड़ोंमें भी प्रेमका गाढ संचार किया हो? 'यत्पादपांसुर्बहुजन्मकृच्छ्रतो धृतात्मभीर्योगिभिरप्यलभ्यः।' (श्रीमद्भा० १०।१२।१२) जिन श्रीभगवान्की पादधूलि बहुत जन्मोंमें भी योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंतकको भी दुर्लभ है, उन प्रभुने अपने संचारसे व्रज-वृन्दावन-लता-तरुको अनन्त महत्त्व दिया है। श्रीवृन्दावनके वृक्षोंके प्रकाशकी एक किरण भी बिना प्रभुपादारविन्दकी अनुकम्पाके जन्म-जन्मान्तर, युगयुगान्तर और कल्पकल्पान्तरमें भी द्रष्टुमशक्य है। 'आनन्दवृन्दावनचम्पू' में कहा है—श्रीवृन्दावनधामके एक-एक वृक्ष, इन्द्रनील, पद्मराग और हरितमणि आदिके सदृश चमत्कृत, देदीप्यमान हैं, इनकी शाखा, उपशाखा, पत्र, पुष्प, फल भी वैसे ही सचिक्कण, प्रकाशमान हैं। उनपर शुक, पिक, कपोत, तित्तिर, मयूर आदि अनेक विहंगम विराजमान हैं। उनके एक-एक पल्लवका प्रकाश सहस्रों सूर्योंको लज्जित करता है। किंतु इनका दर्शन अनन्तदुर्भावनातिमिराच्छन्न इन चर्मचक्षुओंसे नहीं हो सकता। यह तो श्रीमद्भगवत्कृपैकलभ्य दिव्यदृष्टिपर ही निर्भर है। श्रीव्रजांगनाओंको यह सौभाग्य प्राप्त था। वे उन तरुओंके वास्तविक स्वरूपको देख रही थीं। अतः उनसे अपने प्रियतम-प्राणधन-आनन्दकन्द-कृष्णचन्द्र परमानन्दको पूछती हैं।
- 'वनलतास्तरव आत्मनि विष्णुं व्यञ्जयन्त्य इव पुष्पफलाढ्याः। प्रणतभारविटपा मधुधाराः प्रेमहृष्टतनवः ससृजुः स्म॥' (श्रीधरीसम्मतो 'ववृषु' रितिपाठः) (श्रीमद्भा० १०।३५।९) [युगलगोपीगीत]। भगवान् श्रीगोपाल जब वनमें गौ चराने जाते, तब कौतुकवश वेणु बजाकर चरती हुई गौओंको बुलाते। उस समय उनके वेणुरवको सुनकर वनके लता, तरु (स्त्री-पुरुष दोनों ही) भारसे झुकी शाखाओंसे प्रणत होते, पुष्प और फलकी बहुतायतसे प्रसन्नता सूचित करते, प्रेमसे रोमांचित होते। इन लक्षणोंसे अपनेमें मानो वे श्रीविष्णुको ही सूचित करते हुए मधुधारा बरसाने लगते। ये विष्णु साक्षात्कृतिके लक्षण हैं।