भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 360, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंसब बल-धन, विद्या, सौन्दर्य आदिको छोड़कर श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्द नन्दनन्दनको ही जिसने अपना सर्वोपरि बल बनाया, वही अभिन्न होता है। तभी तो उन अबला-व्रजबालामें अभेद हुआ। तभी उन्होंने कहा—'असावहम्', अथवा 'अः—वासुदेवः बलम्-प्राणा यासान्ताः'। अर्थात् बलका भी मूल है प्राण, भगवान् वासुदेव ही जिनके प्राण हैं, वे व्रजांगनाएँ 'अबला' हुईं। इस तरह श्रीकृष्णके अनुकूल और श्रीकृष्णके ही आधारपर कायिकी, वाचनिकी एवं मानसी समस्त चेष्टावाली व्रजदेवियाँ 'अबला' ठहरीं। जिनके भगवान् वासुदेव ही मन, बुद्धि, अन्तर्रात्मा, रोम-रोमके सर्वस्व हैं, उन व्रजबालाओंको उनके बिना, प्राणस्थानीय उनके बिना, कैसी अन्य अवधानता ? अतः सर्वत्र उनका अवलोकन करती कहती हैं—'मैं कृष्ण हूँ'। यह स्थिति वेश-भूषा आदिसे भी अनुकरण करा देती हैं। रसके उद्रेकमें नायिका नायककी लीलाका अनुकरण करती है। यही स्थिति 'मधुरिपुरहमिति भावनशीला' इस रसिकेन्द्रचूड़ामणि श्रीजयदेवके गीतमें पायी जाती है। एक बार श्रीराधा प्रतीक्षा कर रही थीं—बाट जोह रही थीं, अपने प्राणधन त्रिभुवनमोहन मुरलीमनोहरकी। उसी समय उन्हें एक विशिष्ट अवस्थामें 'मधुरिपुरहम्' का अनुसन्धान हो आया। यह भावनाका फल है। वस्तुतः यहाँ तो इन व्रजमहिलाओंके बाहर-भीतर श्रीसाँवरिया गिरिधारी ही विराजमान हैं। अतः यहाँ तो यह व्यवहार स्वाभाविक है। श्रीराधा और श्रीकृष्ण एक ही हैं, दो हैं ही नहीं। कल्पना करो—दो शीशी हैं, एक श्याम, एक गौर। श्याम शीशीमें गौर रस भरा है और गौर शीशीमें श्याम रस भरपूर है। श्रीराधा रसमयी गौर शीशी हैं, वह काँचकी नहीं, रसकी ही बनी है। वैजात्यकी यहाँ कल्पना ही नहीं। उसमें शामरस भरपूर है। ऐसे ही श्रीकृष्ण श्याम शीशी हैं। अतः उभय उभयभावात्मा, उभय उभयरसात्मा हैं। यहाँ कुछ व्रजांगनाएँ राधांशभूता हैं। अंश भी बहुत ही स्वल्प है। राजराजेश्वरी श्रीरासेश्वरी राधाके पादारविन्दकी नखमणिज्योत्स्नाकी छटाका एक स्वल्पभाग, तद्भूता व्रजांगना तद्रूप होनेके नाते अपनेको अभिन्न मानती हैं। इस प्रकार भावनासे भी अभेद होता है। वस्त्राभरणसे भी व्रजांगनाएँ अपनेको श्यामाभिन्न समझती हैं। उन्होंने जो नील निचोल पहना है, वक्षोजमें जो मृगमद लेपा है, वह सब श्याम ही है। भीतर-बाहर श्याम-ही- श्याम है। किसी भावस्निग्धका बड़ा ही सुन्दर सूक्त है— श्रवसोः कुवलयमक्ष्णोरञ्जनमुरसो महेन्द्रमणिदाम । वृन्दावनतरुणीनां मण्डनमखिलं हरिर्जयति ॥ व्रजबालाओंने अपने कानोंमें नीलकमलके 'कर्णफूल', नेत्रोंमें अंजन और हृदयमें नीलवर्णकी महेन्द्रमणिका हार पहना है। लोग समझेंगे, उन्होंने इन वस्तुओंसे अपना श्रृंगार किया है। पर बात ऐसी नहीं। उन्होंने इन श्यामवर्णकी वस्तुओंको धारण करके प्राणधन श्यामसुन्दरको ही धारण किया है। उनका तो अखिल मण्डन-समस्त श्रृंगार-एकमात्र 'श्रीहरि' ही हैं। वे इन सोने-चाँदीके, कंकड़-पत्थरके भूषणोंको नहीं पहनतीं। अपने कानोंमें उन्होंने जिस श्यामसरोरुहको सजाया है, वह साधारण सरोरुह नहीं, अपितु पूर्णानुरागरससारसमुद्भूत है। कमलका नाम पंकज है, वह पंक-कीचड़से उत्पन्न होता है, पर जिस पंकजको उन्होंने धारण किया है, वह साधारण मिट्टीकी कीचमें नहीं उपजा, वह पूर्णानुरागदुग्धसरोवरकी कीचमें उपजा है। जब सरोवर दूधका, तब उसकी कीच नवनीत (मक्खन)-की होगी। जब भूपंकज लोकातिशायी सौन्दर्य-सौगन्ध्य-सम्पन्न होता है, तब पूर्णानुरागरससार-समुद्भूत सरसिजके सौरभादिकी कीमत कौन आँके ? ऐसे ही व्रजबालाओंने यह साधारण करिखा आँखोंमें नहीं लगाया, अपितु उस सौन्दर्यसुधाजलनिधि श्रीघनश्यामको ही सदाके लिये अपने नेत्र-निकुंजमें निवास दिया है। श्रीगोसाईंजीने भी ग्रामवधूटियोंकी उक्तिमें कहा है— जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं ॥ (रा०च०मा० २।१२१।५) उन ग्रामवधूटियोंकी तो यह वासनामात्र थी कि यदि हमें ब्रह्मा वर देनेको प्रस्तुत हों तो हम यह वर माँगैं कि इन भगवान् श्रीरामको अपने नेत्रोंमें पधराकर