भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासपञ्चाध्यायी ३५१ रखें, पर इन व्रजवधूटियोंने तो यह साक्षात् ही कर दिखाया अथवा श्रीकृष्णपाद-पद्मपरागको ही इन्होंने अंजन बनाया। इस प्रकार व्रजवनिताएँ अपनेको श्रीश्यामसुन्दरसे ही भूषित करती थीं। उनकी दृष्टिमें इसके अतिरिक्त किसी भी आभूषणको पहनना अत्यन्त ही हेय है। जैसा कि एक स्थलमें उनकी स्पष्ट उक्ति है— ईदृशा पुरुषभूषणेन या भूषयन्ति हृदयं न सुभ्रुवः। धिक् तदीयकुलशीलयौवनं धिक् तदीयगुणरूपसम्पदः॥ ऐसे सिद्धान्तवाली व्रजांगनाओंने बाहर-भीतर सर्वत्र श्रीश्यामसुन्दर प्राणधनको ही धारण किया। इस प्रकारका तादात्म्य श्रीगोपांगनाओंको हुआ। अन्यत्र तादात्म्य आरोपित होता है, परंतु यहाँ नहीं। अतः श्रीश्यामसुन्दर भगवान्की गति, स्मित, प्रेक्षण, भाषण आदि श्रीव्रजवनिताओंमें और व्रजवनिताओंके मन, बुद्धि आदि श्रीश्यामसुन्दर भगवान्में आरूढ हुए। भगवान् श्रीकृष्णके साथ यों अभिन्नभावसे उनकी रसमयी कायिकी-वाचनिकी-मानसी लीलासे, विहारसे उनमें जो विभ्रम उत्पन्न हुए, वे सब व्रजदेवियोंमें उत्पन्न हुए। श्रीनवलकिशोरकी सभी चेष्टा—गति, भाषण, दर्शन आदि—जो-जो थीं, सब इन व्रजांगनाजनमें प्रस्फुटित हुईं। इतना ही नहीं, बल्कि इतनी ऐक्यापत्ति हुई कि इन व्रजरमणियोंकी लीलासे श्रीराधाविहारीका विभ्रम हुआ—'श्रीकृष्णविहारस्य विभ्रमो याभ्यः।' अनुकरण पूरा उतरा, सर्वथा तन्मयता अथवा लीलाओंने गोपरामाओंको बलात् गृहीत किया। यों 'गतिस्मित' इत्यादि संगत हुआ। यहाँ एक भाव यह भी है—श्रीवल्लभाचार्यजीने अणुभाष्यमें कहा है—किसी भावुकके चिन्तनसे जो अभेद होता है, यह एक संचारीभाव है। इसमें तीन अवस्थाएँ होती हैं। यहाँ 'छान्दोग्योपनिषद्' का यह प्रसंग उदाहरण है—'अहमेव पुरस्तात्' इत्यादि अर्थात् पहले भावुकको जगत्की और अपनी भी विस्मृति हो जाती है। फिर केवल अपनी ही स्मृति रहती है—'अहमेव पुरस्तात् दक्षिणतश्चोत्तरेण' वह सम्पूर्ण विश्वमें अपना ही अस्तित्व देखता है। दूसरी स्थितिमें वह भगवान्को ही सर्वत्र देखता है— 'भूमैव पुरस्तात्, भूमैव'। अन्तमें तीसरी स्थिति— 'अहमेव पुरस्तात्' या 'आत्मैवोपरिष्टात्' की होती है अर्थात् मैं ही अथवा आत्मा ही सर्वत्र भरपूर है, यह भावुक ज्ञानीको अन्तिम निश्चय होता है। भगवान्ने कहा है— मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये। मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ ॥ (श्रीमद्भा० ३।२९।११) मेरे गुणोंके श्रवण करनेसे—मेरी लीलासे भावुकके चित्तकी सर्वाधिष्ठान मुझमें गति होती है। जैसे गंगाका जल समुद्रमें जाता है, भावुकका चित्त वैसे मेरी ओर प्रवाहित होता है। भावुकके द्रुत चित्तकी यह स्थिति है। चित्तकी द्रुतता उसकी निर्मलतापर निर्भर है। 'भक्तिरसायन' में कहा है—जलके प्रधान स्थान 'टंकी' आदिमें रंग छोड़नेसे वह जहाँ-जहाँ स्पष्ट होगा—अपनेमें रँग लेगा। जहाँ-जहाँ वह रंगीन जल निकलेगा—कल आदिके द्वारा—वहाँ वह जिस- जिसपर पड़ेगा—अपने रंगमें मिला लेगा। सभीका बाह्य और आभ्यन्तर दर्शन-ग्रहण अन्तःकरणसे ही होता है। वह यदि लाक्षाकी तरह या 'टंकी' के सदृश श्याम रंगमें रँगा है तो अब जो भी उससे गृहीत होगा चाहे वह आन्तर, बाह्य, पुरस्तात्, उपरिष्टात्, हरित, पीत कैसा भी हो—उस रंगमें रँगा जाकर ही गृहीत होगा। अतः श्रीश्यामसुन्दर भगवान्को अपने हृत्पुण्डरीकपर विराजित करके व्रजांगना सब कुछ श्याममय ही देखती हैं—'जित देखो तित स्याममई है।' व्रजांगना अपने मनमें विचारती हैं—'ये लोग बावरे हैं या हम ही बावरी हैं, इन लोगोंके नेत्रमें विकार हो गया है या हम ही किसी नेत्ररोगसे ग्रस्त हो गयी हैं! क्योंकि लोग हरे, पीले, लाल कई रंग बतलाते हैं, पर हमें तो सर्वत्र श्याम-ही-श्याम दीख पड़ रहा है।' इस स्थितिमें—'भूमैवाधस्तात् भूमैवोपरिष्टात्····' की प्रतीति होती है। जब भूमाका पार्थक्य नहीं प्रतीत होता, तब 'अहमेव पुरस्तादहमेवो- परिष्टादहमेव दक्षिणतश्चोत्तरेण' की ही सर्वत्र