भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 362

३५२ भक्तिसुधा प्रतीति होती है। इसी प्रकार तदवस्थापन्न व्रजांगना 'जैसी श्यामकी सब लीला, वैसी ही हमारी सब लीला' ऐसा समझती हैं। इस रूपसे अपनेको श्यामाभिन्न समझकर कहती हैं—'मैं ही श्याम हूँ।' जिनमें कृष्ण-विहार-विभ्रमा ('कृष्णाय विहारेण विभ्रमो यासु') की वस्तुस्थिति है, उनकी यह बात है, अन्योंकी नहीं। सभी तो श्रीराधांश- समुद्भूता नहीं। जो हैं, उनमें ऐसा विभ्रम हुआ। मूल श्लोकमें 'न्यवेदिषुः' बहुवचन है। इसका यह अभिप्राय है कि सम्पूर्ण—अपरिगणित कोटि व्रजांगनाओंको विभ्रम हुआ। सबने अपनेको कृष्ण समझा। विशेषता यह थी कि सभी अपनेको कृष्ण समझती हैं, पर अन्योंको 'मैं कृष्ण हूँ' ऐसे भ्रमसे युक्त समझती हैं तथा च समझाती हैं—'सखि, हम तो तुम्हारे पास ही हैं, हमारे विप्रयोगसे तुम क्यों इतनी म्लान हो रही हो?' इसपर समझायी जानेवाली सखी समझानेवालीसे कहती है—'सखि, तुम तो सखी हो, कृष्ण नहीं।' तब वह उत्तरमें कहती है—'नहीं, तुम तो सखी हो, मैं तो कृष्ण हूँ।' यों वे एक-दूसरेको समझाती हैं और अपनेको सब श्रीकृष्ण समझती हैं तथा दूसरीको सब सखी जानती हैं। इस प्रकार वे व्रजांगना विभ्रमान्वित हुईं। यहाँ एक यह भी प्रश्न उठता है कि श्रीश्यामसुन्दर भगवान्के विहारसे इन्हें यह विभ्रम हुआ है, अथवा शृंगाररसाक्रान्ततावश अपने चित्तकी अनवस्थितिसे उन्हें यह भावना हुई कि—'हम कृष्ण हैं।' इसपर यही समझना चाहिये कि अधिकारानुसार पात्रोंमें भावनाकी उद्भूति होती है। इनमें किसीको श्रीकृष्ण-विहार-विभ्रमसे तो किसीको शृंगाराक्रान्ततासे विभ्रम हुआ। बाकी विभ्रम सबको हुआ—'मैं ही कृष्ण हूँ।' 'अन्तर्हिते भगवति सहसैव व्रजाङ्गनाः। अतप्यंस्तमचक्षाणाः'''' ॥' गोपरामाओंका प्रेमोन्माद भगवान् श्रीकृष्णके अन्तर्हित होनेपर गोपरामा बहुत विह्वल हुईं। उनका चित्त अपने प्राणधनकी गति, अद्भुत अनुराग, काममदभंजक स्मित, आकर्षक विभ्रम, मनोरमालापसे उनमें सर्वदाके लिये आकृष्ट हो गया। भगवान्ने अपने इन स्वाभाविक गति, स्मित आदिसे बलात् उनके चित्तको अपनेमें खींच लिया। प्राणवियोगमें मरण होता है। श्रीकृष्ण तो प्राणोंके भी प्राण हैं, फिर उनके वियोगमें ब्रजसुन्दरियोंका जीवन कैसे रहा, यही अचरज है। उस समय उनके लिये परमाह्लादकर शारद पूर्णचन्द्र भी सूर्यके यद्वा प्रलयकालीन तीव्र सूर्योंके सदृश परम तापक हुआ। प्रलयकालमें नीचेसे संकर्षण-ज्वाला उठती है, ऊपरसे त्रयोदश प्रचण्ड चण्डांशु तपते हैं। शारद पूर्णचन्द्र शीतल, कोमल, मधुर, आह्लादकर होता है। परंतु यही वियोगियोंके लिये उक्त प्रलयकालीन संकर्षण-ज्वाला, त्रयोदशादित्यके सदृश परम सन्तापक होता है। ब्रजवामाओंके लिये श्रीकृष्णचन्द्ररूप पूर्णचन्द्रके वियोगमें प्रलय-सा उपस्थित हो गया। निश्चय था कि शीघ्र ही उनके प्राणपखेरू उड़ जाते। इस सन्ताप-स्थितिको दूर करनेके लिये ही श्रीरमापतिने अपनी गति आदिसे उनके चित्तको अपनेमें आकृष्ट कर लिया; क्योंकि चित्त रहे तो देहानुसन्धान हो। भगवान्ने गोपरामाओंको सन्ताप- सूर्यसे बचानेके लिये ही अपने गत्यादिसे उनके चित्तको खींच लिया, अतएव 'आक्षिप्तचित्ताः प्रमदाः' (श्रीमद्भा० १०।३०।२) कहा गया। अथवा 'आक्षिप्तचित्ताः प्रमदाः' का अर्थ है—अपने प्राणधन श्यामधनको ढूँढ़नेके लिये व्रजरामाओंने अपने मनको प्रोत्साहन देकर निकाल दिया कि 'हे मन! प्राणधन प्रियतमका पता नहीं और तुम यहाँ इस वियोगमें शान्तिसे बैठे हो, जाओ उनका पता लो।' यों तिरस्कारपूर्वक चित्तको निकाल दिया, फेंक दिया। इस तरह आक्षिप्तचित्तता बनी। जब चित्त ही नहीं, तब तापका अनुभव कैसा? व्रजबालाएँ श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दघनको प्राप्त करके 'प्रमदा' बनी हैं। उन्हें अपने इस प्रमदात्व-हर्षप्रकर्ष अथवा मद- प्रकर्षके कारण अपने इन्द्रियज्ञानतकका पता नहीं। वे प्रेमोन्मादमें, संयोगमें भी ऐसी वियोगकी भावना किया करती हैं। वैसे तो उन्हें रोम-रोममें श्रीकृष्णसंयोग प्राप्त है। अतः यह प्रेमोन्मादमें वियोग-भावना है। वे तो इस प्रकारसे प्रियमय ही हैं, केवल 'बरफ-पूतरी सिन्धुविच रटत पियास पियास' की स्थिति है।