भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासपंचाध्यायी ३५३ बरफकी पूतरीके भीतर, बाहर, मध्यमें जल-ही-जल है। वह स्वयं भी जल ही है। इसी प्रकार श्रीप्रिया- प्रियतमको परस्परमें सदा प्रेमकी भूख रहती है— 'हाय! प्रेम नहीं मिला' और वे हैं स्वयं प्रियतमप्रेमके स्थान। सूर्यका प्रकाश अन्यत्र पर्वतादिमें कभी होने और कभी नहीं होनेसे व्यभिचरित है, पर सूर्यमें वह सदा रहता है। प्रेम और प्रेमीकी जाति अलग है, पर यहाँ तो दोनों एक ही हैं। पूतरी जलमें पड़ी है, पर प्यासी मरती है, मानो अनादिकालसे जल नहीं मिला। यही प्रिया-प्रियतमकी स्थिति है। यह अचिन्त्य, अनन्त, अखण्ड, अव्यक्त, प्रत्यक्चैतन्याभिन्न तत्त्वकी बनी पूतरी है। अनेक शब्दोंमें कह सकते हैं— प्रेमामृतसिन्धु, अचिन्त्यरसामृतसिन्धु, पूर्णानुराग- रससारसिन्धुसे दो पूतरी निकलीं—श्रीराधा, श्रीश्याम। अब इनके बाहर-भीतर सर्वत्र वही प्रेमामृत आदि तत्त्व है। वहाँ प्रेम स्थायी है, जैसे सूर्यमें प्रकाश नित्य है। प्रेमानन्दमहासूर्यमें कभी भी प्रेमका अभाव नहीं हो सकता। अपने स्वरूपके पूर्ण ज्ञानमें पूतरीको प्यास ही कैसी? पर प्रेमोन्मादकी स्थिति है—'मैं प्यासी हूँ।' पूतरीकी तरह प्रिया-प्रियतम दोनों उस प्रेमसिन्धुमें हैं। अनन्तानन्त-अनुराग होनेपर भी उसके लिये दोनों अधीर रहते हैं। 'इनके मिलनेके मूल्यका कण भी हमारे पास नहीं' यही भाव, यही प्यास दोनोंको सदा तड़फड़ाती रहती है। सूर्यसे प्रकाश कभी जाता ही नहीं। पूतरीसे जल कभी जाता नहीं। वैसे ही प्रेम जिनमें सदा, नित्य रहता है, उन श्रीश्यामाश्यामको सदा यही भावना रहती है कि कब प्रेमकण मिले। वे सदा प्रेमको चाहा करते हैं, उसके लिये विकल रहते हैं, पर उन्मादमें, अत्यन्त संयोगमें सर्वांगीण सम्प्रयोगके होने तथा रहनेपर भी उसकी प्राप्तिकी महती आकांक्षा बनी ही रहती है। उसके प्राप्त होनेपर प्रेमोन्मादमें उसे भूल जाते हैं। प्रेमोन्मादमूलक दो आकांक्षाएँ प्रणयीकी होती हैं—एक प्रियतमके सम्मिलनकी अभिलाषा और दूसरी संयोगमूलक अनुरागकी उत्कण्ठा। प्रेमीकी स्थिति कुछ विचित्र रही है, वह भजन करनेकी अपेक्षा प्रेम करना ही उत्तम समझता है। प्रयत्न नहीं करनेपर भी प्रेम प्राप्त करनेको तैयार रहता है। किसी भी तरह प्रियतम मिले, यही उसका ध्येय रहता है। प्रेममें गुण-दोषकी परीक्षा या विवेकको स्थान नहीं है प्रेममें गुण-दोषकी परीक्षाको या विवेकको स्थान नहीं है। कहा है— महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुनधाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥ (रा०च०मा० १।८०) श्रीअम्बा पार्वती श्रीशिवप्राप्तिके निमित्त तप कर रही थीं। उसी प्रसंगपर सप्तर्षि उनके पास गये। परीक्षाके निमित्त भगवान् शिवकी उनके सामने निन्दा की, पर श्रीपार्वती अटल निश्चय लेकर बैठी थी। वह कोई बालूकी भित्ति न थी, जो फूँकसे उड़ जाती। उन्होंने अन्तमें स्पष्ट कह दिया—'हमने माना कि महादेव अवगुण—दोषके घर हैं और विष्णु सब गुणोंके स्थान, पर जिसका मन जहाँ रम गया, उसे तो उसीसे काम है।' उसे गुण-दोष देखनेका समय ही कहाँ? ऐसे ही श्रीव्रजांगनाएँ श्रीकृष्णसे प्रेम करती हैं। उन्हें यह ज्ञान ही नहीं कि उनके प्रेमास्पद सुन्दर हैं या असुन्दर, गुणी हैं या निर्गुणी। वे इन सब बातोंको कुछ नहीं जानतीं, केवल प्रेम करना जानती हैं। किसी भक्तकी सूक्ति है— असुन्दरः सुन्दरशेखरो वा गुणैर्विहीनो गुणिनां वरो वा। द्वेषी मयि स्यात् करुणाम्बुधिर्वा कृष्णः स एवाद्य गतिर्ममास्तु॥ हमारे प्रियतम चाहे सुन्दरोंके सरताज हों, चाहे गुणगणसे विहीन हों, चाहे वे मनमोहन हमसे प्रेम करें, चाहे न करें, चाहे वे हमपर प्रसन्न हों, चाहे नाराज, पर हमारे तो वे ही प्राणधन हैं, सर्वस्व हैं। जहाँ प्रेमियोंकी गणना चलेगी, वहाँ एक प्रेमी चातक भी गिना जायगा। प्रेमियोंके पारखी श्रीगोस्वामीजी कहते हैं—'जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ॥' (रा०च०मा० २।२०५।३) प्रेमी स्वातिबिन्दु माँगता है और प्राणधन मेघ ओला-पत्थर बरसाता है, परंतु चातक