भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५४ भक्तिसुधा कभी उसकी इस निष्ठुरताको मनमें भी नहीं लाता। मेघ कभी उसे वर्षभरमें भी याद नहीं करता, कभी ध्यानपर भी नहीं लाता। एक तरफ यह हाल है और दूसरी ओर प्रेमी एकाध वस्तु नहीं, अपितु अपना सर्वस्व वार डालनेको तैयार है। गंगाजल, यमुनाजल, साक्षात् सुधा भी चातकको नहीं चाहिये। उसको तो वही एक, केवल एक ही, स्वातिबिन्दु चाहिये। प्रेमकी दृढ़ताका एक दृष्टान्त गंगाके तटपर एक वृक्ष था। उसकी एक शाखा गंगामें लटक रही थी। चातक-पक्षिराज अपने प्राण- जीवनकी चिन्तामें उसी शाखापर बैठा था। इसी समय पीछेसे एक बहेलियाने तीर मारा। निशाना सच्चा बैठा, उसके प्राणपखेरू उड़ गये, वह हवाके झोंकेसे गंगामें गिर पड़ा। परंतु अन्तमें मरते समय भी उसका नियम नहीं टूटा, स्वभावसे ही उसने अपना मुँह बन्द कर लिया—कहीं मरनेपर भी गंगाजल मुँहमें न चला जाय, मेरे तो मुखमें बस वही स्वातिबिन्दु हो। कितना ही कोई अपना हो, निजी हो, पर उसके भी प्रतिकूल आचरणपर एक दिन कोप आ ही जाता है। किंतु चातकको नहीं आता। किसीने कहा—‘चातक, अन्य उत्तम जल पियो, मैं अमृत आन दूँगा। क्यों स्वातिपर प्राण देते हो?’ तो उसने कहा—‘नहीं, मेरे लिये तो साक्षात् प्रेमद्रव भी तुच्छ है। मनुष्यकी तरह ढुलमुलपन्थी मैं नहीं हूँ। यहाँ तो यह अडिग-अडोल निश्चय है— स्वातिबिन्दु ही मिलेगा तो लेंगे, नहीं तो पत्थर, ओलाकी मारसे मर जायँगे।’ इतना ही नहीं, उसके मुँहसे मरते समय अन्तिम शब्द निकले—‘पुत्रो ! मेरा श्राद्ध भी गंगाजल आदि जलोंसे नहीं करना।’ वाह री दृढ़ता ! अपने प्रत्यक्ष भी न लिया और भविष्यके लिये भी वंशजोंको शिक्षा दे गया। इतना ही नहीं, किंतु मेरे वंशज भी ऐसा ही करें—यह भी निश्चित कर गया। यह है प्रेमतत्त्व। इन प्रेमी व्यक्तियोंके अखण्ड प्रेमसे ही इनका इतना यश फैला है। इसी प्रेमतत्त्वके सम्बन्धसे साधारण वस्तुमें भी मिठास— उत्तमता आ जाती है। इसके बिना अमृत भी फीका है। बस, यदि यह प्रेम नहीं तो कुछ नहीं। यदि श्रीव्रजांगनाएँ व्रजेश्वर श्रीश्यामसुन्दरको पपीहाकी तरह स्वातिका जल न समझकर साधारण जलस्थानीय समझतीं और ऐसी स्थितिमें दूसरेके भजन-सेवन करनेमें प्रवृत्त हो जातीं तो आज उनके इस महान् सौभाग्यका कोई प्रसंग ही न आता। पर इसके विपरीत उनका तो मन्तव्य ही यह है कि हमारे प्राणधन प्रेमी चाहे जैसे भी हों, हम तो उनसे ही प्रेम करेंगी—‘असुन्दरः सुन्दरशेखरो वा····’ वे अपने प्रेमीके गुण, दोष, महत्त्वके विषयमें कोई शर्त ही नहीं रखतीं; बस, केवल प्रेम करती हैं। चातककी तरह अपमानित होनेपर भी अपने लक्ष्यसे नहीं गिरतीं। क्योंकि—‘चातकु रटनि घटें घटि जाई।’ (रा०च०मा० २।२०५।४)—का उनका सिद्धान्त है। अजी! जिनपर जीवन वार डारा—सर्वस्व न्योछावर कर दिया, बदलेमें उनके प्रेम न करनेपर यदि उनसे वैराग्य हो जाय तो फिर कुछ स्वारस्य ही नहीं। स्वाद तो तभी; जब प्रेमीकी ओरसे शतधा-सहस्रधा अपमानित होनेपर भी चातकके जैसी रटन न घटे। प्रत्युत, उत्तरोत्तर रटन बढ़ती ही जाय, चाहे कितने ही तिरस्कार क्यों न हों। सुवर्णको जितना ही तपाया जायगा, जितना ही उसका निघर्षण-छेदन-ताप-ताड़न किया जायगा, उतना ही वह मूल्यवान् होगा। हमारा प्रेम कांचनकी तरह खरा होना चाहिये। आज प्रेम कम, बल्कि नहींके बराबर है और उसका दिखावा, ढिंढोरा ही सबसे ज्यादा है, पर यह है अपनेको धोखा देना ही। एक भक्त कहता है—हम प्रेम तो करें, पर यदि वे न जानें, तब करें; अथवा उनकी ओरसे अधिक-से-अधिक उपेक्षा, तिरस्कार, डाट-फटकार मिले, तब करें। ‘प्रेम कनक ही बात चढ़े····’ यह तो यहाँ शर्त ही नहीं थी कि वे प्रेम करें, वे सुन्दर हों, तब हम प्रेम करेंगे। यह है प्रेम चीज, यह जिसमें हो, वही धन्य है। मिसरी जैसी मीठी लगती है, ब्रह्म अथवा ब्रह्मस्थानीय श्रीकिशोर नटनागर प्रभु वैसे मीठे नहीं लगते, कटु लगते हैं। खेल-तमाशोंमें, उपन्यास- नाटकोंमें, थियेटर-सिनेमामें मन लगता है। दोषवश जैसे मिसरीमें मिठास नहीं प्रतीत होती, वैसे ही मायावश सर्वान्तरतम प्रियतम प्रभुमें मिठास नहीं प्रतीत