भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहोती, पर वास्तवमें मीठे वे ही हैं। वे प्रेमके योगसे ज्ञात होते हैं। प्रेमके बिना अचिन्त्य, अनन्त, अव्यक्त तत्त्व भी फीका लगता है, जो मधुरिमाका उद्गमस्थान है। प्रेमकी महिमासे सुतृप्त हुआ चातक अमृत भी नहीं चाहता। इसलिये श्रीव्रजांगना प्रेम चाहती है, आदर नहीं। प्रेम होनेसे ही परमानन्दकी प्राप्ति होती है। कंस आदिने भी प्रभु श्रीकृष्णका दर्शन किया, पर आनन्द—मिठास—उन्हें अनुभूत नहीं हुई, क्योंकि वहाँ प्रेम नहीं था। अतः ये गोपरामा प्रेमकी भिक्षा माँगती हैं। जहाँ प्रेम मिला कि प्रेमोन्माद हुआ, वहाँ संयोगमें भी वियोगकी उच्च दशाका उदय हो जाता है। अतः रासेश्वरीकी, प्रेमकी और प्रिय सम्मेलनकी उत्कट इच्छा रहती है—प्रेम, प्रियतम दोनों मिलें। ऐसे ही श्रीश्यामसुन्दर भी दोनों चाहते हैं। जिस प्रेमसिन्धुकी ये दोनों—श्रीश्यामाश्याम पूतरी हैं, उसीसे प्रेम बना। इन दोनोंहीके भीतर प्रेम भी और प्रियतम भी हैं। इधर श्रीरासेश्वरीके स्वरूपमें प्रेम, प्रियतम विराजमान हैं, उधर श्रीरसिकविहारीमें भी ऐसे ही प्रेम, प्रियतम इसकी भिक्षा माँगते हैं। दोनों विराजमान हैं। फिर भी दोनों भीतर-बाहर एक हैं। बरफ-पूतरीकी तरह प्रेम, प्रियतम एक ही प्रेमसिन्धुसे निकले हैं, एकत्र ही स्थित हैं। फिर भी 'रटत पियास पियास'—'हा प्राणजीवन ! कब मिलोगे?' यह प्रेमोन्मादकी स्थिति है। असली वस्तु प्रेमोन्मादको उत्पन्न करके विप्रयोगमें संयोग भावनाका हो जाना है। परंतु इसके बिना संयोगमें वियोग प्रतीत न हो जाय, इसलिये श्रीभगवान्ने 'गत्यानुराग- स्मितविभ्रमेक्षितैः' (श्रीमद्भा० १०।३०।२)-से संत्राण करनेके लिये यह प्रेमोन्माद प्रदान किया। एक और भी अर्थ है—भगवान्को गोपवामाओंके सन्त्राणकी परवाह क्यों करनी थी ? जबकि वे आप्तकाम, आत्माराम हैं ? उन्हें तो चातकके सामने जलदकी तरह ही डटे रहना चाहिये था। आप्तकाम पूर्णकाम भी लीलास्वादनमें तत्पर रहते हैं इसपर यह समझना कि—'रमापतेः आक्षिप्त- चित्ताः' अर्थात् रमापति मनमोहनके चित्तको भी अपनी गति आदिसे गोपियोंने आक्षिप्त कर लिया, हर लिया। गति या अनुराग, स्मित, विभ्रम, ईक्षित कटाक्षादि, मनोरम आलस्य, विलास आदिद्वारा श्रीकृष्णको गोपांगनाओंने अपने वशमें कर लिया। अतः उनकी पूर्णकामता भुला गयी। थे तो ये पूर्णकाम ही, पर जब गोपांगनाओंके अपांगोंसे मन खो बैठे, तब इधर इनपर ध्यान आया और तब प्रेमोन्मादकी स्थिति उत्पन्न की, वे तो थे नीरस, पूर्णकाम, उन्हें सकाम और सरस बनाया सखियोंने। ठीक है, माधुर्यके बिना मिसरीका मूल्य ही क्या ? 'राधा बिन आधा कृष्ण ?' एक विशेषता यह भी कि पूर्णकामके भक्त श्रीआत्माराम, पूर्णकाम, परम निष्काम होते हैं। परंतु लीलास्वादनमें तो ये बड़े तत्पर देखे जाते हैं। देखिये, श्रीगोस्वामीजी कह रहे हैं—'आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं।।' (रा०च०मा० ७।३२।६) उन निष्कामोंमें सकामता ला देनेवाले वे श्रीहरि इस प्रकारके गुणवाले हैं, इसमें उन भक्तोंका कोई दोष नहीं। कहा है— आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥ × × × नैर्गुण्यस्था रमन्ते स्म गुणानुकथने हरेः ॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०; २।१।७) अहैतुकी भक्ति चुम्बककी तरह बलात् उन्हें खींच लेती है। श्रीभगवान्में आत्मारामचित्ताकर्षकत्व भी एक गुण है। श्रीसनकादि, शुकादि 'निर्ग्रन्थ' थे, उनकी चित्-अचित्की ग्रन्थि—चिज्जडग्रन्थि खुल गयी थी। 'पलालमिव धान्यार्थी' की तरह वे सारग्रहण कर चुके थे, सब मर्मज्ञ थे, शास्त्ररहस्य जानकर सब कुछ छोड़ बैठे थे, मोक्षतक नहीं चाहते थे, पर फिर भी उस बाँकिविहारी मनोहारीके लोकोत्तररूपलावण्यपर उनका चित्त बरबस लुभा जाता था। किसीकी बड़ी सुन्दर सूक्ति है— क्लेशे क्रमात् पञ्चविधे क्षयङ्गते यद्ब्रह्मसौख्यं स्वयमस्फुरत्परम्। तद् व्यर्थयन् कः पुरतो नराकृतिः श्यामोऽयमामोदभरः प्रकाशते ॥