भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
सब बल-धन, विद्या, सौन्दर्य आदिको छोड़कर श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्द नन्दनन्दनको ही जिसने अपना सर्वोपरि बल बनाया, वही अभिन्न होता है। तभी तो उन अबला-व्रजबालामें अभेद हुआ। तभी उन्होंने कहा—'असावहम्', अथवा 'अः—वासुदेवः बलम्-प्राणा यासान्ताः'। अर्थात् बलका भी मूल है प्राण, भगवान् वासुदेव ही जिनके प्राण हैं, वे व्रजांगनाएँ 'अबला' हुईं। इस तरह श्रीकृष्णके अनुकूल और श्रीकृष्णके ही आधारपर कायिकी, वाचनिकी एवं मानसी समस्त चेष्टावाली व्रजदेवियाँ 'अबला' ठहरीं। जिनके भगवान् वासुदेव ही मन, बुद्धि, अन्तर्रात्मा, रोम-रोमके सर्वस्व हैं, उन व्रजबालाओंको उनके बिना, प्राणस्थानीय उनके बिना, कैसी अन्य अवधानता ? अतः सर्वत्र उनका अवलोकन करती कहती हैं—'मैं कृष्ण हूँ'। यह स्थिति वेश-भूषा आदिसे भी अनुकरण करा देती हैं। रसके उद्रेकमें नायिका नायककी लीलाका अनुकरण करती है। यही स्थिति 'मधुरिपुरहमिति भावनशीला' इस रसिकेन्द्रचूड़ामणि श्रीजयदेवके गीतमें पायी जाती है। एक बार श्रीराधा प्रतीक्षा कर रही थीं—बाट जोह रही थीं, अपने प्राणधन त्रिभुवनमोहन मुरलीमनोहरकी। उसी समय उन्हें एक विशिष्ट अवस्थामें 'मधुरिपुरहम्' का अनुसन्धान हो आया। यह भावनाका फल है। वस्तुतः यहाँ तो इन व्रजमहिलाओंके बाहर-भीतर श्रीसाँवरिया गिरिधारी ही विराजमान हैं। अतः यहाँ तो यह व्यवहार स्वाभाविक है। श्रीराधा और श्रीकृष्ण एक ही हैं, दो हैं ही नहीं। कल्पना करो—दो शीशी हैं, एक श्याम, एक गौर। श्याम शीशीमें गौर रस भरा है और गौर शीशीमें श्याम रस भरपूर है। श्रीराधा रसमयी गौर शीशी हैं, वह काँचकी नहीं, रसकी ही बनी है। वैजात्यकी यहाँ कल्पना ही नहीं। उसमें शामरस भरपूर है। ऐसे ही श्रीकृष्ण श्याम शीशी हैं। अतः उभय उभयभावात्मा, उभय उभयरसात्मा हैं। यहाँ कुछ व्रजांगनाएँ राधांशभूता हैं। अंश भी बहुत ही स्वल्प है। राजराजेश्वरी श्रीरासेश्वरी राधाके पादारविन्दकी नखमणिज्योत्स्नाकी छटाका एक स्वल्पभाग, तद्भूता व्रजांगना तद्रूप होनेके नाते अपनेको अभिन्न मानती हैं। इस प्रकार भावनासे भी अभेद होता है। वस्त्राभरणसे भी व्रजांगनाएँ अपनेको श्यामाभिन्न समझती हैं। उन्होंने जो नील निचोल पहना है, वक्षोजमें जो मृगमद लेपा है, वह सब श्याम ही है। भीतर-बाहर श्याम-ही- श्याम है। किसी भावस्निग्धका बड़ा ही सुन्दर सूक्त है— श्रवसोः कुवलयमक्ष्णोरञ्जनमुरसो महेन्द्रमणिदाम । वृन्दावनतरुणीनां मण्डनमखिलं हरिर्जयति ॥ व्रजबालाओंने अपने कानोंमें नीलकमलके 'कर्णफूल', नेत्रोंमें अंजन और हृदयमें नीलवर्णकी महेन्द्रमणिका हार पहना है। लोग समझेंगे, उन्होंने इन वस्तुओंसे अपना श्रृंगार किया है। पर बात ऐसी नहीं। उन्होंने इन श्यामवर्णकी वस्तुओंको धारण करके प्राणधन श्यामसुन्दरको ही धारण किया है। उनका तो अखिल मण्डन-समस्त श्रृंगार-एकमात्र 'श्रीहरि' ही हैं। वे इन सोने-चाँदीके, कंकड़-पत्थरके भूषणोंको नहीं पहनतीं। अपने कानोंमें उन्होंने जिस श्यामसरोरुहको सजाया है, वह साधारण सरोरुह नहीं, अपितु पूर्णानुरागरससारसमुद्भूत है। कमलका नाम पंकज है, वह पंक-कीचड़से उत्पन्न होता है, पर जिस पंकजको उन्होंने धारण किया है, वह साधारण मिट्टीकी कीचमें नहीं उपजा, वह पूर्णानुरागदुग्धसरोवरकी कीचमें उपजा है। जब सरोवर दूधका, तब उसकी कीच नवनीत (मक्खन)-की होगी। जब भूपंकज लोकातिशायी सौन्दर्य-सौगन्ध्य-सम्पन्न होता है, तब पूर्णानुरागरससार-समुद्भूत सरसिजके सौरभादिकी कीमत कौन आँके ? ऐसे ही व्रजबालाओंने यह साधारण करिखा आँखोंमें नहीं लगाया, अपितु उस सौन्दर्यसुधाजलनिधि श्रीघनश्यामको ही सदाके लिये अपने नेत्र-निकुंजमें निवास दिया है। श्रीगोसाईंजीने भी ग्रामवधूटियोंकी उक्तिमें कहा है— जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं ॥ (रा०च०मा० २।१२१।५) उन ग्रामवधूटियोंकी तो यह वासनामात्र थी कि यदि हमें ब्रह्मा वर देनेको प्रस्तुत हों तो हम यह वर माँगैं कि इन भगवान् श्रीरामको अपने नेत्रोंमें पधराकर
श्रीरासपञ्चाध्यायी ३५१ रखें, पर इन व्रजवधूटियोंने तो यह साक्षात् ही कर दिखाया अथवा श्रीकृष्णपाद-पद्मपरागको ही इन्होंने अंजन बनाया। इस प्रकार व्रजवनिताएँ अपनेको श्रीश्यामसुन्दरसे ही भूषित करती थीं। उनकी दृष्टिमें इसके अतिरिक्त किसी भी आभूषणको पहनना अत्यन्त ही हेय है। जैसा कि एक स्थलमें उनकी स्पष्ट उक्ति है— ईदृशा पुरुषभूषणेन या भूषयन्ति हृदयं न सुभ्रुवः। धिक् तदीयकुलशीलयौवनं धिक् तदीयगुणरूपसम्पदः॥ ऐसे सिद्धान्तवाली व्रजांगनाओंने बाहर-भीतर सर्वत्र श्रीश्यामसुन्दर प्राणधनको ही धारण किया। इस प्रकारका तादात्म्य श्रीगोपांगनाओंको हुआ। अन्यत्र तादात्म्य आरोपित होता है, परंतु यहाँ नहीं। अतः श्रीश्यामसुन्दर भगवान्की गति, स्मित, प्रेक्षण, भाषण आदि श्रीव्रजवनिताओंमें और व्रजवनिताओंके मन, बुद्धि आदि श्रीश्यामसुन्दर भगवान्में आरूढ हुए। भगवान् श्रीकृष्णके साथ यों अभिन्नभावसे उनकी रसमयी कायिकी-वाचनिकी-मानसी लीलासे, विहारसे उनमें जो विभ्रम उत्पन्न हुए, वे सब व्रजदेवियोंमें उत्पन्न हुए। श्रीनवलकिशोरकी सभी चेष्टा—गति, भाषण, दर्शन आदि—जो-जो थीं, सब इन व्रजांगनाजनमें प्रस्फुटित हुईं। इतना ही नहीं, बल्कि इतनी ऐक्यापत्ति हुई कि इन व्रजरमणियोंकी लीलासे श्रीराधाविहारीका विभ्रम हुआ—'श्रीकृष्णविहारस्य विभ्रमो याभ्यः।' अनुकरण पूरा उतरा, सर्वथा तन्मयता अथवा लीलाओंने गोपरामाओंको बलात् गृहीत किया। यों 'गतिस्मित' इत्यादि संगत हुआ। यहाँ एक भाव यह भी है—श्रीवल्लभाचार्यजीने अणुभाष्यमें कहा है—किसी भावुकके चिन्तनसे जो अभेद होता है, यह एक संचारीभाव है। इसमें तीन अवस्थाएँ होती हैं। यहाँ 'छान्दोग्योपनिषद्' का यह प्रसंग उदाहरण है—'अहमेव पुरस्तात्' इत्यादि अर्थात् पहले भावुकको जगत्की और अपनी भी विस्मृति हो जाती है। फिर केवल अपनी ही स्मृति रहती है—'अहमेव पुरस्तात् दक्षिणतश्चोत्तरेण' वह सम्पूर्ण विश्वमें अपना ही अस्तित्व देखता है। दूसरी स्थितिमें वह भगवान्को ही सर्वत्र देखता है— 'भूमैव पुरस्तात्, भूमैव'। अन्तमें तीसरी स्थिति— 'अहमेव पुरस्तात्' या 'आत्मैवोपरिष्टात्' की होती है अर्थात् मैं ही अथवा आत्मा ही सर्वत्र भरपूर है, यह भावुक ज्ञानीको अन्तिम निश्चय होता है। भगवान्ने कहा है— मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये। मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ ॥ (श्रीमद्भा० ३।२९।११) मेरे गुणोंके श्रवण करनेसे—मेरी लीलासे भावुकके चित्तकी सर्वाधिष्ठान मुझमें गति होती है। जैसे गंगाका जल समुद्रमें जाता है, भावुकका चित्त वैसे मेरी ओर प्रवाहित होता है। भावुकके द्रुत चित्तकी यह स्थिति है। चित्तकी द्रुतता उसकी निर्मलतापर निर्भर है। 'भक्तिरसायन' में कहा है—जलके प्रधान स्थान 'टंकी' आदिमें रंग छोड़नेसे वह जहाँ-जहाँ स्पष्ट होगा—अपनेमें रँग लेगा। जहाँ-जहाँ वह रंगीन जल निकलेगा—कल आदिके द्वारा—वहाँ वह जिस- जिसपर पड़ेगा—अपने रंगमें मिला लेगा। सभीका बाह्य और आभ्यन्तर दर्शन-ग्रहण अन्तःकरणसे ही होता है। वह यदि लाक्षाकी तरह या 'टंकी' के सदृश श्याम रंगमें रँगा है तो अब जो भी उससे गृहीत होगा चाहे वह आन्तर, बाह्य, पुरस्तात्, उपरिष्टात्, हरित, पीत कैसा भी हो—उस रंगमें रँगा जाकर ही गृहीत होगा। अतः श्रीश्यामसुन्दर भगवान्को अपने हृत्पुण्डरीकपर विराजित करके व्रजांगना सब कुछ श्याममय ही देखती हैं—'जित देखो तित स्याममई है।' व्रजांगना अपने मनमें विचारती हैं—'ये लोग बावरे हैं या हम ही बावरी हैं, इन लोगोंके नेत्रमें विकार हो गया है या हम ही किसी नेत्ररोगसे ग्रस्त हो गयी हैं! क्योंकि लोग हरे, पीले, लाल कई रंग बतलाते हैं, पर हमें तो सर्वत्र श्याम-ही-श्याम दीख पड़ रहा है।' इस स्थितिमें—'भूमैवाधस्तात् भूमैवोपरिष्टात्····' की प्रतीति होती है। जब भूमाका पार्थक्य नहीं प्रतीत होता, तब 'अहमेव पुरस्तादहमेवो- परिष्टादहमेव दक्षिणतश्चोत्तरेण' की ही सर्वत्र
३५२ भक्तिसुधा प्रतीति होती है। इसी प्रकार तदवस्थापन्न व्रजांगना 'जैसी श्यामकी सब लीला, वैसी ही हमारी सब लीला' ऐसा समझती हैं। इस रूपसे अपनेको श्यामाभिन्न समझकर कहती हैं—'मैं ही श्याम हूँ।' जिनमें कृष्ण-विहार-विभ्रमा ('कृष्णाय विहारेण विभ्रमो यासु') की वस्तुस्थिति है, उनकी यह बात है, अन्योंकी नहीं। सभी तो श्रीराधांश- समुद्भूता नहीं। जो हैं, उनमें ऐसा विभ्रम हुआ। मूल श्लोकमें 'न्यवेदिषुः' बहुवचन है। इसका यह अभिप्राय है कि सम्पूर्ण—अपरिगणित कोटि व्रजांगनाओंको विभ्रम हुआ। सबने अपनेको कृष्ण समझा। विशेषता यह थी कि सभी अपनेको कृष्ण समझती हैं, पर अन्योंको 'मैं कृष्ण हूँ' ऐसे भ्रमसे युक्त समझती हैं तथा च समझाती हैं—'सखि, हम तो तुम्हारे पास ही हैं, हमारे विप्रयोगसे तुम क्यों इतनी म्लान हो रही हो?' इसपर समझायी जानेवाली सखी समझानेवालीसे कहती है—'सखि, तुम तो सखी हो, कृष्ण नहीं।' तब वह उत्तरमें कहती है—'नहीं, तुम तो सखी हो, मैं तो कृष्ण हूँ।' यों वे एक-दूसरेको समझाती हैं और अपनेको सब श्रीकृष्ण समझती हैं तथा दूसरीको सब सखी जानती हैं। इस प्रकार वे व्रजांगना विभ्रमान्वित हुईं। यहाँ एक यह भी प्रश्न उठता है कि श्रीश्यामसुन्दर भगवान्के विहारसे इन्हें यह विभ्रम हुआ है, अथवा शृंगाररसाक्रान्ततावश अपने चित्तकी अनवस्थितिसे उन्हें यह भावना हुई कि—'हम कृष्ण हैं।' इसपर यही समझना चाहिये कि अधिकारानुसार पात्रोंमें भावनाकी उद्भूति होती है। इनमें किसीको श्रीकृष्ण-विहार-विभ्रमसे तो किसीको शृंगाराक्रान्ततासे विभ्रम हुआ। बाकी विभ्रम सबको हुआ—'मैं ही कृष्ण हूँ।' 'अन्तर्हिते भगवति सहसैव व्रजाङ्गनाः। अतप्यंस्तमचक्षाणाः'''' ॥' गोपरामाओंका प्रेमोन्माद भगवान् श्रीकृष्णके अन्तर्हित होनेपर गोपरामा बहुत विह्वल हुईं। उनका चित्त अपने प्राणधनकी गति, अद्भुत अनुराग, काममदभंजक स्मित, आकर्षक विभ्रम, मनोरमालापसे उनमें सर्वदाके लिये आकृष्ट हो गया। भगवान्ने अपने इन स्वाभाविक गति, स्मित आदिसे बलात् उनके चित्तको अपनेमें खींच लिया। प्राणवियोगमें मरण होता है। श्रीकृष्ण तो प्राणोंके भी प्राण हैं, फिर उनके वियोगमें ब्रजसुन्दरियोंका जीवन कैसे रहा, यही अचरज है। उस समय उनके लिये परमाह्लादकर शारद पूर्णचन्द्र भी सूर्यके यद्वा प्रलयकालीन तीव्र सूर्योंके सदृश परम तापक हुआ। प्रलयकालमें नीचेसे संकर्षण-ज्वाला उठती है, ऊपरसे त्रयोदश प्रचण्ड चण्डांशु तपते हैं। शारद पूर्णचन्द्र शीतल, कोमल, मधुर, आह्लादकर होता है। परंतु यही वियोगियोंके लिये उक्त प्रलयकालीन संकर्षण-ज्वाला, त्रयोदशादित्यके सदृश परम सन्तापक होता है। ब्रजवामाओंके लिये श्रीकृष्णचन्द्ररूप पूर्णचन्द्रके वियोगमें प्रलय-सा उपस्थित हो गया। निश्चय था कि शीघ्र ही उनके प्राणपखेरू उड़ जाते। इस सन्ताप-स्थितिको दूर करनेके लिये ही श्रीरमापतिने अपनी गति आदिसे उनके चित्तको अपनेमें आकृष्ट कर लिया; क्योंकि चित्त रहे तो देहानुसन्धान हो। भगवान्ने गोपरामाओंको सन्ताप- सूर्यसे बचानेके लिये ही अपने गत्यादिसे उनके चित्तको खींच लिया, अतएव 'आक्षिप्तचित्ताः प्रमदाः' (श्रीमद्भा० १०।३०।२) कहा गया। अथवा 'आक्षिप्तचित्ताः प्रमदाः' का अर्थ है—अपने प्राणधन श्यामधनको ढूँढ़नेके लिये व्रजरामाओंने अपने मनको प्रोत्साहन देकर निकाल दिया कि 'हे मन! प्राणधन प्रियतमका पता नहीं और तुम यहाँ इस वियोगमें शान्तिसे बैठे हो, जाओ उनका पता लो।' यों तिरस्कारपूर्वक चित्तको निकाल दिया, फेंक दिया। इस तरह आक्षिप्तचित्तता बनी। जब चित्त ही नहीं, तब तापका अनुभव कैसा? व्रजबालाएँ श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दघनको प्राप्त करके 'प्रमदा' बनी हैं। उन्हें अपने इस प्रमदात्व-हर्षप्रकर्ष अथवा मद- प्रकर्षके कारण अपने इन्द्रियज्ञानतकका पता नहीं। वे प्रेमोन्मादमें, संयोगमें भी ऐसी वियोगकी भावना किया करती हैं। वैसे तो उन्हें रोम-रोममें श्रीकृष्णसंयोग प्राप्त है। अतः यह प्रेमोन्मादमें वियोग-भावना है। वे तो इस प्रकारसे प्रियमय ही हैं, केवल 'बरफ-पूतरी सिन्धुविच रटत पियास पियास' की स्थिति है।
श्रीरासपंचाध्यायी ३५३ बरफकी पूतरीके भीतर, बाहर, मध्यमें जल-ही-जल है। वह स्वयं भी जल ही है। इसी प्रकार श्रीप्रिया- प्रियतमको परस्परमें सदा प्रेमकी भूख रहती है— 'हाय! प्रेम नहीं मिला' और वे हैं स्वयं प्रियतमप्रेमके स्थान। सूर्यका प्रकाश अन्यत्र पर्वतादिमें कभी होने और कभी नहीं होनेसे व्यभिचरित है, पर सूर्यमें वह सदा रहता है। प्रेम और प्रेमीकी जाति अलग है, पर यहाँ तो दोनों एक ही हैं। पूतरी जलमें पड़ी है, पर प्यासी मरती है, मानो अनादिकालसे जल नहीं मिला। यही प्रिया-प्रियतमकी स्थिति है। यह अचिन्त्य, अनन्त, अखण्ड, अव्यक्त, प्रत्यक्चैतन्याभिन्न तत्त्वकी बनी पूतरी है। अनेक शब्दोंमें कह सकते हैं— प्रेमामृतसिन्धु, अचिन्त्यरसामृतसिन्धु, पूर्णानुराग- रससारसिन्धुसे दो पूतरी निकलीं—श्रीराधा, श्रीश्याम। अब इनके बाहर-भीतर सर्वत्र वही प्रेमामृत आदि तत्त्व है। वहाँ प्रेम स्थायी है, जैसे सूर्यमें प्रकाश नित्य है। प्रेमानन्दमहासूर्यमें कभी भी प्रेमका अभाव नहीं हो सकता। अपने स्वरूपके पूर्ण ज्ञानमें पूतरीको प्यास ही कैसी? पर प्रेमोन्मादकी स्थिति है—'मैं प्यासी हूँ।' पूतरीकी तरह प्रिया-प्रियतम दोनों उस प्रेमसिन्धुमें हैं। अनन्तानन्त-अनुराग होनेपर भी उसके लिये दोनों अधीर रहते हैं। 'इनके मिलनेके मूल्यका कण भी हमारे पास नहीं' यही भाव, यही प्यास दोनोंको सदा तड़फड़ाती रहती है। सूर्यसे प्रकाश कभी जाता ही नहीं। पूतरीसे जल कभी जाता नहीं। वैसे ही प्रेम जिनमें सदा, नित्य रहता है, उन श्रीश्यामाश्यामको सदा यही भावना रहती है कि कब प्रेमकण मिले। वे सदा प्रेमको चाहा करते हैं, उसके लिये विकल रहते हैं, पर उन्मादमें, अत्यन्त संयोगमें सर्वांगीण सम्प्रयोगके होने तथा रहनेपर भी उसकी प्राप्तिकी महती आकांक्षा बनी ही रहती है। उसके प्राप्त होनेपर प्रेमोन्मादमें उसे भूल जाते हैं। प्रेमोन्मादमूलक दो आकांक्षाएँ प्रणयीकी होती हैं—एक प्रियतमके सम्मिलनकी अभिलाषा और दूसरी संयोगमूलक अनुरागकी उत्कण्ठा। प्रेमीकी स्थिति कुछ विचित्र रही है, वह भजन करनेकी अपेक्षा प्रेम करना ही उत्तम समझता है। प्रयत्न नहीं करनेपर भी प्रेम प्राप्त करनेको तैयार रहता है। किसी भी तरह प्रियतम मिले, यही उसका ध्येय रहता है। प्रेममें गुण-दोषकी परीक्षा या विवेकको स्थान नहीं है प्रेममें गुण-दोषकी परीक्षाको या विवेकको स्थान नहीं है। कहा है— महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुनधाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥ (रा०च०मा० १।८०) श्रीअम्बा पार्वती श्रीशिवप्राप्तिके निमित्त तप कर रही थीं। उसी प्रसंगपर सप्तर्षि उनके पास गये। परीक्षाके निमित्त भगवान् शिवकी उनके सामने निन्दा की, पर श्रीपार्वती अटल निश्चय लेकर बैठी थी। वह कोई बालूकी भित्ति न थी, जो फूँकसे उड़ जाती। उन्होंने अन्तमें स्पष्ट कह दिया—'हमने माना कि महादेव अवगुण—दोषके घर हैं और विष्णु सब गुणोंके स्थान, पर जिसका मन जहाँ रम गया, उसे तो उसीसे काम है।' उसे गुण-दोष देखनेका समय ही कहाँ? ऐसे ही श्रीव्रजांगनाएँ श्रीकृष्णसे प्रेम करती हैं। उन्हें यह ज्ञान ही नहीं कि उनके प्रेमास्पद सुन्दर हैं या असुन्दर, गुणी हैं या निर्गुणी। वे इन सब बातोंको कुछ नहीं जानतीं, केवल प्रेम करना जानती हैं। किसी भक्तकी सूक्ति है— असुन्दरः सुन्दरशेखरो वा गुणैर्विहीनो गुणिनां वरो वा। द्वेषी मयि स्यात् करुणाम्बुधिर्वा कृष्णः स एवाद्य गतिर्ममास्तु॥ हमारे प्रियतम चाहे सुन्दरोंके सरताज हों, चाहे गुणगणसे विहीन हों, चाहे वे मनमोहन हमसे प्रेम करें, चाहे न करें, चाहे वे हमपर प्रसन्न हों, चाहे नाराज, पर हमारे तो वे ही प्राणधन हैं, सर्वस्व हैं। जहाँ प्रेमियोंकी गणना चलेगी, वहाँ एक प्रेमी चातक भी गिना जायगा। प्रेमियोंके पारखी श्रीगोस्वामीजी कहते हैं—'जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ॥' (रा०च०मा० २।२०५।३) प्रेमी स्वातिबिन्दु माँगता है और प्राणधन मेघ ओला-पत्थर बरसाता है, परंतु चातक
३५४ भक्तिसुधा कभी उसकी इस निष्ठुरताको मनमें भी नहीं लाता। मेघ कभी उसे वर्षभरमें भी याद नहीं करता, कभी ध्यानपर भी नहीं लाता। एक तरफ यह हाल है और दूसरी ओर प्रेमी एकाध वस्तु नहीं, अपितु अपना सर्वस्व वार डालनेको तैयार है। गंगाजल, यमुनाजल, साक्षात् सुधा भी चातकको नहीं चाहिये। उसको तो वही एक, केवल एक ही, स्वातिबिन्दु चाहिये। प्रेमकी दृढ़ताका एक दृष्टान्त गंगाके तटपर एक वृक्ष था। उसकी एक शाखा गंगामें लटक रही थी। चातक-पक्षिराज अपने प्राण- जीवनकी चिन्तामें उसी शाखापर बैठा था। इसी समय पीछेसे एक बहेलियाने तीर मारा। निशाना सच्चा बैठा, उसके प्राणपखेरू उड़ गये, वह हवाके झोंकेसे गंगामें गिर पड़ा। परंतु अन्तमें मरते समय भी उसका नियम नहीं टूटा, स्वभावसे ही उसने अपना मुँह बन्द कर लिया—कहीं मरनेपर भी गंगाजल मुँहमें न चला जाय, मेरे तो मुखमें बस वही स्वातिबिन्दु हो। कितना ही कोई अपना हो, निजी हो, पर उसके भी प्रतिकूल आचरणपर एक दिन कोप आ ही जाता है। किंतु चातकको नहीं आता। किसीने कहा—‘चातक, अन्य उत्तम जल पियो, मैं अमृत आन दूँगा। क्यों स्वातिपर प्राण देते हो?’ तो उसने कहा—‘नहीं, मेरे लिये तो साक्षात् प्रेमद्रव भी तुच्छ है। मनुष्यकी तरह ढुलमुलपन्थी मैं नहीं हूँ। यहाँ तो यह अडिग-अडोल निश्चय है— स्वातिबिन्दु ही मिलेगा तो लेंगे, नहीं तो पत्थर, ओलाकी मारसे मर जायँगे।’ इतना ही नहीं, उसके मुँहसे मरते समय अन्तिम शब्द निकले—‘पुत्रो ! मेरा श्राद्ध भी गंगाजल आदि जलोंसे नहीं करना।’ वाह री दृढ़ता ! अपने प्रत्यक्ष भी न लिया और भविष्यके लिये भी वंशजोंको शिक्षा दे गया। इतना ही नहीं, किंतु मेरे वंशज भी ऐसा ही करें—यह भी निश्चित कर गया। यह है प्रेमतत्त्व। इन प्रेमी व्यक्तियोंके अखण्ड प्रेमसे ही इनका इतना यश फैला है। इसी प्रेमतत्त्वके सम्बन्धसे साधारण वस्तुमें भी मिठास— उत्तमता आ जाती है। इसके बिना अमृत भी फीका है। बस, यदि यह प्रेम नहीं तो कुछ नहीं। यदि श्रीव्रजांगनाएँ व्रजेश्वर श्रीश्यामसुन्दरको पपीहाकी तरह स्वातिका जल न समझकर साधारण जलस्थानीय समझतीं और ऐसी स्थितिमें दूसरेके भजन-सेवन करनेमें प्रवृत्त हो जातीं तो आज उनके इस महान् सौभाग्यका कोई प्रसंग ही न आता। पर इसके विपरीत उनका तो मन्तव्य ही यह है कि हमारे प्राणधन प्रेमी चाहे जैसे भी हों, हम तो उनसे ही प्रेम करेंगी—‘असुन्दरः सुन्दरशेखरो वा····’ वे अपने प्रेमीके गुण, दोष, महत्त्वके विषयमें कोई शर्त ही नहीं रखतीं; बस, केवल प्रेम करती हैं। चातककी तरह अपमानित होनेपर भी अपने लक्ष्यसे नहीं गिरतीं। क्योंकि—‘चातकु रटनि घटें घटि जाई।’ (रा०च०मा० २।२०५।४)—का उनका सिद्धान्त है। अजी! जिनपर जीवन वार डारा—सर्वस्व न्योछावर कर दिया, बदलेमें उनके प्रेम न करनेपर यदि उनसे वैराग्य हो जाय तो फिर कुछ स्वारस्य ही नहीं। स्वाद तो तभी; जब प्रेमीकी ओरसे शतधा-सहस्रधा अपमानित होनेपर भी चातकके जैसी रटन न घटे। प्रत्युत, उत्तरोत्तर रटन बढ़ती ही जाय, चाहे कितने ही तिरस्कार क्यों न हों। सुवर्णको जितना ही तपाया जायगा, जितना ही उसका निघर्षण-छेदन-ताप-ताड़न किया जायगा, उतना ही वह मूल्यवान् होगा। हमारा प्रेम कांचनकी तरह खरा होना चाहिये। आज प्रेम कम, बल्कि नहींके बराबर है और उसका दिखावा, ढिंढोरा ही सबसे ज्यादा है, पर यह है अपनेको धोखा देना ही। एक भक्त कहता है—हम प्रेम तो करें, पर यदि वे न जानें, तब करें; अथवा उनकी ओरसे अधिक-से-अधिक उपेक्षा, तिरस्कार, डाट-फटकार मिले, तब करें। ‘प्रेम कनक ही बात चढ़े····’ यह तो यहाँ शर्त ही नहीं थी कि वे प्रेम करें, वे सुन्दर हों, तब हम प्रेम करेंगे। यह है प्रेम चीज, यह जिसमें हो, वही धन्य है। मिसरी जैसी मीठी लगती है, ब्रह्म अथवा ब्रह्मस्थानीय श्रीकिशोर नटनागर प्रभु वैसे मीठे नहीं लगते, कटु लगते हैं। खेल-तमाशोंमें, उपन्यास- नाटकोंमें, थियेटर-सिनेमामें मन लगता है। दोषवश जैसे मिसरीमें मिठास नहीं प्रतीत होती, वैसे ही मायावश सर्वान्तरतम प्रियतम प्रभुमें मिठास नहीं प्रतीत
होती, पर वास्तवमें मीठे वे ही हैं। वे प्रेमके योगसे ज्ञात होते हैं। प्रेमके बिना अचिन्त्य, अनन्त, अव्यक्त तत्त्व भी फीका लगता है, जो मधुरिमाका उद्गमस्थान है। प्रेमकी महिमासे सुतृप्त हुआ चातक अमृत भी नहीं चाहता। इसलिये श्रीव्रजांगना प्रेम चाहती है, आदर नहीं। प्रेम होनेसे ही परमानन्दकी प्राप्ति होती है। कंस आदिने भी प्रभु श्रीकृष्णका दर्शन किया, पर आनन्द—मिठास—उन्हें अनुभूत नहीं हुई, क्योंकि वहाँ प्रेम नहीं था। अतः ये गोपरामा प्रेमकी भिक्षा माँगती हैं। जहाँ प्रेम मिला कि प्रेमोन्माद हुआ, वहाँ संयोगमें भी वियोगकी उच्च दशाका उदय हो जाता है। अतः रासेश्वरीकी, प्रेमकी और प्रिय सम्मेलनकी उत्कट इच्छा रहती है—प्रेम, प्रियतम दोनों मिलें। ऐसे ही श्रीश्यामसुन्दर भी दोनों चाहते हैं। जिस प्रेमसिन्धुकी ये दोनों—श्रीश्यामाश्याम पूतरी हैं, उसीसे प्रेम बना। इन दोनोंहीके भीतर प्रेम भी और प्रियतम भी हैं। इधर श्रीरासेश्वरीके स्वरूपमें प्रेम, प्रियतम विराजमान हैं, उधर श्रीरसिकविहारीमें भी ऐसे ही प्रेम, प्रियतम इसकी भिक्षा माँगते हैं। दोनों विराजमान हैं। फिर भी दोनों भीतर-बाहर एक हैं। बरफ-पूतरीकी तरह प्रेम, प्रियतम एक ही प्रेमसिन्धुसे निकले हैं, एकत्र ही स्थित हैं। फिर भी 'रटत पियास पियास'—'हा प्राणजीवन ! कब मिलोगे?' यह प्रेमोन्मादकी स्थिति है। असली वस्तु प्रेमोन्मादको उत्पन्न करके विप्रयोगमें संयोग भावनाका हो जाना है। परंतु इसके बिना संयोगमें वियोग प्रतीत न हो जाय, इसलिये श्रीभगवान्ने 'गत्यानुराग- स्मितविभ्रमेक्षितैः' (श्रीमद्भा० १०।३०।२)-से संत्राण करनेके लिये यह प्रेमोन्माद प्रदान किया। एक और भी अर्थ है—भगवान्को गोपवामाओंके सन्त्राणकी परवाह क्यों करनी थी ? जबकि वे आप्तकाम, आत्माराम हैं ? उन्हें तो चातकके सामने जलदकी तरह ही डटे रहना चाहिये था। आप्तकाम पूर्णकाम भी लीलास्वादनमें तत्पर रहते हैं इसपर यह समझना कि—'रमापतेः आक्षिप्त- चित्ताः' अर्थात् रमापति मनमोहनके चित्तको भी अपनी गति आदिसे गोपियोंने आक्षिप्त कर लिया, हर लिया। गति या अनुराग, स्मित, विभ्रम, ईक्षित कटाक्षादि, मनोरम आलस्य, विलास आदिद्वारा श्रीकृष्णको गोपांगनाओंने अपने वशमें कर लिया। अतः उनकी पूर्णकामता भुला गयी। थे तो ये पूर्णकाम ही, पर जब गोपांगनाओंके अपांगोंसे मन खो बैठे, तब इधर इनपर ध्यान आया और तब प्रेमोन्मादकी स्थिति उत्पन्न की, वे तो थे नीरस, पूर्णकाम, उन्हें सकाम और सरस बनाया सखियोंने। ठीक है, माधुर्यके बिना मिसरीका मूल्य ही क्या ? 'राधा बिन आधा कृष्ण ?' एक विशेषता यह भी कि पूर्णकामके भक्त श्रीआत्माराम, पूर्णकाम, परम निष्काम होते हैं। परंतु लीलास्वादनमें तो ये बड़े तत्पर देखे जाते हैं। देखिये, श्रीगोस्वामीजी कह रहे हैं—'आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं।।' (रा०च०मा० ७।३२।६) उन निष्कामोंमें सकामता ला देनेवाले वे श्रीहरि इस प्रकारके गुणवाले हैं, इसमें उन भक्तोंका कोई दोष नहीं। कहा है— आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥ × × × नैर्गुण्यस्था रमन्ते स्म गुणानुकथने हरेः ॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०; २।१।७) अहैतुकी भक्ति चुम्बककी तरह बलात् उन्हें खींच लेती है। श्रीभगवान्में आत्मारामचित्ताकर्षकत्व भी एक गुण है। श्रीसनकादि, शुकादि 'निर्ग्रन्थ' थे, उनकी चित्-अचित्की ग्रन्थि—चिज्जडग्रन्थि खुल गयी थी। 'पलालमिव धान्यार्थी' की तरह वे सारग्रहण कर चुके थे, सब मर्मज्ञ थे, शास्त्ररहस्य जानकर सब कुछ छोड़ बैठे थे, मोक्षतक नहीं चाहते थे, पर फिर भी उस बाँकिविहारी मनोहारीके लोकोत्तररूपलावण्यपर उनका चित्त बरबस लुभा जाता था। किसीकी बड़ी सुन्दर सूक्ति है— क्लेशे क्रमात् पञ्चविधे क्षयङ्गते यद्ब्रह्मसौख्यं स्वयमस्फुरत्परम्। तद् व्यर्थयन् कः पुरतो नराकृतिः श्यामोऽयमामोदभरः प्रकाशते ॥
३५६ भक्तिसुधा किन्हीं महापुरुषके पंचविध क्लेश—अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश क्षीण हो चुके थे, शान्त होकर पंचकोशातीतमें उनका मन लग गया। तत्त्वसाक्षात्कार उन्हें हो चुका था, उन्हें कहीं श्यामसुन्दरके दर्शन हो गये। अब प्रयत्न करते हैं, पर समाधि ही नहीं लगती। किसीने कहा है कि 'जौ लों तोहि नन्दको कुमार नाहीं दीठि परौ, तौ लौ ध्यान धारणा समाधि तू करि ले।' उसका दर्शन हो जानेके बाद चित्त खिंच जाता है, पर पवित्र अन्तःकरणवालोंका ही वहाँ खिंचाव होता है। जैसे चुम्बक स्वच्छ लोहेको जल्दी खींच लेता है, वैसे ही वह श्यामसुन्दर महात्माओंके चित्तको जल्दी खींच लेता है। उन्हें ज्ञात ही नहीं होता कि वे श्यामसुन्दरसे क्यों इतना प्रेम करते हैं? यह श्रीभगवान्में विराजमान चित्ताकर्षकत्व गुणका माहात्म्य है। यह तो हुई योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंकी बात, पर यहाँ इन गँवारी ग्वालिनियोंने तो इन योगीन्द्र-मुनीन्द्र मनोहारी श्रीभगवान्के भी मनको खींच लिया। उन्हें श्रीभगवान् होकर भी इन गोपरामाओंके साथ रमण करनेकी इच्छा हो गयी। भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः । वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१) यह तो मानना ही पड़ेगा कि सनकादि, शुकादि अन्य आत्मारामोंकी अपेक्षा श्रीभगवान्में अधिक आत्मारामत्व था, पर इन्हें कम आत्मारामत्ववाली अथवा जो आत्मारामत्वको जानतीं भी नहीं, उन गोपांगनाओंने इनके आत्मारामत्वको छीन लिया और इन्हें 'गोपीराम' या गोपीरमण बना दिया। निष्कामको सकाम बना दिया। पूर्णकामता आदि छिप गयी, मन गोपरामाओंमें खिंच गया। अब यह दशा हो रही है कि इनके पीछे-पीछे घूम रहे हैं। इस प्रकार 'आकृष्टचित्ता रमापतेः' के अर्थमें षष्ठी है। अतः यह अर्थ भी होता है कि श्रीरमापतिने राजहंस, गजराज और सिंहकी गतिको लज्जित करनेवाली गति, अनुराग, हास, अलसवलितादि विभ्रम तथा मनोरमालापसे व्रजांगनाओंके चित्तको खींच लिया; क्योंकि उन्होंने सोचा कि 'यदि चित्त इनके पास रहेगा तो ये हमारे विप्रयोगजन्य तीव्रतापमें सन्तप्त होंगी।' व्रजांगनाओंको 'प्रमदा' कहा गया। 'प्रकृष्टो मदो यासाम्' इस व्युत्पत्तिसे भाव यह कि दैहिक सब प्रपंच भूल गयीं, जिस मनके रहनेमें सन्ताप, वियोग होता है, उसे तो भगवान्ने पहले ही हर लिया। अब सुख-दुःख ही किसे हो? फिर श्रीभगवान्ने गोपांगनाओंमें प्रमद— मादक मद उत्पन्न किया, जिससे वियोगतापमें भी उन्हें संयोग प्रतीत हुआ, इससे वह वियोगजन्य तीव्रताप उनके अन्तरमें प्रविष्ट न हो सका। इतनेपर भी यदि श्रीमन्मोहनका विप्रयोग उन्हें बाधा पहुँचाये—तो ठीक नहीं। अतः 'तास्ता विचेष्टा जगृहुस्तदात्मिकाः ॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।२) तदात्मिकाका अर्थ है— 'स एव रक्षकत्वेन वर्तमानो
श्रीरासपंचाध्यायी ३५७ हे प्रिय ! आपके चरण अत्यन्त सुकोमल हैं, उनमें कमलकी पांखुरीके भी गड़ जानेका भय रहता है। आपके उन चरणोंको हृदयके तापको दूर करनेके लिये हम अपने स्तनोंमें—हृदयमें धारण करती हैं, पर नाथ ! हम डरती हैं—आपके कमलकोमल पादोंको कर्कश-कठोर स्तनोंमें कैसे धरें, कहीं वे उनमें गड़ न जायें। हे प्राणजीवन ! आप उन्हीं कोमल चरणोंसे कण्टकाकीर्ण अरण्योंमें घूमते हो, इससे हमें और भी व्यथा होती है। हमारे तो प्राणोंके भी प्राण, जीवन आप हो। 'आपको यों घूमते देखकर हमारी बुद्धि चकरा जाती है, हम क्या करें?' कितना ध्यान है, कितनी भावुकता है; क्या यह प्राकृत विषयलोलुप कामिनियोंको होगी ? फिर आध्यात्मिकादि ताप भी तभी दूर होंगे, जब प्रभु श्रीहरिके चरण हृदयमें निहित होंगे। बात यह है कि लौकिक कामुक-कामिनी आदिमें स्वसुखसुखित्वका भाव होता है, वे सब अपने सुखके लिये प्रेम करते हैं। लोकमें पिता आदि अपने आनन्दके लिये बालकके कोमल कपोलका चुम्बन करते हैं, उसे उनकी दाढ़ी चुभती है, वह रोता है, पर इसकी परवाह किसे रहती है? वहाँ तो चुम्बनकी बौछार (परम्परा) लग जाती है। इसलिये कहा है—'....आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति....' (बृहदारण्यक० २।४।५) किंतु श्रीव्रजांगनाओंके विषयमें यह बात नहीं है, यहाँ तो तत्सुखसुखित्वका भाव है। यह श्लोक लज्जाका स्थान नहीं, जैसा कि अनभिज्ञ कह बैठते हैं। अपितु श्रीव्रजदेवियोंके विशुद्ध, गाढ़ प्रेमसे आक्षिप्त हृदयका दर्पण है, उच्च भावुकताका केन्द्र है। वे कहती हैं—क्या करें, आपके चरण हृदयोंमें धरे बिना ताप दूर नहीं होगा—यह सभी शास्त्रोंका सिद्धान्त है, पर डरती हैं हम, यह स्तन (हृदय) कठिन है, कहीं चुभ न जाय, पर आप इनसे वनमें घूमते हो, क्या इनमें तृण, गुल्म, पत्र आदि न गड़ते होंगे ? अवश्य गड़ते होंगे। फिर भी हाय ! हम जीवित हैं, परंतु हमारा कुछ वश नहीं चलता, क्योंकि हमारे प्राण विधाताने आपके हाथमें दे दिये हैं, नहीं तो ये कबके निकल गये होते। अतः 'तस्मिन्नेव आत्मा प्राणो यासान्ताः तदात्मिकाः' यह ठीक कहा गया। जबतक श्रीश्यामसुन्दर प्राणेश्वर इनके अन्तरमें विराजमान हैं, तबतक ये मर सकतीं नहीं, तीव्र ताप सहकर भी जीवित रहेंगी, डोलती-फिरतीं काम-काज करती रहेंगी। इसीसे 'रमापतेरपि आक्षिप्तं चित्तं याभिस्ताः' यह संगत है। जो श्यामसुन्दर परमसमाहितचेता योगीन्द्र मुनीन्द्रोंके चित्तको भी आकृष्ट कर लेते हैं, उनके चित्तको गोपवधूटियोंने आकृष्ट कर लिया। अतएव 'रमापतेरपि प्रकृष्टो मदो यासाम्' यह भी भाव है अर्थात् जिनका मद रमापतिसे भी बढ़कर है। तभी तो अपनी 'गति' आदिसे आप्तकाम, पूर्णकामको भी खूब मतवाला बना दिया। अथवा अपने चित्तपर आक्षेप करती हैं—'अरे चित्त ! तू शरीरमें बैठा क्या करता है ? जा, प्राणधनका अन्वेषण कर' इस तरह ('आक्षिप्तं चित्तं याभिस्ताः') चित्तको जिन्होंने बाहर निकाल दिया, वे गोपांगनाएँ श्रीश्यामसुन्दरको ढूँढ़ती हुई उनकी लीलाका अनुकरण करती हैं। उसमें ऐसी विभोर, तल्लीन हो गयी हैं कि श्रीश्यामके गति, स्मित, प्रेक्षण, भाषण आदि सबका अनुकरण करती हैं। यद्यपि अनुकर्ता नट आदिको अनुकरणीय और अनुकर्तामें भेद बना रहता है, पर इनको तो यह भेद ज्ञात ही नहीं रह गया। इनके मन, बुद्धि आदि सभी सर्वथा श्यामसुन्दरके ही सदृश हो गये। प्रेमोद्रेकमें व्यवधान सह्य नहीं होता उस समय धर्मी (श्रीकृष्ण) और धर्म (जैसे अग्निकी उष्णता आदि, वैसे श्रीकृष्णके धर्म) दोनोंका आविर्भाव हुआ। फिर विहारविभ्रमका उदय हुआ। ('विहारः—विगतो हारो यस्माद् एतादृशो विभ्रमः') अर्थात् जिस विभ्रम या विलासमें हाररहित होना पड़ता है, उस विहारविभ्रमका उदय हुआ। जिस समय व्रजांगनाएँ अपने प्रियतमसे मिलने लगती हैं, उस समय वे देश, काल और वस्तुका व्यवधान भी नहीं रहने देना चाहतीं। प्रेमोद्रेकमें व्यवधान सह्य नहीं होता। हार, कंचुकी आदि निकाल देती हैं। आनन्दोद्रेकमें रोमांचतक—जो प्रियतमालिंगनसमुत्थ है—बाधक होता
३५८ भक्तिसुधा है, फिर हारकी तो बात ही क्या? अतः 'विहार' ('विगतो हारः') कहा। ऐसे विलासका वे अनुभव करने लगीं। द्वारकाकी श्रीकृष्णकी पटरानियोंका भी एक ऐसा ही प्रसंग है। एक बार श्रीकृष्ण इन्द्रप्रस्थके प्रवाससे आये तो उनकी महिषियाँ उनसे मिलनेके लिये—' "उत्तस्थूराश्रात् सहसासनाशायात्' (श्रीमद्भा० १।११।३१) आसनसे उठीं और आशयसे भी उठीं। देशव्यवधानको दूर करनेके लिये आसनसे उठीं। पर उन्हें इतनेसे सन्तोष नहीं हुआ। उन्होंने सोचा—क्या हम उन प्राणेश्वरसे पाँच-पाँच कोषके कंचुकको पहने हुए मिलें, जहाँ एक कंचुकमात्र भी बाधक होता है, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय कोषके कंचुकोंको पहनकर मिलनेमें स्वाद ही कुछ नहीं। इन प्राणधनसे तो निरावरण होकर सम्मिलनमें आनन्द है। अतः आशयसे उठकर मिलीं अर्थात् आशयोपलक्षित पंचकोषके आवरणको हटाकर श्रीकृष्ण परमात्मासे मिलीं। परंतु श्रीव्रजदेवियोंके यहाँ इन कोषोंकी चर्चा नहीं, वे तो नवघनश्याम मुरलीमनोहर मनमोहनकी निरन्तर चिन्तासे तदात्मिका-रसात्मिका हो रही हैं और श्रीवृषभानुनन्दिनी उस रसकी मधुरिमास्थानीया हैं। इस प्रसंगपर श्रीनन्ददासजीने कहा है—'तरंगन वारि ज्यों।' श्रीउद्धव भगवान् कृष्णके सन्देशको गोकुलमें व्रजबालाओंके निकट पहुँचाकर जब वापस आये, तब श्यामके विप्रयोगमें व्याकुल उन गोपदेवियोंका उन्होंने श्रीकृष्णके सामने दयनीय चित्र खींचा और कहा—वे आपके बिना मरी जा रही हैं और आप यहाँ मौज ले रहे हो। उत्तरमें श्रीभगवान्ने सहास स्वरमें कहा—उद्धव ! व्रजमें इतने दिन रहकर उन व्रजांगनाओंसे क्या सीख आये हो? और तब उन्होंने दिखाया 'तरंग ज्यों।' श्रीगोपांगनाओंके रोम-रोममें, प्राण-प्राणमें श्यामसुन्दर विराजमान हैं। श्रीउद्धव यह देखकर और चकित रह गये। ऐसी स्थितिमें गोपियों और श्रीकृष्णमें छिपाव ही क्या है? लोग व्यर्थ शंका करते हैं—श्रीकृष्णने गोपांगनाओंको नग्न कराया, हाथ बँधाकर बुलाया, चीरहरण-लीला की। पर क्या वे नग्न होकर जलमें नहीं नहायी थीं? क्या वे कृष्ण परमात्मा जलसे भी बहिरंग हैं? वस्तु- स्थिति तो यह है कि— सर्वेषामपि वस्तूनां भावार्थो भवति स्थितः। तस्यापि भगवान् कृष्णः किमतद् वस्तु रूप्यताम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५७) सभी वस्तुओंका भावार्थ परिणामीमें स्थित होता है अर्थात् सभी वस्तुएँ अपने कारणरूपमें स्थित होती हैं। उस कारणके भी कारण भगवान् कृष्ण हैं। उनसे भिन्न और है ही क्या वस्तु, जिसका निरूपण किया जाय? अन्तमें सतत्त्व श्रीकृष्ण ही ठहरते हैं। इतना भीतरी श्रीकृष्णतत्त्व है। उसके समक्ष क्या कोई वस्त्रपरिधान करेगा, हाँ तो प्रकृतमें—जलमें तरंगकी तरह गोपांगना हैं। वे एक तरहसे जल ही हैं, परंतु जलगता मधुरिमाकी अपेक्षा तरंग बहिरंग हैं। मधुरिमा अन्तरंग है, वह श्रीराधा हैं। अस्तु, इस प्रकार 'कृष्णविहार-विभ्रमा' व्रजांगनाएँ आपसमें एक-दूसरीसे कहती हैं—हे अबलाओ, तुम कहाँ श्यामसुन्दरको ढूँढ़ती-फिरती हो, वह अशेष विहार नागर कृष्ण तो हम ही हैं, लो हमें ग्रहण करो। इस प्रकार वे मनमोहनस्वरूप ही हो रही हैं। बाहर, भीतर, मध्यमें उनके श्याम-ही-श्याम भरपूर हैं। वही आत्मा, मन, बुद्धि, प्राण सब कुछ हो गये हैं। यों वे 'तदात्मिकाः' ('स एव आत्मा प्राणादिर्यासान्ताः') हो गयी हैं। प्रकृत श्लोकके 'प्रियाः प्रियस्य प्रतिरूढमूर्तयः।' अंशपर पहले कुछ कहा गया है। अब एक भाव और कहा जाता है—'प्रियाः प्रियस्य प्रतिरूढमूर्तयः।' विष्णुदैवतसमें 'क्वचित् स्त्रियः पुरुषायिता भवन्ति' से विपरीत रतिका एक पक्ष है अर्थात् शृंगारोद्रेकमें नायक नायिका बन जाता है और नायिका नायक बन जाती है। यहाँ 'गति, स्मित...' आदि लीला में 'स्वयं स्त्रियः सत्यः प्रतिरूढमूर्तयः' हुए। श्रीव्रजांगना श्यामसुन्दर बन गयीं और व्रजचन्द्र श्रीकृष्णचन्द्र व्रजांगना बन गये। श्रीराधा श्याम हो गयीं और श्रीश्याम राधा हो गये। प्राकृत-लौकिक शृंगारमें वस्तुतः नायिका नायक नहीं होती और नायक नायिका नहीं होता। पर यहाँ तो प्रभु साक्षात् काम और सत्यसंकल्प हैं। एक-दूसरेका चिन्तन करते-
श्रीरासपंचाध्यायी ३५९ ही-करते श्रीरसिक विहारिणी बन जाते और वह रसिक बन जाती हैं। ये दोनों प्रेमामृतसिन्धुकी दो मूर्ति बनकर प्रकट होते हैं और उसीमें ये दोनों प्रिया- प्रियतम गोता लगाते रहते हैं। उसमें न जाने कौन कब बदल जाता है, कुछ पता नहीं रहता; क्योंकि उस प्रेमसुधासिन्धुके उन्मज्जन-निमज्जनमें यह उलट-फेर दिनमें करोड़ों बार होता है। भक्तकी दृढ़ भावनासे भगवान् भक्तके अधीन हो जाते हैं इस प्रसंगमें यह भी ज्ञातव्य है कि पहले श्रीभगवान्—भजनीयतत्त्व स्वतन्त्र और साधक परतन्त्र रहता है। भक्त भगवान्को हर तरह रिझानेका प्रयत्न करता है; स्तुति आदि करता फिरता है। वस्तुतः स्वातन्त्र्य ही पुंस्त्व और पारतन्त्र्य ही स्त्रीत्व है— (‘स्वातन्त्र्यमेव पुंस्त्वम्, पारतन्त्र्यमेव स्त्रीत्वम्’)। इन दृष्टियोंसे यही निश्चय होता है कि जीव परवश—पराधीन और ईश स्ववश—स्वाधीन है। श्रीगोस्वामीजीने भी कहा है—‘परबस जीव स्वबस भगवंता।’ (रा०च०मा० ७।७८।७) तरंग जलके परतन्त्र रहती हैं, जीव प्रभुके परतन्त्र रहता है। इस आशयसे ईशप्राप्तिके निमित्त सखीभावकी साधना होती है। पारतन्त्र्यसे ही पूर्णता-स्वाधीनता प्राप्त होती है। भक्तकी दृढ़ साधनासे फिर धीरे-धीरे श्रीभगवान् परतन्त्र—भक्तके अधीन होने लगते हैं और भक्त स्वतन्त्र, दुरूह वेदान्त और कोमल भक्तिरसमें समान भावसे वर्तमान। श्रीस्वामी मधुसूदन सरस्वतीके श्रीकृष्ण- तत्त्वके साक्षात्कारके लिये यहीं श्रीवृन्दावनमें चार बार श्रीगोपालसहस्रनामका पुरश्चरण किया, पर कुछ भी सिद्धि-सूत्र न मिलनेपर अन्तमें इन्होंने काशीमें श्रीकालभैरवका अनुष्ठान किया। उससे उन्हें पूर्वसंचित अपने पापोंका—प्रभुदर्शन-प्रतिबन्धका ज्ञान हुआ, हताशा भाव मिटा और श्रीकालभैरवके प्रोत्साहनसे फिर श्रीवृन्दावनमें आकर पाँचवीं बार श्रीगोपाल- सहस्रनामका पुरश्चरण उन्होंने आरम्भ किया। उसमें पूर्वपरिश्रमकी सब कसर निकल गयी। ‘क्लेशः फलेन हि पुनर्नवतां विधत्ते।’ रूप, लावण्य, माधुर्य और सुन्दरताकी सीमा श्रीमुरलीमनोहर मनमोहन उनके समक्ष प्रकट हो गये। अब श्रीस्वामीजीको मानकी सूझी, श्रीश्यामसुन्दर उनके सामने जाते हैं और वे मुँह फिराते हैं। अब भक्त स्वतन्त्र, भगवान् परतन्त्र हैं। ऐसे ही अवसरके लिये श्रीभगवान्ने श्रीमुखसे कहा है—‘अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।’ मैं भक्तोंके अधीन हूँ (श्रीमद्भा० ९।४।६३)। साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम्। मदन्यत् ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥ (श्रीमद्भा० ९।४।६८) साधुओंका—भक्तोंका हृदय मेरा विहार-स्थल है और मेरा हृदय साधुओंका निवासस्थान। मेरे सिवा वे और कुछ नहीं जानते। ‘वशीकुर्वन्ति मां भक्त्या सत्स्त्रियः सत्पतिं यथा॥’ (श्रीमद्भा० ९।४।६६)। जैसे साध्वीसती पतिव्रता स्त्री अपने सत्पतिको वशमें कर रखती है, वैसे ही स्वाधीनभर्तृकाकी तरह मुझे सद्भक्त वशमें कर लेता है। तभी तो उस पूर्णतमको हाथमें माखन रख- रखकर, ताली दे-देकर गोपियोंने नचाया। मानो वे उनकी काठकी पूतरी थे—‘तद्वशो दारुयन्त्रवत्’ (श्रीमद्भा० १०।११।७) इसके अनुसार श्रीकृष्णमें गोपांगनात्व हुआ। यों ‘प्रियाः प्रियस्य प्रतिरूढमूर्तयः’ से विपरीत रतिभाव बना। श्रीकृष्ण गोपांगना हो गये और गोपांगनाएँ श्रीकृष्ण हो गयीं। इस प्रकार गोपांगनाएँ श्रीकृष्ण बनकर कहती हैं—‘असावहं त्विति’ (श्रीमद्भा० १०।३०।३) यह केवल भावना ही नहीं, वस्तुस्थिति ही ऐसी है। पहले तो प्रेमोद्रेकवश श्रीनन्दनन्दन उन व्रजांगनाओंके रोम-रोममें थे ही, दूसरे प्रतिरूढ़भावसे भी वे उनमें स्थित हुए एवं तीसरे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकारमें विभ्रमादिसे भी वे प्रविष्ट हुए। इसके अतिरिक्त ‘कृष्ण- विहारविभ्रमाः’ (श्रीमद्भा० १०।३०।३)—का यह भी समास होता है—‘कृष्णविहारस्य विभ्रमो यासु।’ कृष्णविहारका विभ्रम जिनमें हुआ। वे गोपियाँ ‘मैं ही कृष्ण हूँ’, ऐसा परस्पर कहने लगीं। अर्थात् इन गोपांगनाओंके विहारमें कृष्णलीलाका विभ्रम हो गया। अतएव यह लौकिक लीला थी। वस्तुतः
३६० भक्तिसुधा गोपांगनाओंके मनमें यह भाव ही नहीं था कि हम अनुकरण कर रही हैं, वे निष्कपट, निश्छल थीं। वे सच्चे ही प्रेम-समुद्रमें गोता लगाती रहती थीं। इस समुद्रकी तरंगें संयोगमें शान्त रहती हैं, पर वियोगमें खूब उठती हैं। कभी इसमें उन्माद, विभोरताका ज्वारभाटा आता है। गोपियोंकी प्रेमसमाधि भग्न होनेपर वे श्यामसुन्दरको पुकारने लगीं जब कभी उनकी यह प्रेम-समाधि भग्न होती, तल्लीनतामें कुछ कमी आती, वियोगका ज्ञान होता, तब वे पुकार उठतीं, 'हा! प्राणधन, श्यामसुन्दर, नटनागर, कहाँ हो' और ढूँढ़ने लगतीं- गायन्त्य उच्चैरमुमेव संहता विचिक्युरुन्मत्तकवद् वनाद् वनम्। पप्रच्छुराकाशवदन्तरं बहि- र्भूतेषु सन्तं पुरुषं वनस्पतीन् ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।४) श्रीगोपांगनाएँ अबतक बाह्यानुसन्धानसे शून्य थीं, उन्हें होश ही नहीं कि हमारा श्रीप्राणप्यारेसे इस समय असम्प्रयोग हो रहा है। बाह्यानुसन्धान होते ही 'हा श्याम ! हा प्राण कहाँ हो!' इस चिन्तासन्तान- सन्तापसे सातिशय सन्तप्त हो उठती हैं और श्रीश्यामसुन्दर नन्ददुलारेको फिर प्राप्त करनेका प्रयत्न करती हैं-सखि, चलो ढूँढ़ें। कैसे ढूँढ़ें? तो संहत- सम्मिलित होकर ढूँढ़ें। यहाँ व्रजदेवियोंके इस चरित्रसे उपदेश मिलता है कि कोई भी काम सम्मिलित होकर ही करना चाहिये, आपसकी फूटसे काम बिगड़ जाता है। इनकी तो यह नित्यलीला है। यह तो विप्रयोगका नटन हम लोगोंके लिये है। वैसे इनमें कभी ईर्ष्या भी होती थी। इनके पृथक्-पृथक् यूथ थे। इनकी ईर्ष्या स्पृहणीय है, वह भक्तिरसामृतसिन्धुकी लहरें हैं। पारा बहुत स्वच्छ-उज्ज्वल होता है। गन्धक उसके रूपमें हो जाता है, उसमें समा जाता है। चित्त जब स्वच्छ होता है, इष्ट-प्रेय तत्त्व उसमें प्रतिफलित होता है। उस समय चित्त आनन्दस्वरूप- रसस्वरूप होता है। अमृतकी सब तरंगें अमृत, रसकी सब तरंगें रस ही होती हैं। ईर्ष्यादि सब चित्तकी ही वृत्तियाँ अथवा विकार हैं। इस प्रकार श्यामप्रेमप्रमत्त बड़भागियोंकी ईर्ष्या भी प्रेम ही है। अस्तु, अब तो ढूँढ़ना है, अतः रागद्वेषहीन होकर ढूँढ़नेमें ही सुविधा रहेगी। यही उपदेश भी मिलता है। कुंज आदिकी बातोंका अर्थात् यह अमुक कुंजकी, अमुक भावकी है आदि बातोंका विचार कभी स्वस्थतामें होगा। इस समय दृष्टिकी अपेक्षा नहीं। अब तो ईर्ष्या-द्वेष सब दूर हो गया। केवल श्रीश्यामसुन्दरके अन्वेषणकी चिन्ता है। अब तो वे परस्पर कहती हैं-सखि ! यह प्रेममूर्च्छित होगी तो अपने गुलाबजल छिड़ककर इसको होशमें लायेंगी। अतः 'संहताः' कहा। 'गायन्त्य उच्चैः' गाती हुई ढूँढ़ने चल रही हैं-यदि मनमोहन दूर भी होंगे तो सुन लेंगे। फिर हम तो उनके गुण गाती चलती हैं- जिन्हें सुनकर रह न सकेंगे, जहाँ भी होंगे, अवश्य और शीघ्र ही आकर दर्शन देंगे। इस बहाने हम अपनी आर्ति-पीड़ा भी सुना देंगी। वे हमारी पीड़ा सुनकर भी प्रसन्न होते हैं। इसके अतिरिक्त उन्हें गान लगता भी बहुत अच्छा है। हम कहर्तीं- ललन! जरा पादसंवाहन करो, वेणी गूँथ दो, तब वे 'मुझे गान सुनाओ, गूँथ दूँगा' आदि कोरी गप्प मारने लगते, काम न करते। अतः हमारे उच्च स्वरसे गाये गये गीतोंको सुनकर अवश्य ही प्राणधन घनश्याम पधारेंगे। भगवान्ने स्वयं ही कहा- नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च। मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद ॥ (आदिपुराण १९।३५) अथवा गोपियाँ प्रेमार्तिमें विह्वलतासे बेहाल हैं। उन्मादसे गान निकल रहा है। व्रजांगनाओंको किसीने
- वे सब परस्पर मिलकर ऊँचे स्वरसे उन्हींके गुणोंका गान करने लगीं और मतवाली होकर एक वनसे दूसरे वनमें, एक झाड़ीसे दूसरी झाड़ीमें जा-जाकर श्रीकृष्णको ढूँढ़ने लगीं। परीक्षित् ! भगवान् श्रीकृष्ण कहीं दूर थोड़े ही गये थे। वे तो समस्त जड-चेतन पदार्थोंमें तथा उनके बाहर भी आकाशके समान एकरस स्थित ही हैं। वे वहीं थे, उन्हींमें थे, परंतु उन्हें न देखकर गोपियाँ वनस्पतियोंसे-पेड़-पौधोंसे उनका पता पूछने लगीं।
श्रीरासपञ्चाध्यायी ३६१
समझाया—तुम क्यों उन्हींको गाती हो, जो त्यागकर चले गये। इसपर वे कहती हैं—'हाँ, हम तो उन्हींको गायेंगी, उन्हींको रिझायेंगी।' वे यह निश्चय लेकर बैठी हैं—'चाहे वे शतकोटि-अनन्तकोटि कष्ट दें, पर हम तो उन्हें ही, बाँकेबिहारीको ही गायेंगी। इनका यह 'अटल' नियम है। कितनी भी विपत्ति आनेपर, ये अन्यको न गायेंगी। वे त्रिभंग होनेपर भी ललित श्याम, चाहे कितने भी विपरीत आचरण करें, पर इनका प्रेम-प्राखर्य बढ़ता ही जायेगा। गायन उनका स्वभाव हो गया, अतः गाती ही हैं। गोपाङ्गनाओंका प्रेमविह्वल हो वृक्षों- वनस्पतियोंसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना तथा उत्तर न मिलनेपर दोषानुसन्धान करना 'विचिक्युरुन्मत्तकवद् वनाद् वनम्' उन्मत्तकी तरह, जहाँ-जहाँ सम्भावना है, ढूँढ़ती हैं। एकसे एकको, निरालस होकर, दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवें वनोंको ढूँढ़ डालती हैं। विश्राम ही नहीं लेतीं। जबतक प्यारे मनमोहन न मिल जायें, चैन ही नहीं। इससे भी उपदेश है—'ढूँढ़ते ही रहो।' जबतक अभिलषित कार्य सिद्ध न हो ले, विश्राम ही कैसा? फिर वे पूछती हैं—वनस्पतियोंसे। उन्हें दृढ़ आशा है कि इनसे प्राणप्यारेका पता मिलेगा ही। इससे यह भी सिद्ध हुआ कि—प्रेमी वृक्षोंतकसे पूछ सकता है; चेतनकी तो कथा ही क्या? अमुकसे पूछो, अमुकसे नहीं—यह तो उनके यहाँ विचार ही नहीं—अतएव साधारण्येन बहुवचन है—'वनस्पतीन्'। श्रीमद्वल्लभा- चार्यजीका इसपर एक भाव है—वृन्दावनके वनस्पति वैष्णव हैं, 'मूढा अपि वैष्णवाः प्रष्टव्याः'। अनुरागी चाहे विद्वान् न हों, पर वे प्रष्टव्य हैं। अतः वृक्षोंसे पूछती हैं अथवा व्रजांगनाओंको प्रेमोन्मादसे दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई, उन्हें वृक्षोंका वास्तविक स्वरूप ज्ञात हुआ। व्रजके वन, लता, तरु आदि अपने एक-एक कणसे श्रीश्यामसुन्दरके स्वरूपको प्रकट करते हैं*— अतएव भावुक व्रजधूलिको भालपर धरते हैं। एक भावुकका कहना है— सन्त्ववतारा बहवः पुष्करनाभस्य सर्वतोभद्राः। कृष्णादन्यः को वा लतास्वपि प्रेमदो भवति॥ अर्थात् भगवान् विष्णुके बहुत अवतार हुए और उत्तम-उत्तम हुए हों, परंतु श्रीकृष्णअवतारके अतिरिक्त और कौन अवतार हुआ, जिसने लताओंमें भी, जड़ोंमें भी प्रेमका गाढ संचार किया हो? 'यत्पादपांसुर्बहुजन्मकृच्छ्रतो धृतात्मभीर्योगिभिरप्यलभ्यः।' (श्रीमद्भा० १०।१२।१२) जिन श्रीभगवान्की पादधूलि बहुत जन्मोंमें भी योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंतकको भी दुर्लभ है, उन प्रभुने अपने संचारसे व्रज-वृन्दावन-लता-तरुको अनन्त महत्त्व दिया है। श्रीवृन्दावनके वृक्षोंके प्रकाशकी एक किरण भी बिना प्रभुपादारविन्दकी अनुकम्पाके जन्म-जन्मान्तर, युगयुगान्तर और कल्पकल्पान्तरमें भी द्रष्टुमशक्य है। 'आनन्दवृन्दावनचम्पू' में कहा है—श्रीवृन्दावनधामके एक-एक वृक्ष, इन्द्रनील, पद्मराग और हरितमणि आदिके सदृश चमत्कृत, देदीप्यमान हैं, इनकी शाखा, उपशाखा, पत्र, पुष्प, फल भी वैसे ही सचिक्कण, प्रकाशमान हैं। उनपर शुक, पिक, कपोत, तित्तिर, मयूर आदि अनेक विहंगम विराजमान हैं। उनके एक-एक पल्लवका प्रकाश सहस्रों सूर्योंको लज्जित करता है। किंतु इनका दर्शन अनन्तदुर्भावनातिमिराच्छन्न इन चर्मचक्षुओंसे नहीं हो सकता। यह तो श्रीमद्भगवत्कृपैकलभ्य दिव्यदृष्टिपर ही निर्भर है। श्रीव्रजांगनाओंको यह सौभाग्य प्राप्त था। वे उन तरुओंके वास्तविक स्वरूपको देख रही थीं। अतः उनसे अपने प्रियतम-प्राणधन-आनन्दकन्द-कृष्णचन्द्र परमानन्दको पूछती हैं।
- 'वनलतास्तरव आत्मनि विष्णुं व्यञ्जयन्त्य इव पुष्पफलाढ्याः। प्रणतभारविटपा मधुधाराः प्रेमहृष्टतनवः ससृजुः स्म॥' (श्रीधरीसम्मतो 'ववृषु' रितिपाठः) (श्रीमद्भा० १०।३५।९) [युगलगोपीगीत]। भगवान् श्रीगोपाल जब वनमें गौ चराने जाते, तब कौतुकवश वेणु बजाकर चरती हुई गौओंको बुलाते। उस समय उनके वेणुरवको सुनकर वनके लता, तरु (स्त्री-पुरुष दोनों ही) भारसे झुकी शाखाओंसे प्रणत होते, पुष्प और फलकी बहुतायतसे प्रसन्नता सूचित करते, प्रेमसे रोमांचित होते। इन लक्षणोंसे अपनेमें मानो वे श्रीविष्णुको ही सूचित करते हुए मधुधारा बरसाने लगते। ये विष्णु साक्षात्कृतिके लक्षण हैं।
३६२ भक्तिसुधा एक भाव और—प्रसिद्ध कवि श्रीकालिदासके खण्डकाव्य 'मेघदूत' में यक्षने मेघको दूत बनाकर अपनी प्रियाके पास भेजा है। जहाँ प्राकृत स्थलमें ऐसी स्थिति है कि चेतन-अचेतनका भेद मिट जाता है, तब इनकी तो बात ही निराली है। वे तो श्यामसुन्दरके लोकोत्तर अनुरागसागरमें सदा इतनी मग्न रहती हैं कि किसी भी तरहकी सुधबुध ही नहीं रहती। ऐसी स्थितिमें चेतन-अचेतनको भूलकर वे भी वृक्षोंसे प्रश्न करें तो कोई असंगति नहीं। व्रजांगना वृक्षोंसे पूछते समय पहले उनका गुणगान करती हैं, प्रार्थना करती हैं; फिर उनसे अपने प्रियतमका पता न पाकर उनमें दोष बताती हुई आगे चल देती हैं। वे सबसे पूछती जाती हैं—न जाने किससे पता लग जाये। अपनी कार्यसिद्धिके लिये मनुष्य सब कुछ करता है। पुत्रके लिये लोग नौ मन काँकर चालते हैं। कितने ही देवी-देवताओंको ध्याते- पूजते हैं। गरज सब कुछ करा देती है। गरजपर बड़े- बड़े नास्तिक साधुओंकी खुशामद करते हैं, उनसे सट्टा पूछते हैं। तब प्रियतम प्राणधनकी प्राप्तिके लिये क्या-क्या न किया जाये, किस-किससे न पूछा जाये? अतः व्रजांगना सबसे पूछती फिरती हैं, गाती फिरती हैं। यही उपदेश है—रागद्वेष छोड़कर तल्लीन होकर अभिलषित वस्तुका पता लो, अवश्य सफलता मिलेगी। 'गायन्त्युच्चैः' यों श्रीगोपांगनागण उच्च स्वरसे भगवान्को गाती हुई उनके अन्वेषणमें संलग्न हैं। इसमें गोपियोंका एक भाव यह भी है कि—'जैसे श्रीमुरलीमनोहरके श्रीविमुखसे विनिःसृत वेणुगीत- निनादको सुनते ही हम उनके सन्निधानमें अविलम्ब आ पहुँचीं, वैसे ही वे भी शीघ्र हमलोगोंके पास पधारें। अतः उच्चैः उनके गुणोंको गाती हुई ढूँढ़ती हैं। अपने गुणोंको—प्रशंसाको सुनकर शीघ्र आयेंगे, यह भी व्रजदेवियोंका तात्पर्य है। उपदेश तो है ही कि श्रीभगवान्की प्राप्तिका असाधारण कारण उनका गुणगान ही है, इन गोपदेवियोंके लिये उन्मत्तकवत् कहा गया है। उन्मत्तकमें 'कन्' प्रत्यय अधिकतामें है। इससे यह बतलाया गया कि—व्रजांगना मतवालोंकी तरह देह-गेहके नेह और सम्बन्धसे तथा वस्त्रानुसन्धान आदिसे शून्य हैं। उन्हें कुछ पता नहीं कि वे कहाँ क्या कर रही हैं अर्थात् अधिकाधिक उन्मादिनी गोपी उच्चस्वरसे प्राणधन घनश्यामको गाती हैं। यद्यपि इस समय श्रीभगवान् इन्हें त्यागकर दुःसह विप्रयोग दुःख दे रहे हैं। श्रीव्रजदेवियोंके श्यामविरहजन्य तीव्रातितीव्र सन्तापको देखकर लोक निरालोक हो गये, दिशा- विदिशा सन्तप्त हो उठीं, पाषाण भी द्रुत हो चले, पर वे व्रजचन्द्र तनिक नहीं पिघले, बड़े निष्ठुर— महाकठोर बने हुए हैं। फिर भी व्रजांगना अपने कार्यसे विरत नहीं हैं—वे उच्च स्वरसे उन्हें ही गा रही हैं। वे चाहे रीझें, चाहे खीझें, वे तो उन्हें ही— एकमात्र उन्हें ही गायेंगी। वे तो निश्चय लेकर बैठी हैं—'असुन्दरः सुन्दरशेखरो वा........' वे चाहे करुणार्णव हों चाहे द्वेषमहावाडवानल, ये तो भजेंगी उन्हें ही। गायेंगी उन्हें ही। अब क्या दूसरोंको गायेंगी ? 'उच्चैरमुमेव संहताः', 'एव' पद आया है। इसका भी विलक्षण स्वारस्य है। एक गोपी कहती है—'सखि, जीवितं पणीकृतं मया....' मैंने तो अब जीवनकी बाजी लगा दी है। वाह! कोई धनकी बाजी लगाता है, कोई जनकी बाजी लगाता है, कोई 'सट्टे' में सर्वस्व स्वाहा कर देता है, पर यह सब अपने जीवनकी रक्षाके लिये करते हैं। किंतु यहाँ तो जीवनकी भी कोई परवाह नहीं। ये जीवनका 'जुआ' खेलती हैं। अब इन्हें माता, पिता, पति, गुरुजन किसीका क्या डर! इससे अधिक कष्ट ही क्या होगा? इन्होंने तो दृढ़ निर्णय कर लिया—'माधवो यदि विहन्ति हन्यताम्, बान्धवो यदि जहाति त्यज्यताम्। साधवो यदि हसन्ति हस्यताम्, माधवः स्वयमूरीकृतो मया।' यदि वे श्रीश्यामसुन्दर प्राणधन वियोगदुःख देखकर तरसा-तरसाकर हमारा वध करते हैं तो बड़े शौकसे करें, हम इसके लिये तैयार हैं। यदि बान्धव- कुटुम्बी हमें छोड़ते हैं तो वे भी छोड़ दें और हमारी इस हालतपर साधुजन हँसते हैं तो भले ही हँसें, खूब हँसें, पर हमने तो उन माधव मुरली-मनोहरको सर्वस्व
समर्पणद्वारा स्वयं स्वीकृत कर लिया, स्वयं वर लिया। यह है व्रजांगनाओंका अडिग-अडोल निश्चय। इस स्थितिमें सब तो आनन्द ले रहे हैं, पर वे व्रजबालाएँ दुःसह विरह वेदनाको सहती प्राणप्यारेको ढूँढ़ रही हैं। यद्यपि वे यशोदानन्दन आनन्दकन्द और दुःखनिकन्दन हैं, पर इन्हें विरहवाडवाग्नियोंमें जलाते हैं, झुलसाते हैं तथापि ये तो उन्हें ही (एव) गाती हैं और उच्चस्वर से गाती हैं। इसका नाम है दृढ़ प्रेम। इसके अतिरिक्त 'संहतः' इकट्ठी होकर ढूँढ़ रही हैं। श्रीमन्मोहनमें रसात्मकता है, तब भी वे नीरसोंका- सा व्यवहार कर रहे हैं, नहीं मिल रहे हैं। परंतु व्रजांगना बड़े सौहार्दसे एक वनसे दूसरे वनको, एक कुंजसे दूसरे कुंजको अन्वेषण कर रही हैं। वे इस कार्यमें बहुत व्यस्त हैं। उनके केशपाश खुल गये हैं, बाल बिखर गये हैं, वस्त्र असंयत हो गये हैं। उनकी इस दशासे प्रतीत होता है, वे निरालस होकर अन्वेषण कर रही हैं और मानो विश्रामका तो नाम ही नहीं जानतीं। ये सब भाव भी 'उन्मत्तक' पदद्योत्य हैं। इस तरह व्रजदेवियाँ अपने प्राणधन श्यामसुन्दरको खोज रही हैं। कैसे हैं और कौन हैं, वे उनके प्राणजीवन, जिनका वे गवेषण कर रही हैं? तब कहा— 'आकाशावदनन्तरं बहिर्भूतेषु सन्तं पुरुषम्' उनके अन्वेषणका विषय वह पुरुषोत्तम है, जो प्राणीमात्रमें, वस्तुमात्रमें आकाशकी तरह बाहर-भीतर सर्वत्र विराजमान है। वह तो आकाशसे भी अन्तरतम तत्त्व है। अहन्तत्त्व, अव्यक्ततत्त्व, महत्तत्त्वसे भी परेकी वस्तु है। जब उसीकी सत्तासे सत्तावान् आकाश भी सर्वत्र भरपूर है, तब क्या वह सर्वत्र भरपूर नहीं? अतएव कहा भी— सर्वेषामपि वस्तूनां भावार्थो भवति स्थितः। तस्यापि भगवान् कृष्णः किमतद् वस्तु रूप्यताम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५७) कारणमेव कार्यकारेण परिणमते॥ कारण ही कार्यके आकारमें परिणत होता है, मिट्टी ही घट बन जाती है और कार्यका पर्यवसान कारणमें होता है, घट फूटकर मिट्टी हो जाता है। श्रीशुकदेवजी कहते हैं—हम किसका निर्णय करें, वह तो एक ही तत्त्व सर्वत्र भरपूर है। श्रीमद्वल्लभा- चार्यजीने कहा—श्रीशुकाचार्यजी परमसर्वज्ञ थे, वे 'आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादि' तत्त्वको सर्वत्र प्रत्यक्ष अनुभूत करते थे। तभी कहा—'“...भूतेषु सन्तम्”।' अस्तु। तात्पर्य यही कि कार्योंमें कारण सर्वत्र व्यापक रहता है। इस दृष्टिसे जब श्रीकृष्णतत्त्व व्यापक तत्त्व ठहरता है, तब वह मधुरमूर्ति देह-गेह सर्वत्र विराजमान है, अणु-अणु और परमाणु-परमाणुमें है। केवल कुछ आवरण है, जिससे वह सबको नहीं दिखायी देता। जैसा कि—'मायाजवनिकाछन्न...' और 'नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।' (गीता ७।२५) आदिसे यत्र-तत्र बतलाया गया है। राजा परीक्षित्के नामकरण बीजनिर्देश-प्रसंगमें कहा है— ' 'गर्भे दृष्टमनुध्यायन्...'' (श्रीमद्भा० १।१२।३०) अर्थात् गर्भमें देखे श्रीभगवान्को वही बाहर आनेपर ढूँढ़ने-सा लगा। तब क्या बहिर्देशसे उत्तराके गर्भमें परीक्षित्की रक्षाके निमित्त भगवान् गये थे? नहीं, वे पहलेहीसे वहाँ थे, वहीं रहते हैं, परंतु मायाके आवरणवश नहीं दीखते, उसके हटनेपर दीख पड़ने लगते हैं। मायाका अपसरण दो प्रकारसे होता है, एक भक्तके श्रमसे, दूसरा भगवत्कृपासे। दूसरे, इन मानवपुरियोंमें शयन करनेवाला ही पुरुष है, 'पुंसु शेते इति पुरुषः' अर्थात् समष्टि-व्यष्टिशायी ही तत्त्व पुरुष है। यों उस प्राकृत पुरुषेतर पुरुषोत्तमको व्रजांगना वृक्षोंसे पूछती हैं। कह सकते हैं, इन दृष्टियोंसे तो गोपांगनाओंके समीप भी वह तत्त्व विराजमान है ही और इनको भी उस व्यापक श्यामतत्त्वकी स्फूर्ति होती ही है, तब ये ढूँढ़ किसे रही हैं? यह ठीक है। उक्त रूपसे गोपांगनाओंको उस तत्त्वकी स्फूर्ति है ही, परंतु वह प्रत्यक्षमें नहीं प्राप्त है। प्रत्यक्षमें जैसा भाव होता है, वह इन्हें नहीं प्राप्त है—अतः उसका अन्वेषण कर रही हैं। वैसे व्रजांगनाओंके नेत्रोंमें श्यामल महोमय दीप्ति प्रतिष्ठित है, इन्हें सब ओर श्यामरूप ही दीख पड़ रहा है। परंतु वे इतनेहीसे सन्तुष्ट नहीं, इन्हें तो शब्दस्पर्शादि भी वैसे ही चाहिये। श्रीश्यामसुन्दरके महोमय शरीरमें रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द—सब विषय लोकोत्तर हैं। व्रजांगना
चाहती हैं—जैसे हमारे नेत्रोंमें उन सर्वेश्वर प्राणाधिक प्रियका सर्वातिशायी रूप बसा है, वैसे ही उनके शब्दस्पर्शादि भी प्रत्यक्ष हों, नेत्रोंमें भी वही आभा हो, स्पर्श भी वही हो। पर अपने-आप जब ये प्रवृत्त होती हैं, तब इन्हें उन सबका अभाव प्रतीत होता है, वह अनुभव ही नहीं होता। तब आकाशवद् व्याप्त पुरुषोत्तमको वनस्पतियोंसे पूछती हैं, अचेतनोंसे पूछती हैं, यह उनकी विभोरता है। यहाँ एक भाव यह भी है—दर्पीको ब्रह्म भी जड़ प्रतीत होता है, पर जो रसिकशिरोमणि हैं—जो इस सिद्धान्तके आदी हैं— तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥ —वे तो इन तरुओंको सद्घन, चिद्घन, आनन्दघन समझते हैं और अपनेको जड़ समझते हैं। अतएव वे 'भूतेषु सन्तं पुरुषं वनस्पतीन् पप्रच्छुः' व्यापक पुरुषोत्तमको वृक्षोंसे पूछती हैं। पूछो, पूछो। इस अन्वेषण-प्रसंगमें यों अन्तरंगदृष्टिसे तो महत्त्व है ही, पर बाह्यदृष्टिसे भी महत्त्व है—ब्रह्मलोक, वैकुण्ठलोक, भूमण्डलमें न ढूँढ़कर, व्रजमें—गाँवोंमें ढूँढ़ो। दर्पमें मत रहो—यह एक उपदेशसूक्त है—'परमिममुपदेश- माद्रियध्वं निगमवनेषु नितान्तखेदखिन्नाः। विचिनुत भवनेषु वल्लवीनामुपनिषदर्थमुलूखले निबद्धम्॥' कोरे 'टिड्ढाणञ्द्वयसज्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठञ्ठकञ्क- ञ्क्वरपः' (लघुसिद्धान्तकौमुदी ४।१।१५) के घोषणसे यदि थक गये हो तो इस उपदेशका सम्मान करो। निगमागमवेद्यको निगमाटवीमें ढूँढ़ते थक गये हो तो अब उन मुग्धा गोपियोंके घरमें, आँगनमें उसे ढूँढ़ो। वह उपनिषदर्थ श्रीबालमुकुन्द वहाँ ऊखलमें बँधा है। यदि अहंकारमें रह गये—'अजी, इन गँवार गोपोंसे क्या पूछेंगे और वह सर्वोपरि विराजमान तत्त्व इनके यहाँ गाँवोंमें कहाँसे आया, उसे तो महेन्द्रादि लोकमें प्राप्त कर सकेंगे'—तब तो बस गये, वह वहाँ भी न मिलेगा। अहंकारियोंकी दृष्टिसे ब्रह्म परे ही रहता है; क्योंकि उनकी दृष्टिमें अपने सामने ब्रह्मा भी कुछ नहीं। इधर रसिकोंके यहाँ दर्पका काम ही नहीं, यहाँ तृण भी महान् है। तात्पर्य यही कि जहाँ, जैसे भी उसके मिलनेकी सम्भावना हो, ढूँढ़ो। अतएव व्रजांगना वृक्षोंसे पूछती हैं— दृष्टो वः कच्चिदश्वत्थ प्लक्ष न्यग्रोध नो मनः। नन्दसूनुर्गतो हृत्वा प्रेमहासावलोकनैः ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।५) अश्वत्थ, प्लक्ष, न्यग्रोध—तीनों सबसे बड़े ऊँचे वृक्ष हैं, दूरकी बात देख सकते हैं। दूरस्थ श्यामको ये जान लेंगे। अश्वत्थकी व्युत्पत्ति है—'न श्वोऽपि स्थाता।' अर्थात् कल भी—अगले क्षणमें नहीं रह सकनेवाला अनित्य यह विश्व है—ऐसा समझनेवाला ज्ञानी अश्वत्थ है। गोपांगना कहती हैं, ऐसी विश्वकी गतिको जानकर सदा परोपकारमें रत हे अश्वत्थ, हमें कृपाकर हमारे प्राणप्यारेको बताओ, क्या आपने कहीं उन्हें देखा है? वः—युष्माभिः। क्योंकि वे श्यामसुन्दर आपकी ममताके आस्पद हैं। साधारण वस्तुपर ध्यान नहीं दिया जाता, ध्यान रहता ही नहीं। पर जो अपना है, उसका पता रहता है, उसका भी आना-जाना बना रहता है। श्रीश्याम आपके परप्रेमके आस्पद हैं। आप विहारस्थलीके हैं, आप महाभाग्यवान् हैं, कृपाकर हमें उन श्यामका पता दीजिये। यह प्रशंसा हुई। ऐसे ही 'प्लक्ष' की स्तुति करती हैं—'प्रकृष्टतया क्षीयते परोपकाराय यः स प्लक्षः, रलयोरभेदः' अर्थात् जो सदा परोपकारके निमित्त ही क्षीण होता रहे, वह प्लक्ष है। 'प्लक्ष' को प्रक्ष मानकर यह अपेक्षितार्थक व्युत्पत्ति की गयी, ऐसे अवसरपर र-ल में भेद नहीं माना जाता। परोपकारके लिये अपनेको मिटा देनेमें सोत्साह हे प्लक्ष! तुम्हारा जीवन-मरण दोनों उपकारके लिये है—हमारा भी उपकार करो—जरा श्रीश्यामसुन्दरको बता दो। न्यग्रोध! याचकको जो दुत्कारना, वह हुई न्यक्कार, उसे रोकनेवाला—'न्यक् रोधयतीति न्यग्रोधः। हे न्यग्रोध! तुम बड़े उदार हो— कोई उन वंशीधरमें प्रेम माँगने आयेंगे तो उन्हें तुम न्यक्कार न करोगे। अतः हम तुमसे याचना करती हैं—श्रीश्यामसुन्दरका
- (गोपियोंने पहले बड़े-बड़े वृक्षोंसे जाकर पूछा—) हे पीपल, पाकर और बरगद! नन्दनन्दन श्यामसुन्दर अपनी प्रेमभरी मुसकान और चितवनसे हमारा मन चुराकर चले गये हैं। क्या तुमलोगोंने उन्हें देखा है?
श्रीरासपञ्चाध्यायी ३६५ पता दो, बड़ी कृपा होगी। वे 'नन्दसूनु' हमारा चित्त चुराकर ले गये हैं; हम उन्हें ढूँढ़ रही हैं, अतः हे अश्वत्थादि! तुमने कहीं देखा हो तो बता दो। गोपांगना इस समय श्रीकृष्णपर कुपित हैं, अतः बड़ोंके नामसे उनका नाम-निर्देश करती हैं—नन्दसूनु- नन्दरायके बेटा। हमारा कोई सम्बन्ध नहीं; क्योंकि हमारे यदि वे होते तो हमारे पास रहते। यदि कोई गोपांगनाओंसे पूछे कि यदि यह बात है, तब इतनी व्यग्रतासे तुम उन्हें ढूँढ़ क्यों रही हो? इसपर उनका उत्तर है—वे चोर हैं, हमारा मन चुरा ले गये हैं, चोरोंका पता बहुत जरूरी है। सखि, तुम्हारा मन तुम्हारे पास होगा, वे क्यों लेने आयेंगे और कैसे ले जायँगे तो—'प्रेमहासावलोकनैः' मन्दहास और कटाक्षपातोंसे हमारे हृदयमें प्रविष्ट होकर ले गये। कदाचित् वृक्ष कहें; देवियो! हम वृक्ष हैं—जड़ हैं, हम क्या जानें तुम्हारे चित्तचोरको। इसी प्रसंगमें 'कच्चित्' का प्रयोग है। कच्चित् प्रश्नवाचक अव्यय है। इस अर्थमें यह पहले अभी-अभी चरितार्थ हो चुका। फिर अब वृक्षोंकी उक्तिमें इससे अचित् जड़ अर्थ प्रकाशित हुआ। व्रजांगना वृक्षोंको यही उत्तर देती हैं—तुम अज्ञोंको अचित् प्रतीत होते हो, परंतु हो चेतन, आपलोग अमलात्मा महामुनीन्द्र योगीन्द्र हैं, यहाँ श्रीश्यामसुन्दरका स्पर्श प्राप्त करनेके लिये तरु, लता रूपमें प्रकटे हैं। तरु, लता बननेकी बात तो श्रीउद्धवने भी कही— 'आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।' (श्रीमद्भा० १०।४७।६१) व्रजांगनाको जबतक अपने प्राणधनका पता मिलनेकी आशा रही, वृक्षोंकी खूब प्रशंसा की, पर जब देखा कि अब न बतायेंगे, आशा निराशामें बदल रही है; तब उन्हें उससे असूया होने लगी। गुणोंमें दोष दीख पड़ने लगे। एक कहती है—सखि, ये चेतन चाहे हों, पर ये कच्चित् हैं, इनका चेतन, कुत्सित चेतन है—'कत्चित्—कुत्सितञ्च चेतनं येषाम्....।' अच्छा, ये अब हमको ज्ञात हुआ, तुमलोग तीर्थवासी हो, बड़े कठोर हो, अतः बतलाते नहीं अथवा इस समय राजा कलिका साम्राज्य है। वह चोरपक्षपाती है। तुम भी वृक्षो! चोरशिखामणि माखनचोर श्यामसुन्दरके पक्षपाती हो। अतएव इनका नाम 'अश्वत्थ' है, स्थिरमति नहीं, आज कुछ तो कल कुछ कहता है। फिर 'चल-पत्र' भी यह है—स्वयम् अस्थिर है, जान-बूझकर भी धोखा दे सकता है। दूसरा यह इसका साक्षी प्लक्ष भी ऐसा ही है— 'प्रकृष्टतया क्षीयते इति प्लक्षः।' यदि यह धर्मात्मा होता तो प्रकृष्ट (अधिक) क्षयी क्यों होता ? और इस न्यग्रोधकी तो बात ही मत पूछो, इसने तो अपने यहाँ दूसरोंके लिये तिरस्कारका ही भण्डार भर रखा है— 'न्यक्कारमेव रोधयति।' एक दूसरी सखी कहती है—'नहीं सखि, देख, ये भी श्रीश्यामसुन्दरके वियोगतापसे स्तब्ध हैं, ये भी दुःखी हैं, विह्वल हैं। हमारी और इनकी एक-सी ही स्थिति है।' यह वृन्दावनके पशु, पक्षी, वृक्षोंमें जो हराभरापन आनन्द—एकरसताकी स्थिति है, यह श्रीश्यामसुन्दरके दर्शनसे ही है। तब श्रीश्यामके वियोगमें भी वे हरे-भरे ही क्यों दीखते हैं ? तो यह बात दूसरी है, व्रजलीलामें ये सदा एकरस रहते हैं; क्योंकि श्रीभगवान् व्रजलीलामें श्रीवृन्दावनको छोड़कर एक पाद भी कहीं नहीं जाते—'वृन्दावनं परित्यज्य पादमेकं न गच्छति।' व्यापी वैकुण्ठमें ही पुरुषोत्तम भगवान्का प्रादुर्भाव होगा। जैसे— नेत्र, जो बाहरसे दीख रहे हैं, ये नेत्र नहीं हैं, अपितु ये नेत्रगोलक हैं। नेत्र अतीन्द्रिय इन्द्रिय है, वह इस गोलकके भीतर है। श्रीचैतन्य महाप्रभु श्रीजगन्नाथपुरीमें रहते थे तो क्या उन्हें वहाँ श्रीश्यामसुन्दरका प्राकट्य नहीं था ? था, पर वह अन्तरमें था। 'यो वेद निहितं गुहायां.... सह ब्रह्मणा विपश्चितेति॥' (तैत्तिरीय० २।१) दो ब्रह्मकी कल्पना है—एक कार्यब्रह्म, एक कारणब्रह्म। सबके ऊपर-सबसे बड़ा कारणब्रह्म है। 'शेष' का भी यही अर्थ है—'शिष्यते इति शेषः।' लयप्रक्रियासे सबके लीन होनेपर क्या बचेगा? कारणब्रह्म, वही अव्याकृत तत्त्व है और वही शेष है; उसीपर श्रीभगवान् विष्णु विराजते हैं। अतएव कहा भी—
'यत्र प्रविष्टः सकलोऽपि जन्तुरानन्दसच्चि- द्धनतामुपैति।' वह व्यापक तत्त्व है। जो महानुभाव श्रीवल्लभादि वृन्दावनसे प्रसंगवश बाहर रह गये, वे वस्तुतः बाहर नहीं रहे। वे श्रीवृन्दावनको छोड़कर बाहर कैसे रहते ? इसी उक्त युक्तिसे, वे कभी वियुक्त नहीं रहे। उनके हृदयमें श्रीवृन्दावन, श्रीनित्यनिकुंजका सदा प्राकट्य है। परंतु सर्वसाधारणका सामर्थ्य ऐसा नहीं है। आजकल बहुत-से भावोंसे दर्शनशक्ति व्यापिका हो रही है। वैसे भी— 'अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः।' (श्वेताश्वतर० ३।१९) सर्वदर्शी, सर्वश्रोता वह सबमें है, परंतु प्रकट अपने स्थानमें—गोलोकमें ही होगा। 'स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठितः स्वे महिम्नि···।' यह विशेषरूपमें प्राकट्य है। वे लता, भूमि सब यहीं हैं, यह ठीक है, परंतु नेत्रदोषसे वे असली रूपमें नहीं दीखतीं। दोषसे—पित्तदोषसे मिसरी भी कड़वी लगती है। ऐसे ही दोषवश व्यापक होते हुए भी श्रीश्यामसुन्दरके दर्शन नहीं होते। यहाँ श्रीवृन्दावनमें जहाँ कांचनमयी भूमि है, वहाँ तरु नीलमणिके हैं, जहाँ पद्मरागमणिकी भूमि है, वहाँ तरु हरितमणि हैं······यों नील, पीत, हरितरूपमें सब लोकोत्तर वस्तु हैं। यत्र-तत्र तथा परिवेष्ठित तरु मानो श्रीराधाकृष्ण ही विहार करते प्रतीत हो रहे हैं। परंतु ये सब असली रूपमें दीखते नहीं, तब इसे नेत्रदोष ही कहना चाहिये। इसके लिये भगवदनुकम्पा प्राप्त हो, दिव्यदृष्टि मिले तो यह सब अद्भुतता दीख पड़ने लग जाय। अन्तरंग दृष्टिसे वे वृक्षादि यह सब कह रहे हैं, पर बहिरंग दृष्टिवश हमें कुछ ज्ञात नहीं होता। सखि, व्रजलीलाके अतिरिक्त श्रीश्यामसुन्दरके विप्रयोग तापमें ये तरु, लता झुलसते क्यों नहीं, इन्होंने एक बार ही नेत्र भरके उन त्रिभुवनसुन्दरका ऐसा दर्शन पाया है कि वह रूपमाधुरी इनकी चक्षुओंमें सदाके लिये बस गयी है, ओझल ही नहीं होती। इन्हें उस कमनीयताका स्थायीभाव प्राप्त हो गया है। ये उस रूपमाधुरीकी लोकोत्तरतापर— आश्चर्यकारितापर मुग्ध हो रहे हैं—स्तब्ध हो रहे हैं। सखि, तब हमें ये क्या जवाब दें, क्या बतायें ? इस प्रकार श्रीव्रजसीमन्तिनी अपने प्राणवल्लभ श्रीश्यामबिहारीको वृक्षोंसे पूछती, वनसे वनमें भटकती फिर रही हैं। कण्टकाकीर्ण गर्तोंमें, अनुकूल-प्रतिकूल भूमिमें घूम रही हैं। उन्हें मार्ग-विमार्गका ज्ञान नहीं है। देहका अनुसन्धान नहीं है। प्रेमोन्मादमें ऊर्मिमाली समुद्रकी-सी इनकी स्थिति हो रही है। उसमें जैसे ज्वारभाटे आते हैं, इन्हें भी कभी कुछ स्मरण- अनुसन्धान हो आता है? कभी भी नहीं। परंतु श्रीभगवान्की योगमाया उनके साथ है; वह उनकी रक्षा कर रही है। उन्हें कष्टोंसे बचा रही है। उनकी सेवाके लिये वह तत्पर है। अन्तरंग दृष्टिसे भी—यह तो वृन्दावनधाम है, यहाँ कष्ट कैसा ? किंतु प्रेमियोंकी कितनी दुरवस्था होती है—यह टीकाकार कल्पना करते हैं। यह इसलिये कि साधकोंको आश्वासन मिले, सहारा मिले। साधारणोंकी कौन कहे, ये व्रजदेवियाँ प्रेमपथिकोंकी परमाचार्या हैं। ये बतलातीं हैं—देखो, प्राणधनको ढूँढनेमें कितना क्लेश है, कहीं पाषाणों, वृक्षोंसे टकराते हैं। ऐसे ही भावुक भी अपनेको जीवन-मरणके संशयमें डाले बिना अभीष्ट तत्त्व नहीं प्राप्त कर सकता— न संशयमनारुह्य नरो भद्राणि पश्यति। संशयं पुनरारुह्य यदि जीवति पश्यति॥ बड़े-बड़े सम्राट्, स्वराट्-विराट् ऐसे ही ढूँढ़नेसे मिलेंगे! कोई भी काम प्राणोंकी बाजी लगनेसे ही सिद्ध होगा। यह भाव दिखलानेके लिये ही टीकाकार इतनी बातें कहते हैं। 'आनन्दवृन्दावनचम्पू' में कहा है—जहाँ-जहाँ विषम स्थानोंमें व्रजांगना घूमती हैं, वहाँ-वहाँ उनके परमानुरागवश कठोर-तीक्ष्ण कण्टक भी कोमल-कुसुम हो जाते हैं, जैसे श्रीभगवद्दर्शनसे वज्रसे भी कठोर वस्तु कोमल हो जाती है। गोस्वामीजीने भी कहा— जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी । तजहिं बिखम बिखु तामस तीछी ॥ (रा०च०मा० २।२६२।८) नागिनी पुत्रादिनी है—अपने बच्चोंको भी खा जाती है—'पुत्रादिनी सर्पिणी' इतनी क्रूर है, वह भी भगवद्भक्तोंके सामने अपने स्वाभाविक विषको त्याग
देती है। प्रकृतिके समस्त अंग भागवतकी सेवा करते हैं। 'तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात॥' (रा०च०मा० २।२१६) पृथ्वी श्रीरामभद्रके चरणोंके नीचे अपने कोमल हृदयकमलको बिछाती थी, परंतु भरतके लिये वह इससे भी अधिक कोमल थी। अतः जहाँ वृन्दावन अपने अधीश्वरके लिये कोमल बनता है, वहाँ वह उनके प्रियके लिये कोमल क्यों न होगा ? पहले तो वहाँ कण्टक, शर्करा, कंकड़ हैं ही नहीं, वहाँ तो इन्द्रनील, पद्मरागमणि आस्तीर्ण हैं। पर '......तं सप्रपञ्चमधिरूढ......।' 'गाँठी तो बाँधे नहीं माँगतहू सकुचायँ। तिनके पीछे हरि रहें कहूँ भूखे नहिं रहि जायं ॥' यों प्रकृतिके अणु-अणु इन व्रजदेवियोंकी सेवाके लिये तत्पर हैं। स्वामीको प्रसन्न करनेके लिये पहले स्वामिनीको प्रसन्न करना चाहिये। श्रीकृष्णको प्रसन्न करनेके लिये उनकी अन्तरंगा इन व्रजदेवियोंका पहले प्रसाद प्राप्त करना चाहिये। प्रकृतमें उनका चरित्रगान और उनकी लगनका अनुकरण ही उनके प्रसादका हेतु है। अस्तु, इस तरह वे अपने मनमोहनको ढूँढ़ती फिर रही हैं। अश्वत्थादिमें और भी कल्पना—अश्वत्थ विष्णु- दैवत्य, प्लक्ष ब्रह्मदैवत्य और न्यग्रोध शिवदैवत्य हैं। अतः मानो व्रजांगना अपने प्राणधनको ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरसे पूछती हैं। वे कहती हैं—'आपलोग साधु हैं, आपसे हम अपने चोरको पूछ रही हैं। दूसरे, आपकी शाखा-प्रशाखा दसों दिशामें फैल रही हैं— उन हमारे चितचोरको कहीं अवश्य देखा होगा।' पिप्पल चलदल है, उसे चंचल देखकर व्रजांगनाने समझा—'यह हाथ हिला रहा है, कह रहा है—हमने तुम्हारे श्यामसुन्दरको नहीं देखा। ठीक है, इसे नेत्र नहीं हैं। चलो नेत्रवालेसे पूछें ('प्रकृष्टे अक्षिणी यस्य असौ प्लक्षः') इस प्लक्षके बड़ी-बड़ी आँखें हैं, यह नेत्रवाला है। इसके जो अरुण पल्लव हैं— वे नेत्र हैं। यह ब्रह्मदैवत्य भी है। अच्छा तो तुम्हीं बताओ प्लक्ष ! तुमने कहीं हमारे प्राणको देखा ? अरे यह क्या, यह तो कुछ बोलता ही नहीं, क्या इसने मौनव्रत लिया है ? पर नहीं, इसे वागिन्द्रिय नहीं है, बेचारा कैसे बोले ? सखि ! आओ, इस न्यग्रोधसे पूछें, यह जिह्वावाला है, इसके दल जिह्वाके जैसे हैं। यों नये-नये क्रमोंसे बार-बार पूछती फिरती हैं। फिर कुछ जवाब न मिलनेसे दोषानुसन्धानकी सुध हो आती है। कहती हैं—'सखि, अब जाना, यह ऊँचा (दर्पिष्ठ) होनेसे क्षुद्र है, यह क्षुद्रफल भी है (पीपल जितना बड़ा है, फल उसके उतने ही छोटे हैं), चाहे कितना भी आराधन करें, इससे महाफल—श्याम नहीं मिलेंगे। यह अश्वत्थ है—अस्थायी है।' सहसा 'वट' पर दृष्टि चली जाती है। कहती हैं—'देखो, इसकी शाखा कितनी झुकी हैं, यह विनम्र है। ('नितराम् अग्राणि अधोभूतानि यस्य असौ') शिवदेवताक है; शिव परमवैष्णव हैं। अतः यह अवश्य बतायेगा।' परंतु उत्तरकी कोई आशा न देखनेपर कहती हैं—इसकी बड़ी-से-बड़ी भी उन्नति अवनति ही है। देखो, शाखा नीचे घुसती जा रही हैं—'नितरामग्राणि अधोभूतान्यवनतिः यस्य असौ न्यग्रोधः।' अश्वत्थ परोपकारी नहीं है, अतः 'दरिद्रा' इसमें निवास करती है। बात यह है—दरिद्रा लक्ष्मीकी बड़ी बहन हैं। उसे कोई नहीं ब्याहता था। इसीलिये लक्ष्मीका विवाह भी रुका रहा; क्योंकि छोटे भाई- बहनका विवाह पहले हो जानेसे 'परिवित्ता'— 'परिवित्ती' दोष होता है। अन्ततः बहुत कुछ समझाने- बुझानेपर अश्वत्थने दरिद्रासे विवाह किया। उसे प्रसन्न रखनेके लिये यह तय किया गया कि शनिवारके दिन श्रीनारायणसहित लक्ष्मी वहाँ आकर बसें। अतएव अन्य दिनोंमें अश्वत्थके स्पर्शका निषेध है। यह अश्वत्थ उपकारी नहीं, इसीका फल है, जो इसे दरिद्रा मिली है। श्रीमद्वल्लभाचार्यजीके कथनानुसार श्रीव्रजवनिताऔंने प्लक्षमें यह दोष देखा—'प्लक्ष अपवित्र है, देवताओंने स्वर्गकी कामनासे पशुका आलम्बन किया, उसीसे यह उत्पन्न हुआ, अतः अपवित्र है। तभी तो प्राणजीवनका पता नहीं देता।' यह सब निराश होनेपर कहा जाता है, सान्त्वनाके समय ऐसा नहीं कहा जाता। अथवा अपना मनोरथ सिद्ध न होनेपर भी वे व्रजदेवियाँ वृक्षोंसे असूया नहीं करतीं; क्योंकि वे प्रेममार्गकी आचार्या हैं। अतः कहती हैं—'कच्चित्'—
'कुत्सितश्चेतनवर्गोऽपि यस्मात्।' अर्थात् इस वृन्दावन वृक्षसमूहकी अपेक्षा चेतनवर्ग भी कुत्सित है, इन्द्रादि भी निकृष्ट हैं। ब्रह्मा, वह तो आशा लगाये बैठा है— 'वह दिन कब उदित होगा, वह ऊँचा भाग्य कब जागेगा कि जब श्रीवृन्दाटवीमें मैं कुछ—लता-पत्र- पाद-धूलि बनूँगा और किसी बड़भागी व्रजवासीके चरणसे मेरा उद्धार होगा'— तद् भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां यद् गोकुलेऽपि कतमाङ्घ्रिरजोऽभिषेकम्। (श्रीमद्भा० १०।१४।३४) उद्धव भगवान्को बहुत प्रिय थे। भगवान् उन्हें अपनेसे जरा भी कम नहीं मानते थे, श्रीसंकर्षण- बलदेव और श्रीलक्ष्मी भी उद्धवसे अधिक प्रिय न थीं। उनके लिये ये भगवान्के शब्द हैं—'नोद्धवोऽण्वपि मन्यूनः•••• न च सङ्कर्षणो न श्रीः•••• यथा भवान्।' वे महाभाग्यवान् उद्धव भी श्रीवृन्दावनके तृण, गुल्म बननेके लिये तपस्या करते रहे। यह भाग्य वृन्दावनके वृक्षोंको छोड़कर संसारमें और किसका होगा? यों 'कच्चित्' से व्रजांगना वृक्षोंकी प्रशंसा ही करती हैं और कहती हैं—आप परम चेतन हो, कृपा करो, बताओ—'दृष्टो वः कच्चिदश्वत्थ••••' वृक्ष, मानो स्तुतिसे प्रसन्न हो गये। परस्पर प्रश्नोत्तर-परम्परा चलने लगी—किसको बतायें, व्रजबालाओ, तुम किसे पूछती हो? चौरको। क्या चुराया उसने? हमारा मन। चौर कौन हैं? नन्दसूनु। नहीं, वह तो विष्णु है—व्यापक है, नन्दरायने अनन्त तपस्यासे उसे प्राप्त किया है, वह चौर नहीं, आखिर उसने तुम्हारा क्या चुराया? अजी! नन्दसूनु व्यापक-विष्णु होंगे तुम्हारे घरमें, हमारे यहाँ तो वे पक्के चौर हैं, उन्होंने क्या नहीं चुराया, हमारे दहीको चुराया, नवनीतकी चोरी की और अब तो वे हमारे मनको भी चुराकर भाग गये हैं!' मुग्धा गोपी, तुम क्या कहती हो? मन! यह तो तुम्हारे ही पास होगा और दूध, दही, माखनकी तो चोरी गिनी ही नहीं जाती। नहीं-नहीं, वे हमारा मन चुरा ले गये हैं, वे हमारे चितचोर हैं। दूध, दहीकी चोरीपर तो हमने कभी उन्हें ढूँढ़ा ही नहीं। अबकी बार उन्होंने हमारी बड़ी भारी चोरी की है—हमारी मनोमंजूषाका उन्होंने हरण किया है, उसमें धैर्य, लज्जा, विवेक, विज्ञान, धर्मनिष्ठा आदि रत्न भरे रखे हैं। उसे वे ले गये, अब कुछ रह ही नहीं गया। दही, माखन जानेसे हमारी कोई क्षति नहीं थी, हम विवेकादिसे रहित नहीं थीं, पर आज हम उनसे हीन होकर बाल-बिखेरे घूम रही हैं। हाय, हमारा सर्वस्व लुट गया। बताओ, बड़ा पुण्य होगा। सखियो, तुम क्या कह रही हो? उन्होंने तुम्हारा मन कैसे चुराया? क्योंकि वह तो अन्नमय, प्राणमयके भीतर रहता है, वहाँसे कोई भी उसे कैसे ले सकता है? यह मत कहिये, 'प्रेमहासावलोकनैः' वे प्रेमसे हृदयमें प्रविष्ट हुए, मधुर हाससे उस मंजूषाको ग्रहण किया और तुरन्त उलटे पाँव लौट पड़े। प्रेमी हृदयमें घुस जाता है, वह हृदयकी बात जान जाता है। इस समय वे मोहन उदासीन, अग्राह्य, अलक्ष्य, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य बने हैं। पर पहले इतने अनुरागी बने कि हमारे पादसंवाहन करते, वेणी गूँथ देते, नाचते, गाते, जो हम कहतीं, सब करते। इसी प्रेमसे वे हृदयमें प्रविष्ट हुए। उन प्रेमीका हास याद आता है—मालूम होता है, वे अपने उस हृदयहारी हाससे हमें पकड़े हुए हैं। ऐसे ही विभोरताके अवसरपर अवलोकन-कटाक्षोंसे बस; मन लेकर झटसे चले गये। आप कृपाकर बता दो, हम सर्वशून्य होकर उन्हें ढूँढ़ रही हैं। आप बड़े हो, राजा हो, न्याय करो। अथवा मनके तीन भाव हैं—तामस, राजस, सात्त्विक। प्रेम, हास और अवलोकन—इन तीनोंने मनोंको अपहृत किया। यहाँ अलौकिक सद्घन, चिद्घनमें तामस, राजस भाव कहाँसे आये? इसपर श्रीमद्वल्लभाचार्यजीका कहना है—यह यद्यपि लोकातीत है, परंतु यहाँ गोपी कोई तामसी, कोई राजसी आदि हैं। इनमें भी दस भेद हैं। इनमें तामसी तमसे ऊँची हैं। 'प्रेमपत्तन' आदिमें भी यह वर्णन है। जो अन्यत्र प्रधान है, वह प्रेमपन्थमें अप्रधान है। वह भी वैधी भक्तिकी अपेक्षा रागानुगा प्रीतिमें और भी अप्रधान है। वैधी प्रीतिमें सत्य आदि धर्मका ही मन्त्रिमण्डल रहता है। रागानुगामें वह बदल जाता है, वहाँ व्यसन लग जाता है। परंतु यदि भावुकका मन श्रीकृष्णपादारविन्द-
मकरन्दका मधुप बन जाय, तब तो फिर महान् वैराग्यादि भी अग्निमें 'राई-नोन' की तरह वारकर फेंक दिये जायँ ! श्रीसनकादि, शुकादि आशावसनदिगम्बर महान् विरक्त थे, पर उन्हें एक व्यसन था—जहाँ मंगलमय भगवान्का चरित्र होता; उसे वे अवश्य सुनते। अन्यत्र आशा दूषण है, कहा भी है—'आशा पिशाची परिमर्दितानाम्...' परंतु यहाँ वह भूषण है, यहाँ आशा, तृष्णा कल्पलता है। अन्य सब कुछ देकर भी इसे भावुक खरीदना चाहता है। तामस स्नेह है, वह एक गाढ़ आसक्ति है, दृढ़ अभिनिवेश है। प्रेमी इसे पाकर किसीकी नहीं सुनता। माता, पिता, वेद, शास्त्र, सज्जन, साधु उसे इस मार्गसे रोकते- रोकते परेशान हो जायँ, पर वह किसीको नहीं मानता। वह उसका प्रियव्यसन मूढ़ग्राह, औरोंकी तो क्या, साक्षात् सृष्टिकर्ता ब्रह्माकी भी बात कान नहीं करता। यह महाअग्निपुंज सूर्यदेव ठण्डा पड़ जाय, चन्द्र जल उठे, दुनिया उथल-पुथल हो जाय, परंतु यह वह प्रेम है, वह तामस स्नेह है, जो किंचिन्मात्र भी शिथिल न होगा। जैसे लौकिक कामिनीको कान्तमें अटूट अनुराग होता है, इन गोपांगनाओंको वैसे ही श्रीकृष्णमें था। वैधी प्रीतिमें इसका तिरस्कार है, परंतु रागानुगामें इसीका आदर है। इस प्रकारकी कृष्णकी तामसी मूर्तिका इन दो श्लोकोंमें वर्णन है— बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्। रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै- वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।५) 'कर्णोत्पलालकविटङ्क०' (श्रीमद्भा० १०। ३३।१६)—'श्यामं हिरण्यपरिधिं वनमाल्यबर्ह०' (श्रीमद्भा० १०।२३।२२)। इनमें शृंगाररससारसर्वस्व उद्वेलित उद्बुद्धरूपमें संयोग, वियोग दोनोंहीके साथ वर्णित हुआ है। यहाँ संयोग तो 'अणोरणीयान्' है और वियोग ही 'महतो महीयान्'। श्रीश्यामसुन्दर वनविहारीने मस्तकपर मुकुट धारण किया है, वह मोरपंखका बना है। उसके मयूरपिच्छमें जो श्यामता है, उससे आसक्ति—तामसता निर्दिष्ट हुई—परम आसक्ति बतलायी गयी। अरुण पल्लवके समान पीताम्बरसे सरस सुकोमलता कही गयी। आम्रपल्लवके निर्देशसे यह कहा गया कि उसे भी शृंगारस्वरूपसे धारण किया है और इससे रंजनशील रागकी सूचना है। व्रजांगनाओंका अनुराग सरल, सुकोमल है। मालाके सौगन्ध्यसे 'सत्त्व' गुण कहा गया। 'सत्त्व' का अभिप्राय है—प्रकाश, 'रज' का अभिप्राय है—हलचल—क्रिया और 'तम' का अभिप्राय है—रुकावट—आवरण। यही प्रकृतिमें भी है। जहाँ 'लीला' है, वहाँ भी एक अवरोध, हलचल और प्रकाश है। पहले श्रीश्यामसुन्दर—मुरलीमनोहरका प्रकाश, फिर उनके दर्शनके लिये चंचलता, इसके बाद उससे आसक्ति—गाढ़मूढ़ता सिद्ध ही है। यह जो प्रेम है, यह तामस है। प्रेमका स्वरूप, आसक्ति— उत्कट उत्कण्ठा है। व्रजांगना कहती हैं—हे वृक्षो, श्रीश्यामसुन्दरके अनुरागसे आवरण हो गया—हमारी बुद्धिपर परदा पड़ गया, हाससे चंचलता—खलबली हो उठी और अवलोकनसे सात्त्विक भाव। उसी समय ये चौरशेखर हमारे चित्तको चुरा ले गये। अब तुम समझो, यों चुरा ले गये। अब ये कहाँ गये ? तुमने देखा हो तो जल्दी बतलाओ। अच्छा व्रजवनिताओ, यह तो बताओ, तुमने उनमें विश्वास कैसे कर लिया ? विश्वास न करनेका कोई कारण नहीं था, क्योंकि हम जिनके राजमें रहती हैं, वे उनके पुत्र हैं—'नन्दसूनु' हैं। हम क्या जानती थीं कि ये पालकके बालक ही हमारे घालक निकल पड़ेंगे। अथवा 'नन्दस्य—सर्वानन्दहेतोरयं सूनुः' हम तो समझती थीं जगदानन्दकारक नन्दके ये सुपुत्र हैं। अतएव हमने उनपर विश्वास किया। हन्त कष्टम्! हम विश्वाससे ठगी गयीं। वृक्षो, तुम बताओ, तुमने उन्हें किसी तरफ जाते देखा है ? इस प्रकार व्रजांगना श्रीकृष्णके विरहमें विह्वल हुई उनका अन्वेषण कर रही हैं और संहत होकर गान करती हुई उन्हें खोजती हैं। फिर-फिर अनुसन्धान होनेसे प्लक्षादिसे पूछती हैं—हमारे चितचोरको बताओ। वह प्रेम, हास और अवलोकनसे हमारे मनको—धैर्य, लज्जा, विवेक, विज्ञानकी मंजूषाको हर ले गये हैं।