भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 373, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमर्पणद्वारा स्वयं स्वीकृत कर लिया, स्वयं वर लिया। यह है व्रजांगनाओंका अडिग-अडोल निश्चय। इस स्थितिमें सब तो आनन्द ले रहे हैं, पर वे व्रजबालाएँ दुःसह विरह वेदनाको सहती प्राणप्यारेको ढूँढ़ रही हैं। यद्यपि वे यशोदानन्दन आनन्दकन्द और दुःखनिकन्दन हैं, पर इन्हें विरहवाडवाग्नियोंमें जलाते हैं, झुलसाते हैं तथापि ये तो उन्हें ही (एव) गाती हैं और उच्चस्वर से गाती हैं। इसका नाम है दृढ़ प्रेम। इसके अतिरिक्त 'संहतः' इकट्ठी होकर ढूँढ़ रही हैं। श्रीमन्मोहनमें रसात्मकता है, तब भी वे नीरसोंका- सा व्यवहार कर रहे हैं, नहीं मिल रहे हैं। परंतु व्रजांगना बड़े सौहार्दसे एक वनसे दूसरे वनको, एक कुंजसे दूसरे कुंजको अन्वेषण कर रही हैं। वे इस कार्यमें बहुत व्यस्त हैं। उनके केशपाश खुल गये हैं, बाल बिखर गये हैं, वस्त्र असंयत हो गये हैं। उनकी इस दशासे प्रतीत होता है, वे निरालस होकर अन्वेषण कर रही हैं और मानो विश्रामका तो नाम ही नहीं जानतीं। ये सब भाव भी 'उन्मत्तक' पदद्योत्य हैं। इस तरह व्रजदेवियाँ अपने प्राणधन श्यामसुन्दरको खोज रही हैं। कैसे हैं और कौन हैं, वे उनके प्राणजीवन, जिनका वे गवेषण कर रही हैं? तब कहा— 'आकाशावदनन्तरं बहिर्भूतेषु सन्तं पुरुषम्' उनके अन्वेषणका विषय वह पुरुषोत्तम है, जो प्राणीमात्रमें, वस्तुमात्रमें आकाशकी तरह बाहर-भीतर सर्वत्र विराजमान है। वह तो आकाशसे भी अन्तरतम तत्त्व है। अहन्तत्त्व, अव्यक्ततत्त्व, महत्तत्त्वसे भी परेकी वस्तु है। जब उसीकी सत्तासे सत्तावान् आकाश भी सर्वत्र भरपूर है, तब क्या वह सर्वत्र भरपूर नहीं? अतएव कहा भी— सर्वेषामपि वस्तूनां भावार्थो भवति स्थितः। तस्यापि भगवान् कृष्णः किमतद् वस्तु रूप्यताम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५७) कारणमेव कार्यकारेण परिणमते॥ कारण ही कार्यके आकारमें परिणत होता है, मिट्टी ही घट बन जाती है और कार्यका पर्यवसान कारणमें होता है, घट फूटकर मिट्टी हो जाता है। श्रीशुकदेवजी कहते हैं—हम किसका निर्णय करें, वह तो एक ही तत्त्व सर्वत्र भरपूर है। श्रीमद्वल्लभा- चार्यजीने कहा—श्रीशुकाचार्यजी परमसर्वज्ञ थे, वे 'आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादि' तत्त्वको सर्वत्र प्रत्यक्ष अनुभूत करते थे। तभी कहा—'“...भूतेषु सन्तम्”।' अस्तु। तात्पर्य यही कि कार्योंमें कारण सर्वत्र व्यापक रहता है। इस दृष्टिसे जब श्रीकृष्णतत्त्व व्यापक तत्त्व ठहरता है, तब वह मधुरमूर्ति देह-गेह सर्वत्र विराजमान है, अणु-अणु और परमाणु-परमाणुमें है। केवल कुछ आवरण है, जिससे वह सबको नहीं दिखायी देता। जैसा कि—'मायाजवनिकाछन्न...' और 'नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।' (गीता ७।२५) आदिसे यत्र-तत्र बतलाया गया है। राजा परीक्षित्के नामकरण बीजनिर्देश-प्रसंगमें कहा है— ' 'गर्भे दृष्टमनुध्यायन्...'' (श्रीमद्भा० १।१२।३०) अर्थात् गर्भमें देखे श्रीभगवान्को वही बाहर आनेपर ढूँढ़ने-सा लगा। तब क्या बहिर्देशसे उत्तराके गर्भमें परीक्षित्की रक्षाके निमित्त भगवान् गये थे? नहीं, वे पहलेहीसे वहाँ थे, वहीं रहते हैं, परंतु मायाके आवरणवश नहीं दीखते, उसके हटनेपर दीख पड़ने लगते हैं। मायाका अपसरण दो प्रकारसे होता है, एक भक्तके श्रमसे, दूसरा भगवत्कृपासे। दूसरे, इन मानवपुरियोंमें शयन करनेवाला ही पुरुष है, 'पुंसु शेते इति पुरुषः' अर्थात् समष्टि-व्यष्टिशायी ही तत्त्व पुरुष है। यों उस प्राकृत पुरुषेतर पुरुषोत्तमको व्रजांगना वृक्षोंसे पूछती हैं। कह सकते हैं, इन दृष्टियोंसे तो गोपांगनाओंके समीप भी वह तत्त्व विराजमान है ही और इनको भी उस व्यापक श्यामतत्त्वकी स्फूर्ति होती ही है, तब ये ढूँढ़ किसे रही हैं? यह ठीक है। उक्त रूपसे गोपांगनाओंको उस तत्त्वकी स्फूर्ति है ही, परंतु वह प्रत्यक्षमें नहीं प्राप्त है। प्रत्यक्षमें जैसा भाव होता है, वह इन्हें नहीं प्राप्त है—अतः उसका अन्वेषण कर रही हैं। वैसे व्रजांगनाओंके नेत्रोंमें श्यामल महोमय दीप्ति प्रतिष्ठित है, इन्हें सब ओर श्यामरूप ही दीख पड़ रहा है। परंतु वे इतनेहीसे सन्तुष्ट नहीं, इन्हें तो शब्दस्पर्शादि भी वैसे ही चाहिये। श्रीश्यामसुन्दरके महोमय शरीरमें रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द—सब विषय लोकोत्तर हैं। व्रजांगना