भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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चाहती हैं—जैसे हमारे नेत्रोंमें उन सर्वेश्वर प्राणाधिक प्रियका सर्वातिशायी रूप बसा है, वैसे ही उनके शब्दस्पर्शादि भी प्रत्यक्ष हों, नेत्रोंमें भी वही आभा हो, स्पर्श भी वही हो। पर अपने-आप जब ये प्रवृत्त होती हैं, तब इन्हें उन सबका अभाव प्रतीत होता है, वह अनुभव ही नहीं होता। तब आकाशवद् व्याप्त पुरुषोत्तमको वनस्पतियोंसे पूछती हैं, अचेतनोंसे पूछती हैं, यह उनकी विभोरता है। यहाँ एक भाव यह भी है—दर्पीको ब्रह्म भी जड़ प्रतीत होता है, पर जो रसिकशिरोमणि हैं—जो इस सिद्धान्तके आदी हैं— तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥ —वे तो इन तरुओंको सद्घन, चिद्घन, आनन्दघन समझते हैं और अपनेको जड़ समझते हैं। अतएव वे 'भूतेषु सन्तं पुरुषं वनस्पतीन् पप्रच्छुः' व्यापक पुरुषोत्तमको वृक्षोंसे पूछती हैं। पूछो, पूछो। इस अन्वेषण-प्रसंगमें यों अन्तरंगदृष्टिसे तो महत्त्व है ही, पर बाह्यदृष्टिसे भी महत्त्व है—ब्रह्मलोक, वैकुण्ठलोक, भूमण्डलमें न ढूँढ़कर, व्रजमें—गाँवोंमें ढूँढ़ो। दर्पमें मत रहो—यह एक उपदेशसूक्त है—'परमिममुपदेश- माद्रियध्वं निगमवनेषु नितान्तखेदखिन्नाः। विचिनुत भवनेषु वल्लवीनामुपनिषदर्थमुलूखले निबद्धम्॥' कोरे 'टिड्ढाणञ्द्वयसज्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठञ्ठकञ्क- ञ्क्वरपः' (लघुसिद्धान्तकौमुदी ४।१।१५) के घोषणसे यदि थक गये हो तो इस उपदेशका सम्मान करो। निगमागमवेद्यको निगमाटवीमें ढूँढ़ते थक गये हो तो अब उन मुग्धा गोपियोंके घरमें, आँगनमें उसे ढूँढ़ो। वह उपनिषदर्थ श्रीबालमुकुन्द वहाँ ऊखलमें बँधा है। यदि अहंकारमें रह गये—'अजी, इन गँवार गोपोंसे क्या पूछेंगे और वह सर्वोपरि विराजमान तत्त्व इनके यहाँ गाँवोंमें कहाँसे आया, उसे तो महेन्द्रादि लोकमें प्राप्त कर सकेंगे'—तब तो बस गये, वह वहाँ भी न मिलेगा। अहंकारियोंकी दृष्टिसे ब्रह्म परे ही रहता है; क्योंकि उनकी दृष्टिमें अपने सामने ब्रह्मा भी कुछ नहीं। इधर रसिकोंके यहाँ दर्पका काम ही नहीं, यहाँ तृण भी महान् है। तात्पर्य यही कि जहाँ, जैसे भी उसके मिलनेकी सम्भावना हो, ढूँढ़ो। अतएव व्रजांगना वृक्षोंसे पूछती हैं— दृष्टो वः कच्चिदश्वत्थ प्लक्ष न्यग्रोध नो मनः। नन्दसूनुर्गतो हृत्वा प्रेमहासावलोकनैः ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।५) अश्वत्थ, प्लक्ष, न्यग्रोध—तीनों सबसे बड़े ऊँचे वृक्ष हैं, दूरकी बात देख सकते हैं। दूरस्थ श्यामको ये जान लेंगे। अश्वत्थकी व्युत्पत्ति है—'न श्वोऽपि स्थाता।' अर्थात् कल भी—अगले क्षणमें नहीं रह सकनेवाला अनित्य यह विश्व है—ऐसा समझनेवाला ज्ञानी अश्वत्थ है। गोपांगना कहती हैं, ऐसी विश्वकी गतिको जानकर सदा परोपकारमें रत हे अश्वत्थ, हमें कृपाकर हमारे प्राणप्यारेको बताओ, क्या आपने कहीं उन्हें देखा है? वः—युष्माभिः। क्योंकि वे श्यामसुन्दर आपकी ममताके आस्पद हैं। साधारण वस्तुपर ध्यान नहीं दिया जाता, ध्यान रहता ही नहीं। पर जो अपना है, उसका पता रहता है, उसका भी आना-जाना बना रहता है। श्रीश्याम आपके परप्रेमके आस्पद हैं। आप विहारस्थलीके हैं, आप महाभाग्यवान् हैं, कृपाकर हमें उन श्यामका पता दीजिये। यह प्रशंसा हुई। ऐसे ही 'प्लक्ष' की स्तुति करती हैं—'प्रकृष्टतया क्षीयते परोपकाराय यः स प्लक्षः, रलयोरभेदः' अर्थात् जो सदा परोपकारके निमित्त ही क्षीण होता रहे, वह प्लक्ष है। 'प्लक्ष' को प्रक्ष मानकर यह अपेक्षितार्थक व्युत्पत्ति की गयी, ऐसे अवसरपर र-ल में भेद नहीं माना जाता। परोपकारके लिये अपनेको मिटा देनेमें सोत्साह हे प्लक्ष! तुम्हारा जीवन-मरण दोनों उपकारके लिये है—हमारा भी उपकार करो—जरा श्रीश्यामसुन्दरको बता दो। न्यग्रोध! याचकको जो दुत्कारना, वह हुई न्यक्कार, उसे रोकनेवाला—'न्यक् रोधयतीति न्यग्रोधः। हे न्यग्रोध! तुम बड़े उदार हो— कोई उन वंशीधरमें प्रेम माँगने आयेंगे तो उन्हें तुम न्यक्कार न करोगे। अतः हम तुमसे याचना करती हैं—श्रीश्यामसुन्दरका

  • (गोपियोंने पहले बड़े-बड़े वृक्षोंसे जाकर पूछा—) हे पीपल, पाकर और बरगद! नन्दनन्दन श्यामसुन्दर अपनी प्रेमभरी मुसकान और चितवनसे हमारा मन चुराकर चले गये हैं। क्या तुमलोगोंने उन्हें देखा है?