भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 375

श्रीरासपञ्चाध्यायी ३६५ पता दो, बड़ी कृपा होगी। वे 'नन्दसूनु' हमारा चित्त चुराकर ले गये हैं; हम उन्हें ढूँढ़ रही हैं, अतः हे अश्वत्थादि! तुमने कहीं देखा हो तो बता दो। गोपांगना इस समय श्रीकृष्णपर कुपित हैं, अतः बड़ोंके नामसे उनका नाम-निर्देश करती हैं—नन्दसूनु- नन्दरायके बेटा। हमारा कोई सम्बन्ध नहीं; क्योंकि हमारे यदि वे होते तो हमारे पास रहते। यदि कोई गोपांगनाओंसे पूछे कि यदि यह बात है, तब इतनी व्यग्रतासे तुम उन्हें ढूँढ़ क्यों रही हो? इसपर उनका उत्तर है—वे चोर हैं, हमारा मन चुरा ले गये हैं, चोरोंका पता बहुत जरूरी है। सखि, तुम्हारा मन तुम्हारे पास होगा, वे क्यों लेने आयेंगे और कैसे ले जायँगे तो—'प्रेमहासावलोकनैः' मन्दहास और कटाक्षपातोंसे हमारे हृदयमें प्रविष्ट होकर ले गये। कदाचित् वृक्ष कहें; देवियो! हम वृक्ष हैं—जड़ हैं, हम क्या जानें तुम्हारे चित्तचोरको। इसी प्रसंगमें 'कच्चित्' का प्रयोग है। कच्चित् प्रश्नवाचक अव्यय है। इस अर्थमें यह पहले अभी-अभी चरितार्थ हो चुका। फिर अब वृक्षोंकी उक्तिमें इससे अचित् जड़ अर्थ प्रकाशित हुआ। व्रजांगना वृक्षोंको यही उत्तर देती हैं—तुम अज्ञोंको अचित् प्रतीत होते हो, परंतु हो चेतन, आपलोग अमलात्मा महामुनीन्द्र योगीन्द्र हैं, यहाँ श्रीश्यामसुन्दरका स्पर्श प्राप्त करनेके लिये तरु, लता रूपमें प्रकटे हैं। तरु, लता बननेकी बात तो श्रीउद्धवने भी कही— 'आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।' (श्रीमद्भा० १०।४७।६१) व्रजांगनाको जबतक अपने प्राणधनका पता मिलनेकी आशा रही, वृक्षोंकी खूब प्रशंसा की, पर जब देखा कि अब न बतायेंगे, आशा निराशामें बदल रही है; तब उन्हें उससे असूया होने लगी। गुणोंमें दोष दीख पड़ने लगे। एक कहती है—सखि, ये चेतन चाहे हों, पर ये कच्चित् हैं, इनका चेतन, कुत्सित चेतन है—'कत्चित्—कुत्सितञ्च चेतनं येषाम्....।' अच्छा, ये अब हमको ज्ञात हुआ, तुमलोग तीर्थवासी हो, बड़े कठोर हो, अतः बतलाते नहीं अथवा इस समय राजा कलिका साम्राज्य है। वह चोरपक्षपाती है। तुम भी वृक्षो! चोरशिखामणि माखनचोर श्यामसुन्दरके पक्षपाती हो। अतएव इनका नाम 'अश्वत्थ' है, स्थिरमति नहीं, आज कुछ तो कल कुछ कहता है। फिर 'चल-पत्र' भी यह है—स्वयम् अस्थिर है, जान-बूझकर भी धोखा दे सकता है। दूसरा यह इसका साक्षी प्लक्ष भी ऐसा ही है— 'प्रकृष्टतया क्षीयते इति प्लक्षः।' यदि यह धर्मात्मा होता तो प्रकृष्ट (अधिक) क्षयी क्यों होता ? और इस न्यग्रोधकी तो बात ही मत पूछो, इसने तो अपने यहाँ दूसरोंके लिये तिरस्कारका ही भण्डार भर रखा है— 'न्यक्कारमेव रोधयति।' एक दूसरी सखी कहती है—'नहीं सखि, देख, ये भी श्रीश्यामसुन्दरके वियोगतापसे स्तब्ध हैं, ये भी दुःखी हैं, विह्वल हैं। हमारी और इनकी एक-सी ही स्थिति है।' यह वृन्दावनके पशु, पक्षी, वृक्षोंमें जो हराभरापन आनन्द—एकरसताकी स्थिति है, यह श्रीश्यामसुन्दरके दर्शनसे ही है। तब श्रीश्यामके वियोगमें भी वे हरे-भरे ही क्यों दीखते हैं ? तो यह बात दूसरी है, व्रजलीलामें ये सदा एकरस रहते हैं; क्योंकि श्रीभगवान् व्रजलीलामें श्रीवृन्दावनको छोड़कर एक पाद भी कहीं नहीं जाते—'वृन्दावनं परित्यज्य पादमेकं न गच्छति।' व्यापी वैकुण्ठमें ही पुरुषोत्तम भगवान्का प्रादुर्भाव होगा। जैसे— नेत्र, जो बाहरसे दीख रहे हैं, ये नेत्र नहीं हैं, अपितु ये नेत्रगोलक हैं। नेत्र अतीन्द्रिय इन्द्रिय है, वह इस गोलकके भीतर है। श्रीचैतन्य महाप्रभु श्रीजगन्नाथपुरीमें रहते थे तो क्या उन्हें वहाँ श्रीश्यामसुन्दरका प्राकट्य नहीं था ? था, पर वह अन्तरमें था। 'यो वेद निहितं गुहायां.... सह ब्रह्मणा विपश्चितेति॥' (तैत्तिरीय० २।१) दो ब्रह्मकी कल्पना है—एक कार्यब्रह्म, एक कारणब्रह्म। सबके ऊपर-सबसे बड़ा कारणब्रह्म है। 'शेष' का भी यही अर्थ है—'शिष्यते इति शेषः।' लयप्रक्रियासे सबके लीन होनेपर क्या बचेगा? कारणब्रह्म, वही अव्याकृत तत्त्व है और वही शेष है; उसीपर श्रीभगवान् विष्णु विराजते हैं। अतएव कहा भी—