भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 376

'यत्र प्रविष्टः सकलोऽपि जन्तुरानन्दसच्चि- द्धनतामुपैति।' वह व्यापक तत्त्व है। जो महानुभाव श्रीवल्लभादि वृन्दावनसे प्रसंगवश बाहर रह गये, वे वस्तुतः बाहर नहीं रहे। वे श्रीवृन्दावनको छोड़कर बाहर कैसे रहते ? इसी उक्त युक्तिसे, वे कभी वियुक्त नहीं रहे। उनके हृदयमें श्रीवृन्दावन, श्रीनित्यनिकुंजका सदा प्राकट्य है। परंतु सर्वसाधारणका सामर्थ्य ऐसा नहीं है। आजकल बहुत-से भावोंसे दर्शनशक्ति व्यापिका हो रही है। वैसे भी— 'अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः।' (श्वेताश्वतर० ३।१९) सर्वदर्शी, सर्वश्रोता वह सबमें है, परंतु प्रकट अपने स्थानमें—गोलोकमें ही होगा। 'स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठितः स्वे महिम्नि···।' यह विशेषरूपमें प्राकट्य है। वे लता, भूमि सब यहीं हैं, यह ठीक है, परंतु नेत्रदोषसे वे असली रूपमें नहीं दीखतीं। दोषसे—पित्तदोषसे मिसरी भी कड़वी लगती है। ऐसे ही दोषवश व्यापक होते हुए भी श्रीश्यामसुन्दरके दर्शन नहीं होते। यहाँ श्रीवृन्दावनमें जहाँ कांचनमयी भूमि है, वहाँ तरु नीलमणिके हैं, जहाँ पद्मरागमणिकी भूमि है, वहाँ तरु हरितमणि हैं······यों नील, पीत, हरितरूपमें सब लोकोत्तर वस्तु हैं। यत्र-तत्र तथा परिवेष्ठित तरु मानो श्रीराधाकृष्ण ही विहार करते प्रतीत हो रहे हैं। परंतु ये सब असली रूपमें दीखते नहीं, तब इसे नेत्रदोष ही कहना चाहिये। इसके लिये भगवदनुकम्पा प्राप्त हो, दिव्यदृष्टि मिले तो यह सब अद्भुतता दीख पड़ने लग जाय। अन्तरंग दृष्टिसे वे वृक्षादि यह सब कह रहे हैं, पर बहिरंग दृष्टिवश हमें कुछ ज्ञात नहीं होता। सखि, व्रजलीलाके अतिरिक्त श्रीश्यामसुन्दरके विप्रयोग तापमें ये तरु, लता झुलसते क्यों नहीं, इन्होंने एक बार ही नेत्र भरके उन त्रिभुवनसुन्दरका ऐसा दर्शन पाया है कि वह रूपमाधुरी इनकी चक्षुओंमें सदाके लिये बस गयी है, ओझल ही नहीं होती। इन्हें उस कमनीयताका स्थायीभाव प्राप्त हो गया है। ये उस रूपमाधुरीकी लोकोत्तरतापर— आश्चर्यकारितापर मुग्ध हो रहे हैं—स्तब्ध हो रहे हैं। सखि, तब हमें ये क्या जवाब दें, क्या बतायें ? इस प्रकार श्रीव्रजसीमन्तिनी अपने प्राणवल्लभ श्रीश्यामबिहारीको वृक्षोंसे पूछती, वनसे वनमें भटकती फिर रही हैं। कण्टकाकीर्ण गर्तोंमें, अनुकूल-प्रतिकूल भूमिमें घूम रही हैं। उन्हें मार्ग-विमार्गका ज्ञान नहीं है। देहका अनुसन्धान नहीं है। प्रेमोन्मादमें ऊर्मिमाली समुद्रकी-सी इनकी स्थिति हो रही है। उसमें जैसे ज्वारभाटे आते हैं, इन्हें भी कभी कुछ स्मरण- अनुसन्धान हो आता है? कभी भी नहीं। परंतु श्रीभगवान्‌की योगमाया उनके साथ है; वह उनकी रक्षा कर रही है। उन्हें कष्टोंसे बचा रही है। उनकी सेवाके लिये वह तत्पर है। अन्तरंग दृष्टिसे भी—यह तो वृन्दावनधाम है, यहाँ कष्ट कैसा ? किंतु प्रेमियोंकी कितनी दुरवस्था होती है—यह टीकाकार कल्पना करते हैं। यह इसलिये कि साधकोंको आश्वासन मिले, सहारा मिले। साधारणोंकी कौन कहे, ये व्रजदेवियाँ प्रेमपथिकोंकी परमाचार्या हैं। ये बतलातीं हैं—देखो, प्राणधनको ढूँढनेमें कितना क्लेश है, कहीं पाषाणों, वृक्षोंसे टकराते हैं। ऐसे ही भावुक भी अपनेको जीवन-मरणके संशयमें डाले बिना अभीष्ट तत्त्व नहीं प्राप्त कर सकता— न संशयमनारुह्य नरो भद्राणि पश्यति। संशयं पुनरारुह्य यदि जीवति पश्यति॥ बड़े-बड़े सम्राट्, स्वराट्-विराट् ऐसे ही ढूँढ़नेसे मिलेंगे! कोई भी काम प्राणोंकी बाजी लगनेसे ही सिद्ध होगा। यह भाव दिखलानेके लिये ही टीकाकार इतनी बातें कहते हैं। 'आनन्दवृन्दावनचम्पू' में कहा है—जहाँ-जहाँ विषम स्थानोंमें व्रजांगना घूमती हैं, वहाँ-वहाँ उनके परमानुरागवश कठोर-तीक्ष्ण कण्टक भी कोमल-कुसुम हो जाते हैं, जैसे श्रीभगवद्दर्शनसे वज्रसे भी कठोर वस्तु कोमल हो जाती है। गोस्वामीजीने भी कहा— जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी । तजहिं बिखम बिखु तामस तीछी ॥ (रा०च०मा० २।२६२।८) नागिनी पुत्रादिनी है—अपने बच्चोंको भी खा जाती है—'पुत्रादिनी सर्पिणी' इतनी क्रूर है, वह भी भगवद्भक्तोंके सामने अपने स्वाभाविक विषको त्याग