भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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देती है। प्रकृतिके समस्त अंग भागवतकी सेवा करते हैं। 'तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात॥' (रा०च०मा० २।२१६) पृथ्वी श्रीरामभद्रके चरणोंके नीचे अपने कोमल हृदयकमलको बिछाती थी, परंतु भरतके लिये वह इससे भी अधिक कोमल थी। अतः जहाँ वृन्दावन अपने अधीश्वरके लिये कोमल बनता है, वहाँ वह उनके प्रियके लिये कोमल क्यों न होगा ? पहले तो वहाँ कण्टक, शर्करा, कंकड़ हैं ही नहीं, वहाँ तो इन्द्रनील, पद्मरागमणि आस्तीर्ण हैं। पर '......तं सप्रपञ्चमधिरूढ......।' 'गाँठी तो बाँधे नहीं माँगतहू सकुचायँ। तिनके पीछे हरि रहें कहूँ भूखे नहिं रहि जायं ॥' यों प्रकृतिके अणु-अणु इन व्रजदेवियोंकी सेवाके लिये तत्पर हैं। स्वामीको प्रसन्न करनेके लिये पहले स्वामिनीको प्रसन्न करना चाहिये। श्रीकृष्णको प्रसन्न करनेके लिये उनकी अन्तरंगा इन व्रजदेवियोंका पहले प्रसाद प्राप्त करना चाहिये। प्रकृतमें उनका चरित्रगान और उनकी लगनका अनुकरण ही उनके प्रसादका हेतु है। अस्तु, इस तरह वे अपने मनमोहनको ढूँढ़ती फिर रही हैं। अश्वत्थादिमें और भी कल्पना—अश्वत्थ विष्णु- दैवत्य, प्लक्ष ब्रह्मदैवत्य और न्यग्रोध शिवदैवत्य हैं। अतः मानो व्रजांगना अपने प्राणधनको ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरसे पूछती हैं। वे कहती हैं—'आपलोग साधु हैं, आपसे हम अपने चोरको पूछ रही हैं। दूसरे, आपकी शाखा-प्रशाखा दसों दिशामें फैल रही हैं— उन हमारे चितचोरको कहीं अवश्य देखा होगा।' पिप्पल चलदल है, उसे चंचल देखकर व्रजांगनाने समझा—'यह हाथ हिला रहा है, कह रहा है—हमने तुम्हारे श्यामसुन्दरको नहीं देखा। ठीक है, इसे नेत्र नहीं हैं। चलो नेत्रवालेसे पूछें ('प्रकृष्टे अक्षिणी यस्य असौ प्लक्षः') इस प्लक्षके बड़ी-बड़ी आँखें हैं, यह नेत्रवाला है। इसके जो अरुण पल्लव हैं— वे नेत्र हैं। यह ब्रह्मदैवत्य भी है। अच्छा तो तुम्हीं बताओ प्लक्ष ! तुमने कहीं हमारे प्राणको देखा ? अरे यह क्या, यह तो कुछ बोलता ही नहीं, क्या इसने मौनव्रत लिया है ? पर नहीं, इसे वागिन्द्रिय नहीं है, बेचारा कैसे बोले ? सखि ! आओ, इस न्यग्रोधसे पूछें, यह जिह्वावाला है, इसके दल जिह्वाके जैसे हैं। यों नये-नये क्रमोंसे बार-बार पूछती फिरती हैं। फिर कुछ जवाब न मिलनेसे दोषानुसन्धानकी सुध हो आती है। कहती हैं—'सखि, अब जाना, यह ऊँचा (दर्पिष्ठ) होनेसे क्षुद्र है, यह क्षुद्रफल भी है (पीपल जितना बड़ा है, फल उसके उतने ही छोटे हैं), चाहे कितना भी आराधन करें, इससे महाफल—श्याम नहीं मिलेंगे। यह अश्वत्थ है—अस्थायी है।' सहसा 'वट' पर दृष्टि चली जाती है। कहती हैं—'देखो, इसकी शाखा कितनी झुकी हैं, यह विनम्र है। ('नितराम् अग्राणि अधोभूतानि यस्य असौ') शिवदेवताक है; शिव परमवैष्णव हैं। अतः यह अवश्य बतायेगा।' परंतु उत्तरकी कोई आशा न देखनेपर कहती हैं—इसकी बड़ी-से-बड़ी भी उन्नति अवनति ही है। देखो, शाखा नीचे घुसती जा रही हैं—'नितरामग्राणि अधोभूतान्यवनतिः यस्य असौ न्यग्रोधः।' अश्वत्थ परोपकारी नहीं है, अतः 'दरिद्रा' इसमें निवास करती है। बात यह है—दरिद्रा लक्ष्मीकी बड़ी बहन हैं। उसे कोई नहीं ब्याहता था। इसीलिये लक्ष्मीका विवाह भी रुका रहा; क्योंकि छोटे भाई- बहनका विवाह पहले हो जानेसे 'परिवित्ता'— 'परिवित्ती' दोष होता है। अन्ततः बहुत कुछ समझाने- बुझानेपर अश्वत्थने दरिद्रासे विवाह किया। उसे प्रसन्न रखनेके लिये यह तय किया गया कि शनिवारके दिन श्रीनारायणसहित लक्ष्मी वहाँ आकर बसें। अतएव अन्य दिनोंमें अश्वत्थके स्पर्शका निषेध है। यह अश्वत्थ उपकारी नहीं, इसीका फल है, जो इसे दरिद्रा मिली है। श्रीमद्वल्लभाचार्यजीके कथनानुसार श्रीव्रजवनिताऔंने प्लक्षमें यह दोष देखा—'प्लक्ष अपवित्र है, देवताओंने स्वर्गकी कामनासे पशुका आलम्बन किया, उसीसे यह उत्पन्न हुआ, अतः अपवित्र है। तभी तो प्राणजीवनका पता नहीं देता।' यह सब निराश होनेपर कहा जाता है, सान्त्वनाके समय ऐसा नहीं कहा जाता। अथवा अपना मनोरथ सिद्ध न होनेपर भी वे व्रजदेवियाँ वृक्षोंसे असूया नहीं करतीं; क्योंकि वे प्रेममार्गकी आचार्या हैं। अतः कहती हैं—'कच्चित्'—