भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'कुत्सितश्चेतनवर्गोऽपि यस्मात्।' अर्थात् इस वृन्दावन वृक्षसमूहकी अपेक्षा चेतनवर्ग भी कुत्सित है, इन्द्रादि भी निकृष्ट हैं। ब्रह्मा, वह तो आशा लगाये बैठा है— 'वह दिन कब उदित होगा, वह ऊँचा भाग्य कब जागेगा कि जब श्रीवृन्दाटवीमें मैं कुछ—लता-पत्र- पाद-धूलि बनूँगा और किसी बड़भागी व्रजवासीके चरणसे मेरा उद्धार होगा'— तद् भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां यद् गोकुलेऽपि कतमाङ्घ्रिरजोऽभिषेकम्। (श्रीमद्भा० १०।१४।३४) उद्धव भगवान्को बहुत प्रिय थे। भगवान् उन्हें अपनेसे जरा भी कम नहीं मानते थे, श्रीसंकर्षण- बलदेव और श्रीलक्ष्मी भी उद्धवसे अधिक प्रिय न थीं। उनके लिये ये भगवान्के शब्द हैं—'नोद्धवोऽण्वपि मन्यूनः•••• न च सङ्कर्षणो न श्रीः•••• यथा भवान्।' वे महाभाग्यवान् उद्धव भी श्रीवृन्दावनके तृण, गुल्म बननेके लिये तपस्या करते रहे। यह भाग्य वृन्दावनके वृक्षोंको छोड़कर संसारमें और किसका होगा? यों 'कच्चित्' से व्रजांगना वृक्षोंकी प्रशंसा ही करती हैं और कहती हैं—आप परम चेतन हो, कृपा करो, बताओ—'दृष्टो वः कच्चिदश्वत्थ••••' वृक्ष, मानो स्तुतिसे प्रसन्न हो गये। परस्पर प्रश्नोत्तर-परम्परा चलने लगी—किसको बतायें, व्रजबालाओ, तुम किसे पूछती हो? चौरको। क्या चुराया उसने? हमारा मन। चौर कौन हैं? नन्दसूनु। नहीं, वह तो विष्णु है—व्यापक है, नन्दरायने अनन्त तपस्यासे उसे प्राप्त किया है, वह चौर नहीं, आखिर उसने तुम्हारा क्या चुराया? अजी! नन्दसूनु व्यापक-विष्णु होंगे तुम्हारे घरमें, हमारे यहाँ तो वे पक्के चौर हैं, उन्होंने क्या नहीं चुराया, हमारे दहीको चुराया, नवनीतकी चोरी की और अब तो वे हमारे मनको भी चुराकर भाग गये हैं!' मुग्धा गोपी, तुम क्या कहती हो? मन! यह तो तुम्हारे ही पास होगा और दूध, दही, माखनकी तो चोरी गिनी ही नहीं जाती। नहीं-नहीं, वे हमारा मन चुरा ले गये हैं, वे हमारे चितचोर हैं। दूध, दहीकी चोरीपर तो हमने कभी उन्हें ढूँढ़ा ही नहीं। अबकी बार उन्होंने हमारी बड़ी भारी चोरी की है—हमारी मनोमंजूषाका उन्होंने हरण किया है, उसमें धैर्य, लज्जा, विवेक, विज्ञान, धर्मनिष्ठा आदि रत्न भरे रखे हैं। उसे वे ले गये, अब कुछ रह ही नहीं गया। दही, माखन जानेसे हमारी कोई क्षति नहीं थी, हम विवेकादिसे रहित नहीं थीं, पर आज हम उनसे हीन होकर बाल-बिखेरे घूम रही हैं। हाय, हमारा सर्वस्व लुट गया। बताओ, बड़ा पुण्य होगा। सखियो, तुम क्या कह रही हो? उन्होंने तुम्हारा मन कैसे चुराया? क्योंकि वह तो अन्नमय, प्राणमयके भीतर रहता है, वहाँसे कोई भी उसे कैसे ले सकता है? यह मत कहिये, 'प्रेमहासावलोकनैः' वे प्रेमसे हृदयमें प्रविष्ट हुए, मधुर हाससे उस मंजूषाको ग्रहण किया और तुरन्त उलटे पाँव लौट पड़े। प्रेमी हृदयमें घुस जाता है, वह हृदयकी बात जान जाता है। इस समय वे मोहन उदासीन, अग्राह्य, अलक्ष्य, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य बने हैं। पर पहले इतने अनुरागी बने कि हमारे पादसंवाहन करते, वेणी गूँथ देते, नाचते, गाते, जो हम कहतीं, सब करते। इसी प्रेमसे वे हृदयमें प्रविष्ट हुए। उन प्रेमीका हास याद आता है—मालूम होता है, वे अपने उस हृदयहारी हाससे हमें पकड़े हुए हैं। ऐसे ही विभोरताके अवसरपर अवलोकन-कटाक्षोंसे बस; मन लेकर झटसे चले गये। आप कृपाकर बता दो, हम सर्वशून्य होकर उन्हें ढूँढ़ रही हैं। आप बड़े हो, राजा हो, न्याय करो। अथवा मनके तीन भाव हैं—तामस, राजस, सात्त्विक। प्रेम, हास और अवलोकन—इन तीनोंने मनोंको अपहृत किया। यहाँ अलौकिक सद्घन, चिद्घनमें तामस, राजस भाव कहाँसे आये? इसपर श्रीमद्वल्लभाचार्यजीका कहना है—यह यद्यपि लोकातीत है, परंतु यहाँ गोपी कोई तामसी, कोई राजसी आदि हैं। इनमें भी दस भेद हैं। इनमें तामसी तमसे ऊँची हैं। 'प्रेमपत्तन' आदिमें भी यह वर्णन है। जो अन्यत्र प्रधान है, वह प्रेमपन्थमें अप्रधान है। वह भी वैधी भक्तिकी अपेक्षा रागानुगा प्रीतिमें और भी अप्रधान है। वैधी प्रीतिमें सत्य आदि धर्मका ही मन्त्रिमण्डल रहता है। रागानुगामें वह बदल जाता है, वहाँ व्यसन लग जाता है। परंतु यदि भावुकका मन श्रीकृष्णपादारविन्द-