भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमकरन्दका मधुप बन जाय, तब तो फिर महान् वैराग्यादि भी अग्निमें 'राई-नोन' की तरह वारकर फेंक दिये जायँ ! श्रीसनकादि, शुकादि आशावसनदिगम्बर महान् विरक्त थे, पर उन्हें एक व्यसन था—जहाँ मंगलमय भगवान्का चरित्र होता; उसे वे अवश्य सुनते। अन्यत्र आशा दूषण है, कहा भी है—'आशा पिशाची परिमर्दितानाम्...' परंतु यहाँ वह भूषण है, यहाँ आशा, तृष्णा कल्पलता है। अन्य सब कुछ देकर भी इसे भावुक खरीदना चाहता है। तामस स्नेह है, वह एक गाढ़ आसक्ति है, दृढ़ अभिनिवेश है। प्रेमी इसे पाकर किसीकी नहीं सुनता। माता, पिता, वेद, शास्त्र, सज्जन, साधु उसे इस मार्गसे रोकते- रोकते परेशान हो जायँ, पर वह किसीको नहीं मानता। वह उसका प्रियव्यसन मूढ़ग्राह, औरोंकी तो क्या, साक्षात् सृष्टिकर्ता ब्रह्माकी भी बात कान नहीं करता। यह महाअग्निपुंज सूर्यदेव ठण्डा पड़ जाय, चन्द्र जल उठे, दुनिया उथल-पुथल हो जाय, परंतु यह वह प्रेम है, वह तामस स्नेह है, जो किंचिन्मात्र भी शिथिल न होगा। जैसे लौकिक कामिनीको कान्तमें अटूट अनुराग होता है, इन गोपांगनाओंको वैसे ही श्रीकृष्णमें था। वैधी प्रीतिमें इसका तिरस्कार है, परंतु रागानुगामें इसीका आदर है। इस प्रकारकी कृष्णकी तामसी मूर्तिका इन दो श्लोकोंमें वर्णन है— बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्। रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै- वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।५) 'कर्णोत्पलालकविटङ्क०' (श्रीमद्भा० १०। ३३।१६)—'श्यामं हिरण्यपरिधिं वनमाल्यबर्ह०' (श्रीमद्भा० १०।२३।२२)। इनमें शृंगाररससारसर्वस्व उद्वेलित उद्बुद्धरूपमें संयोग, वियोग दोनोंहीके साथ वर्णित हुआ है। यहाँ संयोग तो 'अणोरणीयान्' है और वियोग ही 'महतो महीयान्'। श्रीश्यामसुन्दर वनविहारीने मस्तकपर मुकुट धारण किया है, वह मोरपंखका बना है। उसके मयूरपिच्छमें जो श्यामता है, उससे आसक्ति—तामसता निर्दिष्ट हुई—परम आसक्ति बतलायी गयी। अरुण पल्लवके समान पीताम्बरसे सरस सुकोमलता कही गयी। आम्रपल्लवके निर्देशसे यह कहा गया कि उसे भी शृंगारस्वरूपसे धारण किया है और इससे रंजनशील रागकी सूचना है। व्रजांगनाओंका अनुराग सरल, सुकोमल है। मालाके सौगन्ध्यसे 'सत्त्व' गुण कहा गया। 'सत्त्व' का अभिप्राय है—प्रकाश, 'रज' का अभिप्राय है—हलचल—क्रिया और 'तम' का अभिप्राय है—रुकावट—आवरण। यही प्रकृतिमें भी है। जहाँ 'लीला' है, वहाँ भी एक अवरोध, हलचल और प्रकाश है। पहले श्रीश्यामसुन्दर—मुरलीमनोहरका प्रकाश, फिर उनके दर्शनके लिये चंचलता, इसके बाद उससे आसक्ति—गाढ़मूढ़ता सिद्ध ही है। यह जो प्रेम है, यह तामस है। प्रेमका स्वरूप, आसक्ति— उत्कट उत्कण्ठा है। व्रजांगना कहती हैं—हे वृक्षो, श्रीश्यामसुन्दरके अनुरागसे आवरण हो गया—हमारी बुद्धिपर परदा पड़ गया, हाससे चंचलता—खलबली हो उठी और अवलोकनसे सात्त्विक भाव। उसी समय ये चौरशेखर हमारे चित्तको चुरा ले गये। अब तुम समझो, यों चुरा ले गये। अब ये कहाँ गये ? तुमने देखा हो तो जल्दी बतलाओ। अच्छा व्रजवनिताओ, यह तो बताओ, तुमने उनमें विश्वास कैसे कर लिया ? विश्वास न करनेका कोई कारण नहीं था, क्योंकि हम जिनके राजमें रहती हैं, वे उनके पुत्र हैं—'नन्दसूनु' हैं। हम क्या जानती थीं कि ये पालकके बालक ही हमारे घालक निकल पड़ेंगे। अथवा 'नन्दस्य—सर्वानन्दहेतोरयं सूनुः' हम तो समझती थीं जगदानन्दकारक नन्दके ये सुपुत्र हैं। अतएव हमने उनपर विश्वास किया। हन्त कष्टम्! हम विश्वाससे ठगी गयीं। वृक्षो, तुम बताओ, तुमने उन्हें किसी तरफ जाते देखा है ? इस प्रकार व्रजांगना श्रीकृष्णके विरहमें विह्वल हुई उनका अन्वेषण कर रही हैं और संहत होकर गान करती हुई उन्हें खोजती हैं। फिर-फिर अनुसन्धान होनेसे प्लक्षादिसे पूछती हैं—हमारे चितचोरको बताओ। वह प्रेम, हास और अवलोकनसे हमारे मनको—धैर्य, लज्जा, विवेक, विज्ञानकी मंजूषाको हर ले गये हैं।