भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 380

प्रेम, हास और अवलोकनसे यहाँ सात्त्विक, राजस और तामस भाव बतलाये। प्रथम वस्तुज्ञान अवलोकन, फिर तत्प्राप्तिके लिये व्याकुलता, इसके बाद स्नेहासक्ति, मूर्च्छा हुई। यह बात अन्यत्र भी कही गयी है— 'अदर्शने दर्शनमात्रकामा दृष्ट्वा परिष्वङ्ग···' अर्थात् जबतक प्राणप्रियका दर्शन नहीं मिला, तबतक तो दर्शनकी केवल उत्कट उत्कण्ठा रही। फिर इसके पूरा होते ही आलिंगनकी अभिलाषा जाग उठी। इसके बाद एक विचित्र आसक्ति, विभोरताने वशमें कर लिया। फलतः अब वह उनमें मिल जाना चाहती है और उन्हें अपनेमें मिला लेना चाहती है—दोनों एकमेव हो जाना चाहते हैं। यद्यपि ये शृंगारके भाव हैं—रसीले भाव हैं। पर यह लौकिक शृंगारसे ऊँची वस्तु है। साथ ही इस विषयमें श्रीभरतादि नाट्याचार्योंकी सम्मति है कि ऐसे समस्त शृंगारके उदात्त भाव, भेद, प्राकृत नायक- नायिकादिमें समन्वित नहीं हो सकते, यदि हो सकते हैं तो केवल रसिकशेखर श्रीराधाकृष्णमें ही, उनके प्रेम-सुधासिन्धुके तो एक बिन्दुमें ही ये सब समा जायँगे। इन्हींके प्रसंगमें कहा गया है—'आशास्महे विग्रहयोरभेदम्' दोनों एक-दूसरेके साथ अभेद— ऐक्य चाहते हैं। परंतु ये सब भाव अन्तरंगा आह्लादिनी शक्ति और श्रीश्यामसुन्दरमें ही हैं। अस्तु, प्रकृतमें अभिप्राय यही है कि इस प्रकारसे दर्शन सात्त्विक है और उससे ज्ञान उत्पन्न होता है—'सत्त्वात् सञ्जायते ज्ञानम्' इसके अनन्तर मिलनेकी उत्कण्ठा, फिर तज्जनित गाढ़ आसक्ति—अभिनिवेश होता है। ये सत्त्वादि तीनों प्राकृत सत्त्वादिसे भिन्न हैं। गोपांगना इस 'तामस' का—आवरक अन्धकारका बड़ा आदर करती हैं। उनका कहना है—'हमारे लिये तो कृष्णपक्षके तामस-विस्तारमें अभिसरणकी सुविधा रहती है, यह पक्ष बहुत उत्तम है।' उनके यहाँ रज-गोरज-धूलिका भी बहुत आदर है—'वह ऐसा व्याप्त हो कि हमें श्रीश्यामका छिपकर दर्शन करते कोई देखे ही नहीं।' उन्हें यों परम प्यारे साँवरेके दर्शनमें 'रज' और 'तम' दोनों ही अपेक्षित हैं, दूसरे, 'रज' को ये श्यामसुन्दरके आगमनकी सूचना समझती हैं; क्योंकि सायंकाल गोचारण करके आते हुए श्रीगोपालके आगमनकी सूचना दर्शनोत्कण्ठिता व्रजबलाओंको आगे उड़ती गोधूलिसे मिलती। वैसे भी 'रज' में (गुण और धूलि दोनोंमें) क्रिया—चंचलता होती है। प्रियदर्शनपक्षमें चंचलता-विह्वलताका बहुत महत्त्व है। एक भावुकने कहा—'कृष्णभावरसभाविता मतिः क्रीयतां यदि कुतोऽपि लभ्यते' भाई, प्रेमियो! 'कृष्णभावरस- भावितामति' यदि खरीदी जा सके तो खरीद लो, चाहे वह किसी भी कीमतपर मिले। अच्छा, अगर ऐसा है तो हम खरीदेंगे, कहिये क्या दाम है? उसकी कीमत, बहुत ही सस्ती लेकिन बहुत ही महँगी भी— चंचलता एकमात्र मनकी चंचलता है। बस, प्राणप्रियके दर्शनके बिना न रह सकना, उससे व्यथित, अशान्त रहना, यही उस अमूल्य मतिका मूल्य है। यहाँ अशान्ति, बेचैनी जितनी ही बढ़े, उतनी ही अधिकाधिक मूल्यवती है—महार्घ है। यों भी 'रज' का महत्त्व है। हाँ तो अवलोकनादिसे सात्त्विक भावसे प्रकाश अर्थात् गोपांगनाओंको पहले दर्शन, फिर हासरूप राजसभावसे प्राप्तिके लिये विह्वलता, अन्तमें तामससे गाढ़ासक्ति, मूर्च्छा हुई। इन्हीं काण्डोंसे वे मन खो बैठीं। अथवा प्रेम जगन्मोहन महौषध है—बेहोश करनेकी दवा है। उन चोरशेखरके पास इसके भण्डार भरे पड़े हैं। उन्होंने यह मोहन महौषध देकर अपने दो साथियोंको भेजा। वे हैं—हास और अवलोकन— नेत्र। जब श्रीश्यामसुन्दर चौर हैं तो उनके हास, अवलोकन, नेत्र, हाथ, पाँव सब चौर हैं। चौरके साथी सब चौर, इनमें बाँके-बिहारीके बाँके नेत्र तो पक्के चोर हैं, उनसे कोई बचा ही नहीं। एक बार सरसिजसम्राट्ने विचार किया कि 'यह अलबेलो ब्रजसाँवरिया, सबनकूं ठगतो फिरे है, सबकी चोरी करै है, कहुँ मेरीउ शोभाकूं यह चुराय न ले ज्यायँ, मैं अपनो खूब पक्को बन्दोबस्त कर लऊँ।' यह निश्चयकर वह कमलाधिपति जलाशयमें उत्पन्न हुआ, वहीं बसा—'यहाँ कैसे आयेंगे श्याम? पर वे बड़े नटखटिया हैं, कहीं जलविहारके लिये ही आ निकले तो मेरी इस अद्भुत शोभाको अवश्य चुरा लेंगे, वे पक्के चोरजारशिखामणि हैं। मेरी सम्पत्ति यह