भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासपञ्चाध्यायी ३७१ एकमात्र शोभा ही है। मुझे खूब सावधान रहना चाहिये।' जलविहार गर्मीमें होता है, शरदमें लोग शीतसे डरते हैं, सहसा जलमें नहीं प्रविष्ट होते। यह सोचकर वह सरोजराज शरद्ऋतुमें और तत्रापि जलमें उत्पन्न हुआ, वहीं बसा। इतनेपर भी सन्तोष न हुआ, उसने अपनी रक्षाके लिये चारों ओर बहादुर कमलोंको पहरेदार खड़ा किया, कितनोंहीको अपने पास बसाया- यदि उन्हें चोरी करना ही इष्ट होगा तो इन्हींकी सम्पत्ति हरके अपनी आदत पूरी कर लेंगे, मुझतक नौबत न आयेगी, पर इसके बाद भी डरके मारे उसने शतपत्रोंको द्वारपाल बनाया। उनके भी चारों ओर काँटे लगाये, स्वयं सबके बीचमें रहा। अब रक्षाके बाह्य प्रयत्न-प्रबन्धसे वह निश्चिन्त हुआ। किंतु अब भी उसका भय गया नहीं। वह सोचता रहा-'उनकी चोरी बड़ी अद्भुत है, वे आँखसे काजल निकाल लेते हैं।' अतः अब अपनी शोभाकी रक्षाके लिये उसने आभ्यन्तर प्रयत्न किया-उस छवि-सम्पत्तिको अपने अन्तरतम कोषमें छिपाकर रखा। फिर भी सचमुच महान् आश्चर्य कि श्रीश्यामबिहारीके उन नेत्रारविन्दोंने- निरुपम नेत्रोंने सरसिजसम्राट्की श्रीको-सम्पत्तिको चुरा ही लिया और किसीने देखताक नहीं- 'कब चुराया?' श्रीगोपीगीतके इस श्लोकमें यह बात कही गयी है- शरदुदाशये साधुजातसत्सरसिजोदरश्रीमूषा दृशा। (श्रीमद्भा० १०।३१।२) ऐसे चौर्यकुशल अपने साथी नेत्र-चौरोंको अवलोकनको श्रीश्यामसुन्दरने व्रजसीमन्तिनियोंकी चोरी करने भेजा-'जाओ, गोपियोंके मनोरत्नको- धैर्यलज्जादि रत्नोंको चुरा लाओ।' साथमें मोहन- औषध दिया, जिसके प्रयोगसे वे जागती भी सो जायें। उन रूपशेखर श्यामके हास और अवलोकन ही इस कार्यके लिये पर्याप्त थे, इनमें प्रेम-सम्मोहन और मिल गया-अब कहना ही क्या था? हे महावृक्षो! इस प्रकार प्रेमहासावलोकनसे उन्होंने हमारा सब कुछ चुरा लिया, हम उन्हें पूछ रही हैं, बताओ, वे किस ओर गये हैं? गोपियो, तुम सचमुच भोली हो, पर अपने रत्नोंकी-सर्वस्वकी रक्षामें इतनी ग़फ़लत क्यों तुमने की? सज्जनो, यह तुम्हारा कहना ठीक है, पर हम तो यही विश्वास करती रहीं, ये श्रीनन्दसूनू हैं- आनन्ददायी हैं, हमें क्या ज्ञान था कि इनसे प्रेम करके ऐसे सन्ताप उठाना पड़ेगा। यों व्रजांगना अपने ही प्रश्नोत्तर करती पूछती-फिरती हैं। जबतक उन्हें उत्तरकी आशा रहती है, विविध भाँति पूछती हैं। निराश होनेपर उनमें दोषानुसन्धान करती हैं-सखि, इसने मौनव्रत लिया है। नहीं, यह गूँगा है। यह भी बात नहीं, इसे तो प्रियतमके दरस-परससे-गाढ़ प्रेमसे स्तब्धता हो गयी है। हाँ हाँ, यह कह सकते कि बीमारीमें आ गया है, हमारी सुनता ही नहीं। मेरी समझमें तो सखि, ये उनकी विभूति हैं, इन्हें श्रीश्यामका अधिक सहयोग प्राप्त हुआ है। ये उनके साथी होनेसे उनके पक्षपाती हैं, कभी पता न देंगे। यह सब कुछ नहीं, असल बात यह है कि ये सब महत्त्वाभिमानी हैं। सोचते हैं-'इन गँवारी ग्वालिनोंसे क्या बोलें।' यही समझकर ये हमारी उपेक्षा कर रहे हैं। अतएव इनमें कोई गुण नहीं। चलो अब आगे चलें, उस 'कुरबक' से पूछें*— गोपांगनाओंका कुरबक-अशोक आदिसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना देखो सखि! इसमें सुमनस (पुष्प) भी लगे हैं। यह अच्छे मनवाला है, इससे पूछना चाहिये। इसके स्वरूपसे भी प्रतीत होता है, इसे श्रीश्यामसुन्दरके अवश्य दर्शन हुए हैं। तभी यह प्रसन्न हो रहा है। इसके अम्लान पुष्प विकसित हो रहे हैं। यह अपने सौरभसे मनको, दिग्दिगन्तको आमोदित कर रहा है। इसका अन्तःकरण पवित्र है। दूसरे, फूलोंका फूलना, यह तो प्यारेके दर्शनके बिना सम्भव नहीं-हृदयका फूल उसके बिना खिलता नहीं। यह इसका आमोद भी तभी है, जब यह स्वयं दर्शनका आनन्द ले चुका

  • कच्चित् कुरबकाशोकनागपुन्नागचम्पकाः । रामानुजो मानिनीनामितो दर्पहरस्मितः ॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।६) कुरबक, अशोक, नागकेशर, पुन्नाग और चम्पा ! बलरामजीके छोटे भाई, जिनकी मुसकानमात्रसे बड़ी-बड़ी मानिनियोंका मानमर्दन हो जाता है, इधर आये थे क्या ?