भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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है। सखि, इसका सहवास करेंगी, इससे प्रश्न करेंगी तो हमारा भी मन खिलेगा, हमें भी मंगलमय अंगकी प्राप्ति होगी। अहो, इसका तो नाम भी बड़ा अच्छा है—'कौ पृथिव्यां यशसो रवो यस्य सः एव 'कुरवकः' : अखण्ड भूमण्डलमें इसका यश व्याप्त है। यह श्रीश्यामके ही समान है। इसके वे सखा हैं, अपने समान नाम-रूपवाले हैं। अतः इससे पूछो। इससे पता चलेगा। कुरबक ! तुम बड़े अच्छे हो, तुमने कहीं श्यामसुन्दरको देखा हो तो बताओ, वे हमारा मन चुराके भाग आये हैं। कुरबककी ओरसे शंका करके कहती हैं—सखि, यह तो कह रहा है— व्रजांगनाओ, तुम्हारे ही दोषसे—गर्वसे श्याम चले गये हैं, अब तुम क्यों रोती हो ? तो कहती हैं—श्यामसुन्दर तो 'दर्पहरस्मितः' हैं। माना, हमारे ही दोषसे वे गये, पर वे अन्तर्हित क्यों हो गये? क्योंकि उनके तो स्मितमात्रसे ही हमारा दर्प दूर हो सकता था। अमृतसे लाभ होनेकी जगह विषका प्रयोग कौन करेगा ?— व्रजजनार्तिहन् वीर योषितां निजजनस्मयध्वंसनस्मित । (श्रीमद्भा० १०।३१।६) जिनकी मधुर मनोहर मुसकान अनन्त कन्दर्पके दर्पको दलित कर देती है, कामिनीके काम-मदका मर्दन कर देती है, वे—'रामानुजो मानिनीनाम्' (श्रीमद्भा० १०।३०।६) मानिनीके मानका मर्दन करनेके लिये इस अरण्यमें क्यों घूम रहे हैं? कहो कुरबक ! अरे, हम इतना अनुनय कर रही हैं और यह बोलतातक नहीं ? सखि ( 'कुत्सितो रवो यस्य सः, अथवा कुत्सितात् रवात् कं सुखं यस्य स कुरवकः') जिसे दूसरोंके रोनेसे सुख मिले, यह तो वह है। हमारे रोनेसे यह प्रसन्न हो रहा है। देखो, फूल खिले हैं, सौरभ फैल रहा है। सचमें यह भी निष्ठुर श्रीश्यामकी तरह ही है, उन्हें भी हमारा रोना ही अच्छा लगता है। गोपियो ! योगीन्द्र-मुनीन्द्रवन्दितपादारविन्दसे तुम पादसंवाहन कराओ—यह क्या उचित है? इसी तुम्हारे दर्पको दूर करनेके लिये वे अन्तर्हित हो गये हैं। नहीं, यह काम तो 'स्मित' से ही चल जाता, पर वे तो हमारे रोनेसे खुश होते हैं, अतः अन्तर्हित हुए हैं। मृगयु (व्याध) हरिणियोंको वीणावादन करके मोहित कर लेता है। फिर उन्हें जालमें फँसाकर उनके रोनेसे प्रसन्न होता है। हम हरिणाक्षियोंको अपने कटाक्षशरसे विद्ध और वंशीरवसे मुग्ध करके अब रोती देखकर वे श्यामसुन्दर प्रसन्न हो रहे हैं। इस तरह वे भी कुत्सित रवसे प्रसन्न होनेवाले कुरवक ही हैं। आगे अशोकसे पूछती हैं। पहले उसकी स्तुति करती हैं—सखि! यह बहुत सुन्दर वृक्ष है, इसके पास जानेसे ही शोक मिट जाता है—'नास्ति शोको यस्य स अशोकः ।' वह है आत्मवित्, क्योंकि— 'तरति शोकमात्मवित्।' आत्मा कौन है? श्रीकृष्ण, उनको जान लेनेसे सब शोक-मोह दूर हो जाते हैं— 'तत्र को मोहः कः शोकः....।' अशोकके मिले बिना शोक मिटता नहीं। अशोकके संगसे अशोक हो जाता है। अतः हे अशोक! हम तुमसे पूछती हैं, बतलाओ, वे चितचोर मोहन कहाँ गये ? जैसे चन्दन अपने पासके वृक्षोंको चन्दन बना देता है—सुगन्धित बना देता है, वैसे ही तुम्हारे पास आयी हमको श्यामका पता देकर अशोक बनाओ, बड़ी कृपा होगी। अरे! यह भी कुछ नहीं बोलता। बोले क्या, जिसे स्वयं दुःखका अनुभव नहीं, वह दूसरेकी पीड़ाको क्या जाने ?—'यथा कण्टकविद्धाङ्गो......' (श्रीमद्भा० १०।१०।१४), 'जाके पाँव न फटी बिवाई। सो क्या जाने पीर पराई॥' हमारे विरहकष्टको यह जानता ही नहीं, कैसे दूर करेगा। यह तो एक अशोक है, श्रीजानकीजी तो अशोकवाटिकामें टिकी थीं। वे बहुत भी एकका शोक दूर न कर सके। यह भी मोहनका ही साथी है। आगे चलो। 'नागपुन्नागचम्पकाः' (श्रीमद्भा० १०।३०। ६) सखि, नागकेशरको देखो 'न अगः साधारणो वृक्षो यस्याः सा......' यह पुमान् नाग है। ये दोनों गजेन्द्रगति श्रीमोहनकी गतिको जानते हैं। हे चम्पक! तुम्हारा वर्ण हमारे श्यामके शरीरपर विराजमान हैं, तुम उन्हींकी तरह चपल ('चपि चापल्ये') भी हो। तुम्हीं लोग हमारे प्राणधनका परिचय दो। यहाँ व्रजांगनाओंमें—मुग्धा, मध्या, प्रगल्भा, मानिनी बहुत भेद हैं। उनमेंसे मानवती व्रजांगना कहती हैं—