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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 778 में से

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पृष्ठ 383

श्रीरासपञ्चाध्यायी ३७३ 'नागपुन्नागचम्पकाः।' 'तुम हमारे चोरको बताओ।' मानवती यह चाहती हैं कि श्रीनन्दनन्दनको यह पता न चले कि 'हम उन्हें ढूँढ़ रही हैं' '...नेति नेति वचनामृत बोलत...' ये स्वप्नमें भी यह प्रकट न होने देंगी कि हम उन छबीले श्यामपर मुग्ध होकर उन्हें ढूँढ़ रही हैं। इसलिये ये ब्रजयुवतियाँ यों पूछ रही हैं—'हे नागपुन्नागचम्पकाः' हमें उन श्यामसे कोई गर्ज नहीं, केवल वे हमारी चीज चुराकर ले गये, अतः 'सोऽस्याभिर्भर्तव्यः' हम उन्हें पकड़ेंगी। कदाचित् 'पुन्नाग' कहे—'अरी ब्रजांगनाओ, तुम अबला हो और वह बलवान् है, तुम उसे कैसे धरोगी ? इसपर कहती हैं, आखिर वे हैं तो 'रामानुज' श्रीबलरामके छोटे भाई ही, क्योंकि—'बलाधिक्याद् बलं विदुः।' (श्रीमद्भा० १०।८।१२) वह तो हमसे कम बलवान् ही हैं।' इसी सम्बन्धमें गोपांगना नागसे पूछती हैं—हे नाग, तुम साधारण अग (वृक्ष) नहीं हो। तुम श्यामसुन्दरके सदृश हो। उन नागसदृश भुजदण्डवाले श्यामको बतलाओ, तुमने कहीं उन्हें देखा है ? 'अहो अमी देववरामरार्चितं × × × × तमोऽपहत्यै तरुजन्म यत्कृतम्॥' (श्रीमद्भा० १०।१५।५) श्रीभगवान्ने स्वयं श्रीमुखसे इन वृक्षोंकी स्तुति की है। ये साधारण वृक्ष नहीं हैं, ये योगीन्द्र-मुनीन्द्र- वन्दित वृक्ष हैं। ये सुमन और फलका उपहार लेकर अपने शाखारूप शिखाग्रभागसे भगवद्वन्दन करते हैं। ये इसलिये प्रणाम करते हैं कि 'तम मिटे'। परंतु यह बात जँचती नहीं; क्योंकि जब श्रीउद्धव, श्रीब्रह्मा- जैसे श्रीवृन्दावनके 'तरु, गुल्म' होना चाहते हैं, तब इनमें 'तम' कैसा ? इससे तो इनकी महिमा सिद्ध होती है। यद्यपि यह ठीक है, परंतु इसमें वृक्षोंका भाव दूसरा है। वृक्ष सोचते हैं—'ये पक्षी, ग्वालबाल, गैया, जहाँ-जहाँ श्रीश्याम कन्हैया पधारते हैं, वहाँ-वहाँ पहुँच जाते हैं, परंतु हम तो ऐसा नहीं कर सकते। हमें तो श्रीश्यामसुन्दर स्वयं ही पधारकर आलिंगन, स्पर्श दें, तब हमारी इच्छा पूर्ण हो। अतः इस 'तम' को दूर करनेके लिये यह इनका यत्न है; क्योंकि ये बड़े हैं—दिव्य हैं—उदार हैं, निःस्वार्थ भावसे परोपकार करना महानुभावोंका स्वभाव होता है। परंतु यह इनकी दिव्यता सर्वसाधारणको नहीं ज्ञात है, जैसे भगवान् श्रीकृष्णका ईश्वरत्व सब नहीं जान सके; वैसे ही इनका वास्तविक स्वरूप अप्रकट है। इनका दिव्य स्वरूप, श्रीयमुनाका मणि-हीरक-रचित तट और वहाँ दुग्धधाराप्रवाह यदि साधारण जनवेद्य हो जाय तो तुरन्त पहरा बैठ जाय, परंतु किन्हीं महानुभावोंको यह सब सदा साक्षात् रहता है। ऐसे ही एक महानुभावने एक अभिमानी सम्राट्‌को यहाँका एक पत्थरका टुकड़ा बतलाया, जो बहुत मूल्यवान् हीरकखण्ड था; सम्राट्‌का समस्त साम्राज्य भी उस टुकड़ेके बराबर नहीं निकला। हाँ तो इस दृष्टिसे 'तमोऽपहत्यै' प्रकाश करनेके लिये, लोगोंको बोध देनेके लिये 'तरु जन्म' है। जिस समय अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक अप्रकट—गुप्त रहकर लीला करते हैं, उनके परिकर भी छिपकर लीलामें सम्मिलित होते हैं। ब्रजांगना कहती हैं, हे तरुओ! उसी स्वरूपमें आप वृक्ष हो, आपने हमारे प्राणप्यारेको इधर कहीं जाते देखा हो तो कहो। हम आपका बड़ा अनुग्रह मानेंगी। ब्रजांगनाओंकी बहुत मिन्नत-आरजू करनेपर भी जब आशा पूर्ण न हुई, तब वही निन्दामें बदल गयी—'सखि! रूप और गुणकी बात तो दूर रही, पहले इसका नाम ही देखो कैसा डरावना है— 'नाग-सर्प!' श्रीश्यामसुन्दरने भी प्रेमहालाहलसे हम सबको वियोगमें विमोहित किया और ये भी उसी प्रकार कष्ट दे रहे हैं। इसके अतिरिक्त यह पुन्नाग है, पुरुष जाति बड़ी कठोर होती है, वह हम अबलाओंके कष्ट नहीं जानती। चलो सखि, ये नहीं बतलायेंगे।' यों जब ब्रजांगना निराश होती हैं, तब उनसे असूया करती हैं। भाव यह है कि जिससे श्रीश्यामसुन्दरका पता मिले, उसकी स्तुति है। जो श्रीकृष्णतत्त्वको नहीं बतला सकते, उनकी स्तुति ही क्या ? एक मुग्धा अनभिज्ञा नायिकाने प्रश्न किया— 'आखिर सखि! श्यामसुन्दर चले क्यों गये?' इसपर एकने उत्तर दिया—'इसलिये कि अकेले श्रीघनश्यामको

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