भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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तुम अनेकोंने घेर लिया, इससे वे डरकर भाग गये।' दूसरी कहने लगी—'अरे नहीं, वे तो परम बलवान् हैं,—'रामानुजो मानिनीनाम्' श्रीबलरामके अनुज हैं, स्वयं भी बलवान् फिर भाईका भी बल, कहीं उनसे कह दें तो एक मुशल-प्रहारमें ही वारा-न्यारा हो जाय। इसलिये सखि, उन्हें हमसे कैसा डर? अतः यह बात नहीं, वस्तुतः वे हमारे मानापनोदनार्थ कहीं छिप गये हैं।' यह रासलीला श्रीरासेश्वरीके मनको आमोदित करनेके लिये हुई। उनकी यह इच्छा हुई कि 'श्रीगोपीजनवल्लभ आकर समस्त गोपियोंके साथ कैसे विहार कर सकते हैं' यह देखें। वैसे ही श्रीवृषभानुनन्दिनीके एक-एक अंगसे अनेक-अनेक गोपांगनाओंका प्राकट्य हुआ है। अवान्तर प्रयोजन यह भी कि श्रुतिरूपा, मुनिरूपा गोपियोंको भी प्रसन्न किया जाय। उत्तम लीला तब बने, जब सब सख्यभावापन्न हों; परंतु यहाँ सबमें समान भाव हो गया—'हम भी श्यामसे वेणी गुँथायेंगी, हम भी पादसंवाहन करायेंगी' और होना चाहिये था यह भाव केवल एक श्रीराधाजूमें ही। श्रीश्यामसुन्दर तो अपनी अभिन्नात्मा एक श्रीवृषभानुललीके प्राकट्यपर ही रास कर सकते थे; उन्होंने एक उन्हें ही महत्त्व देकर उन्हें ही प्रसन्न करनेके लिये रास चाहा था, पर जब सबमें समान भाव आ गया, तब वे भाग गये। 'बह्व्यः सपत्न्य इव गेहपतिं लुनन्ति॥' (श्रीमद्भा० ७।९।४०) वाली बात वे कैसे सहते? परंतु इसका भी समाधान हुआ—अनन्तसमुद्रतरंग महासमुद्रके परतन्त्र हैं। इसी आशयसे श्रीभगवच्छंकरपादने भी कहा है— 'सत्यपि भेदापगमे, नाथ! तवाहम्, न मामकीनस्त्वम्। सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः।' भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र पूर्णपुरुषोत्तम हैं, महानायक हैं; अनेक गोपियोंसे डरकर वे भाग नहीं सकते। गोपांगना अनेक रहें, अनन्त रहें, कोई बात नहीं; परंतु वहाँ जो मान, ईर्ष्या, असूया आदिकी सृष्टि हो गयी, यही ठीक नहीं हुआ। भगवान् वहाँ नहीं विराजते जहाँ ईर्ष्या आदि हों। यदि इन भावोंसे गोपांगनाएँ महाराससौख्यरसास्वादमें विघ्न हो गयीं तो ये इनके मान-दर्प आदि तो भगवान्‌के एक स्मितमात्रसे दूर हो जाते हैं। उन्हें श्रीशुकदेवजीके कविनिबद्व वक्तृप्रौढोक्तिद्वारा 'दर्पहरस्मित' कहा है। ऐसी स्थितिमें भगवान् अन्तर्हित क्यों हुए? ये सब व्रजांगनाओंके उक्तिवैचित्र्य हैं। पहले एक नायिकाकी शिकायत थी, 'वे चोर हैं, मनोरत्नमंजूषाको चुरा ले गये।' अब मानवतियोंकी शिकायत है, 'वे दर्प-मान चुरा ले गये, हमारा सर्वस्व लूट ले गये, हाय! हम अब क्या करें? श्यामसुन्दरने अपने 'स्मित' से हमारा मान चुरा लिया, हमें निर्धन बना दिया। अतः हम अपना मान खोजने जा रही हैं। बतलाओ, हे पुन्नाग! बतलाओ, वे कहाँ गये?' 'अबला बालाओ! तुम उन्हें कैसे धरोगी?' इसपर कहती हैं—'रामानुजो मानिनीनाम्' श्रीबलरामसे हम जरा लज्जा करती हैं, वे तो उनके छोटे भाई हैं और छोटे होनेसे ही निर्बल। हम उन्हें बाहुलतासे वेष्टित और नयनशरसे विद्ध करके आँचलसे बाँधकर रखेंगी। फिर वे निर्बल हैं, तभी तो भाग गये। यों इस प्रसंगमें मुग्धा, मध्या, प्रगल्भा आदि नायिकाभावापन्न गोपांगनाओंके भाव हैं। लोकमें जब भावुक अपनेको अभीष्टपूर्ति- प्रसंगमें समर्थ नहीं पाता, तब वह आश्रय लेता है महान्‌का, देवका। उसमें स्त्रीहृदय-मातृहृदय कोमल होता है, परदुःखसे सत्वर द्रुत होता है। भावुकशेखर श्रीगोस्वामीजीने अपनी 'विनय-पत्रिका' के ४१वें पदमें 'श्रीरघुनाथजी मेरी सुध लें' इसके लिये श्रीजनकनन्दिनीजीसे प्रार्थना की है—'कबहुँक अंब, अवसर पाइ। मेरिऔ सुधि द्याइबी, कछु करुन- कथा चलाइ॥' वस्तुतः श्रीश्यामसुन्दर कृष्णतत्त्वका— निर्गुण निराकारका सम्मिलन अधिगति शक्तितत्त्वकी आराधना भी ब्रह्मविद्याद्वारा ही होती है। 'केनोपनिषद्' में एक कथा है—इन्द्र, वायु, यम, वरुणादि देवोंको गर्व हो गया। उसे दूर करनेके लिये तेजःपुंज रूपमें 'ब्रह्म' प्रकट हुआ। उसे देवता नहीं पहचान सके— 'यह कौन है?' उसका पता लेने एक-एक देवता गये। अग्निदेव पहले उसकी परीक्षा लेने गये, पर जाज्वल्यमान उस तेजोराशिको देखकर बोलनेकी