भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 385

श्रीरामपञ्चाध्यायी ३७५ हिम्मत न पड़ी। तब उस तेजःपुंज यक्षने कहा- तुम कौन हो, तुम्हारा क्या सामर्थ्य है? अग्निने उत्तर दिया-'मैं अग्नि हूँ। सबको क्षणभरमें जला सकता हूँ।' यक्षने उसके सामने एक तृणखण्ड रख दिया। कहा- 'इसको जला दो।' बहुत जोर लगानेपर भी अग्नि उसे नहीं जला सका। लज्जित होकर लौट आया। इसी प्रकार क्रमसे वायु, वरुण सब गये, पर उस तिनकेको न वायु उड़ा सका, न जल गला सका, सब हतप्रभ होकर लौट आये। अन्तमें इन्द्र गये। इस अवसरपर वह तेजःपुंज अन्तर्हित हो गया। इन्द्रको इससे बड़ा पश्चात्ताप हुआ-'हा, मुझे तो उस तत्त्वके दर्शनतक न हुए।' फिर इन्द्रने ब्रह्मविद्याकी आराधनासे उसकी सहायतासे उस तत्त्वका ज्ञान प्राप्त किया। देवताओंका दर्प मिट गया। भगवान् श्रीरामके उपासक श्रीजानकीमाताकी स्नेहभरी अनुकम्पासे श्रीरामतत्त्वके साक्षात्कारमें सफलप्रयत्न होते हैं। भगवान्‌की अन्तरंग शक्ति उनकी अपेक्षा कोमल मानी जाती है। स्तुतिकुसुमांजलिकार श्रीजगद्धरभट्टने अपनी स्तुतिमें सरस्वतीसे कहा- मातः सरस्वति ! आप व्याकुल, हताश न होओ, धैर्य धारण करो, अवश्य भगवान् शिव आपकी सुध लेंगे, आप गुणगान करती चलो। फिर, उस दरबारमें आपका पक्ष समर्थन करनेवाली, श्रीगंगा, चन्द्रकला और पार्वती उपस्थित हैं। वे प्रसंग पड़नेपर आपका पक्ष समर्थित करेंगी; क्योंकि स्त्री अपनी स्त्री जातिका अवश्य पक्षपात करती है। यदि भगवान् कठोर हैं तो वे उन्हें कोमल बना देंगी— मात: सरस्वति बधान धृतिं त्वदीयां विज्ञप्तिमार्त्तिविधुरां विभवे निवेद्य। देवी शिवा शशिकला गगनापगा च कुर्वन्त्यवश्यमबलाजनपक्षपातम् ॥ (स्तोत्र ११, श्लोक २४) अगले श्लोकमें कहा-हे सरस्वति ! यदि आप यह समझती हो कि 'चन्द्रलेखा' स्वभावसे ही कुटिल है-टेढ़ी है और गंगा नित्य तरंगिता-अनिश्चित बुद्धिवाली है, इनसे सहायताकी सम्भावना नहीं; तब भी कोई चिन्ता नहीं; क्योंकि भगवती जगदम्बा पार्वती तो वहाँ विराजमान हैं ही, वे शैलराजकी पुत्री हैं-सद्वंशकी सन्तान हैं, कुलीन हैं। अतएव दयार्द्रहृदया हैं, पराये दुःखसे अकारण ही उनका हृदय पिघल जाता है। वे अवश्य आपको मदद देंगी— एषा निसर्गकुटिला यदि चन्द्रलेखा स्वर्गापगा च यदि नित्यतरङ्गितेयम्। देवी दयार्द्रहृदया तु नगेन्द्रकन्या धन्या करिष्यति न ते निबिडामवज्ञाम् ॥ (स्तोत्र ११, श्लोक २५) सारांश यह कि काम न चलनेपर सबको अबलाओंकी शरण लेनी पड़ी है। यहाँ गोपीजनने भी यही निश्चय किया-ये वृक्ष-पुरुष हमारी पीड़ा नहीं जानते। चलो, इस तुलसीसे पूछें, ये परम अन्तरंगा हैं। गोपांगनाओंका तुलसी आदिसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना कच्चित्तुलसि कल्याणि गोविन्दचरणप्रिये। सह त्वालिकुलैर्बिभ्रद् दृष्टस्तेऽतिप्रियोऽच्युतः ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।७) हे तुलसि ! आपकी तुलना जगत्‌में नहीं है। एक बार श्रीनारदजी कल्पवृक्षका पुष्प लाये, उसे श्रीकृष्णको समर्पित किया। उन्होंने श्रीरुक्मिणीको दे दिया। नारदजीको अवसर मिला, नारदविद्या करनेका। उन्होंने झट श्रीसत्यभामासे जाकर कहा-'आप कहती थीं, 'मैं भगवान्‌को अति प्रिय हूँ।' पर वह पुष्प तो उन्होंने आपको नहीं दिया।' नारदजीका मन्त्र चल गया। श्रीसत्यभामा मान करके बैठ गयीं। श्रीकृष्णको यह सब ज्ञात हुआ। वे श्रीसत्यभामाके पास गये। उनको समझाया-'हम तुम्हें कल्पवृक्ष ही ला देंगे' और ला भी दिया। घूमते-घामते श्रीनारद फिर वहाँ आ निकले। सत्यभामाने उन्हें अपना सौभाग्य बतलाया। उन्होंने दानके गीत गाकर कल्पवृक्षके सहित श्रीकृष्णको दान

  • (अब उन्होंने स्त्रीजातिके पौधोंसे कहा-) 'बहन तुलसि ! तुम्हारा हृदय तो बड़ा कोमल है, तुम तो सभी लोगोंका कल्याण चाहती हो। भगवान्‌के चरणोंमें तुम्हारा प्रेम तो है ही, वे भी तुमसे बहुत प्यार करते हैं। तभी तो भौंरोंके मँडराते रहनेपर भी वे तुम्हारी माला नहीं उतारते, सर्वदा पहने रहते हैं। क्या तुमने अपने परम प्रियतम श्यामसुन्दरको देखा है?'
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ) · पृष्ठ 385, कुल 778 में से · BharatKosha