भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
श्रीरामपञ्चाध्यायी ३७५ हिम्मत न पड़ी। तब उस तेजःपुंज यक्षने कहा- तुम कौन हो, तुम्हारा क्या सामर्थ्य है? अग्निने उत्तर दिया-'मैं अग्नि हूँ। सबको क्षणभरमें जला सकता हूँ।' यक्षने उसके सामने एक तृणखण्ड रख दिया। कहा- 'इसको जला दो।' बहुत जोर लगानेपर भी अग्नि उसे नहीं जला सका। लज्जित होकर लौट आया। इसी प्रकार क्रमसे वायु, वरुण सब गये, पर उस तिनकेको न वायु उड़ा सका, न जल गला सका, सब हतप्रभ होकर लौट आये। अन्तमें इन्द्र गये। इस अवसरपर वह तेजःपुंज अन्तर्हित हो गया। इन्द्रको इससे बड़ा पश्चात्ताप हुआ-'हा, मुझे तो उस तत्त्वके दर्शनतक न हुए।' फिर इन्द्रने ब्रह्मविद्याकी आराधनासे उसकी सहायतासे उस तत्त्वका ज्ञान प्राप्त किया। देवताओंका दर्प मिट गया। भगवान् श्रीरामके उपासक श्रीजानकीमाताकी स्नेहभरी अनुकम्पासे श्रीरामतत्त्वके साक्षात्कारमें सफलप्रयत्न होते हैं। भगवान्की अन्तरंग शक्ति उनकी अपेक्षा कोमल मानी जाती है। स्तुतिकुसुमांजलिकार श्रीजगद्धरभट्टने अपनी स्तुतिमें सरस्वतीसे कहा- मातः सरस्वति ! आप व्याकुल, हताश न होओ, धैर्य धारण करो, अवश्य भगवान् शिव आपकी सुध लेंगे, आप गुणगान करती चलो। फिर, उस दरबारमें आपका पक्ष समर्थन करनेवाली, श्रीगंगा, चन्द्रकला और पार्वती उपस्थित हैं। वे प्रसंग पड़नेपर आपका पक्ष समर्थित करेंगी; क्योंकि स्त्री अपनी स्त्री जातिका अवश्य पक्षपात करती है। यदि भगवान् कठोर हैं तो वे उन्हें कोमल बना देंगी— मात: सरस्वति बधान धृतिं त्वदीयां विज्ञप्तिमार्त्तिविधुरां विभवे निवेद्य। देवी शिवा शशिकला गगनापगा च कुर्वन्त्यवश्यमबलाजनपक्षपातम् ॥ (स्तोत्र ११, श्लोक २४) अगले श्लोकमें कहा-हे सरस्वति ! यदि आप यह समझती हो कि 'चन्द्रलेखा' स्वभावसे ही कुटिल है-टेढ़ी है और गंगा नित्य तरंगिता-अनिश्चित बुद्धिवाली है, इनसे सहायताकी सम्भावना नहीं; तब भी कोई चिन्ता नहीं; क्योंकि भगवती जगदम्बा पार्वती तो वहाँ विराजमान हैं ही, वे शैलराजकी पुत्री हैं-सद्वंशकी सन्तान हैं, कुलीन हैं। अतएव दयार्द्रहृदया हैं, पराये दुःखसे अकारण ही उनका हृदय पिघल जाता है। वे अवश्य आपको मदद देंगी— एषा निसर्गकुटिला यदि चन्द्रलेखा स्वर्गापगा च यदि नित्यतरङ्गितेयम्। देवी दयार्द्रहृदया तु नगेन्द्रकन्या धन्या करिष्यति न ते निबिडामवज्ञाम् ॥ (स्तोत्र ११, श्लोक २५) सारांश यह कि काम न चलनेपर सबको अबलाओंकी शरण लेनी पड़ी है। यहाँ गोपीजनने भी यही निश्चय किया-ये वृक्ष-पुरुष हमारी पीड़ा नहीं जानते। चलो, इस तुलसीसे पूछें, ये परम अन्तरंगा हैं। गोपांगनाओंका तुलसी आदिसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना कच्चित्तुलसि कल्याणि गोविन्दचरणप्रिये। सह त्वालिकुलैर्बिभ्रद् दृष्टस्तेऽतिप्रियोऽच्युतः ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।७) हे तुलसि ! आपकी तुलना जगत्में नहीं है। एक बार श्रीनारदजी कल्पवृक्षका पुष्प लाये, उसे श्रीकृष्णको समर्पित किया। उन्होंने श्रीरुक्मिणीको दे दिया। नारदजीको अवसर मिला, नारदविद्या करनेका। उन्होंने झट श्रीसत्यभामासे जाकर कहा-'आप कहती थीं, 'मैं भगवान्को अति प्रिय हूँ।' पर वह पुष्प तो उन्होंने आपको नहीं दिया।' नारदजीका मन्त्र चल गया। श्रीसत्यभामा मान करके बैठ गयीं। श्रीकृष्णको यह सब ज्ञात हुआ। वे श्रीसत्यभामाके पास गये। उनको समझाया-'हम तुम्हें कल्पवृक्ष ही ला देंगे' और ला भी दिया। घूमते-घामते श्रीनारद फिर वहाँ आ निकले। सत्यभामाने उन्हें अपना सौभाग्य बतलाया। उन्होंने दानके गीत गाकर कल्पवृक्षके सहित श्रीकृष्णको दान
- (अब उन्होंने स्त्रीजातिके पौधोंसे कहा-) 'बहन तुलसि ! तुम्हारा हृदय तो बड़ा कोमल है, तुम तो सभी लोगोंका कल्याण चाहती हो। भगवान्के चरणोंमें तुम्हारा प्रेम तो है ही, वे भी तुमसे बहुत प्यार करते हैं। तभी तो भौंरोंके मँडराते रहनेपर भी वे तुम्हारी माला नहीं उतारते, सर्वदा पहने रहते हैं। क्या तुमने अपने परम प्रियतम श्यामसुन्दरको देखा है?'
३७६ भक्तिसुधा कर देनेकी सलाह दी। इस दान लेनेके अधिकारीकी खोज होनेपर स्वयं नारद दानपात्र बने। श्रीसत्यभामाने श्रीकृष्णसे कहा—'नाथ, जन्मजन्मान्तरमें मैं आपकी ही दासी बनूँ, आप ही मुझे मिलें, एतदर्थ मैं आपको दान कर देना चाहती हूँ।' दान हो गया। अब श्रीकृष्णसे नारदजीने कहा—चलिये, आप मेरा कमण्डलु उठाइये। मुझे आप महादानमें मिले हैं। श्रीकृष्ण नारदके साथ चल पड़े। अब तो बड़ी आफत मची। श्रीसत्यभामाने स्वप्नमें भी यह नहीं विचारा था कि इस दानसे उन्हें श्रीकृष्णसे वियुक्त होना पड़ेगा। अन्ततोगत्वा श्रीनारद किसी तरह मनाये गये। श्रीकृष्णके बदलेमें उनके बराबर हीरे, माणिक्य, जवाहरात सब तराजूमें चढ़ाये गये, पर श्रीकृष्णका पलड़ा हिलातक नहीं। श्रीसत्यभामा परेशान थीं, किंकर्तव्यविमूढ़ थीं। उधर श्रीरुक्मिणीको इस काण्डका पता लगा, वे आयीं। उन्होंने एक प्रकार निकाला, कहा—बहन, यह सब हीरेकी हारें उतार दो, इनकी जगह एक तुलसीदल, केवल एक तुलसीदल रखो। ऐसा ही हुआ। श्रीकृष्णका पलड़ा ऊपर उठ गया। यह है तुलसीका महत्त्व। अतएव तुलसीदलपर श्रीकृष्ण अपनेको बेचते हैं, जिसकी इच्छा हो, खरीद ले—'तुलसीदलमात्रेण जलस्य चुलुकेन च। विक्रीणीते स्वमात्मानं........' इन दृष्टियोंसे गोपांगनाओंने कहा—गोविन्दचरणप्रिये— हे तुलसि! आप परम सौभाग्यवती हो, कल्याणी हो। हम तो श्रीश्यामविप्रयोगसे अति तप्त हैं, पर आपका उनसे कभी विच्छेद होता ही नहीं। आपको श्रीगोविन्दके चरण अतिप्रिय हैं। वैसे वैजयन्तीमालाके साथ भगवान्के वक्षःस्थलमें भी तुलसी विराजमान है, पर उसे उनके श्रीचरणोंसे ही अनुराग है। जैसे तुलसीको भगवान् प्रिय हैं, तुलसी भी भगवान्को वैसे ही प्रिय हैं। कहा है— 'तेऽतिप्रियोऽच्युतः.....' इस अच्युतसे यह बतलाया गया है कि तुलसीका भगवत्पादारविन्दसे कभी विश्लेषण होता ही नहीं, उसका अविघटित सम्बन्ध है। यहाँ 'गोविन्दचरणप्रिये।' (श्रीमद्भा० १०।३०।७) इस पदमें 'चरण' से पूज्यता ली गयी है; क्योंकि आगे गोपियोंने कहा—श्रीतुलसीकी माला मोहनके वक्षःस्थलपर विराजमान है, उसके मकरन्दरसामृतके लोभी भ्रमर भी उसे घेरे हैं। यदि चरण ही प्रिय होता तो 'सह त्वालिकुलैर्बिभ्रद् दृष्टस्तेऽतिप्रियोऽच्युतः॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।७) आदि कैसे कहा जाता? अस्तु। यहाँ व्रजांगना तुलसीका भाग्य सराह रही हैं—सखि तुलसि, देखो! एक हमारा भाग्य है और एक आपका। हमें वे श्यामविहारी दर्शन देनेसे भी जी लुका रहे हैं, हम कोई भार नहीं, हम चरणस्पर्शमात्र चाहती हैं। आप तो उनके विशाल वक्षःस्थलपर विराजमान हो। हमें तो वह अति दुर्लभ है, रंककी साम्राज्य-कामना है। हमने सब कुछ छोड़ा; गुरुजनलज्जा आदि सबको तिलांजलि दी। तब जन्म-जन्मकी तपस्यासे वह प्राणाधार आज प्राप्त हुए थे, परंतु हम प्राप्त न कर सकीं। देखो सखि! तुलसि! हमारे साथ कोई उपद्रव नहीं और आपके साथ ये भौंरेके झुण्ड मँडरा रहे हैं, इतनेपर भी यह आपका ही सौभाग्य है, जो इन सबके साथ वे देवकीसुत आपको धारण किये रहते हैं। हम तो अलिकुल-मालासे व्याप्त नहीं हैं—अलिकुलसंकुल नहीं हैं, फिर भी दर्शनतक नहीं देते, छिपते फिरते हैं। आप अति प्रिय हो। प्रिय लक्ष्मी भी है। उनके वामवक्षपर वामावर्त सुवर्णरोमराजी भी लक्ष्मी ही है। 'हारहास उरसि स्थिरविद्युत्।' (श्रीमद्भा० १०।३५। ४) वह वहाँ लताकी तरह विराजमान है। परंतु सखि, आप उनसे भी बढ़कर हो, आप सर्वांगव्यापिनी हो— दोनों वक्षःस्थलोंपर विराजती हो, वह भी भौरोंके साथ। इससे लक्ष्मी अवश्य नाराज होती होंगी—'मेरी छातीपर सौत बिठा दी।' सो यहाँ तो साक्षात् ही तुम्हें धारण करके सौत बैठा दी। देवकृत भगवत्स्तुतिसे भी प्रसंग पुष्ट होता है— पर्युष्टया तव विभो वनमालयेयं संस्पर्धिनी भगवती प्रतिपत्नीवच्छ्रीः। यः सुप्रीतममुयार्हणमाददन्नो भूयात् सदाङ्घ्रिशुभाशयधूमकेतुः॥ (श्रीमद्भा० ११।६।१२) श्रीलक्ष्मीके लिये सापत्न्यभावके विषयवाली उस सूखी वनमालासे सम्पादित भक्तके पूजनको सुसम्पादित बहुत उत्तम माननेवाले हे प्रभो! आपका
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श्रीरासपंचाध्यायी ३७७ चरणारविन्द हमारे पापोंको नष्ट करे। वनमाला पतिदेवके दर्शनकी लालसा अथवा व्रजवासियोंकी वन्यपुष्पस्तवकोंकी बनी है, उसमें तुलसी मिश्रित है— सेवाके निमित्त व्रजमें सदा रहती हैं। यहाँ 'श्रयते' तुलसीकुन्दमन्दारपारिजातसरोरुहैः। यह आत्मनेपद है। इसका अभिप्राय यह कि यहाँ पञ्चभिर्ग्रथिता माला वनमाला प्रकीर्तिता ॥* श्रयणका फल कर्तृगामी, आत्मगामी है अर्थात् श्रीरमा वह इस समय बासी हो चुकी, कुरकुराती है, अपनेको सौभाग्यशालिनी बनानेके लिये व्रजमें नित्य चुभती भी है, परंतु वह भक्तकी पहनायी हुई है, उसे ही निवास करती हैं। वैकुण्ठमें श्रीनारायणके समीप जबतक भक्त नहीं उतार दे, प्रभु नहीं उतारते। लक्ष्मी तो वह 'श्रयते' सेव्या है। यहाँ सेविका है। इन उससे प्रतिस्पर्द्धा करती है—'संस्पर्धिनी भगवती भावोंसे यह स्पष्ट है कि श्रीराधा तथा उनके प्रतिपत्निवच्छ्रीः।' भगवान् लक्ष्मीकी नाराजगीकी लोमकूपोंसे उत्पन्न नित्यसिद्धा आदि सखी लक्ष्मीसे परवाह न करके उसे धारण किये हैं। 'पर्युष्टया'— कहीं अधिक बढ़कर हैं, पर वे इस समय अपनेको पर्युषितया (इडभावश्छान्दसः) 'वशकान्तौ' से बना भूलकर वैसा कह रही हैं। हाँ तो व्रजांगना तुलसीसे है। यह तुलसीमाला सर्वांगमें कान्तिमती बनकर कहती हैं—आप लक्ष्मीसे भी बढ़कर हो, आपको विराजती है। व्रजांगना कहती हैं—अतः तुम अतिप्रिया श्यामसुन्दरने अपना समस्त वक्षःस्थल समर्पित कर हो तुलसि! वैसे सर्वाधिकसौभाग्य श्रीरासेश्वरीज्यू दिया। 'गोविन्दचरणप्रिये' पदमें चरणका अर्थ आदिका ही है, पर इस समय अपने सौभाग्यको आचरण—चेष्टा या लीला है 'गोविन्दस्य चरणम्- भूलकर साधारणके प्रेमको सिहाती है। पीछे भी आचरणम्, चेष्टा, लीला वा प्रिया यस्या सा कहा—'पूर्णाः पुलिन्द्य उरुगायपदाब्जरागश्रीकुङ्कुमेन तत्सम्बुद्धौ' जिसका आशय यह हुआ कि हे तुलसि! दयितास्तनमण्डितेन।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१७) आपको श्रीगोविन्दकी लीला अत्यन्त प्रिय है। आपको सखि, हम तो अपूर्ण हैं, 'पुलिन्द्यः पूर्णाः' सापत्न्यभाव भी है। श्रीश्यामसुन्दरके कम्बुकण्ठमें दयितास्तनमण्डितकुंकुमसंलग्न पादसे प्राणधन दूर्वामें विराजमान मुक्तावैजयन्ती आदि किसी (माला)-से घूमे, इससे वह कुंकुम दूर्वामें लग गया, उसे सुन्दर आपको द्वेष भी नहीं है। आप कल्याणी हैं। आप पाकर पुलिन्दियोंने अपने शरीरमें लपेट लिया। वे श्यामप्रिया हैं। हमें बताओ, आपने उन्हें कहीं इधर कृतकृत्य हो गयीं। परंतु इससे उनके मनमें स्मरका देखा है? ('स्मरणं स्मरः') उद्रेक हुआ। पुनः उसी कुंकुमको हे तुलसि! आप स्वयं मंगलमयी हो, अपने लगाकर उन्होंने उसे दूर किया। अतः वे धन्य हैं। हम आराधकको—भक्तको भी मांगल्य प्रदान करती हो। तो अनन्त कालसे उसका सेवन कर रही हैं, फिर भी जो भक्त आपको श्रीकृष्णभगवान्के श्रीकण्ठमें, श्रीचरणमें कृतकृत्य न हुईं।' इस प्रकार ये सब गोपांगना समर्पित करते हैं, उन्हें आप उनसे मिला देती हो, आप अपनेको भूलकर प्रेमविभोर बनी ऐसा कह रही हैं। कल्याणी हो। हमें भी बतलाओ, श्रीश्यामसुन्दर किस इसपर एक प्रसंग और भी है— तरफ निकल गये हैं? हे सखि! आपको श्रीगोविन्दके 'जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः चरण और आचरण, लीलादि भी अति प्रिय हैं। हम श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि।' सबको भी वे श्रीगोकुलेन्द्र गोविन्दचरण तो अवश्य (श्रीमद्भा० १०।३१।१) प्रिय हैं, परंतु यह उनका आचरण प्रिय नहीं है—जो आपके जन्मसे व्रजका सौभाग्य खूब बढ़ा, वह हमें वियोगिनी बनाकर छिप गये हैं। सखि! आपको सर्वदेशशिरोमणि माना गया। श्रीलक्ष्मी यहाँ श्रीश्यामरूपमें उनके वियोगका कभी अवसर ही नहीं आया। कारण अवतीर्ण श्रीविष्णुदर्शनार्थ ही केवल नहीं आयीं, कि आप सौभाग्यवश अनुकूल आचरणमें ही रहीं। जब अपितु वे शाश्वत नित्य यहाँ रहती हैं। वे अपने आप वृन्दा थीं, तब भी अनुकूल आचरणमें रहीं। हम * तुलसी, कुन्द, मन्दार, पारिजात तथा कमल—इन पाँच पुष्पोंसे गूँथी हुई माला वनमाला कहलाती है।
३७८ भक्तिसुधा तो आर्यधर्मादिको त्यागकर उन्हें चाहती हैं, तब वे मिलते नहीं, पर आप नहीं चाहती थीं, तब भी जालन्धर-वेशसे उन्होंने आपको ग्रहण किया। अन्तमें वर भी दिया—'कभी विप्रयोग न होगा।' भोग लगनेके समय और सब हट जायें, भोग-रागमें कमी हो जाये, पर आप नहीं हट सकतीं, आपकी कमी नहीं हो सकती। आपके बिना भोग ही नहीं लग सकता। देखो सखि तुलसि ! आपको मकरन्दलोभी भ्रमरोंसे संकुलित होनेपर भी भ्रमरोंकी गुनगुनाहट और लक्ष्मीकी नाराजगीकी परवाह न करके भी उन्होंने धारण किया है। एतावता यह भी बतलाया कि 'आप बहुवल्लभा हैं— 'बहवो वल्लभा यस्याः', तब भी वे आपको धारण किये हैं। पहले 'वृन्दा' रूपमें जालन्धर तुम्हारा वल्लभ था। अब ये मधुलम्पट मिलिन्दवृन्द मकरन्दपानके लिये आपको घेरे हैं, फिर भी सखि, आपको श्रीश्यामसुन्दर धारण किये हैं। हम तो हे तुलसि ! एक वल्लभा हैं, लोकधर्म, कुलधर्म—सब कुछ त्यागकर अपना सर्वस्व उनपर न्योछावर करके उन्हें, केवल उन्हें ही स्वीकार कर चुकी हैं, पर फिर भी वे हमें दर्शनतक नहीं देते। इससे तो उनका सब आचरण आपके अनुकूल पाया जाता है। अतः आप अच्युतकी परमप्रेयसी हो। अतएव वे आपसे सदा अच्युत (अविश्लिष्ट) रहते हैं। अतएव जाना जाता है, आपका बहुत शुद्ध और गाढ़ प्रेम है।' अथवा 'गोविन्दचरणप्रिये' श्रीगोविन्दका चरण ही प्रिय है जिन्हें, ऐसी आप हो। हे तुलसि ! आपने प्रथमसे ही दैन्यभावका आश्रय लिया—श्रीश्यामसुन्दरके श्रीचरणको अंगीकृत किया—दास्यभावसे, दासी होकर, मानिनी या कान्ता बनकर नहीं। आपमें किसी भावका गर्व नहीं, औद्धत्य नहीं, अतएव 'तेऽतिप्रियोऽच्युतः।' कभी उनसे आपका विश्लेष नहीं। हममें तो सखि तुलसि ! 'मान' है और यह बड़ा दोष है। यह इसीका फल है, जो हमें आज असह्य विप्रयोग हो रहा है। आप गोविन्दचरणप्रिया हो। जिन्हें श्रीचरण प्रिय होते हैं, उन्हें कभी वियोग नहीं होता। यही विशेषता है। यही दास्यभावकी महिमा है। श्रीमद्वल्लभाचार्यजीका कथन है—श्रीचरणरजसे ही भक्त बनते हैं। अतः उनका श्रीभगवान्से विश्लेष नहीं होता। यह उस रजमें खास बात है। अतएव कहा भी है— श्रीर्यत्पदाम्बुजरजश्चकमे तुलस्या लब्ध्वापि वक्षसि पदं किल भृत्यजुष्टम्। यस्याः स्ववीक्षणकृतेऽन्यसुरप्रयास- स्तद्वद् वयं च तव पादरजः प्रपन्नाः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।३७) कृपा करके श्रीभगवान्ने लक्ष्मीको अपने वक्षःस्थलपर स्थान दिया। यह नायिकाका परम सौभाग्य है, पर लक्ष्मी डरती रही। वह जानती थी— श्रीचरणाम्बुजरजके बिना वियोग हो जाता है। अतः इतना ऊँचा स्थान पाकर भी उसने चरणरज ही चाहा, इसके लिये उसने तपस्या की—'यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाचरत्तपः...।' (श्रीमद्भा० १०।१६।३६) पहले भी श्रीलक्ष्मीका ऊँचा ही स्थान था, ब्रह्मादि- स्तम्बपर्यन्त उसके अपांगमोक्षकी—जरा-सा देख देनेभरकी कामना किया करते थे। इसपर भी उसे सन्तोष नहीं था। अपने कमलोंके कोमल भवनको छोड़कर श्रीभगवान्के पाद-पंकजरजको ही उसने उत्तम आश्रय समझा— ब्रह्मादयो बहुतिथं यदपाङ्गमोक्ष- कामास्तपः समचरन् भगवत्प्रपन्नाः। सा श्रीः स्ववासमरविन्दवनं विहाय यत्पादसौभगमलं भजतेऽनुरक्ता॥ इस प्रकार श्रीमन्नारायणके विशाल वक्षको— निःसपत्न स्थानको पाकर भी श्रीलक्ष्मी उनके सपत्न स्थान श्रीचरणोंको ही चाहती रहीं। श्रीभगवान्के चरणारविन्दकी महिमा ही ऐसी है। उनके चरणोंमें विराजमान वनमालाके गुच्छ आदिसे उत्थित, मकरन्दसे मिश्रित वायुका झोंका सनकादिके नासाविवरमें जाते ही उनके चित्त और तनु दोनोंमें क्षोभ उत्पन्न कर देता है। बरबस ब्रह्मचिन्तनसे उनका मन चंचल हो जाता है— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः । अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) उसी महत्त्वको समझकर श्रीमहालक्ष्मी तुलसीके
श्रीरासपंचाध्यायी ३७९ साथ—सपत्नीके साथ भी श्रीभगवान्के चरणरजको ही चाहती हैं। अतएव तुलसी, दीर्घदर्शिनी तुलसी पहलेसे ही उस महामहिमपदाम्बुजको ग्रहण किये रहती है; क्योंकि लक्ष्मीको सदा यह भय रहता है कि कोई श्रीमद्भगवच्चरणरज-उपासक महातपस्वी मुझे अपने वशमें न कर ले। इसलिये श्रीमद्भगवद्विप्रयोगसे बचे रहनेके लिये वह निरन्तर उनके पादाम्बुजरजमें संलग्न रहती है। तुलसी इस बातको समझती है, अतः वह पहलेहीसे उन चरणोंमें लिपटी रहती है। तभी श्रीश्यामसुन्दर उसके लिये अच्युत हैं। इस प्रकार जो चरणप्रिया है, वही प्रियतमके वक्षःस्थलपर स्थान पाती है। इसी प्रसंगपर एक दूसरी दृष्टिसे व्रजांगनोक्ति है—सखि तुलसि! ये मधुव्रत जो गुंजारव कर रहे हैं, यह वस्तुतः आपका यशोगान कर रहे हैं। सखि! आपको तो क्या, आपके कारण आपके अनुरागी भौंरोंतकको भगवान् श्यामसुन्दर नहीं हटाते अथवा ये भ्रमर क्या हैं? ये उनकी मूर्तिमती अभिलाषा हैं; क्योंकि वे श्यामल हैं, अतः ये भी श्यामल हैं। हे तुलसि ! आपने उन्हें ऐसा वशमें किया है कि वे अपने मनोरथोंको मूर्तिमान् बनाकर उनके द्वारा आपका यशोगान किया करते हैं और आपका मकरन्द पान किया करते हैं। आप धन्य-धन्य हो। सखि! हमें भी उनसे मिला दो—गोविन्दचरणप्रिये! हम तो श्रीमुखचन्द्रकी अधरसुधाकी पिपासु हुईं, मानिनी हुईं, अतः भटक रही हैं। सखि! आप चतुर हो। अथवा— कच्चित्तुलसि कल्याणि गोविन्दचरणप्रिये। सह त्वालिकुलैर्बिभ्रद् दृष्टस्तेऽतिप्रियोऽच्युतः॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।७) हे तुलसि ! हमलोग तो ऐसी हतभागिनी हैं कि हमपर श्रीश्यामसुन्दर सदा 'अच्युत' रहते हैं—कभी भी कृपासे—प्रेमसे—द्रवीभूत नहीं होते। आप बड़ी सौभाग्यशालिनी हो। अनुकम्पा करके हमें बतलाओ, आपने उन प्राणजीवनको इधर कहीं देखा है? अथवा 'गोविन्दचरण' में 'चरण' पद आदरार्थक है, जैसे— गुरुचरण, पितृचरण; इसके अनुसार—परम आदरणीय गोविन्द गोकुलेन्द्र जिसे प्रिय हैं, वह तुलसी उनकी अतिप्रिया है। अतः कभी भी उनसे उसका वियोग नहीं है। अथवा—'गोभिः श्रुतिभिः विन्द्यते— प्राप्यते यः स गोविन्दः' अर्थात् जो वेदके द्वारा प्राप्त किया जा सके, वह हुआ गोविन्द, कहा भी है— 'वेदान्तवेद्यचरणेन मयैव गीतम्' अर्थात् वेदशास्त्रके महातात्पर्यका विषय ही अत्यन्त प्रिय है जिसे, ऐसी हे तुलसि ! आपने यहाँ कहीं उन मनमोहनको देखा हो, बताओ। आपको उनसे बड़ा प्रेम है। देखो, अभी-अभी उन्होंने अपनी वनमालामें आपको नोंचकर लगाया है। अभी इधर गये हों, बता दो। यहाँ जिससे वे पूछ रही हैं, वह तो तुलसीका क्षुप है और यह यहाँ लगा है। इससे इस समय श्रीकृष्णका कोई सम्बन्ध नहीं। व्रजांगना भी इस बातको जान रही हैं, तब उनकी यह सब प्रश्न-परम्परा श्रीचरणधृत तुलसीसे होगी। परंतु वह तो उन्हें दीखती ही नहीं; तब प्रश्न वे किससे कर रही थीं? ऐसे संशयपर यह समाधान समझना चाहिये कि जंगलमें खड़ी तुलसीकी सजातीय श्रीचरणधृत तुलसीसे गोपांगनाओँने प्रश्न किया। श्रीकृष्ण इधरसे निकले तो उनके साथ वर्तमान तुलसी इस तुलसीसे मिलती गयी, इससे इस वनस्थ तुलसीको यह भी मालूम हो गया कि श्रीश्याम इधर पधारे हैं। अब वह गोपांगनाओंको उत्तर दे, न दे, यह बात दूसरी है। परंतु इन दृष्टियोंसे प्रष्टव्यता उसमें अवश्य है। अब तुलसीसे मानिनी गोपांगना पूछती हैं— 'हे सखि! उन अतिप्रिय श्यामको तुमने इधर कहीं देखा हो तो बतलाओ। हाँ, वे अतिप्रिय हैं, हमारे- जैसी परप्रेयसियोंका अतिक्रमण करके आ गये हैं। वे तुमपर मुग्ध हैं, विभोर हैं। ऐसे मुग्ध कि संसारकी समस्त वस्तुओंका, प्रिय वस्तुओंका अतिलंघन उन्होंने कर डाला और मधुर मधुपमूर्ति बनकर तुम्हारे पास चले आये। सखि! तुमने उनके चित्तको खूब आकृष्ट किया।' इस प्रकार यहाँ मानिनी उक्तिप्रसंगमें 'अतिप्रिय' पदमें एक ही समासको भिन्नार्थक करके दो चमत्कारिक अर्थोंकी सृष्टि है—'अतिक्रान्ताः प्रियाः अस्मादृशोऽपि येन सः तथा अतिक्रान्तं प्रियं जगद्वस्तुमात्रं येन
३८० भक्तिसुधा
सः'। 'फिर सखि! तुम कल्याणी हो, तुम्हारी जो पूजा करते हैं, उनका तुम कल्याण करती हो। हम भी पूजा करती हैं, कहो, 'मनमोहन' किधर गये हैं?' लौकिक दृष्टिसे भी उन सर्वमनोहर मोहनका मन हमपर कृपालु हो अथवा हमारा मन उनमें लग जाय यह चाहते ही हैं, बात एक ही है। परंतु स्थिति यह है कि चाहनेपर भी नहीं लगता। श्रीविष्णुके द्वारा जालन्धररूप लेकर वृन्दाका पातिव्रत भंग करनेकी शंका बहिर्भूतोंकी है। वैसे जालन्धर श्रीविष्णुका अंश था और वृन्दा श्रीराधाका अंश। केवल अपूर्ण स्वरूपमें आसक्त अपने भक्तको छलसे, बलसे जैसे बने भगवान् अपने पूर्णरूपमें ग्रहण करते हैं। सब सती चाहेंगी कि वृन्दाका महत्त्व प्राप्त हो, हमारे मनको भगवान् स्वीकार करें। वस्तुतः सब धर्मोंका तात्पर्य ही यह कि श्रीश्यामसुन्दर बलात् हमें चाहें। नहीं तो कौन चाहता है कलत्र, पुत्र, वित्तसे चित्त हटाना? स्त्री यदि जारमें मन ले जाय तो कभी उसका उद्धार नहीं। पतिप्रेम तो शालग्रामबुद्ध्या सेव्यमान परमपुरुषको प्राप्त करना है। परमपतिको प्राप्त करनेके लिये ही पतिकी पूजा है। इसी स्वधर्मबुद्ध्या क्रियमाण कर्मसे प्रभु प्रसन्न होकर स्वात्मसमर्पण करते हैं। तभी वे अमूर्त मनोरथोंको मूर्त मिलिन्द बनाकर वृन्दाके तुलसीके मकरन्दका पान करते हैं। इन दृष्टियोंसे तुलसि! तुम्हारा बहुत महत्त्व है, श्रीश्याम तुम्हारे वशमें हैं। अतः इधर आये हों तो बतलाओ, सखि! जरा हम भी उन चतुर चोरका दर्शन तो करें। व्रजांगनाओंन्द्वारा तुलसीमें दोषानुसन्धान जब व्रजांगनाओंने देखा, 'हम इतनी देरसे इसको मना रही हैं, मिन्नतें कर रही हैं, पर यह जरा भी नहीं पिघलती, देखतीतक नहीं।' तब वे निराश हो गयीं। उनमें असूया उत्पन्न हो गयी—वे अब तुलसीके उन्हीं गुणोंमें दोष देखने लगीं—'सखि! यह बड़ी गर्वीली है, इसे अपने श्यामके अतिप्रियत्वका बड़ा अभिमान है। क्यों नहीं, इसका नाम ही आखिर 'तुलसी' ठहरा— 'तुल्याः ('न अस्मान्') स्यति (खण्डयति) इति तुलसी।' जिन श्यामसुन्दरमें यह रत है, हम भी उनमें अनुरक्त हैं। अतः हमें सौतें समझकर हमारा खण्डन कर रही है। सखि! यह तो दासी थी—चरणाधिकारिणी है, पर देखो उन साँवरे मोहनका अन्याय कि उन्होंने सेविकाको प्रेयसीका स्थान दिया है। अस्तु, दासीको प्रेयसी बनाया सो तो बनाया, पर यह भी नहीं सोचा कि 'यह नायकोंसे घिरी है।' इस रूपमें तो यह हमारे हृदयोंको टूक-टूक कर रही है। हाय, जिसपर हमारा अधिकार है, उसीको इसने अपने वशमें कर लिया। यह तुलसी कल्याणी अर्थात् भद्रा है। 'विचरति भद्रा त्रिभुवनमध्ये।' नाममात्र ही भद्रा है, वस्तुतः है यह भी अभद्रा ही। भरणी, भद्रासे लोग बचते हैं। हाँ, सम्प्रयोगमें यह भद्रा कल्याणी अवश्य है।' कुछ व्रजांगना कहती हैं—'सखि! जाने दो; यह तो भगवदीया है। उनकी रुचिके बिना यह हमें उनका पता न देगी; क्योंकि यह अतिप्रिया है। अतः चलो, इसकी सौतोंसे पूछें—वे इससे दुःखी होंगी, अवश्य बता देंगी।' ('मालत्यदर्शि नः कच्चित्') यहाँ एक साथ मालती आदि कईके नाम हैं। वस्तुतः अनन्तनामवाली दास्यभाववती ये सखी हैं। 'प्रिय सखि! मालति! तुम जानती हो इधरसे कहीं श्यामसुन्दर निकले हैं, तुमने देखा है?' मालतीको प्रफुल्लित देखकर, उससे मकरन्द गिरता देखकर व्रजांगना कल्पना करती हैं और उससे कहती हैं—'सखि! मालति! तुम्हें श्रीश्यामके दर्शन अवश्य हुए हैं, तभी तो तुम्हारे विकसित सुमनोंसे सौमनस्य झलक रहा है। सखि! तुमने उन्हें देखा ही नहीं, अपितु उनका स्पर्श तो तुम्हें अवश्य प्राप्त हुआ है, तभी तो यह तुम्हें मुकुलित भावके बहाने रोमांच हो रहा है; क्योंकि श्रीश्यामके अंगसंगके बिना रोमांच हो नहीं सकता। अगर हो सकता है तो उनके स्पर्शसे ही। यह अन्वयव्यतिरेकसे ही दीख रहा है। इसके अतिरिक्त ये मकरन्दबिन्दु भी गिर रहे हैं। अरे, ये मकरन्दबिन्दु नहीं, ये तो स्पष्ट ही आनन्दाश्रु हैं। सखि! बस, अब हमसे मत छिपाओ, यह सब चमत्कार तो उन श्रीश्यामबिहारीके दर्शन आदिके बिना नहीं हो सकता।' इससे व्रजांगनाओंको श्रीकृष्णका स्मरण आ गया, वे बीचमें उन्हें ही उपालम्भ देने लगीं—
श्रीरासपंचाध्यायी ३८१ 'का स्त्र्यङ्ग ते कलपदायतमूर्च्छितेन सम्मोहितार्यचरितान्न चलेत्रिलोक्याम्।' (श्रीमद्भा० १०।२९।४०) 'हे मोहन! आपके कलपदायतसे, मधुर संगीतलहरीसे, कौन देवी-दानवीतक, जड़-चेतनतक मोहित होकर आर्यधर्मसे विचलित न हो जायगी? सूर्यसे जैसे दिन, आपके रूपसे वैसे ही संसारमें सौभग सौन्दर्य है। आपके दर्शनके लिये गायें भी, पशु भी लालायित रहते हैं'— गावश्च कृष्णमुखनिर्गतवेणुगीत- पीयूषमुत्तभितकर्णपुटैः पिबन्त्यः। शावाः स्नुतस्तनपयः कवलाः स्म तस्थु- र्गोविन्दमात्मनि दृशाश्रुकलाः स्पृशन्त्यः॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।१३) वे आपके मुखसे निकले वेणुगीतपीयूषका अपने कर्णरूप दोनों पानपात्रोंको सावधानीसे उठाकर पान करती हैं। वे अपने बाहुओंसे आपका सुस्पर्शसौख्य लेनेमें असमर्थ हैं; क्योंकि उनके बाहु इस योग्य नहीं। अतः सजल नेत्ररन्ध्रोंसे आपकी मधुर मूर्तिको हृदयमें पधराकर ('हृदि स्पृशन्त्यः') उसका वे निर्विघ्न आलिंगन करती हैं और दूध पी रहे उनके बछड़े आपको देखकर वेणुनाद सुनकर चकित रह जाते हैं, स्तनोंसे बहते और मुखमें गये दूधको पीना भूल जाते हैं, अतएव वह बाहर यों ही झरने लगता है। हरिणियोंकी भी यही दशा है— धन्याः स्म मूढमतयोऽपि हरिण्य एता या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेषम्। आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।११) वे एक तो पहले ही मूढ़मति हैं, फिर नन्दयशोदानन्दन श्रीश्यामसुन्दरको विचित्र वेशधारी देखकर और उनके विचित्र वेणुनादको सुनकर अपने पतियोंके साथ और भी मूढ़मति हो जाती हैं, सुधबुध भूल जाती हैं। इसी विभोर दशामें वे प्रणयावलोकनसे, अपनी समस्त सम्पत्तिसे उनकी पूजा करती हैं, वे धन्य हैं। 'हाँ तो सखियो! इसमें जो ये रोमावली आदि हैं, यह सब उन्हीं श्रीश्यामके दर्शन और स्पर्शका फल है। वृक्षोंमें, लताओंमें रोमावली उनके स्पर्श बिना नहीं हो सकती। सखि मालति! हमें इन लक्षणोंसे पता लग गया, वे तुम्हारे पास होकर गये हैं। इतना ही नहीं, तुम दासीको तत्रापि पुष्पिणी (रजस्वला)-को स्पर्श करते हुए गये हैं। बतलाओ सखि! किस तरफ गये हैं?' यों परिहास भी करती हैं, पूछती भी हैं। व्रजांगनाओंको श्रीकृष्णके वियोगमें धैर्य नहीं है। वे चाहती हैं—किसी प्रकारसे जल्दी पता मिले। अतएव एक साथ ही कईसे पूछ जाती हैं— 'मल्लिके जाति यूथिके।' (श्रीमद्भा० १०।३०।८)। इससे उनका अधैर्य द्योतन होता है। एक-एकसे प्रश्न करना, उत्तर सुनना धैर्यका काम है। पर वे चाहती हैं—'कोई भी दयावती जल्दी बतला दे। लताओंकी ओरसे मानो प्रश्न है—'हे व्रजांगनाओ! हम तो जड़ हैं, प्रेमोन्मादमें तुम हमसे प्रश्न कर रही हो।' इसपर व्रजांगना कहती हैं—'तुम झूठ बोलती हो, रहस्यको छिपाती हो, परंतु तुम्हारा यह पुष्पविकास, यह मकरन्दस्राव, तुम्हारी मानसप्रफुल्लता और आनन्दाश्रुको स्फुट ही बतला रहा है। यह सब श्रीश्यामसुन्दर- सम्पर्कको बिना पाये नहीं हो सकता। यह चमत्कार उसीमें है। हमलोग, हे लताओ! यह सब अनुभव कर चुकी हैं। यह कल्पना अपने विषयमें मत करो कि हम जड़ हैं, तुमलोग जड़ नहीं, बड़ी चतुर हो। बतलाओ, श्रीश्यामविहारी किस ओर गये हैं?' श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्दके ऐश्वर्य-माधुर्यपर एक दृष्टि डालनेसे सहज ही उनके सम्पर्कका महत्त्व ज्ञात हो जायगा। श्रीभगवान्के ऐश्वर्यकी तुलना अतुलनीय है। कहा है— 'स्वयं त्व०''''किरीटकोट्येडितपादपीठः॥' (श्रीमद्भा० ३।२।२१) स्वयं अद्भुत ऐश्वर्यवान् हैं। वह भी ऐसे कि किसीके साथ समानता ही नहीं बनती—असाम्यातिशय है—'न तत्समश्चाभ्यधिकः' (श्वेताश्वतर० ६।८) उनके-जैसा तीनों लोकमें कोई नहीं। स्थूल, सूक्ष्म और कारण जगत्के वे महान् अधिपति हैं और
हैं—‘स्वाराज्यलक्ष्म्याप्तसमस्तकामः।’ (श्रीमद्भा० ३।२।२१) (‘स्वेनैव राजते दीप्यते’) किसी दूसरेके प्रकाशसे नहीं, अपने ही प्रकाशसे— स्वतःप्रकाशसे प्रकाशमान तथा उसीसे पूर्णकाम। जैसे समुद्र अपने ही जलसे पूर्ण है। इन्द्र, महेन्द्र देवाधिदेव आकर उन पूर्णतम प्रभुको नमस्कार करना चाहते हैं—उनके चरणोंमें अपना मस्तक रखना चाहते हैं, परंतु उन्होंने अपने मस्तकोंपर जो मुकुट- किरीट धारण किये हैं, वे बहुत कठोर हैं और श्रीप्रभुके चरण बहुत ही कोमल हैं। अतः उनमें गड़ जानेके डरसे रत्नमय पादपीठको (पाँव रखनेकी चौकीको) ही वे लोग प्रणाम करते हैं अथवा महत्त्वातिशयवश प्रभुके चरणोंतक अपने मस्तकको ले जानेकी हिम्मत नहीं होती, अतः पादपीठपर ही उसे छुआते हैं अथवा अपनी लघुता बतलानेके लिये पादपीठपर ही किरीटवेष्टित मस्तकको रखते हैं। किरीटोंके पादपीठपर रखे जानेसे खट-खट शब्द होता है, वह मानो किरीटकृत स्तुति है, अर्थात् श्रीभगवान्के पादस्पर्शको पाकर जड़ चौकीमें ऐसी चेतनता—विलक्षण चेतनता—आ गयी कि जिसके क्षणिक स्पर्शसे किरीट-जैसे जड़ पदार्थ भी बोलने लगे, वह बोलना भी सामान्य नहीं, अपितु स्तुतिके रूपमें, जहाँ गुणगणाढ्यताके साथ चातुर्यकी परम अपेक्षा है। यों इन्द्रलोक, रुद्रलोक, ब्रह्मलोक, वैकुण्ठलोकादिके देवाधिपति बड़े भय, आदर और हर्षसे स्तुति करते हैं तथा महामहामूल्यवान् उपहार लेकर उनके श्रीचरणोंमें समर्पित करते हैं। कहाँ तो यह उच्चदृष्टि, यह ऐश्वर्य और कहाँ हरिणियोंकी पूजा ? जिन्होंने वेद, वेदान्त नहीं पढ़ा, षड्दर्शनका अभ्यास नहीं किया, उपास्यस्वरूप समझना जिनके लिये कठिन है, उन्होंने दर्शनसे—केवल दूरके दर्शनसे पूजा की और धन्यवादकी पात्र बन गयीं— धन्याः स्म मूढमतयोऽपि हरिण्य एता या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेषम्। आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः॥* (श्रीमद्भा० १०।२१।११) इसपर श्रीमद्वल्लभाचार्यजीका कथन है—वस्तुतः ऐश्वर्यकी सच्ची पराकाष्ठा तभी समझी जा सकती है, जब सभी वर्गके लोग धनी, गरीब, पण्डित, मूर्ख समान भावसे आराधना कर सकें। ये हरिणी केवल प्रेमसे अवलोकन करके ही पूजा कर सकती हैं। इनके पास और कुछ पूजा-सामग्री ही नहीं है और न ये उसे जुटा सकनेमें समर्थ हैं। श्रीभगवान्ने इनकी इसी पूजाको स्वीकार किया और इनका सत्कारत्मक प्रतिपूजन भी किया। पूज्यको कोई पुष्कल भेंट समर्पण करके पूजा करे, यह बात नहीं है। साधारण वस्तुसे भी उनकी पूजा हो सकती है, केवल भावकी गाढ़ता चाहिये। भगवान्ने स्वयं कहा है— अण्वप्युपाहृतं भक्तैः प्रेम्णा भूर्येव मे भवेत्। भूर्यप्यभक्तोपहृतं न मे तोषाय कल्पते॥ (श्रीमद्भा० १०।८१।३) भगवान्की पूजामें भावका प्राधान्य है, प्रचुर उपचारोंका नहीं अर्थात् अभक्तके द्वारा बहुत भेंट की गयी वस्तु मुझे सन्तुष्ट नहीं कर सकती, परंतु भक्तोंके द्वारा प्रेमसे, श्रद्धासे समर्पित की गयी थोड़ी-सी अणुभर भी वस्तु प्रेमसे, प्रेमकी महिमासे—मेरे लिये बहुत अधिक हो जाती है। श्रीसुदामाके तन्दुल श्रीश्यामसुन्दरके योग्य थोड़े ही थे, परंतु श्रीभगवान्ने उन्हें जबर्दस्ती छीन लिया। यद्यपि श्रीसुदामाके दुपट्टेके कोनेमें उनकी ब्राह्मणीने श्रीकृष्णके भेंटके लिये ही पड़ोसिनसे माँगकर उन मुट्ठीभर तन्दुलको बाँध दिया तथापि श्रीकृष्णका वह महाराज-भाव, वह ऐश्वर्य देखकर
- अरी सखी! जब प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण विचित्र वेष धारण करके बाँसुरी बजाते हैं, तब मूढ़ बुद्धिवाली ये हरिणियाँ भी वंशीकी तान सुनकर अपने पति कृष्णसार मृगोंके साथ नन्दनन्दनके पास चली आती हैं और अपनी प्रेमभरी बड़ी-बड़ी आँखोंसे उन्हें निरखने लगती हैं। निरखती क्या हैं, अपनी कमलके समान बड़ी-बड़ी आँखें श्रीकृष्णके चरणोंपर निछावर कर देती हैं और श्रीकृष्णकी प्रेमभरी चितवनके द्वारा किया हुआ अपना सत्कार स्वीकार करती हैं। वास्तवमें उनका जीवन धन्य है! (हम वृन्दावनकी गोपी होनेपर भी इस प्रकार उनपर अपनेको निछावर नहीं कर पातीं, हमारे घरवाले कुढ़ने लगते हैं। कितनी विडम्बना है!)
श्रीरासपंचाध्यायी ३८३
उनकी हिम्मत छूट गयी। वे उन तण्डुलोंको भेंट करनेमें समर्थ न हुए। पर भगवान् कब चूकनेवाले थे, वे तो उस स्वादके भूखे थे। श्रीरुक्मिणी, श्रीसत्यभामाके द्वारा निर्मित विविध व्यंजनोंमें उन्हें वह स्वाद नहीं मिला था। उन्होंने छीन-झपटकर वह तण्डुलोंकी मुट्ठी ली। बल्कि इसी छीना-झपटीमें बेचारे ब्राह्मणका दुपट्टा भी फट गया। श्रीमद्वल्लभाचार्यजीने इसका यों उपपादन किया है— प्रेम्णा समर्पितं वस्तु हृदयेन समर्पितं भवति। हृदयेन समर्पितञ्च तत् हृदयेनैव गृह्यते॥ प्रेमसे समर्पित वस्तु हृदयसे समर्पित होती है और हृदयसे समर्पित वस्तु हृदयसे गृहीत होती है। ‘युगपज्ज्ञानानुपपत्तिर्मनसो लिङ्गम्।’ नैयायिक मनको, हृदयको (‘स्वान्तं हृन्मानसं मनः इत्यमरः’) अणु परिमाण-परिमित मानते हैं। अणुसे ग्रहण करनेपर मुष्टिमान तो बहुत है—एक तन्दुल भी पर्याप्त होगा। प्रेमरहित समर्पण बाह्य समर्पण है। उसे प्रभु महाविराट्के अपने बाह्यस्वरूपसे ग्रहण करते हैं। आकाशके पेटको कौन भरेगा? अतएव ‘भूर्यप्यभक्तोपहृतं न मे तोषाय कल्पते’ कहा है। प्रेमसे समर्पित वस्तुके साथ सुस्वादुताकी भी कोई अभिसन्धि नहीं है— पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥ (श्रीमद्भा० १०।८१।४) फल खानेकी वस्तु है, जल भी खा ले। पर क्या पत्र, पुष्प भी खाये जाते हैं? वे तो सूँघनेकी वस्तु हैं। किंतु भगवान् भक्तके सद्भावमें, गाढ़ भक्तिमें मुग्ध हो जाते हैं, खाने और सूँघनेकी बातको भूल जाते हैं। भावुककी समर्पित वस्तुएँ प्रेमरसपरिप्लुत होती हैं। वे सब एक मुरब्बा बन जाती हैं। ऐसी थोड़ी भी वस्तु बहुत हो जाती है, फीकी भी मीठी हो जाती है। उस समय भक्त भी विभोर हो जाता है, केलेकी फलीको छोड़कर छिलकेको निवेदित करने लगता है। परंतु हरिणियोंके पास यह सब कहाँ? वे तो केवल प्रेमभरे नेत्रोंसे देखना जानती हैं। उनका सर्वस्व यही है। उन्होंने अपने वीक्षणसे ग्वाल-वेशधारी छैल-छबीले भगवान्का पूजन किया। उन रसिकचूड़ामणि भगवान्को हरिणीके नेत्र देखकर हरिणाक्षी-प्रेयसीका स्मरण हो आया। यही हरिणीकृत पूजन हो गया। प्रियतमका स्मरण करानेसे बढ़कर और क्या पूजन होगा? भगवान्ने उनके इस पूजनको अंगीकृत किया और प्रतिपूजनमें—बदलेमें उन्हें देख लिया। हरिणियोंका यह पूजन कर्मसे नहीं, ज्ञानसे था। देखना ज्ञान है। यही तो ऐश्वर्य है कि छोटे-से-छोटे और बड़े-से- बड़े अवस्थानुसार प्राप्त साधनोंसे सभी पूजा कर सकें। भगवान्का सौन्दर्य-माधुर्य स्वयं भगवान्को भी विस्मयमें डाल देता है भगवान्के माधुर्यकी भी यही स्थिति है। उनके माधुर्यपर देवांगना मुग्ध हो गयीं। जब देवर्षि, महर्षि, वीतराग, मुनीन्द्र-योगीन्द्र सब आपके लोकोत्तर लावण्यपर लट्टू हो गये, ज्ञान-ध्यान सब उड़ गया, तब सरस, सहृदय गोपीश्वरी आदिकी तो बात ही क्या? आपके माधुर्यमें इतना वैलक्षण्य है कि और तो मुग्ध हों सो हों ही, पर आप स्वयं भी उसे निहारकर मन्त्रमुग्ध हो गये— यन्मर्त्यलीलोपयिकं स्वयोग- मायाबलं दर्शयता गृहीतम्। विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः परं पदं भूषणभूषणाङ्गम्॥ (श्रीमद्भा० ३।२।१२) इसमें ‘विस्मापनं स्वस्य च’ कहा है। इसका अभिप्राय यही है कि वह भगवद्विम्ब स्वयं भगवान्को भी आश्चर्य उत्पन्न करनेवाला था। लोकमें सौन्दर्य- सम्पादनकी सामग्री अलंकार हैं, गहने-कपड़े हैं। इनसे अंगोंकी शोभा बढ़ती है। परंतु श्रीभगवद्विग्रह तो— ‘परं पदं भूषणभूषणाङ्गम्’ है। प्रभुका मंगलमय स्वरूप, उसका एक-एक अंग भूषणोंको भी भूषित करनेवाला है, भूषणका भी भूषण है—(‘भूषणभूतानि अंगानि यस्य तत्’) मोरमुकुट, बाँकी लकुट, कारी कामरी, गुंजामाला, वनमाला अथवा कौस्तुभमणि आदि श्रीअंगमें धृत होकर अपनी शोभा पाते हैं। कहा है— वक्षोध्रिवासमृषभस्य महाविभूतेः पुंसां मनोनयननिर्वृतिमादधानम्।
३८४ भक्तिसुधा कण्ठं च कौस्तुभमणेरधिभूषणार्थं कुर्यान्मनस्यखिललोकनमस्कृतस्य ॥ ( श्रीमद्भा० ३।२८।२६) इन कौस्तुभादि मणियोंपर अनुकम्पा करके मानो इनकी तपस्यापर प्रसन्न होकर प्रभुने इनको अंगीकृत किया, नहीं तो श्रीप्रभुको अपने निमित्त इनकी कोई आवश्यकता नहीं है, वे निरपेक्ष हैं— 'मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम्।' ( श्रीमद्भा० ११।१३।४०) भूषणोंका यद्वा गुणोंका आधान महत्त्वके लिये, मंगलके लिये अथवा अनर्थ-निवारणके लिये ही होता है। प्रभुको इनकी अपेक्षा ही नहीं है। श्रीरामावतारमें सब शकुन अपनेको सफलजन्मा बनानेके लिये उद्भूत हुए। प्रभुके मंगलमय कार्योंमें प्रवृत्त होना ही उनकी सफलता है। ऐसे ही श्रीअंगके संगसे भूषणोंकी महत्ता है, अन्यथा वे सब दूषण ही हैं। ऐसे अपने लोकातिशायी रमणीय रूपपर आप स्वयं ही ऐसे मुग्ध हुए कि किसीके मनाये न माने। उनकी सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता सब कुण्ठित हो गयी। एक बार श्रीनन्दरानीके मणिमय प्रांगणमें आप बालक्रीड़ा कर रहे थे। वह आपका श्रीबालमुकुन्द स्वरूप माधुर्यकी साक्षात्मूर्ति अति ही दिव्य थी। घुटनोंके बल चलते हुए उस दर्पणसे भी अधिक शतकोटि-गुणित सुन्दर- मणिमय प्रांगणमें आपको सहसा अपना प्रतिबिम्ब दीख पड़ा—'अहो सौन्दर्यम् !' बस, उस सुन्दरताकी सीमाके दृष्टिगत होते ही श्रीप्रभु उसका आलिंगन करनेके लिये—उसका ग्रहण करनेके लिये मचल पड़े। बड़ा जोर लगाया, पर जब हाथमें न आया, तब आप धात्रीका मुख देखकर रोने लगे। उस अपने प्रतिबिम्बका ग्रहण अपने सामर्थ्यसे बाहरकी बात समझकर धात्रीके द्वारा उसे लेना चाहा। भूल गये माखन-मिश्री खाना, उस रूपपर इतनी मुग्धता हुई— रत्नस्थले जानुचरः कुमारः सङ्क्रान्तमात्मीयमुखारविन्दम्। आदातुकामस्तदलाभखेदान् निरीक्ष्य धात्रीवदनं रुरोद॥ जब महानागरशिरोमणिको ही ऐसा मोह हो गया, तब औरकी तो बात ही क्या ? श्रीश्यामसुन्दर इस अपनी विस्मापक रूपराशिका आस्वादन लेनेके लिये श्रीराधा बनना चाहते हैं। ऐसे ही जब श्रीब्रजेश्वरी अपनेको देखतीं, तब उनके मनमें भी यही आता कि मैं श्रीश्यामसुन्दर बनूँ, तब इस रूपका आस्वादन मिले। सारांश यह है कि श्रीराधा तथा श्रीकृष्ण दोनोंको ही अपने अद्भुत स्वरूपमाधुर्यपर मुग्धता है, परंतु दोनों उसका उपयोग करनेमें असमर्थ हैं; क्योंकि उपभोग्य वस्तु जब उपभोक्तासे भिन्न हो, तभी उसका उपभोग हो सकता है। यदि उपभोग्य वस्तु उपभोक्तासे अभिन्न, उसका स्वरूपभूत हो, तब उसका उपभोग दुर्घट ही है। अतः श्रीश्यामसुन्दर श्रीराधा बनकर अपने अद्भुत रूपमाधुर्यका उपभोग चाहते या करते हैं और श्रीराधा श्रीश्याम बनकर अपनी रूपमाधुरीका पान किया करती हैं। इन्हीं दृष्टियोंसे 'विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः' (श्रीमद्भा० ३।२।१२) कहा गया है। एक भाव और भी इस प्रसंगमें है—जब कभी सर्वसीमन्तिनी श्रीवृषभानुनन्दिनीके अंगमें रसिकशेखर नन्दनन्दन, षोडशवार्षिक कैशोरस्वरूपको अलौकिक, तदेकस्थ—अन्यत्र दुर्लभ रूप लावण्यको देखते, तब अपने रूपसे भी अधिक मन्त्रमुग्ध हो जाते। उनकी रुचि होती—'मैं कब अनन्तानन्त कल्पोंकी तपस्या द्वारा श्रीप्राणेश्वरीका स्वरूप प्राप्त करके इस मधुर स्वरूपके संस्पर्शका अवसर प्राप्त कर सकूँगा। यद्यपि कहा जा सकता है कि जब श्रीश्याम, श्रीराधाके नारीके रूपमें आ जायेंगे, तब उन्हें उनके रूपपर मुग्धता ही कैसे रह जायगी; क्योंकि 'मोह न नारि नारि कें रूपा' (रा०च०मा० ७।११६।२)-का सिद्धान्त है तथापि जहाँ असाधारण बात होती है, वहाँ नारी भी उसके रूपपर मुग्ध हो ही जाती है।' श्रीब्रजधाममें सभी भावकी उपासना चलती है, उसका यही रहस्य है। पीछे कहा गया है—'पुंसां मनोनयननिर्वृत्तिमादधानम्।' यह बड़े मार्केका वचन है। ('पुंसामपि') पुरुषोंके भी तथापि उन पुरुषोंके, जो अनंगको भी लजानेवाले हैं—उनके मन और नयन दोनोंको उससे आनन्द, आह्लाद मिलता है। इसमें
श्रीरासपञ्चाध्यायी ३८५ लौकिक स्त्रीत्व, पुंस्त्व-भावना मिटकर अलौकिक भावना होती है। यहाँ तो श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहनको भी, जो परम पुरुष हैं—पुरुषभावनिवृत्तिपूर्वक श्रीवृषभानुनन्दिनीभावनाकी प्रेप्सा होती है, अस्तु, इस प्रकार एक-दूसरेकी स्वरूपमाधुरीका पान करनेके लिये श्रीराधाकृष्ण दोनों ही परस्पर प्रतिक्षण परिवर्तित होते रहते हैं। ऐसी रूप-माधुरीमें सदा छके रहनेवाले श्रीश्यामसुन्दरके दर्शनमात्रसे मालती (लतानायिका) आदिमें आमोद, प्रसन्नता या सौगन्ध्य और तदतिरेकोत्थ (हर्षोत्थ) अश्रु (मकरन्दबिन्दु) प्रादुर्भूत होते हैं। इस रूपमें मालतीको भावित करके श्रीकृष्णान्वेषणकातरा व्रजबाला कहती हैं—'सखि ! मालति ! तुम यह मत कहो कि तुमने उन्हें देखा नहीं; क्योंकि यदि तुमने उन्हें देखा न होता तो यह तुम्हारा सुमन-विकास— कुसुम-विकास—कैसे होता ? यह तो उस प्राणप्यारेकी ही विशेषता है, जो उनके दर्शनमात्रसे ही प्रसन्नता आती है। अतः बतलाओ सखि मालति ! मल्लिके ! तुमलोगोंने उन्हें इधर कहीं जाते देखा है ?' मालत्यदर्शि वः कच्चिन्मल्लिके जाति यूथिके । प्रीतिं वो जनयन् यातः करस्पर्शेन माधवः ॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।८) 'मालत्यादि सखि ! न केवल उनका दर्शन, अपितु स्पर्श भी आपलोगोंने प्राप्त किया है; क्योंकि वे रसिकेन्द्रचूड़ामणि हैं, वे अवश्य ही आपलोगोंके पल्लव, पुष्प आदि ग्रहण करते गये हैं, आपलोगोंके स्पर्श करते हुए इधरसे गये हैं।' 'माधव' का अर्थ वसन्त और सरस शृंगाररसस्वरूप श्रीश्यामसुन्दर भी है। माधवी, मल्लिका, जाति आदि 'माधव' के बिना 'पुष्पिणी' नहीं हो सकतीं। इस तरह गोपांगनाएँ श्लेषसे बोल रही हैं। इतना सब पूछनेपर भी जब मालत्यादि कुछ बोलतीं ही नहीं, तब व्रजांगना कहती हैं—'अरी सखियो ! इतनी गर्वीली मत बनो, देखो, वे माधव ('मायायाः शोभाया एव धवः, माधवः') हैं, शोभामात्रके पति हैं—प्यारे हैं। जबतक तुम पुष्पवती हो, तभीतक वे इधर आते हैं, फिर तो झाँकेंगे भी नहीं। देखो न, वे हमें कैसे छोड़कर चले गये। मालत्यादिको ! बतलाओ, बड़ा पुण्य होगा और उससे अधिक कालतक तुम्हें श्रीश्यामका करस्पर्श-सुख मिलेगा। बतलाओ, किधर गये ? हे मालति ! यह तो सिद्ध ही है कि वे तुमसे मिलते अवश्य गये हैं; क्योंकि तुम उनकी प्राणाधिका राधिकाकी यद्वा लक्ष्मीकी 'लतिका' हो और इनकी सखी होनेके कारण अधिक शोभावाली भी हो, अतः आनन्दोद्रेकमें तुमसे मिलते हुए ही वे गये हैं—'मायायाः लक्ष्म्याः अथवा राधायाः लतिकैव लती मालती' 'लत' परिवेष्टने। अजी यह उस ललीकी लता है—सौतकी सखी है, इसलिये नहीं बतलायेगी। श्रीराधाका कभी उनसे वियोग नहीं, अतः यह मालती वियोग- दुःखानभिज्ञा होनेसे मानो हमारी उपेक्षा कर रही है। मल्लिका—मल्ल हैं अवयव जिनके, उन श्रीकृष्णको आनन्द देनेवाली यह है। यह अद्भुतता है इस वृन्दावन लताकी कि इसे देखकर श्रीश्यामसुन्दर इसके पास खड़े हो जाते हैं और अपनी प्रियाको इसकी सुन्दरता बतलाने लगते हैं—'देखो, कैसी है यह।' 'जाती' ('जनयति आनन्दमिति जाती') श्रीमोहनमें प्रेम उत्पन्न करनेवाली है। 'यूथिका' यह स्वयं भी यूथके साथ रहती है और श्रीनन्दनन्दनको— व्रजांगनाओंके साथी श्रीनन्दनन्दनको यूथसहित देखती है। यों व्रजांगना उन लताओंकी स्तुति आदि करती हुईं उनसे अपने प्राणधनका पता पूछती हैं।' इस प्रसंगमें 'मालती' आदिपर कुछ और भी भाव हैं। 'हे मालति ! आप—मा—नित्यानपायिनी जो लक्ष्मी भगवान्के वक्षपर सदा निवास करती हैं—उनकी लता हो, अतः आपको हमारे प्राणवल्लभका अवश्य पता है, कृपाकर बतलाओ।' जब बहुत अनुनय-विनयसे पूछनेपर भी मालती कुछ नहीं बोलती, तब उन्मादवती व्रज-युवतियोंको उससे ईर्ष्या होती है। वे उससे कहती हैं—'आखिर मालति! तुम लक्ष्मीपक्षपातिनी हो, वह हमें सौत समझती है। ऐसी दशामें तुम हमारा प्रिय कैसे कर सकती हो?' चन्द्रावलीपक्षकी गोपांगना भी इसीका समर्थन करती है। इस तरह व्रजांगनाओंमें प्रशंसा, असूया
३८६ भक्तिसुधा आदि उदय हो रहा है। सहसा फिर मल्लिकापर दृष्टि पड़ी—'अहो, 'मल्लिके'—श्रीकृष्णको 'क'— सुख पहुँचानेवाली—यह लता है। इसके मकरन्द, कुसुम आदि उनको बहुत प्रिय हैं! देखो सखि! अनन्तकोटि ब्रह्माण्डाधिपतिको भी यह आनन्दित करनेवाली है, बड़ी सौभाग्यशालिनी है यह। अच्छा, सखि! मल्लिके! श्रीश्यामसुन्दरका पता बताकर हमें भी थोड़ा सुख दो।' थोड़ी देरके बाद जब उत्तरकी आशा समाप्त हो गयी, तब व्रजांगनाओंको सूझा— 'सखियो! यह भी श्रीश्यामका पता न देगी; क्योंकि यह श्रीश्यामसुन्दरके उत्संगसे सुखिनी है और उनके इस भावकी सम्भवतः कल्पना कर रही है कि 'वे रसिकेन्द्र श्रीश्याम इनको किसी कारणवश विप्रयोगदुःख देनेके लिये अन्तर्धान हुए हैं, अतः उनकी कृपापात्र बनी रहनेके लिये मुझे भी उनका पता नहीं देना चाहती।' दूसरे, वे अपने श्रीहस्तसे इसका स्पर्श करते गये हैं, मानो इसे समझाते गये हैं कि गोपांगनाजनको मेरा पता मत देना।' यों उस मल्लिकाके प्रति अवहेलनासे देखतीं व्रजांगनाओंकी दृष्टि फिर उसी अवहेलनासे 'जाती' पर पड़ती है और वे प्रियप्राप्तिके लिये मिन्नतोंके स्थानपर उसकी निन्दा करती हैं। परंतु उनको यह कुछ पता नहीं है कि प्रेमोन्माद उनसे क्या-क्या करा रहा है। अस्तु, वे जातीसे कहती हैं—'तुम उन मोहनके लिये सुखजनन करनेवाली अवश्य हो। परंतु 'जो अभिभवे' धातुसे तुम्हारी रचना हुई है। हमारे रोनेसे तुम्हें सुख मिलता है। खल सज्जनोंको दुःखी देखकर प्रसन्न होते हैं। सखियो! इसमें और कुछ तत्त्व नहीं, केवल सुमनोविकासमात्र ही रह गया है। हाँ, यह यूथिका एक अवश्य ऐसी है, जो हमें श्रीश्यामको बतला सकती है; क्योंकि यह यूथी—गोपांगनासहित श्रीनन्दनन्दन-को- 'क'—आनन्द देती है। अच्छा, बहन यूथिके! अब तुम्हीं हमारा अवलम्ब हो। ये मालती, लक्ष्मी, राधा आदि केवल उन नवनागरको ही सुख देती हैं, परन्तु तुम केवल कृष्णपक्षपातिनी नहीं हो, हमारा भी पक्ष रखती हो। अतः श्रीश्यामका पता देकर हमें सुखिनी करो। हम उनके दर्शन बिना बहुत व्याकुल हैं।' थोड़ी प्रतीक्षा करके देखनेपर भी जब कुछ उत्तर नहीं मिला, यूथिका ज्यों-की- त्यों खड़ी ही रही, तब उन व्रजदेवियोंने समझा— 'यह बतलाती तो अवश्य, परंतु वे नागरशिरोमणि 'करस्पर्श' से हमें बतलानेका निषेध करते गये हैं, तब बेचारी कैसे बतलाये ? अथवा जब कृष्णके साथ हम होती हैं, तभी यह हमें आनन्दित करती है, उनके बिना यह हमारी ओर ताकतीतक नहीं।' प्रेमोन्मादिनी गोपांगनाओंका आम्र, प्रियाल आदि वृक्षोंसे मनमोहन श्यामके विषयमें पूछना और उत्तर न मिलनेपर उनपर असूया भाव रखना इस तरह इन लताओंका गुणस्तवन, असूया आदि करतीं, कृष्णान्वेषणतत्परा व्रजबालाओंकी दृष्टि आम्रादि बड़े वृक्षोंपर पड़ी। उन्होंने सोचा—'ये लता आदि क्षुद्र क्षुप हैं, केवल पुष्पवाले हैं, इनसे किसीको 'फल' न मिलेगा, चलो इन बड़े फली वृक्षोंसे अपना मनोरथ कहें'— चूतप्रियालपनसासनकोविदार- जम्ब्वर्कबिल्वबकुलाम्रकदम्बनीपाः। येऽन्ये परार्थभवका यमुनोपकूलाः शंसन्तु कृष्णपदवीं रहितात्मनां नः ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।९) अहह, गोपांगनाओंके आगे प्रेमकी पराकाष्ठा हो गयी। श्रीकृष्णानुरागगंगाके महाप्रवाहसे उनके धैर्यका बाँध टूट गया, जड़-चेतनका भेद मिट गया। एक ही बात, एक ही धुनमें वे व्यग्र हैं—किसी भी तरह प्राणप्यारे, श्यामसाँवरेका दर्शन मिले। वृक्षोंसे पूछती हैं—'हे कालिन्दीकूलवासी, विशुद्ध, परोपकारी कोविदारादि वृक्षो! कृपाकर हमें श्रीकृष्णका मार्ग
- 'रसाल, प्रियाल, कटहल, पीतशाल, कचनार, जामुन, आक, बेल, मौलसिरी, आम, कदम्ब और नीम तथा अन्यान्य यमुनाके तटपर विराजमान सुखी तरुवरो! तुम्हारा जन्म-जीवन केवल परोपकारके लिये है। श्रीकृष्णके बिना हमारा जीवन सूना हो रहा है। हम बेहोश हो रही हैं। तुम हमें उन्हें पानेका मार्ग बता दो।'
।' महाकाशके बिना जैसे घटाकाशका जीवन नहीं, वैसे श्रीश्यामसुन्दरके बिना हमारा भी जीवन नहीं।' आत्माके बिना कोई रह नहीं सकता, अतः पहले 'अन्तर्हित' कहा गया, किंतु इस समय व्रजांगनाएँ प्रेमोन्मादमें अपनेको आत्मरहित समझकर वृक्षोंसे पूछती हैं। इस तरह व्रजांगनाएँ अधीर हो रही हैं। इधर श्रीश्यामसुन्दर सोचते हैं—यद्यपि वे स्वयं अन्तर्हित हैं और उन व्रजांगनाओंके दर्पोपशमनके लिये ही अन्तर्हित हुए हैं तथापि उनके हृदयमें दया है, वे व्रजांगनाजनकी ऐसी विलक्षण प्रणयदशासे उदित क्लेशके दूरीकारका उपाय सोचते हैं, परंतु उनकी समझमें नहीं आता कि इनको कैसे सान्त्वना दें। तरंगमें जलकी तरह अन्य व्रजांगनाजनकी स्थिति है और जलमें मधुरिमास्थानीया श्रीराधेश्वरी हैं। यह अत्यन्त अन्तरंगा हैं। इस प्रकार जलस्थानीय श्रीकृष्णमें मधुरिमास्थानीय अत्यन्त
वैसे व्रजमें कोई भी ऐसा नहीं, जो श्रीकृष्णको अपना प्रियतम न समझे, सभी उनका आनुरूप चाहते थे। गोपबालाओंके माता-पिता आदि सभी श्रीश्यामसुन्दरके साथ अपनी पुत्रियोंका विवाह करना चाहते थे। इसमें रसाक्रान्तिकी तरह, मूर्तिमान् शृंगारके प्रादुर्भावकी तरह, व्रजसीमन्तिनी तथा व्रजबालाओंका श्रीकृष्णसे मिलते रहनेपर भी सम्मिलनोत्कण्ठाका उदय हुआ रहता था। एक समय गोपियोंके पिताओंने श्रीगर्गजीसे श्रीश्यामसुन्दरके साथ अपनी पुत्रियोंके विवाहके विषयमें पूछा— (यह प्रकट लीला है, श्रीशुकदेवजीने प्रकट-अप्रकट दोनों लीलाओंका वर्णन किया है)। उत्तरमें श्रीगर्गजीने कहा— 'आपलोगोंका यह भाव बहुत उत्तम है, परंतु यदि आपकी कन्याओंका विवाह श्रीकृष्णके साथ हो गया तो आप सबका श्रीकृष्णके साथ वियोग हो जायगा, उनका दर्शन दुर्लभ हो जायगा।' तबसे सब सावधान हो गये और गोपियोंके लिये श्रीकृष्णदर्शनतकमें रुकावट उत्पन्न हो गयी। यह सब हुआ केवल श्रीकृष्णके वियोग-भयसे, किसी द्वेष-बुद्धिसे नहीं। इस प्रसंगमें पूर्णमासीने वृन्दासे पूछा कि 'जब मन्त्रोंमें भी श्रीकृष्णका 'गोपीजनवल्लभ' नाम है, तब श्रीकृष्णके साथ गोपियोंके विवाह क्यों रोके गये ? और दूसरी जगह क्यों हुए ? इसपर वृन्दाने यही कहा कि 'ये सब दुःख स्वप्नमात्र हैं। वास्तवमें गोपांगनाओंका सम्बन्ध श्रीकृष्णको छोड़कर अन्यत्र हुआ ही नहीं। इसीलिये—'मन्यमानाः स्वपार्श्वस्थान् स्वान् स्वान् दारान् व्रजौकसः ॥' (श्रीमद्भा० १०।३३।३८) और 'न जातु व्रजदेवीनां पतिभिः सह संगमः।' (उज्ज्वलनीलमणि ३१) आदि कहा गया है। यत्र- तत्र जो गोपांगनाओंकी पत्यन्तर-प्रतीति है, वह सब मायामय है। उन-उन व्रजदेवियोंका मायामय पतियोंके साथ ही संगम होता था।' 'उज्ज्वलनीलमणि' में कहा गया है कि रसशास्त्रमें प्रधान रसके पोषण-प्रसंगमें परोढ़ाके परिग्रहमें कवियोंने जो रसाभास माना है, वह गोकुलांगना-समूहको छोड़कर है; क्योंकि इसमें दुर्लभता, प्रच्छन्नकामुकता आदिसे उत्कण्ठावृद्धि, अद्भुत प्रेमप्राखर्य आदि होते हैं। इस रूपमें यह सब (परकीयात्व आदिके पोषक भाव) प्रीतिवृद्धिके लिये होते हैं। जितनी-जितनी प्राप्तव्यके प्रति दुर्लभता बढ़ती जाती है, उतनी ही उसके प्रति गाढ़ानुरागता भी बढ़ती है। फिर वह साधारणविषयक न होकर सर्वेश्वरके प्रति है। श्रीराधाकी यह जो श्रीकृष्णविषयक दुर्लभता बतलायी गयी है, वह वैसे ही है, जैसे अमृत और उसकी मधुरिमाका कभी भी वियोग न होनेपर भी वियोग और विह्वलता बतलायी जाय। सारस तथा लक्ष्मणाका सर्वदा संयोग रहता है और चक्रवाक-चक्रवाकीका सर्वदा वियोग रहता है। यहाँ दोनोंका सामंजस्य है। अनन्तकोटिगुणित संयोग एवं वियोगका श्रीश्यामा-श्यामको एक कालमें सदा आस्वाद बना रहता है। श्रीजीवगोस्वामीने एक प्रसंगमें कहा है कि कुलांगनाके लिये सबसे बड़ा कष्ट— महाकष्ट लज्जात्याग है। परंतु यह बड़े-से-बड़ा दुःख भी श्रीश्यामसुन्दर नटनागरके सम्बन्धमें उतना ही महान् सौख्य हो जाता है, यह दुःख अनन्त, अलौकिक सुखविषयक है। यही प्रेमका प्राखर्य है। माता-पिता आदिके तीव्रातितीव्र निषेध जैसे-जैसे बढ़ते जाते हैं, प्रीति उतनी ही अधिक बढ़ती जाती है। श्रीवृषभानुनन्दिनी इस प्रकार अपने प्रेमप्राखर्य और विविध निरोधोंका अनुभव कर रही हैं। वह सोचती हैं कि 'यदि मैं आज कोई पक्षी होती तो दर्शनार्थ उड़कर प्रेष्ठके समीप पहुँच जाती, पर करूँ क्या? 'वपुः परवशम्' यह शरीर परवश है। इसी समय उन्हें पुलिन्दियों, हरिणियोंका स्मरण होता है। वे उनका भाग्य सराहती हैं—'अहो ! वे भील- भामिनियाँ धन्य हैं, जिन्हें प्रियतमपादारविन्दसंलग्न कुंकुमका तो दर्शन मिला। इनसे भी अधिक धन्य वे हरिणांगनाएँ हैं, जो अपने पतियोंके साथ उन नन्दनन्दनका प्रेमावलोकसे पूजन करती हैं, दर्शन करती हैं। उनके पति 'कृष्णसार' ('कृष्ण एव सारो येषां ते') हैं। हम गोपांगनाओंके पति 'अभिमान-सार' हैं। वे हरिण अपनी हरिणियोंको साथ लेकर दर्शन करने आते हैं, सब जगह जाकर दर्शन करते हैं, अतः वे हरिणियाँ धन्य हैं—
श्रीरामपञ्चाध्यायी ३८९ धन्याः स्म मूढमतयोऽपि हरिण्य एता या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेषम्। आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।११) परंतु 'वयं अधन्याः'। कथंचित् दर्शनार्थ जायँ भी, पर यह जन्म जो एक कुलीन वंशमें हुआ है— 'जनुः परमिदं कुलीनान्वये।' खानदानमें बट्टा लग जानेका भय है। अहह! कितनी विवशता है तथापि क्या यह मैं अबतक जी रही हूँ? हा! मुझे भला मौत कहाँ?—'न जीवति तथापि किं परमदुर्मरोऽयं जनः?' मरना बड़ा कठिन है, मर जाऊँ तो अच्छा। मृत्युसे भी कहीं अधिक ये प्राणधनके वियोगके कष्ट तो न होंगे। इस प्रकारके चिन्ता-सन्तापमें मग्न श्रीराधिकारानी किसी समय अपने लीलाशुकको अपने हस्तारविन्दके अंगुष्ठप्रान्तपर बिठाकर उसे दाडिमी बीज चुगाती हुई स्नेहसे उसके चंचुपुट का चुम्बन करती हुई पढ़ा रही थीं—'कृष्ण कहु, कृष्ण कहु, राधा कहु मति रे।' शुक बहुत विशेषज्ञ था, अपनी पालिकापर उसे प्रेम और दया थी, उसके वियोगदुःखको देखकर वह दुःखी था। वह तुरन्त पद्यसन्देश लेकर उड़ा और श्रीनन्दरायके प्रांगणमें जा पहुँचा, जहाँ श्रीश्यामसुन्दर क्रीडामें आसक्त थे। एक ऊँची-सी जगह निर्भीक भावसे बैठकर वह पद्य उसने उन्हें सुनाया। अपनी परमान्तरंगा आह्लादिनी प्रियाका वह भावगम्भीर पद्य सुनकर श्रीश्यामसुन्दर मुग्ध हो गये। बड़े आग्रह एवं अनुनयसे श्रीकृष्णने उस शुकको अपने पास बुलाया, अपने सुकोमल हस्तारविन्दपर उसे बिठलाकर कई बार उस पद्यको सुना और समीक्षा करने लगे—'यह किसी महानुरागवतीका पद्य है। इतनेहीमें वहाँ मधुरिका और कुसुमासव सखा भी आ गये। परस्पर प्रश्न हुए। मधुरिकाने कहा—'मैं इस शुकको ढूँढ़ने आयी हूँ।' कुसुमासव बीचमें ही बोल उठे—'सखि! यह तो हमारे श्रीश्यामसुन्दरका शुक है। यदि यह तुम्हारी प्रियाजूका है तो इसे अपने पास बुलाओ।' मधुरिकाने कहा—'सखे! क्या कोई भी इन श्रीलालजूके हाथसे छूटकर जा सकता है?' यह तो भला एक प्रेमी जीव है। इनके हाथमें आते ही जड़ चेतन हो जाते हैं और चेतन जड़ हो जाते हैं। इनके हाथमें आते ही जड़ वेणु सजीव हो जाती है। उनका यह रसमय प्रसंग चल ही रहा था कि इतनेमें ही श्रीयशोदाजी वहाँ आ गयीं और बोलीं—'सखि! लालाको अभी खेल लेने दे, फिर मैं इसे तुम्हारे ही घरतक पहुँचा दूँगी।' इस तरह लोकापवादादि भयसे भीत श्रीश्यामाजू प्रच्छन्नकामुकता आदिके लोकोत्तर साधन शुकप्रेषणादिका रसवर्धनार्थ आश्रय लेती हैं, अस्तु, ऐसे विलक्षण गूढ़ संचारवती श्रीमती राधा तथा तत्प्रिय सखियोंको प्रसन्न करनेका भगवान्को कोई उपाय नहीं सूझता। अतः वे श्रीललिताजीसे पूछती हैं— लोकापवाददलितां मम लम्भनेऽपि एतां कथं कथमहो परिसान्त्वयामि॥ हृदयसे हृदयका कभी विप्रयोग नहीं होता, पर फिर भी भ्रमसे ऐसा होता ही है; क्योंकि श्रीमद्भागवतादिमें विप्रयुक्तोंकी अवस्थाका दिग्दर्शन हुआ है। अन्यत्र भी 'दावानलज्वालिवनी सहक्षाम' आदिसे विप्रयुक्तोंकी लोकसिद्ध किसी भी सद्वस्तुमें वस्त्वन्तरकी प्रतीति होनेके उदाहरण मिलते हैं। अस्तु, किसीको संयोगसे, किसीको वियोगसे सान्त्वना दी जाती है। परंतु इन्हें कैसे प्रसन्न करें, जो प्रत्येक दशामें दुःखका ही अनुभव करती हैं? सखी श्रीललिता कहती हैं—'महाराज! श्रीप्रियाजूको तो अंक (गोद)-में विराजमान करके ही प्रसन्न करो; क्योंकि वे आपके अन्यान्य गुणगणोंसे सिवा मूर्च्छित होनेके सुखी नहीं होतीं'— न मूढधीरस्मि न वा दुराग्रहा शरीरभोगेषु न चापि लालसा। किन्तु व्रजाधीशसुतस्य ते गुणा बलादपस्मारदशां नयन्ति माम्॥ गोप-सुन्दरियोंके भी ऐसे ही मिलते-जुलते भाव हैं। इसने उच्च गम्भीर भाववती, फिर आत्मरहित भी उन गोपबालाओंको प्रसन्न करनेका उनके अनुकूल होनेके सिवा भगवान्के पास कोई भी अन्य साधन नहीं है।
३९० भक्तिसुधा पूर्वोक्त 'चूतप्रियालपनसासन' (श्रीमद्भा० १०।३०।९) इस पद्यमें आमके 'चूत' और 'आम्र' ये दो नाम आये हैं। इस द्विरुक्तिके टीकाकारोंने विभिन्न अर्थ किये हैं। अम्ल (खट्टे) रसवाले आमको 'चूत' और मधुर रसवाले आमको 'आम्र' कहते हैं। इस तरह रसभेदसे दो नाम, दो भेद हैं। अथवा 'करुणया च्यवते इति चूतः' करुणासे जो दीनोंपर द्रुत हो, उसे 'चूत' कहते हैं। अन्यत्रके आमोंमें चाहे यह बात न हो, पर श्रीवृन्दावनधामके आमोंमें तो यह विशेषता है ही। ये श्रीश्यामसुन्दरके यहाँ अन्तरंग हैं अथवा परिकरोंमें कोई हैं। मुनिजन भी यहाँकी वृक्षता चाहते हैं। श्रीव्रजांगनाएँ कहती हैं—'वैसे हे आम्रवृक्षो! आपलोग दुःखियोंका दुःख देखकर द्रुत होते हैं। दूसरोंमें दया नहीं, अतः वे द्रुत नहीं होते। हमसे बढ़कर दूसरा दुखिया और कौन होगा? हमपर दया करो। आमका भव—जन्म परोपकारके लिये हैं। फल, पुष्प, पत्र और काष्ठ आदि आपकी सभी वस्तुएँ केवल परोपकारके लिये हैं। आपका निवास साक्षात् प्रेमद्रववती श्रीयमुनाके तटपर है। श्रीयमुनाजलकी तरह ही मानसरोवर, कृष्णसरोवर आदि भी व्रजके तीर्थ अनुरागद्रव हैं। इन श्रीयमुनाजल आदिके दर्शन, स्पर्श, पान आदिसे दूसरोंको भी श्रीकृष्णविषयक ज्ञान देनेके कारण आपका नाम 'चिति संज्ञाने' से चेतति 'अन्यांश्चेतयतीति वा चूतः' हुआ है। इतनी ऊँची आपलोगोंकी योग्यता है। आप हम दुःखियोंको भी श्रीश्यामसुन्दरका पता देकर कृतार्थ करो।' जब इतनी स्तुति करनेपर भी आम्रवृक्षोंने कुछ उत्तर नहीं दिया, तब गोपांगनाएँ बड़ी खिन्न हुईं। असूयासे अब उनके प्रति दोषोंका अनुसन्धान हुआ— ('च्योतति, प्रच्युतयति इति चूतः') 'सखि! ये तो थे परोपकारी, पवित्र तीर्थवासी ही, परंतु अब स्वरूपसे प्रच्युत हो जानेके कारण निष्ठुर हो गये हैं। 'यमुनोपकूलाः' ये यमुनाके किनारे रहते हैं। यमुना यमराजकी बहन हैं, यम सर्व दुःखदायी हैं। 'संसर्गजा दोषगुणा भवन्ति' उसी यमसम्पर्कसे ये अब निर्दय हो गये हैं। हमारे तीव्रतापसे इन्हें प्रसन्नता हो रही है।' 'प्रियाल' पीले सालवृक्षका नाम है ('प्रियाः इति आलापो यस्य सः' ) सखीगण जिसे प्रिय हों, यह नामार्थ 'प्रियाल' का गोपांगनाओंने निकाला। 'सखि, वह हम सखियोंपर अवश्य अनुकम्पा करेगा, यह अवश्य हमारा हित सोचेगा। हित तो श्रीश्यामसुन्दरके मिलनमें है, सो यह उनका पता बतलायेगा। अजी! यह 'प्रियं लाति इति प्रियालः' है, प्रिय श्रीकृष्णको देनेवाला है।' 'प्रियं लाति' अर्थात् जो प्रिय पदार्थको दे, वह 'प्रियाल' है। वृन्दावनका 'प्रियाल' श्रीकृष्णको देनेवाला है। 'वृन्दावनशतक' में वृन्दावनस्थ तरुओंकी बड़ी महिमा कही गयी है। कहा है—'यदि तुमसे और कुछ भजन-भावना नहीं बन सकती तो इन वृक्षोंका ही दर्शन करो, ये तुम्हें प्रियको देंगे, स्वयं प्रियका अन्वेषण करके तुम्हें समर्पित करेंगे।' इस अंशमें वृन्दावनके सभी वृक्ष 'प्रियाल' हैं, फिर साक्षात् प्रियालकी तो बात ही क्या? इसी आशासे गोपीजन प्रियालकी प्रशंसा करती हैं। अद्भुत प्रेमोन्मादमें उन्हें जड़ और चेतनका ज्ञान नहीं रह गया, उन्हें अभी यही भावना बनी है कि ये हमें अभी प्रियका पता देंगे। प्रेमीकी आशाका कुछ ठिकाना नहीं, वह जड़में भी चेतनकी कल्पना करता है। प्रेमकी प्रतिमूर्ति व्रजदेवियाँ श्यामसुन्दरके आभूषणोंकी, मालाकी प्रशंसा करती हैं। इतना ही नहीं, वे तो उस वायुकी भी स्तुति करनेको उद्यत हैं, यदि वह मोहन प्यारेकी ओरसे आ रहा हो। वे चन्द्रमासे कहती हैं—'हे हिमकर, अपनी किरणों (करों)—का हमसे स्पर्श न होने दो, परंतु यदि वे (आपकी किरणें) प्यारे श्यामसुन्दरका स्पर्श करके आयी हों तो उनसे हमें अवश्य स्पर्श करो, हम तुम्हारा उपकार मानेंगी।' इससे अधिक परम्परा- सम्बन्धकी महिमा क्या होगी? परंतु ब्रह्मादि देवता इस परम्परामें और भी आगे बढ़े हैं। वे इसीमें कृतार्थ हैं कि अस्मदधिष्ठातृक तत्तदिन्द्रियोंसे व्रजवासी उस आनन्दसिन्धु ब्रह्मतत्त्वका दर्शन, स्पर्श, श्रवण आदि कर रहे हैं; क्योंकि देवतालोग देवत्वके कारण साक्षात् रूपसे उस ग्वारिये गोपालकी रसमाधुरीका आस्वाद लेनेमें सर्वथा असमर्थ
श्रीरासपञ्चाध्यायी ३९१
हैं, अतएव बेचारे नेत्रादिरूपसे परम्परासम्बन्ध स्थापित करते हैं। उनकी दृष्टिमें धन्य हैं वे व्रजवासी, जो अपने नेत्रादिसे साक्षात् श्रीश्यामसुन्दरके चरणामृत, सौगन्ध्याद्यमृतका पान करते हैं। नेत्रका अधिष्ठातृदेव सूर्य है। वह इतनेमें ही कृतकृत्य है कि किसी भी व्रजवासीने श्यामसुन्दरको मदधिष्ठातृक नेत्रसे देखा। नासिकाके देवता अश्विनीकुमार हैं। वे व्रजवासीके घ्राणसे अपना सम्बन्ध स्थापित करके आनन्दमग्न हैं। श्रोत्रों (कानों)-की अधिष्ठात्री दिग्देवता हैं। व्रजवासी श्रीनन्दनन्दनके वचन और वेणुगीतको सुनते हैं, इसीमें वह फूली नहीं समाती। वह सोचती है—धन्य हूँ मैं, जो मदधिष्ठातृक श्रोत्रोंसे व्रजवासी श्रीश्यामके वेणुगीतको सुनते हैं। चित्तके अधिष्ठाता ब्रह्मा हैं। इसी प्रकार विभिन्न इन्द्रियोंके विभिन्न अधिष्ठाता हैं। सब इसी प्रकार अपनेको कृतकृत्य मानते हैं। स्वयं ब्रह्माजीने भगवान्की स्तुति करते समय कहा है—हे अच्युत, इन व्रजवासियोंके भाग्यकी महिमाका कोई भी वर्णन नहीं कर सकता। जो कि हमलोग रुद्र, चन्द्र आदि इसलिये प्रशस्त भाग्यशाली हैं कि इनके इन्द्रियरूप पात्रोंसे आपके चरणकमल-मकरन्दका, जो अमृतके समान अतिमिष्ट और आसवके जैसा मदकारी है, बार-बार पान करते हैं। जब एक-एक इन्द्रियके अभिमानी हमलोग आपकी कीर्ति, सौन्दर्य, सौगन्ध आदि एक देशके सेवन करनेवाले भी कृतार्थ हैं, तब समस्त इन्द्रियोंसे सर्वसेवी इन व्रजवासियोंके भाग्यकी सराहना किन शब्दोंमें की जाय? एषां तु भाग्यमहिमाच्युत तावदास्ता- मेकादशैव हि वयं बत भूरिभागाः। एतद्धृषीकचषकैरसकृत् पिबामः शर्वादयोऽङ्घ्र्युदजमध्वमृतासवं ते॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३३) इन्द्रियादिके ये अधिष्ठाता हैं—अहंकारके शिव, बुद्धिके ब्रह्मा, मनके चन्द्रमा, श्रोत्रोंकी दिशाएँ, त्वक् (त्वचा)-के वायु, नेत्रोंके सूर्य, जिह्वाके वरुण, नासिकाके अश्विनीकुमार, वाणीके अग्नि, हस्तके इन्द्र, चरणके उपेन्द्र, पायुके मित्र, उपस्थके प्रजापति और चित्तके अधिष्ठाता स्वयं भगवान् माने गये हैं। पान-पात्रका नाम 'चषक' है। व्रजांगनादिका वह पात्र इन्द्रियाँ हैं, उसीसे वे श्रीश्यामसुन्दरके पादारविन्द- सौन्दर्यामृतका पान करती हैं। उस मादक सुधासवके पानसे व्रजांगनाजनको देह, गेह, लोकलाज सब एक बार ही विस्मृत हो गये। इसपर श्रीनन्दनन्दनकी उस मोहक मुसकानसे तो वह और भी अधिक पुष्ट हो गयीं। इसका पूरा आस्वादन तो व्रजदेवियोंको ही प्राप्त हुआ। इसपर थोड़ा विचार करें—पात्रको रसका आस्वाद नहीं आता। दर्वीको, जिससे भक्ष्यवस्तु परोसी जाती है, वस्तुका स्वाद नहीं आता। इसी प्रकार इन्द्रियाँ पात्रमात्र हैं, उन्हें रसास्वाद नहीं हो सकता। परंतु यह लौकिक रसकी बात है, भगवद्विषयक रस अलौकिक, विलक्षण होता है, उसके तो सम्पर्कसे भी रसास्वादकी अनुभूति सिद्ध है। ऐसी स्थितिमें पात्र—दर्वी आदिको रसका आस्वाद असम्भव नहीं। इस प्रसंगमें व्रजदेवियोंकी वंशीके प्रति ऐसी भावना है कि श्रीश्यामसुन्दरसे शतशः सम्पृक्त होते रहनेपर भी उसे रसका आस्वाद नहीं मिला। उनकी इस विषयमें उपपत्ति इस प्रकार है— वंशीको वस्तुतः अधरामृत नहीं दिया गया। यदि ऐसा होता तो यह सूखी ही कैसे रह जाती? उस वेणुगीतपीयूषसे यमुना भी जमकर इन्द्रनीलमणिकी शिलाके समान हो गयी और पाषाण भी यमुना-प्रवाहकी तरह बह चले, पर बाँसकी वंशीमें एक पल्लवतक नहीं जमा, यह पोली, शुष्क, सग्रन्थि और सच्छिद्र ही रह गयी। जहाँ 'अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरूणाम्' (श्रीमद्भा० १०।२१।१९)-के अनुसार स्थिर पदार्थ जंगम बन गये और जंगम स्थिर हो गये, सूखे हरे हो गये, वहाँ वंशीके पल्ले कुछ नहीं लगा। यह तो केवल विप्रयोगलीलामें वंशीछिद्रोंसे हमारे (व्रजदेवियोंके) कर्णकुहरोंमें प्रविष्ट होनेका, हमारी जीवनरक्षाका उपायमात्र किया गया है। इस सिद्धान्तसे वंशीकी तरह दर्वी सूखी ही है, रसासम्पृक्त ही है। परंतु दूसरे कहते हैं—नहीं, आखिर सम्बन्ध तो हुआ न, किसी भी तरह सही। इसीसे कृतकृत्यता हो जाती है। अतः पात्र—'चषक'—भी परम्परासे कृतार्थ हुए। ऐसे पात्रका तो स्पर्श करनेवाले भी
कृतार्थ हो जाते हैं। ब्रह्मादि इतनेहीसे अपनेको धन्य मानते हैं। वंशीको श्यामसुन्दरकी अधरसुधाका सम्बन्ध होनेपर रसास्वाद भी अवश्य हुआ ही, अतएव गोपांगनाजनकी ही परस्पर उक्ति है—'गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुः' (श्रीमद्भा० १०।२१।९) अर्थात् इस वेणुने कौन पुण्य किया है, जो श्रीश्यामसुन्दर इसको अपने हस्तारविन्दोंमें लेते, अधरपर पधराते, अपने सुकोमल अंगुलीदलसे इसका पादसंवाहन करते, अधरामृतका भोग लगाते और मुकुटका छत्र लगाकर कुण्डलोंसे इसकी आरती उतारते हैं, कैसी अनोखी पूजा करते हैं? यह तो जो ताल-तलाइयोंमें कुमुदिनीका विकास—प्रफुल्लता देख पड़ रही है, यह इन्हें वंश (बाँस)—के सौभाग्योदयपर हर्षातिरेकसे मानो रोमांच हुआ है। ये समझते हैं कि हमारे ही जलसे पालित, पुष्ट होकर वंशीकी यह इतनी उन्नति हुई है, वह श्रीमन्मोहनके अधरपर शोभित हुई है। इस अवसरपर इनको कैसी प्रसन्नता हुई, जैसी पाल-पोसकर बड़े किये गये बालकको साम्राज्य मिलनेपर उसके माता-पिता, कुटुम्बियोंको होती है। वृक्षोंको भी अपने सजातीय वेणुके इस उत्कर्षपर बड़ी प्रसन्नता हुई। उनके नेत्रोंसे मधुधाराके व्याजसे आनन्दाश्रु बह चले—'तरवोऽश्रु मुमुचुः।' (श्रीमद्भा० १०।२१।९) अपने वंशमें किसीके भक्तप्रवर होनेसे जैसे कुलवृद्ध प्रसन्न होते हैं, अपनेको धन्य-धन्य मानते हैं, वैसे ही वेणुसजातीय वृक्ष अपनेको मानते हैं—अहो! हमारी वृक्षजातिमें भला एक तो ऐसा उत्पन्न हुआ, जो कूक-कूककर (निर्भीकता और आनन्दके साथ) श्यामसुन्दरके अधरामृतरसका पान कर रहा है। यदि वंशीको कुछ भी रसका आस्वाद न होता तो ऐसी बातें कैसे कही जा सकती थीं! यहाँ तर्क हो सकता है कि यदि उस वंशीको रसास्वाद हुआ है तो यह अबतक सग्रन्थि कैसे? सच्छिद्र कैसे? छिद्रोंके रहनेपर तो अनर्थ ही होते हैं—'छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति' रसका आस्वाद आनेपर, तत्त्वकी स्फूर्ति होनेपर तो ग्रन्थि खुल जाती है, छिद्र (दोष) नहीं रह जाते—जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥ (रा०च०मा० ७।११७। ४) परंतु चरणरजसे सब दोष दूर हो जाते हैं। व्रजांगनाओंका प्रेमोन्माद व्रजदेवियोंको वेणुके कर्मपर बहुत आश्चर्य है। वे सोचती हैं—'अहो, इसका वह कौन-सा कुशल कर्म है, जो मोहनाधरसुधाका पान करता है और सच्छिद्र रहकर भी उसे छिपाकर रखता है। किसीको पता ही नहीं लगता कि इसने अधरसुधा-रस पान किया है। स्थिर और जंगम अपनी प्रकृतिसे च्युत हो गये, सुध-बुध भूल गये, पर इसने तो अधरसुधाको खूब अघाकर पान करके भी ऐसा गुप्त रखा है, जैसे कृपणका धन। बड़ी चतुराई है, बड़ी धीरता है। हाँ, इसने सोचा है यदि मैं हरी-भरी हो गयी, हमारी सुस्वाद-मर्मज्ञता प्रकट हो गयी तो फिर बजनेलायक न रहूँगी, फेंक दी जाऊँगी। वह आनन्द किस कामका, जो फिर फेंक दी जाऊँ? गोपांगनाएँ सोचती हैं कि इस तरह मोहनके विप्रयोगभयसे वह वंशी अपने आनन्दको छिपाती है, परंतु हम तो बावरी, पागल हो जाती हैं।' इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि गोपांगनाएँ प्रेमको छिपा रखनेमें महत्त्व समझती हैं, पर वह अवांछनीय विक्षिप्तता बरबस प्रकट हो जाती है। 'वृन्दावनचम्पू' में गोपांगनाओंके प्रेमको साठीके धानकी उपमा दी गयी है। उनका सिद्धान्त है—'गुप्त प्रेम सखि सदा दुरइये।' प्रेममें 'टोना' लग जाता है। उसे अवश्य छिपाना चाहिये। फिर वह बहुत बेश- कीमत है, मूल्यवान् वस्तु सात तालेके भीतर धरी जाती है। जब 'चिन्तामणि' पत्थर-जैसी वस्तु भी छिपाकर रखी जाती है, तब प्रेमका तो उससे कहीं अधिक महत्त्व है। पर आज तो प्रेमका ढिंढोरा पीटा जाता है। श्रीश्यामसुन्दरकी अधरसुधाका पान करके अन्य जड़-चेतनोंकी तरह मुरलीको भी आनन्द आता है, पर वह चतुर है, विप्रयोग-भयसे, 'टोना' के भयसे उसे छिपाती है। इस प्रकार तात्पर्य यही कि व्रजेन्द्रनन्दन श्रीश्यामसुन्दरके दर्शनादि-समुत्थ यह रस ही ऐसा अलौकिक है कि इसकी परम्परामें भी आस्वाद है,
श्रीरासपञ्चाध्यायी ३९३ इसीलिये ब्रह्मादि देवगण व्रजवासियोंके हृषीकचषकमात्र भी बनकर अपनेको कृतार्थ समझते हैं—'एतावत्तैव हि वयं बत भूरिभागाः।' विरहव्याकुल गोपांगनाओंका मन एक क्षणके लिये भी श्रीश्यामसुन्दर प्राणधनके चिन्तनसे मुक्त नहीं होता। वे कभी श्रीश्यामसुन्दर नवलबिहारीके अलौकिक रसका, उसकी परम्परामें भी अनुभूतिका तो कभी उनके अंगके संगी आभूषण आदिका चिन्तन, मनन, उनमें गुण-दोषका आरोप, अधिकार-अनधिकारकी चर्चा आदि करती हुईं प्राणप्यारेके अन्वेषणमें व्यग्र हैं। श्रीव्रजराजकिशोरकी मालाका स्मरणकर व्रजदेवियोंको भावना हुई—सखियो, देखो, हमसे अधिक सयानी तो वे सुमन (पुष्प), मुक्ता, हीरक आदिकी मालाएँ हैं, जो कभी उनका संग नहीं छोड़तीं। वे जड़ होकर भी कितनी विवेकसम्पन्न हैं और हम कामपरवश स्त्री अतएव मुग्धता या मूढ़तावश उनका साथ छोड़ बैठी हैं। हाय, कामपरवशात् स्त्री जगत्में मुक्ता, हीरक आदिसे भी—कंकड़-पत्थर आदिसे भी अधिक विचारशून्य है। दूसरा भाव यह भी है कि जब सुमन, मुक्ता, हीरक आदि भी उन श्रीश्यामसुन्दरको नहीं छोड़ सकते, तब हम कामके वशमें पड़ी हुई स्त्रियाँ कैसे छोड़ दें? कैसे उन्हें भुला दें— अहो सुमनसो मुक्ता वज्राण्यपि हरेरुरः । न त्यजन्ति वयन्तत्र का वा स्मरवशः स्त्रियः ॥ श्रीश्यामसुन्दरके कण्ठमें, वक्षःस्थलपर मुक्तामालाएँ हैं, मानो इन्द्रनीलमणिके शिखरपर गंगाकी दो धारा, किंवा नवनीलनीरदपर हंसोंकी पंक्ति, काली घटापर हंसोंकी दो पंक्तिके समान विराज रही हैं। मालामें विविध मणि, रत्न जड़े हैं, कोई सूर्यके सदृश देदीप्यमान, कोई चन्द्रके समान समुज्ज्वल और कोई नक्षत्रोंकी तरह प्रकाशमान है। ऐसी वनमाला, मुक्तामाला, वैजयन्तीमाला आदि अनेक मालाएँ श्रीप्रभुने धारण की हैं। गोपांगनाओंकी इसपर एक और ऊँची सूझ है। वे कहती हैं—ये सुमनस केवल सुमनस—पुष्प नहीं, किंतु शोभन-तत्त्वचिन्तानुकूल मनवाले तत्त्वज्ञ ही सुमनस—पुष्पके रूपमें अनन्त तपस्या करके श्रीहरिके विशाल वक्षःस्थलपर विराजमान हुए हैं और ये मुक्त हुए मुक्त—वामदेव, वसिष्ठ, शुक, सनकादि हैं, जो मुक्त होकर—मोती बनकर हमारे प्यारेके अंगमें आ विराजते हैं। ये भी हमारे श्यामके उरको नहीं छोड़ना चाहते। ये क्यों रागी हो गये, जो विरक्त हैं? वहाँ तो हमें ही रहना चाहिये। सखि, हम तो स्त्री हैं, अशेषशेखरमें हमारा तो राग युक्त है, पर इन जड़ मुक्ता, वज्र आदिका वहाँ क्या काम ? जब ये नहीं छोड़ते, तब हम स्त्रियाँ कैसे छोड़ें ? श्रीश्यामसुन्दरके कर्णाभरणादिके प्रति व्रजांग- नाओंकी ईर्ष्या देखते ही बनती है। श्रीत्रिभुवनमोहनने कानोंमें मकराकृति कुण्डल पहने हैं, जब उनका सिर हिलता है, तब वे कुण्डल या उनकी आभा स्वच्छ, स्निग्ध कपोलोंसे टकराती है, उस समय मालूम होता है कि मीन भगवान्के कपोलोंका चुम्बन कर रहे हैं। इसे देखकर व्रजांगना रसोद्रेकमें विह्वल हो जाती हैं, उन्हें ईर्ष्या होती है, वे कह उठती हैं—'हा मीन, आज मधुर कपोलोंका, जो हमारे ही हैं, तुम चुम्बन कर रहे हो।' इसी सम्पर्कमें उन्हें अन्य श्यामांगसंगियोंके प्रति भी सापत्न्य उदय हो आता है। वे वंशीसे कहती हैं—हे मुरलिके ! अधिकारिणी तो हम हैं और तुम इस अधरसुधाका लम्पटता, अकृपणतासे पान कर रही हो। हे माले ! हमसे बिना ही पूछे—हमारी अनुमतिके बिना ही हमारे प्रियतमके श्रीअंगका निरन्तर परिरम्भण कर रही हो अथवा ठीक है, तुम सब जगज्जालसे परे—विधि-निषेधसे दूर हो गयी हो, तुम्हारी तपस्याके सूखे वृक्षमें आज फल लग गये हैं, सौभाग्यका उदय हुआ है। हम तो विधि-निषेधमें बँधी हैं, जंगलोंमें भटक रही हैं। इस तरह कृष्णप्रेममें प्रमत्त व्रजदेवियाँ अचेतनोंको चेतन ही जानकर उलाहना दे रही हैं। इसी प्रकार वृक्षोंके प्रति धारणा करती हैं और कहती हैं—जिन कदम्ब, आम्र, प्रियाल आदिका आश्रय लेकर श्यामसुन्दर विराजते हैं, वे अवश्य हमें उनसे मिलायेंगे और कहती हैं, हे प्रियके आलय प्रियाल ! तुम हमें श्यामसे मिला दो, हम तुम्हारा बड़ा उपकार मानेंगी। इस प्रकार गोपदेवियाँ श्रीकृष्ण परमात्माके
३९४ भक्तिसुधा विप्रयोगमें सन्तप्त प्रेममुग्ध हुईं उन्हें ढूँढ़ती, वृक्षोंसे पूछती फिरती हैं— चूतप्रियालपनसासनकोविदार- जम्ब्वर्कबिल्ववकुलाम्रकदम्बनीपाः । येऽन्ये परार्थभवका यमुनोपकूलाः शंसन्तु कृष्णपदवीं रहितात्मनां नः॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।९) यह बात कही जा चुकी है कि व्रजांगनाओंको जबतक उत्तरकी आशा रहती है, तबतक खूब स्तुति, गुणगान करती हैं और उस आशाके निराशामें बदलते ही दोषोंका गान करने लगती हैं। पहले प्रियालकी बड़ी स्तुति हुई। जब देखा कि यह जरा भी नहीं पसीजता, तब कहने लगीं—'प्रियं न लातीति प्रियालः (प्रिय-अ) नञ् (लः) प्रियप्राप्तौ प्रतिबन्धकः।' जो प्रियका पता न दे, उसके सम्मिलनमें व्यवधान उपस्थित करे, वह पापी प्रायश्च