भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८६ भक्तिसुधा आदि उदय हो रहा है। सहसा फिर मल्लिकापर दृष्टि पड़ी—'अहो, 'मल्लिके'—श्रीकृष्णको 'क'— सुख पहुँचानेवाली—यह लता है। इसके मकरन्द, कुसुम आदि उनको बहुत प्रिय हैं! देखो सखि! अनन्तकोटि ब्रह्माण्डाधिपतिको भी यह आनन्दित करनेवाली है, बड़ी सौभाग्यशालिनी है यह। अच्छा, सखि! मल्लिके! श्रीश्यामसुन्दरका पता बताकर हमें भी थोड़ा सुख दो।' थोड़ी देरके बाद जब उत्तरकी आशा समाप्त हो गयी, तब व्रजांगनाओंको सूझा— 'सखियो! यह भी श्रीश्यामका पता न देगी; क्योंकि यह श्रीश्यामसुन्दरके उत्संगसे सुखिनी है और उनके इस भावकी सम्भवतः कल्पना कर रही है कि 'वे रसिकेन्द्र श्रीश्याम इनको किसी कारणवश विप्रयोगदुःख देनेके लिये अन्तर्धान हुए हैं, अतः उनकी कृपापात्र बनी रहनेके लिये मुझे भी उनका पता नहीं देना चाहती।' दूसरे, वे अपने श्रीहस्तसे इसका स्पर्श करते गये हैं, मानो इसे समझाते गये हैं कि गोपांगनाजनको मेरा पता मत देना।' यों उस मल्लिकाके प्रति अवहेलनासे देखतीं व्रजांगनाओंकी दृष्टि फिर उसी अवहेलनासे 'जाती' पर पड़ती है और वे प्रियप्राप्तिके लिये मिन्नतोंके स्थानपर उसकी निन्दा करती हैं। परंतु उनको यह कुछ पता नहीं है कि प्रेमोन्माद उनसे क्या-क्या करा रहा है। अस्तु, वे जातीसे कहती हैं—'तुम उन मोहनके लिये सुखजनन करनेवाली अवश्य हो। परंतु 'जो अभिभवे' धातुसे तुम्हारी रचना हुई है। हमारे रोनेसे तुम्हें सुख मिलता है। खल सज्जनोंको दुःखी देखकर प्रसन्न होते हैं। सखियो! इसमें और कुछ तत्त्व नहीं, केवल सुमनोविकासमात्र ही रह गया है। हाँ, यह यूथिका एक अवश्य ऐसी है, जो हमें श्रीश्यामको बतला सकती है; क्योंकि यह यूथी—गोपांगनासहित श्रीनन्दनन्दन-को- 'क'—आनन्द देती है। अच्छा, बहन यूथिके! अब तुम्हीं हमारा अवलम्ब हो। ये मालती, लक्ष्मी, राधा आदि केवल उन नवनागरको ही सुख देती हैं, परन्तु तुम केवल कृष्णपक्षपातिनी नहीं हो, हमारा भी पक्ष रखती हो। अतः श्रीश्यामका पता देकर हमें सुखिनी करो। हम उनके दर्शन बिना बहुत व्याकुल हैं।' थोड़ी प्रतीक्षा करके देखनेपर भी जब कुछ उत्तर नहीं मिला, यूथिका ज्यों-की- त्यों खड़ी ही रही, तब उन व्रजदेवियोंने समझा— 'यह बतलाती तो अवश्य, परंतु वे नागरशिरोमणि 'करस्पर्श' से हमें बतलानेका निषेध करते गये हैं, तब बेचारी कैसे बतलाये ? अथवा जब कृष्णके साथ हम होती हैं, तभी यह हमें आनन्दित करती है, उनके बिना यह हमारी ओर ताकतीतक नहीं।' प्रेमोन्मादिनी गोपांगनाओंका आम्र, प्रियाल आदि वृक्षोंसे मनमोहन श्यामके विषयमें पूछना और उत्तर न मिलनेपर उनपर असूया भाव रखना इस तरह इन लताओंका गुणस्तवन, असूया आदि करतीं, कृष्णान्वेषणतत्परा व्रजबालाओंकी दृष्टि आम्रादि बड़े वृक्षोंपर पड़ी। उन्होंने सोचा—'ये लता आदि क्षुद्र क्षुप हैं, केवल पुष्पवाले हैं, इनसे किसीको 'फल' न मिलेगा, चलो इन बड़े फली वृक्षोंसे अपना मनोरथ कहें'— चूतप्रियालपनसासनकोविदार- जम्ब्वर्कबिल्वबकुलाम्रकदम्बनीपाः। येऽन्ये परार्थभवका यमुनोपकूलाः शंसन्तु कृष्णपदवीं रहितात्मनां नः ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।९) अहह, गोपांगनाओंके आगे प्रेमकी पराकाष्ठा हो गयी। श्रीकृष्णानुरागगंगाके महाप्रवाहसे उनके धैर्यका बाँध टूट गया, जड़-चेतनका भेद मिट गया। एक ही बात, एक ही धुनमें वे व्यग्र हैं—किसी भी तरह प्राणप्यारे, श्यामसाँवरेका दर्शन मिले। वृक्षोंसे पूछती हैं—'हे कालिन्दीकूलवासी, विशुद्ध, परोपकारी कोविदारादि वृक्षो! कृपाकर हमें श्रीकृष्णका मार्ग
- 'रसाल, प्रियाल, कटहल, पीतशाल, कचनार, जामुन, आक, बेल, मौलसिरी, आम, कदम्ब और नीम तथा अन्यान्य यमुनाके तटपर विराजमान सुखी तरुवरो! तुम्हारा जन्म-जीवन केवल परोपकारके लिये है। श्रीकृष्णके बिना हमारा जीवन सूना हो रहा है। हम बेहोश हो रही हैं। तुम हमें उन्हें पानेका मार्ग बता दो।'