भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 397, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें।' महाकाशके बिना जैसे घटाकाशका जीवन नहीं, वैसे श्रीश्यामसुन्दरके बिना हमारा भी जीवन नहीं।' आत्माके बिना कोई रह नहीं सकता, अतः पहले 'अन्तर्हित' कहा गया, किंतु इस समय व्रजांगनाएँ प्रेमोन्मादमें अपनेको आत्मरहित समझकर वृक्षोंसे पूछती हैं। इस तरह व्रजांगनाएँ अधीर हो रही हैं। इधर श्रीश्यामसुन्दर सोचते हैं—यद्यपि वे स्वयं अन्तर्हित हैं और उन व्रजांगनाओंके दर्पोपशमनके लिये ही अन्तर्हित हुए हैं तथापि उनके हृदयमें दया है, वे व्रजांगनाजनकी ऐसी विलक्षण प्रणयदशासे उदित क्लेशके दूरीकारका उपाय सोचते हैं, परंतु उनकी समझमें नहीं आता कि इनको कैसे सान्त्वना दें। तरंगमें जलकी तरह अन्य व्रजांगनाजनकी स्थिति है और जलमें मधुरिमास्थानीया श्रीराधेश्वरी हैं। यह अत्यन्त अन्तरंगा हैं। इस प्रकार जलस्थानीय श्रीकृष्णमें मधुरिमास्थानीय अत्यन्त