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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 778 में से

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पृष्ठ 395

श्रीरासपञ्चाध्यायी ३८५ लौकिक स्त्रीत्व, पुंस्त्व-भावना मिटकर अलौकिक भावना होती है। यहाँ तो श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहनको भी, जो परम पुरुष हैं—पुरुषभावनिवृत्तिपूर्वक श्रीवृषभानुनन्दिनीभावनाकी प्रेप्सा होती है, अस्तु, इस प्रकार एक-दूसरेकी स्वरूपमाधुरीका पान करनेके लिये श्रीराधाकृष्ण दोनों ही परस्पर प्रतिक्षण परिवर्तित होते रहते हैं। ऐसी रूप-माधुरीमें सदा छके रहनेवाले श्रीश्यामसुन्दरके दर्शनमात्रसे मालती (लतानायिका) आदिमें आमोद, प्रसन्नता या सौगन्ध्य और तदतिरेकोत्थ (हर्षोत्थ) अश्रु (मकरन्दबिन्दु) प्रादुर्भूत होते हैं। इस रूपमें मालतीको भावित करके श्रीकृष्णान्वेषणकातरा व्रजबाला कहती हैं—'सखि ! मालति ! तुम यह मत कहो कि तुमने उन्हें देखा नहीं; क्योंकि यदि तुमने उन्हें देखा न होता तो यह तुम्हारा सुमन-विकास— कुसुम-विकास—कैसे होता ? यह तो उस प्राणप्यारेकी ही विशेषता है, जो उनके दर्शनमात्रसे ही प्रसन्नता आती है। अतः बतलाओ सखि मालति ! मल्लिके ! तुमलोगोंने उन्हें इधर कहीं जाते देखा है ?' मालत्यदर्शि वः कच्चिन्मल्लिके जाति यूथिके । प्रीतिं वो जनयन् यातः करस्पर्शेन माधवः ॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।८) 'मालत्यादि सखि ! न केवल उनका दर्शन, अपितु स्पर्श भी आपलोगोंने प्राप्त किया है; क्योंकि वे रसिकेन्द्रचूड़ामणि हैं, वे अवश्य ही आपलोगोंके पल्लव, पुष्प आदि ग्रहण करते गये हैं, आपलोगोंके स्पर्श करते हुए इधरसे गये हैं।' 'माधव' का अर्थ वसन्त और सरस शृंगाररसस्वरूप श्रीश्यामसुन्दर भी है। माधवी, मल्लिका, जाति आदि 'माधव' के बिना 'पुष्पिणी' नहीं हो सकतीं। इस तरह गोपांगनाएँ श्लेषसे बोल रही हैं। इतना सब पूछनेपर भी जब मालत्यादि कुछ बोलतीं ही नहीं, तब व्रजांगना कहती हैं—'अरी सखियो ! इतनी गर्वीली मत बनो, देखो, वे माधव ('मायायाः शोभाया एव धवः, माधवः') हैं, शोभामात्रके पति हैं—प्यारे हैं। जबतक तुम पुष्पवती हो, तभीतक वे इधर आते हैं, फिर तो झाँकेंगे भी नहीं। देखो न, वे हमें कैसे छोड़कर चले गये। मालत्यादिको ! बतलाओ, बड़ा पुण्य होगा और उससे अधिक कालतक तुम्हें श्रीश्यामका करस्पर्श-सुख मिलेगा। बतलाओ, किधर गये ? हे मालति ! यह तो सिद्ध ही है कि वे तुमसे मिलते अवश्य गये हैं; क्योंकि तुम उनकी प्राणाधिका राधिकाकी यद्वा लक्ष्मीकी 'लतिका' हो और इनकी सखी होनेके कारण अधिक शोभावाली भी हो, अतः आनन्दोद्रेकमें तुमसे मिलते हुए ही वे गये हैं—'मायायाः लक्ष्म्याः अथवा राधायाः लतिकैव लती मालती' 'लत' परिवेष्टने। अजी यह उस ललीकी लता है—सौतकी सखी है, इसलिये नहीं बतलायेगी। श्रीराधाका कभी उनसे वियोग नहीं, अतः यह मालती वियोग- दुःखानभिज्ञा होनेसे मानो हमारी उपेक्षा कर रही है। मल्लिका—मल्ल हैं अवयव जिनके, उन श्रीकृष्णको आनन्द देनेवाली यह है। यह अद्भुतता है इस वृन्दावन लताकी कि इसे देखकर श्रीश्यामसुन्दर इसके पास खड़े हो जाते हैं और अपनी प्रियाको इसकी सुन्दरता बतलाने लगते हैं—'देखो, कैसी है यह।' 'जाती' ('जनयति आनन्दमिति जाती') श्रीमोहनमें प्रेम उत्पन्न करनेवाली है। 'यूथिका' यह स्वयं भी यूथके साथ रहती है और श्रीनन्दनन्दनको— व्रजांगनाओंके साथी श्रीनन्दनन्दनको यूथसहित देखती है। यों व्रजांगना उन लताओंकी स्तुति आदि करती हुईं उनसे अपने प्राणधनका पता पूछती हैं।' इस प्रसंगमें 'मालती' आदिपर कुछ और भी भाव हैं। 'हे मालति ! आप—मा—नित्यानपायिनी जो लक्ष्मी भगवान्‌के वक्षपर सदा निवास करती हैं—उनकी लता हो, अतः आपको हमारे प्राणवल्लभका अवश्य पता है, कृपाकर बतलाओ।' जब बहुत अनुनय-विनयसे पूछनेपर भी मालती कुछ नहीं बोलती, तब उन्मादवती व्रज-युवतियोंको उससे ईर्ष्या होती है। वे उससे कहती हैं—'आखिर मालति! तुम लक्ष्मीपक्षपातिनी हो, वह हमें सौत समझती है। ऐसी दशामें तुम हमारा प्रिय कैसे कर सकती हो?' चन्द्रावलीपक्षकी गोपांगना भी इसीका समर्थन करती है। इस तरह व्रजांगनाओंमें प्रशंसा, असूया

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