भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८४ भक्तिसुधा कण्ठं च कौस्तुभमणेरधिभूषणार्थं कुर्यान्मनस्यखिललोकनमस्कृतस्य ॥ ( श्रीमद्भा० ३।२८।२६) इन कौस्तुभादि मणियोंपर अनुकम्पा करके मानो इनकी तपस्यापर प्रसन्न होकर प्रभुने इनको अंगीकृत किया, नहीं तो श्रीप्रभुको अपने निमित्त इनकी कोई आवश्यकता नहीं है, वे निरपेक्ष हैं— 'मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम्।' ( श्रीमद्भा० ११।१३।४०) भूषणोंका यद्वा गुणोंका आधान महत्त्वके लिये, मंगलके लिये अथवा अनर्थ-निवारणके लिये ही होता है। प्रभुको इनकी अपेक्षा ही नहीं है। श्रीरामावतारमें सब शकुन अपनेको सफलजन्मा बनानेके लिये उद्भूत हुए। प्रभुके मंगलमय कार्योंमें प्रवृत्त होना ही उनकी सफलता है। ऐसे ही श्रीअंगके संगसे भूषणोंकी महत्ता है, अन्यथा वे सब दूषण ही हैं। ऐसे अपने लोकातिशायी रमणीय रूपपर आप स्वयं ही ऐसे मुग्ध हुए कि किसीके मनाये न माने। उनकी सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता सब कुण्ठित हो गयी। एक बार श्रीनन्दरानीके मणिमय प्रांगणमें आप बालक्रीड़ा कर रहे थे। वह आपका श्रीबालमुकुन्द स्वरूप माधुर्यकी साक्षात्मूर्ति अति ही दिव्य थी। घुटनोंके बल चलते हुए उस दर्पणसे भी अधिक शतकोटि-गुणित सुन्दर- मणिमय प्रांगणमें आपको सहसा अपना प्रतिबिम्ब दीख पड़ा—'अहो सौन्दर्यम् !' बस, उस सुन्दरताकी सीमाके दृष्टिगत होते ही श्रीप्रभु उसका आलिंगन करनेके लिये—उसका ग्रहण करनेके लिये मचल पड़े। बड़ा जोर लगाया, पर जब हाथमें न आया, तब आप धात्रीका मुख देखकर रोने लगे। उस अपने प्रतिबिम्बका ग्रहण अपने सामर्थ्यसे बाहरकी बात समझकर धात्रीके द्वारा उसे लेना चाहा। भूल गये माखन-मिश्री खाना, उस रूपपर इतनी मुग्धता हुई— रत्नस्थले जानुचरः कुमारः सङ्क्रान्तमात्मीयमुखारविन्दम्। आदातुकामस्तदलाभखेदान् निरीक्ष्य धात्रीवदनं रुरोद॥ जब महानागरशिरोमणिको ही ऐसा मोह हो गया, तब औरकी तो बात ही क्या ? श्रीश्यामसुन्दर इस अपनी विस्मापक रूपराशिका आस्वादन लेनेके लिये श्रीराधा बनना चाहते हैं। ऐसे ही जब श्रीब्रजेश्वरी अपनेको देखतीं, तब उनके मनमें भी यही आता कि मैं श्रीश्यामसुन्दर बनूँ, तब इस रूपका आस्वादन मिले। सारांश यह है कि श्रीराधा तथा श्रीकृष्ण दोनोंको ही अपने अद्भुत स्वरूपमाधुर्यपर मुग्धता है, परंतु दोनों उसका उपयोग करनेमें असमर्थ हैं; क्योंकि उपभोग्य वस्तु जब उपभोक्तासे भिन्न हो, तभी उसका उपभोग हो सकता है। यदि उपभोग्य वस्तु उपभोक्तासे अभिन्न, उसका स्वरूपभूत हो, तब उसका उपभोग दुर्घट ही है। अतः श्रीश्यामसुन्दर श्रीराधा बनकर अपने अद्भुत रूपमाधुर्यका उपभोग चाहते या करते हैं और श्रीराधा श्रीश्याम बनकर अपनी रूपमाधुरीका पान किया करती हैं। इन्हीं दृष्टियोंसे 'विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः' (श्रीमद्भा० ३।२।१२) कहा गया है। एक भाव और भी इस प्रसंगमें है—जब कभी सर्वसीमन्तिनी श्रीवृषभानुनन्दिनीके अंगमें रसिकशेखर नन्दनन्दन, षोडशवार्षिक कैशोरस्वरूपको अलौकिक, तदेकस्थ—अन्यत्र दुर्लभ रूप लावण्यको देखते, तब अपने रूपसे भी अधिक मन्त्रमुग्ध हो जाते। उनकी रुचि होती—'मैं कब अनन्तानन्त कल्पोंकी तपस्या द्वारा श्रीप्राणेश्वरीका स्वरूप प्राप्त करके इस मधुर स्वरूपके संस्पर्शका अवसर प्राप्त कर सकूँगा। यद्यपि कहा जा सकता है कि जब श्रीश्याम, श्रीराधाके नारीके रूपमें आ जायेंगे, तब उन्हें उनके रूपपर मुग्धता ही कैसे रह जायगी; क्योंकि 'मोह न नारि नारि कें रूपा' (रा०च०मा० ७।११६।२)-का सिद्धान्त है तथापि जहाँ असाधारण बात होती है, वहाँ नारी भी उसके रूपपर मुग्ध हो ही जाती है।' श्रीब्रजधाममें सभी भावकी उपासना चलती है, उसका यही रहस्य है। पीछे कहा गया है—'पुंसां मनोनयननिर्वृत्तिमादधानम्।' यह बड़े मार्केका वचन है। ('पुंसामपि') पुरुषोंके भी तथापि उन पुरुषोंके, जो अनंगको भी लजानेवाले हैं—उनके मन और नयन दोनोंको उससे आनन्द, आह्लाद मिलता है। इसमें