भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासपंचाध्यायी ३८३
उनकी हिम्मत छूट गयी। वे उन तण्डुलोंको भेंट करनेमें समर्थ न हुए। पर भगवान् कब चूकनेवाले थे, वे तो उस स्वादके भूखे थे। श्रीरुक्मिणी, श्रीसत्यभामाके द्वारा निर्मित विविध व्यंजनोंमें उन्हें वह स्वाद नहीं मिला था। उन्होंने छीन-झपटकर वह तण्डुलोंकी मुट्ठी ली। बल्कि इसी छीना-झपटीमें बेचारे ब्राह्मणका दुपट्टा भी फट गया। श्रीमद्वल्लभाचार्यजीने इसका यों उपपादन किया है— प्रेम्णा समर्पितं वस्तु हृदयेन समर्पितं भवति। हृदयेन समर्पितञ्च तत् हृदयेनैव गृह्यते॥ प्रेमसे समर्पित वस्तु हृदयसे समर्पित होती है और हृदयसे समर्पित वस्तु हृदयसे गृहीत होती है। ‘युगपज्ज्ञानानुपपत्तिर्मनसो लिङ्गम्।’ नैयायिक मनको, हृदयको (‘स्वान्तं हृन्मानसं मनः इत्यमरः’) अणु परिमाण-परिमित मानते हैं। अणुसे ग्रहण करनेपर मुष्टिमान तो बहुत है—एक तन्दुल भी पर्याप्त होगा। प्रेमरहित समर्पण बाह्य समर्पण है। उसे प्रभु महाविराट्के अपने बाह्यस्वरूपसे ग्रहण करते हैं। आकाशके पेटको कौन भरेगा? अतएव ‘भूर्यप्यभक्तोपहृतं न मे तोषाय कल्पते’ कहा है। प्रेमसे समर्पित वस्तुके साथ सुस्वादुताकी भी कोई अभिसन्धि नहीं है— पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥ (श्रीमद्भा० १०।८१।४) फल खानेकी वस्तु है, जल भी खा ले। पर क्या पत्र, पुष्प भी खाये जाते हैं? वे तो सूँघनेकी वस्तु हैं। किंतु भगवान् भक्तके सद्भावमें, गाढ़ भक्तिमें मुग्ध हो जाते हैं, खाने और सूँघनेकी बातको भूल जाते हैं। भावुककी समर्पित वस्तुएँ प्रेमरसपरिप्लुत होती हैं। वे सब एक मुरब्बा बन जाती हैं। ऐसी थोड़ी भी वस्तु बहुत हो जाती है, फीकी भी मीठी हो जाती है। उस समय भक्त भी विभोर हो जाता है, केलेकी फलीको छोड़कर छिलकेको निवेदित करने लगता है। परंतु हरिणियोंके पास यह सब कहाँ? वे तो केवल प्रेमभरे नेत्रोंसे देखना जानती हैं। उनका सर्वस्व यही है। उन्होंने अपने वीक्षणसे ग्वाल-वेशधारी छैल-छबीले भगवान्का पूजन किया। उन रसिकचूड़ामणि भगवान्को हरिणीके नेत्र देखकर हरिणाक्षी-प्रेयसीका स्मरण हो आया। यही हरिणीकृत पूजन हो गया। प्रियतमका स्मरण करानेसे बढ़कर और क्या पूजन होगा? भगवान्ने उनके इस पूजनको अंगीकृत किया और प्रतिपूजनमें—बदलेमें उन्हें देख लिया। हरिणियोंका यह पूजन कर्मसे नहीं, ज्ञानसे था। देखना ज्ञान है। यही तो ऐश्वर्य है कि छोटे-से-छोटे और बड़े-से- बड़े अवस्थानुसार प्राप्त साधनोंसे सभी पूजा कर सकें। भगवान्का सौन्दर्य-माधुर्य स्वयं भगवान्को भी विस्मयमें डाल देता है भगवान्के माधुर्यकी भी यही स्थिति है। उनके माधुर्यपर देवांगना मुग्ध हो गयीं। जब देवर्षि, महर्षि, वीतराग, मुनीन्द्र-योगीन्द्र सब आपके लोकोत्तर लावण्यपर लट्टू हो गये, ज्ञान-ध्यान सब उड़ गया, तब सरस, सहृदय गोपीश्वरी आदिकी तो बात ही क्या? आपके माधुर्यमें इतना वैलक्षण्य है कि और तो मुग्ध हों सो हों ही, पर आप स्वयं भी उसे निहारकर मन्त्रमुग्ध हो गये— यन्मर्त्यलीलोपयिकं स्वयोग- मायाबलं दर्शयता गृहीतम्। विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः परं पदं भूषणभूषणाङ्गम्॥ (श्रीमद्भा० ३।२।१२) इसमें ‘विस्मापनं स्वस्य च’ कहा है। इसका अभिप्राय यही है कि वह भगवद्विम्ब स्वयं भगवान्को भी आश्चर्य उत्पन्न करनेवाला था। लोकमें सौन्दर्य- सम्पादनकी सामग्री अलंकार हैं, गहने-कपड़े हैं। इनसे अंगोंकी शोभा बढ़ती है। परंतु श्रीभगवद्विग्रह तो— ‘परं पदं भूषणभूषणाङ्गम्’ है। प्रभुका मंगलमय स्वरूप, उसका एक-एक अंग भूषणोंको भी भूषित करनेवाला है, भूषणका भी भूषण है—(‘भूषणभूतानि अंगानि यस्य तत्’) मोरमुकुट, बाँकी लकुट, कारी कामरी, गुंजामाला, वनमाला अथवा कौस्तुभमणि आदि श्रीअंगमें धृत होकर अपनी शोभा पाते हैं। कहा है— वक्षोध्रिवासमृषभस्य महाविभूतेः पुंसां मनोनयननिर्वृतिमादधानम्।