भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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हैं—‘स्वाराज्यलक्ष्म्‍याप्तसमस्तकामः।’ (श्रीमद्भा० ३।२।२१) (‘स्वेनैव राजते दीप्यते’) किसी दूसरेके प्रकाशसे नहीं, अपने ही प्रकाशसे— स्वतःप्रकाशसे प्रकाशमान तथा उसीसे पूर्णकाम। जैसे समुद्र अपने ही जलसे पूर्ण है। इन्द्र, महेन्द्र देवाधिदेव आकर उन पूर्णतम प्रभुको नमस्कार करना चाहते हैं—उनके चरणोंमें अपना मस्तक रखना चाहते हैं, परंतु उन्होंने अपने मस्तकोंपर जो मुकुट- किरीट धारण किये हैं, वे बहुत कठोर हैं और श्रीप्रभुके चरण बहुत ही कोमल हैं। अतः उनमें गड़ जानेके डरसे रत्नमय पादपीठको (पाँव रखनेकी चौकीको) ही वे लोग प्रणाम करते हैं अथवा महत्त्वातिशयवश प्रभुके चरणोंतक अपने मस्तकको ले जानेकी हिम्मत नहीं होती, अतः पादपीठपर ही उसे छुआते हैं अथवा अपनी लघुता बतलानेके लिये पादपीठपर ही किरीटवेष्टित मस्तकको रखते हैं। किरीटोंके पादपीठपर रखे जानेसे खट-खट शब्द होता है, वह मानो किरीटकृत स्तुति है, अर्थात् श्रीभगवान्‌के पादस्पर्शको पाकर जड़ चौकीमें ऐसी चेतनता—विलक्षण चेतनता—आ गयी कि जिसके क्षणिक स्पर्शसे किरीट-जैसे जड़ पदार्थ भी बोलने लगे, वह बोलना भी सामान्य नहीं, अपितु स्तुतिके रूपमें, जहाँ गुणगणाढ्यताके साथ चातुर्यकी परम अपेक्षा है। यों इन्द्रलोक, रुद्रलोक, ब्रह्मलोक, वैकुण्ठलोकादिके देवाधिपति बड़े भय, आदर और हर्षसे स्तुति करते हैं तथा महामहामूल्यवान् उपहार लेकर उनके श्रीचरणोंमें समर्पित करते हैं। कहाँ तो यह उच्चदृष्टि, यह ऐश्वर्य और कहाँ हरिणियोंकी पूजा ? जिन्होंने वेद, वेदान्त नहीं पढ़ा, षड्दर्शनका अभ्यास नहीं किया, उपास्यस्वरूप समझना जिनके लिये कठिन है, उन्होंने दर्शनसे—केवल दूरके दर्शनसे पूजा की और धन्यवादकी पात्र बन गयीं— धन्याः स्म मूढमतयोऽपि हरिण्य एता या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेषम्। आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः॥* (श्रीमद्भा० १०।२१।११) इसपर श्रीमद्वल्लभाचार्यजीका कथन है—वस्तुतः ऐश्वर्यकी सच्ची पराकाष्ठा तभी समझी जा सकती है, जब सभी वर्गके लोग धनी, गरीब, पण्डित, मूर्ख समान भावसे आराधना कर सकें। ये हरिणी केवल प्रेमसे अवलोकन करके ही पूजा कर सकती हैं। इनके पास और कुछ पूजा-सामग्री ही नहीं है और न ये उसे जुटा सकनेमें समर्थ हैं। श्रीभगवान्‌ने इनकी इसी पूजाको स्वीकार किया और इनका सत्कारत्मक प्रतिपूजन भी किया। पूज्यको कोई पुष्कल भेंट समर्पण करके पूजा करे, यह बात नहीं है। साधारण वस्तुसे भी उनकी पूजा हो सकती है, केवल भावकी गाढ़ता चाहिये। भगवान्‌ने स्वयं कहा है— अण्वप्युपाहृतं भक्तैः प्रेम्णा भूर्येव मे भवेत्। भूर्यप्यभक्तोपहृतं न मे तोषाय कल्पते॥ (श्रीमद्भा० १०।८१।३) भगवान्‌की पूजामें भावका प्राधान्य है, प्रचुर उपचारोंका नहीं अर्थात् अभक्तके द्वारा बहुत भेंट की गयी वस्तु मुझे सन्तुष्ट नहीं कर सकती, परंतु भक्तोंके द्वारा प्रेमसे, श्रद्धासे समर्पित की गयी थोड़ी-सी अणुभर भी वस्तु प्रेमसे, प्रेमकी महिमासे—मेरे लिये बहुत अधिक हो जाती है। श्रीसुदामाके तन्दुल श्रीश्यामसुन्दरके योग्य थोड़े ही थे, परंतु श्रीभगवान्‌ने उन्हें जबर्दस्ती छीन लिया। यद्यपि श्रीसुदामाके दुपट्टेके कोनेमें उनकी ब्राह्मणीने श्रीकृष्णके भेंटके लिये ही पड़ोसिनसे माँगकर उन मुट्ठीभर तन्दुलको बाँध दिया तथापि श्रीकृष्णका वह महाराज-भाव, वह ऐश्वर्य देखकर

  • अरी सखी! जब प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण विचित्र वेष धारण करके बाँसुरी बजाते हैं, तब मूढ़ बुद्धिवाली ये हरिणियाँ भी वंशीकी तान सुनकर अपने पति कृष्णसार मृगोंके साथ नन्दनन्दनके पास चली आती हैं और अपनी प्रेमभरी बड़ी-बड़ी आँखोंसे उन्हें निरखने लगती हैं। निरखती क्या हैं, अपनी कमलके समान बड़ी-बड़ी आँखें श्रीकृष्णके चरणोंपर निछावर कर देती हैं और श्रीकृष्णकी प्रेमभरी चितवनके द्वारा किया हुआ अपना सत्कार स्वीकार करती हैं। वास्तवमें उनका जीवन धन्य है! (हम वृन्दावनकी गोपी होनेपर भी इस प्रकार उनपर अपनेको निछावर नहीं कर पातीं, हमारे घरवाले कुढ़ने लगते हैं। कितनी विडम्बना है!)