भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 391, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासपंचाध्यायी ३८१ 'का स्त्र्यङ्ग ते कलपदायतमूर्च्छितेन सम्मोहितार्यचरितान्न चलेत्रिलोक्याम्।' (श्रीमद्भा० १०।२९।४०) 'हे मोहन! आपके कलपदायतसे, मधुर संगीतलहरीसे, कौन देवी-दानवीतक, जड़-चेतनतक मोहित होकर आर्यधर्मसे विचलित न हो जायगी? सूर्यसे जैसे दिन, आपके रूपसे वैसे ही संसारमें सौभग सौन्दर्य है। आपके दर्शनके लिये गायें भी, पशु भी लालायित रहते हैं'— गावश्च कृष्णमुखनिर्गतवेणुगीत- पीयूषमुत्तभितकर्णपुटैः पिबन्त्यः। शावाः स्नुतस्तनपयः कवलाः स्म तस्थु- र्गोविन्दमात्मनि दृशाश्रुकलाः स्पृशन्त्यः॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।१३) वे आपके मुखसे निकले वेणुगीतपीयूषका अपने कर्णरूप दोनों पानपात्रोंको सावधानीसे उठाकर पान करती हैं। वे अपने बाहुओंसे आपका सुस्पर्शसौख्य लेनेमें असमर्थ हैं; क्योंकि उनके बाहु इस योग्य नहीं। अतः सजल नेत्ररन्ध्रोंसे आपकी मधुर मूर्तिको हृदयमें पधराकर ('हृदि स्पृशन्त्यः') उसका वे निर्विघ्न आलिंगन करती हैं और दूध पी रहे उनके बछड़े आपको देखकर वेणुनाद सुनकर चकित रह जाते हैं, स्तनोंसे बहते और मुखमें गये दूधको पीना भूल जाते हैं, अतएव वह बाहर यों ही झरने लगता है। हरिणियोंकी भी यही दशा है— धन्याः स्म मूढमतयोऽपि हरिण्य एता या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेषम्। आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।११) वे एक तो पहले ही मूढ़मति हैं, फिर नन्दयशोदानन्दन श्रीश्यामसुन्दरको विचित्र वेशधारी देखकर और उनके विचित्र वेणुनादको सुनकर अपने पतियोंके साथ और भी मूढ़मति हो जाती हैं, सुधबुध भूल जाती हैं। इसी विभोर दशामें वे प्रणयावलोकनसे, अपनी समस्त सम्पत्तिसे उनकी पूजा करती हैं, वे धन्य हैं। 'हाँ तो सखियो! इसमें जो ये रोमावली आदि हैं, यह सब उन्हीं श्रीश्यामके दर्शन और स्पर्शका फल है। वृक्षोंमें, लताओंमें रोमावली उनके स्पर्श बिना नहीं हो सकती। सखि मालति! हमें इन लक्षणोंसे पता लग गया, वे तुम्हारे पास होकर गये हैं। इतना ही नहीं, तुम दासीको तत्रापि पुष्पिणी (रजस्वला)-को स्पर्श करते हुए गये हैं। बतलाओ सखि! किस तरफ गये हैं?' यों परिहास भी करती हैं, पूछती भी हैं। व्रजांगनाओंको श्रीकृष्णके वियोगमें धैर्य नहीं है। वे चाहती हैं—किसी प्रकारसे जल्दी पता मिले। अतएव एक साथ ही कईसे पूछ जाती हैं— 'मल्लिके जाति यूथिके।' (श्रीमद्भा० १०।३०।८)। इससे उनका अधैर्य द्योतन होता है। एक-एकसे प्रश्न करना, उत्तर सुनना धैर्यका काम है। पर वे चाहती हैं—'कोई भी दयावती जल्दी बतला दे। लताओंकी ओरसे मानो प्रश्न है—'हे व्रजांगनाओ! हम तो जड़ हैं, प्रेमोन्मादमें तुम हमसे प्रश्न कर रही हो।' इसपर व्रजांगना कहती हैं—'तुम झूठ बोलती हो, रहस्यको छिपाती हो, परंतु तुम्हारा यह पुष्पविकास, यह मकरन्दस्राव, तुम्हारी मानसप्रफुल्लता और आनन्दाश्रुको स्फुट ही बतला रहा है। यह सब श्रीश्यामसुन्दर- सम्पर्कको बिना पाये नहीं हो सकता। यह चमत्कार उसीमें है। हमलोग, हे लताओ! यह सब अनुभव कर चुकी हैं। यह कल्पना अपने विषयमें मत करो कि हम जड़ हैं, तुमलोग जड़ नहीं, बड़ी चतुर हो। बतलाओ, श्रीश्यामविहारी किस ओर गये हैं?' श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्दके ऐश्वर्य-माधुर्यपर एक दृष्टि डालनेसे सहज ही उनके सम्पर्कका महत्त्व ज्ञात हो जायगा। श्रीभगवान्के ऐश्वर्यकी तुलना अतुलनीय है। कहा है— 'स्वयं त्व०''''किरीटकोट्येडितपादपीठः॥' (श्रीमद्भा० ३।२।२१) स्वयं अद्भुत ऐश्वर्यवान् हैं। वह भी ऐसे कि किसीके साथ समानता ही नहीं बनती—असाम्यातिशय है—'न तत्समश्चाभ्यधिकः' (श्वेताश्वतर० ६।८) उनके-जैसा तीनों लोकमें कोई नहीं। स्थूल, सूक्ष्म और कारण जगत्के वे महान् अधिपति हैं और